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शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

छोटे अखबारों की बड़ी लड़ाई
एस0राजेन टोडरिया
आने वाला इतिहास जब कभी मौजूदा मुख्यमंत्री के राजनीतिक सफर को बयां करेगा वह यह भी दर्ज करेगा कि उन्होने अपनी राजनीति का ककहरा भले ही शिशु मंदिर के शिक्षक के रुप में सीखा हो पर राजनीति में उनकी उड़ान की शुरुआत टूटे अक्षरों की इबारत वाले एक चार पेजी अखबार से हुई थी। विडंबना यह है कि वही इतिहास उन्हे पूरी शक्ति,सामर्थ्य और जुनून के साथ छोटे अखबारों के गला घोंटने के लिए भी याद करेगा। भविष्य मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के व्यक्तित्व को इस विरोधाभास की रोशनी में पढ़ेगा और इस अजूबे से विस्मय में भी पड़ेगा। वह शायद इतिहास में अकेले ऐसे पत्रकार राजनेता होंगे जो मात्र कुछ सैकड़ा बंटने वाले छोटे-छोटे अखबारों में भी असहमति और आलोचना के स्वर बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं। यह इस बात का भी सबूत है कि सत्ता आदमी को किस हद तक दुर्बल,दयनीय और असहिष्णु बना देती है।उत्तराखंड में बड़े अखबारों और क्षेत्रीय चैनलों को मिलाकर मीडिया की कुल जमा जो तस्वीर बनती है वह चारण अखबारों और चमचा चैनलों की बनती है। काश! हमारे समय में भी कोई भारतेंदु हरिश्चंद्र होते तो मीडिया की इस दुर्दशा पर कोई नाटक जरुर लिखते। फिर भी मीडिया की इस दुर्दशा का पूरा श्रेय सिर्फ मौजूदा मुख्यमंत्री के पुरूषार्थ को देना ठीक नहीं होगा। एनडी तिवारी ने अपने राजनीतिक जीवन के पूरे अनुभव को झोंकते हुए करोड़ों रु0 की खनक के बूते मीडिया की इन कुलीन कुलवधुओं को नगरवधू बना दिया। तिवारी की ही परंपरा पर चलते हुए मौजूदा मुख्यमंत्री ने इन्हे हरम पहुंचा दिया है। विज्ञापन का बजट हर रोज छलांगें मार रहा है। अंतःपुर के कारिंदे रोज किसी न किसी को लाख-दो लाख से लेकर तीस-तीस लाख के पैकेजों की बख्शीशें दिला रहे है। राजा ने अपना खजाना खोल दिया है, ‘‘लूट सके तो लूट’’। प्रदेश में अभूतपूर्व आपदा है, पहाड़ के गांवों में लोग एक-एक पैसे और एक टाइम के खाने के लिए जूझ रहे हैं पर सरकार है कि चैनलों में प्राइम टाइम में दस साल का जश्न पर करोड़ों के विज्ञापन लुटा रही है। विधानसभा चुनाव से पहले की इस लूट में मीडिया मस्त है और पत्रकारिता पस्त है। यह सुनकर अजीब लगे पर सच यही है कि आपदा के दौरान भी उत्तराखंड के दैनिक अखबारों और क्षेत्रीय चैनलों के लिए विज्ञापन कम नहीं हुए उल्टे बढ़ गए । आपदा को लेकर दिए गए विज्ञापनों के आंकड़े इस उलटबांसी के गवाह हैं। अखबारों ने आपदा के नाम पर भी विज्ञापन कमाई के जरिये निकाल लिए।एक हिंदी अखबार ने राहत कार्यों पर सरकार की चमचागिरी का नया रिकार्ड कायम कर दिया। ऐसा घटियापन कि कल्पना करना मुश्किल है कि खरबों रु0 का मीडिया हाउस चलाने वाली कंपनी का एक अखबार मात्र 28 लाख रु0 के पैकेज के लिए इस हद तक गिर जाएगा!लेकिन यह कोई अपवाद नहीं है। ऐसे वाकये अक्सर होते रहते हैं सिर्फ अखबारों के नाम बदल जाते हैं। कुछ अखबार चमचागिरी में शऊार बरतते हैं तो कुछ नंग-धड़ंग होकर 17 वीं सदी के भांडों की तरह इसे अंजाम दे रहे हैं। उत्तराखंड में बड़े दैनिकों ने संपादक को ऐसे प्राणी में बदल दिया गया है जो सरकारी विज्ञापनों के लिए मुख्यमंत्री को रिझाने और पटाने के वे सारे गुण जानता हो जो एक समय गणिकाओं के लिए जरुरी माने जाते थे। माहौल ऐसा है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग सुबहो शाम समाचार माध्यमों में ‘तन डोले मेरा मन डोले’ की धुन ही सुनना चाहते हैं। मुख्यधारा के इस रवैये ने राज्य की पत्राकारिता को भांडगिरी में बदल दिया है। एक अखबार ने मुख्यमंत्री के पुतले जलाने की घटनाओं की खबरें छपने से रोकने के लिए संवाददाताओं को पुतलादहन की खबरें न भेजने का फरमान जारी कर दिया तो दूसरे ने राजनीतिक खबरें छोटी और बाजार से जुड़ी खबरें बड़ी छापने की आचार संहिता लागू कर दी है। अखबार और चैनलों के दफ्तरों में ऐसी खबरों का गर्भपात कर दिया जाता है जिनमें थोड़ा भी मुख्यमंत्री विरोध की गंध आती हो। मंत्रियों और अफसरों के खिलाफ छापिए पर उतना ही जितने में मुखिया की छवि पर असर न पड़े, यह अलिखित आचार संहिता अखबारों और चैनलों के ऑफिसों में लागू है। खबरें न छापना आज सबसे बड़ा कारोबार बन गया है। पत्रकारिता की पेशेवर ईमानदारी का हाल यह है कि पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी की खबरें अखबारों और चैनलों से सिर्फ इसलिए गायब कर दी गई हैं क्योंकि सत्ता के शिखर पुरूष को चैनलों और अखबारों में जनरल नाम तक देखना पंसद नहीं है। समाचार माध्यम इस संकीर्णता और अनुदारता के राजनीतिक एजेंडे के एजेंट बने हुए हैं। गौरतलब है कि ये वही अखबार और चैनल हैं कि जो जनरल के मुख्यमंत्रित्व काल में उनकी ईमानदारी के कसीदे पढ़ रहे थे। वह वक्त चला गया जब बड़े अखबार सरकारी दबाव झेलने के लिए ज्यादा बेहतर माने जाते थे और तमाम दबावों के बावजूद वे सत्ता की दौलत और ताकत के आगे तने दिखते थे। अब ऐसा समय है जब ये अखबार सरकारी विज्ञापनों के बिना जिंदा ही नहीं रह सकते हैं। पहले छोटे अखबार अपनी आर्थिक संसाधनों की सीमाओं के चलते ज्यादा नाजुक माने जाते थे। बाजार की महिमा देखिये कि उसने कई हजार करोड़ के बड़े-बड़े मीडिया हाउसों को छुईमुई बना दिया है। चारणों और चमचों की पांत में सबसे आगे वे ही हैं जो सबसे बड़े हैं।लेकिन क्षेत्रीय चैनलों और बड़े अखबारों के पतित होने से सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध की आवाजें दबी नहीं हैं। उत्तराखंड के स्थानीय और छोटे अखबारों के एक हिस्से ने सरकार के आगे घुटने टेकने से इंकार कर दिया है। यह एक सकारात्मक बदलाव है। इस हिस्से में लगातार घोटाले छप रहे हैं, मुख्यमंत्री के खिलाफ खबरें और विश्लेषण छप रहे हैं। इससे हैरान और परेशान मुख्यमंत्री ने पहले घोषणापत्र की आड़ में इन छोटे अखबारों को धमकाने की कोशिश की, सूचना विभाग के अफसर खबरों पर संपादकों के जबावतलब करने की हद तक चले गए। इस पर शर्मिंदा होने के बजाय एक छोटे अखबार के स्वामी,प्रकाशक और संपादक रहे राज्य के मुखिया की छाती गर्व से फूलती रही कि उन्होने छोटे अखबारों को उनकी औकात बता दी। उनके मुंहलगे अपफसर और कांरिंदे हर रोज विरोध में लिखने वाले अखबारों का आखेट करने के तौर तरीके खोजने में लगे हैं। इसी के तहत सचिवालय और विधानसभा में छोटे अखबारों के घुसने पर पाबंदी लगा दी है। जबकि बड़े अखबार वहां बांटे जा सकते हैं। सत्ता के इन शुतुरमुर्गों को यह समझ नहीं आ रहा है कि सरकार के कुछ अफसरों और कर्मचारियों के न पढ़ने से क्या मुख्यमंत्राी के खिलाफ आए दिन छपने वाली खबरों और घोटालों की मारक क्षमता कम हो जाएगी? जाहिर है कि आम लोगों तक तो वे पहुंचेंगी ही। ऐसे कदम एक सरकार की बदहवासी और डर को जाहिर करते हैं और उस पर कमजोर सरकार का बिल्ला भी चस्पा कर देती हैं। तानाशाही सनकों से भरे ऐसे फैसलों के बावजूद न छोटे अखबार डर रहे हैं और न मुख्यमंत्री के खिलाफ खबरें छापने से बाज आ रहे हैं। यह एक तरह से छोटे प्रेस की गुरिल्ला लड़ाई है जो सत्ता के महाबली शिखर पुरुष पर हमले कर उसे बेचैन किए हुए है। जिसने मुख्यधारा के मीडिया को लौह कपाट वाले अपने काले-कलूटे गेट पर चौकीदारी के लिए बांध दिया है, ऐसे शिखर पुरुष के खिलाफ छोटे अखबारों की यह लड़ाई महत्वपूर्ण भी है और सत्ताधारियों के लिए चेतावनी भी है कि वे समूचे प्रेस को दुम हिलाने वाला पालतू पशु में नहीं बदल सकते। कुछ लोग हर समय रहेंगे जो सत्ता के खिलाफ सच के साथ रहने का जोखिम उठायेंगे। यह सिलसिला चलता रहेगा। उल्लेखनीय यह है कि चारणकाल में सच कहने की जुर्रत करने वाले इन सारे छोटे अखबारों,पत्रिकाओं की कुल प्रसार संख्या मुश्किल से कुछ हजार ही है। जो लाखों छपने और बंटने वाले दैनिक अखबारों की दस फीसदी भी नहीं है लेकिन इतनी कम संख्या के बावजूद राज्य के मुखिया इनसे घबराये हुए हैं। लाखों पाठक और दर्शक संख्या वाले अखबार और चैनलों सुबह-शाम प्रशस्ति वाचन के कर्मकांड में लगे हुए हैं तब भी विरोध की इन तूतियों से राजा क्यों हैरान हैं? दरअसल इन अखबारों ने खबरों के असर के उस तिलिस्म को तोड़ दिया है जो बड़े अखबार प्रचारित करते रहे हैं। खबरों पर बड़े अखबारों का एकाधिकार ही नहीं टूटा है बल्कि उनकी सीमायें, दरिद्रता और दयनीयता भी उघड़ गई है। पत्रकारिता के इस समर में वे कागजी शेर साबित हो रहे हैं,उनकी कथित ताकत का मिथक टूट रहा है। जनमत को प्रभावित करने में उनकी भूमिका अब सिफर हो गई है। उनकी हर खबर पर उंगलियां उठती हैं और उसे सत्ता या स्थानीय ताकतवर लोगों के हाथों बिकी हुई खबर मान लिया जाता है। उन्हे खबरों का सौदागर करार दिया जा रहा है। उनके दफ्तरों में सच को कत्ल करने के लिए जो कसाईबाड़े बने हैं उनकी दुर्गंध अब जनता तक पहुंचने लगी है। राज्य के लोग समझ रहे हैं कि राजा नंगा है पर खबरों के ये दुकानदार उसके कपड़ों के डिजायन की तारीफ में पन्ने रंग रहे हैं। मुख्यधारा के समाचार माध्यमों की साख के इस तरह निम्नतम स्तर पर पहुंच जाने से ही आम लोग खोज-खोज कर सरकार विरोधी खबरें पढ़ रहे हैं। इससे इतना तो पता चल ही जाता है कि लोगों का रूझान बदल रहा है,जिस पाठक को मीडिया के महारथी ‘विचारविहीन उपभोक्ता’ प्राणी घोषित कर चुके हैं उसका मिजाज बदल रहा है। वह बदलाव के मोर्चे पर भले ही लड़ाई नहीं लड़ रहा हो पर वह सत्ताधरियों के काले सच को विचार के साथ जानना चाहता है। उत्तराखंड कभी भी वैचारिक रुप से गंजे लोगों की नासमझ भीड़ नहीं रहा है। उसके भीतर सच जानने को उत्सुक समाज है। लोकप्रियता में आये इस उछाल से छोटे अखबारों को भी मुगालते में नहीं रहना चाहिए। यह उनका नहीं उस सच का चमत्कार है जो वे छाप रहे हैं। छोटे अखबार यदि अपने हीनताबोध से उबर सकें तो वे साबित कर सकते हैं कि अखबार बड़े या छोटे नहीं होते, ये खबरें हैं जो अखबारों को बड़ा बनाती हैं तो उन्हे छोटा भी साबित कर देती हैं। खबरों की मारक सीमा और क्षमता हर साल जारी होने वाले प्रसार संख्या के निर्जीव और गढ़े गए आंकड़ों से तय नहीं होती। खबरों में सच और दम होता है तो वे एक मुख से दूसरे मुख तक होते हुए या फोटोस्टेट होकर भी कई गुना घातक हो जाती हैं। सच और अपने समाज की समझ मामूली माने जाने वाली खबरों को भी कालजयी बना देती है।उत्तराखंड के पत्रकारिता क्षितिज पर घट रही यह छोटी सी घटना बताती है कि देश के स्तर पर पत्रकारिता को समर्पित छोटे अखबारों,चैनलों और इंटरनेट अखबारांें के बीच यदि राष्ट्रीय स्तर पर तालमेल और संवाद स्थापित हो सके तो जनपक्षीय पत्रकारिता का एक बड़ा गठबंधन भविष्य में उभर सकता है। यह कठिन है पर इस दिशा में गंभीर प्रयास शुरू किए जाने चाहिए। मीडिया हाउसों के एकाधिकारवादी भस्मासुरों के खिलाफ यह पत्रकारिता के जनतंत्राीकरण और विकेंद्रीकरण की शुरूआत हो सकती है।

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

21000 करोड़ का झूठ

बरसात का कहर अभी थमा भी न था कि मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार से 21हजार करोड़ का राहत पैकेज मांगकर अपने अफसरों से लेकर भाजपा के बड़े नेताओं को हैरत में डाल दिया। विशेषज्ञ सशंकित थे कि नौकरशाही मुख्यमंत्री के भारी भरकम आंकड़े के बराबर की आपदा को फाइलों में कैसे डिजायन कर सकेगी। राजनीतिक दबाव में सरकारी अमले ने 21000 करोड़ रुपए की आपदा को फाइलों में पैदा कर दिखा दिया कि आंकड़ेबाजी की कला में वे देश के सबसे बेहतरीन सरकारी तंत्र हैं। केंद्र में कई जिम्मेदारियां निभा चुके एक रिटायर्ड आईएएस अफसर ने इस आंकड़े पर टिप्पणी करते हुए कहा,‘ अविश्वसनीय! विचित्र!! और बचकाना!!! उन्होने आगे कहा,‘ लगता है आपके मुख्यमंत्री पिस्तौल पाने के लिए तोप का लाइसेंस मांग रहे हैं।’ आपदा राहत के इतिहास के दस सबसे बड़े राहत पैकेजों में से एक के लिए इतना भारी भरकम आंकड़ा खोजकर खुद को कोलबंस मान रही सरकार को शायद पता भी न हो उसके आंकड़े ही इस फर्जीवाड़े की पोल खेल रहे है। इन आंकड़ों का विश्लेषण साबित कर देता है कि इसमें बुनियादी बातों का भी ध्यान नहीं रखा गया। सारे कामों की वीडियोग्रापफी कराने के केंक्त के अभूतपूर्व फैसले ने इन आंकड़ों की साख पर सवालिया निशान लगा दिया है। विडंबना यह है कि इस महाकाय राशि में में आपदा पीड़ितों के हिस्से बस एक फीसदी ही आएगा । उनमें से अधिकांश को 2,250 रु0 से ज्यादा नहीं मिलेंगे । राहत की मलाई सरकारी विभागों के लिए आरक्षित होगी।राज्य सरकार द्वारा केंद्र को भेजे गए 21000 करोड़ रुपए की राहत की डिमांड का विश्लेषण करने से पहले यह जानना उचित होगा कि यह आंकड़ा किस तरह से तैयार हुआ। दैवी आपदा के आकलन का ग्रास रूट पर पटवारी ही एकमात्र सरकारी कर्मचारी है। इस समय पहाड़ में 1,220 पटवारी हैं जिनमें से हरेक को औसतन सात गांव देखने पड़ते हैं। इन्ही पटवारियों से मिली सूचना के अनुसार सरकार से उन्हे 25 सितंबर को आपदा से हुए पूरे नुकसान की रिपोर्ट भेजने का आदेश मिला और अक्तूबर के पहले सप्ताह में उन्होने रिपोर्ट जिला प्रशासन को भेज दी। इन रिपोर्टों को संकलित करने में यदि दो दिन भी लगे हों तब भी यह रिपोर्ट दस अक्तूबर को ही राज्य मुख्यालय पहुंच पाई होगी। लेकिन मुख्यमंत्री ने 21000 करोड़ के नुकसान का बयान 22-23 सितंबर को हुए विधानसभा सत्र के दौरान ही दे दिया था। सचिव आपदा डा0राकेश कुमार के अनुसार नुकसान के इस आकलन को केंद्रीय राहत दल के आने से पहले 30 सितंबर को अंतिम रुप दे दिया गया था। क्या मात्रा एक सप्ताह में लगभग एक लाख 20 हजार लंबी सड़कों, नहरों और बिजली लाइनों, साढ़े सात लाख हेक्टेयर कृषि भूमि, दो लाख हेक्टेयर बगीचों,23 लाख मकानों और लगभग 22 हजार स्कूल भवनों का सर्वे किया जा सकता है? वह भी सिर्फ दो हजार कर्मचारियों द्वारा? 670 कृषि कर्मी एक सप्ताह में 7 लाख 16 हजार हैक्टेयर यानी एक कर्मचारी ने प्रतिदिन 4 गांवों की 7600 नाली जमीन पर खड़ी फसल का सर्वे किया। एक उद्यानकर्मी ने प्रतिदिन में 6 गांवों में जाकर 2300 नाली में स्थित बगीचों का सर्वे कर लिया। यदि ऐसा हुआ है तो यह चमत्कारिक है। आश्चर्यजनक यह भी है कि सार्वजनिक संपत्तियों और कृषि भूमि को हुई क्षति के आकलन के लिए सरकार ने ग्राम स्तर पर समितियों के गठन का शासनादेश 13 अक्तूबर को जारी किया। इस आदेश में सभी जिलों के डीएम को ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य, ग्राम विकास अधिकारी और स्थानीय प्राइमरी विद्यालय के शिक्षक की चार सदस्यीय समिति गठित करने का निर्देश दिया गया। समितियों को क्षतियों के विवरण भेजने के लिए एक सप्ताह का समय दिया गया। जाहिर है कि यह ब्यौरा 20 अक्तूबर तक जिलाधिकारियों तक पहंुचा होगा और जिलों से संकलित होकर 23 अक्तूबर तक यह सचिवालय आया होगा।अब सवाल यह उठता है कि जब 23 अक्तूबर तक अंतिम रिपोर्ट नहीं आई तब मुख्यमंत्री ने एक माह पहले, सचिवालय ने तीन सप्ताह पहले कैसे 21000 करोड़ रु0 के नुकसान का सटीक पूर्वानुमान लगा दिया और यही नहीं इस अनुमान को आंकड़ों में ढ़ालकर केंक्तीय दल और प्रधनमंत्राी को भी सौंप दिया। गजब यह कि ऐसा पटवारियों द्वारा भेजी गई पहली रिपोर्ट से भी पहले ही कर दिया गया। इसी संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि सरकार में आपदा के आकलन को लेकर खासा कन्फ्यूजन व्याप्त है। इसी कारण से नुकसान के आकलन को लेकर शासन में रिपोर्टों के प्रारूप बदलते रहे। 4 सितंबर को शासन ने सभी विभागों को पत्र भेजकर केंद्र के मानकों के आधार पर रिपोर्ट तलब की फिर 14 सितंबर को नया प्रारुप भेजकर आंकड़ों को नये सिरे से मंगाया गया। इस प्रारूप में मानक बदल दिए गए। सूत्रों का कहना है कि नुकसान के सूचकांक को 21000 करोड़ रु0तक पहुंचाने का ड्रीम प्रोजेक्ट इसी प्रारूप के साथ शुरू हुआ। अब एक बार फिर समितियां बनाकर नुकसान का जायजा लिया जा रहा है। इस प्रकार विभागों से तीन बार रिपोर्टें मंगाई गईं। यह कन्फ्यूजन आंकड़ों के पीछे चल रहे खेल को उजागर कर देता है।भूस्खलन से प्रभावित गांवों को लेकर केंद्र को भेजी गई रिपोर्ट से भी यही जाहिर होता है। सर्वे के लिए अभी भूविज्ञानियों के दल बाद में गठित किए गए और उनका सर्वे अभी तक पूरा नहीं हुआ पर सरकार सितंबर में ही इस नतीजे पर पहुंच गई कि 233 गांव अब लोगों के रहने के लिए खतरनाक हो चुके हैं और इनके पूर्ण विस्थापन के अलावा कोई विकल्प नहीं है। चंूकि मांगी गई राहत का 57 फीसदी इन गांवों के ही पुनर्वास पर खर्च किया जाना है इसलिए इस आंकड़े की विश्वसनियता मायने रखती है। इसका न केवल वैज्ञानिक आधार होना चाहिए बल्कि राज्य और केंद्र द्वारा प्रति परिवारके लिए निर्धरित पुनर्वास राशि के मानक पर इस आंकड़े को खरा उतरना चाहिए पर सच्चाई यह है कि सरकार के इस आंकड़े का कोई वैज्ञानिक आधार अभी तक स्थापित नहीं हो पाया है और यह केवल प्रथम दृष्ट्या सतही अनुमान मात्र है।अब जरा तथ्यों और तर्क पर सरकार के आंकड़ों को परखा जाय। राज्य सरकार के आंकड़े के हिसाब से 233 गांवों के 3049 परिवारों के पुनर्वास के लिए 12000 करोड़ रूपए उसे चाहिए। यानी वह पुनर्वास के लिए प्रति परिवार पर 4 करोड़ रुपए खर्च करेगी। यदि ऐसा है तो देश की सबसे बेहतरीन पुनर्वास नीति और मानक तय करने के लिए उसकी पीठ थपथपाई जानी चाहिए। क्या वह निजी और सरकारी क्षेत्र के बिजली प्रोजेक्टों के विस्थापितों को वह इसी दर से मुआवजा देगी? टिहरी बांध के नए विस्थापितों के लिए सरकार जमीन इत्यादि का इंतजाम करने के बजाय एकमुश्त 38 लाख रु0 देने पर विचार कर रही है जो कि केंद्र को भेजे गए प्रति परिवार पुनर्वास खर्च का मात्र दसवां हिस्सा है। सरकार यदि एक करोड़ रु0 भी प्रति परिवार एकमुश्त भुगतान करने को तैयार हो तो इन 233 गांवों के लोग अपने लिए खुद ही जमीन का इंतजाम कर लेंगे। सरकार को उन पर 12000 करोड़ के बजाय सिर्फ 3000 करोड़ ही खर्च करने हैं। जाहिर है कि पुनर्वास पर आने वाला खर्च अव्यवहारिक और बढ़ाचढा कर पेश किया गया है। इसके पीछे इन गांवों को बसाने की मंशा नहीं बल्कि केंद्र को इस प्रस्ताव को नामंजूर करने के लिए बाध्य करने की रणनीति है।नुकसान दूसरा सबसे बड़ा आंकड़ा पीडब्लूडी का है जिसकी 13,600 किमी सड़कें तबाह हुई बताई गई हैं। इसके लिए केंद्र से पांच हजार पांच सौ 17 करोड़ रु0 मांगे गए हैं। यह कुल राहत का लगभग एक चौथाई है। यह आंकड़ा इसलिए चकित करता है कि राज्य में सड़कों की कुल लंबाई 26000किमी के आसपास है। इस आंकड़े के हिसाब से राज्य की आधी सड़कें पूरी तरह से नष्ट हो गई हैं। दूसरी ओर लोनिवि का दावा है कि उसने 90 फीसदी सड़कों पर यातायात बहाल कर दिया है। इस आंकड़े में केंद्र से हर सड़क के लिए प्रति किमी 37 लाख रु0 मांगे गए हैं। लोनिवि के सूत्र बताते हैं कि बिलकुल नई सड़क बनाने के लिए भी खर्च 30-35 लाख रु0 आता है। यदि बिल्कुल चट्टान काटकर बनानी है तो यह खर्च अधिकतम 45 लाख रु0 आएगा। तो क्या लोनिवि ये 13600 किमी पहले बन चुकी सड़कें चट्टानें काटकर बनाने वाली है। जाहिर है कि आंकड़े इतने बड़े कर दिये गए हैं कि एस्टीमेट की साख गिरकर शून्य हो गई है।विभागीय सूत्रों का कहना है कि यदि इतने ही किमी सड़कें वाकई प्रभावित हुई हैं तो भी पहले बनी सड़कों को ठीक करने पर अल्पकालीन और दीर्घकालीन खर्च 1000 करोड़ रु0 से ज्यादा नहीं आएगा। यानी केंद्र को पांच गुना ज्यादा का आंकड़ा भेजा गया है। शहरी क्षेत्रों में एक किमी सड़क बनाने के लिए 39 लाख 14 हजार रु0 की दर से 327 किमी सड़कें पूरी तरह से नई बनाने के लिए 128 करोड़ रु0 की डिमांड की गई है। क्या शहरों में 470 किमी सड़कें बह गई हैं? क्या सरकार शहरी निकायों को 39 लाख रु0 की इसी दर पर रखरखाव का खर्च दे रही है? जबकि इतनी ही किमी सड़कों को फिर से ठीक-ठाक करने पर वास्तविक व्यय 22 करोड़ आएगा। इसी प्रकार सिंचाई विभाग में यदि 1813 किमी नहरें और 470किमी तटबंध यदि पूरी तरह बह भी गए हैं तब भी 18 लाख प्रति किमी की दर से नहर और 60 लाख प्रति किमी की दर से बाढ़ सुरक्षा ढ़ांचे को तैयार करने में भी 611 करोड़ रु0 का खर्च आएगा जबकि सरकार ने इसका तिगुना 1522 करोड़ रु0 का एस्टीमेट केंद्र को भेजा है। बिजली विभाग की क्षति सरकारी आकलन के अनुसार एक किमी बिजली की लाइन का खर्च 15 लाख रु0है। सरकार के हिसाब से 1369 किमी बिजली की लाइनें पोल सहित नष्ट हो गई हैं। यानी हर जिले में 100 किमी बिजली की लाइनें पूर्ण नष्ट हो चुकी हैं। उस पर तुर्रा यह कि यूपीसीएल भी दावा कर रहा है कि सभी शहरी इलाकों और अधिकांश ग्रामीण इलाकों में बिजली आपूर्ति सामान्य है। सरकार के आंकड़ों का यकीन करें तो राज्य की पांच हजार पेयजल योजनायें नष्ट हो चुकी हैं। इन पर प्रति योजना 20 लाख 60 हजार रु0 का एस्टीमेट केंद्र को भेजा गया है। प्रधनमंत्री को दिए गए पत्र में दिए क्षति के आंकड़ों के अनुसार राज्य के 2356 विद्यालय नष्ट हुए हैं। इसके लिए राज्य सरकार हर विद्यालय के लिए 15 लाख 28000रु0 मांगे हैं। जबकि विश्वबैंक परियोजना के तहत बनने वाले प्राथमिक विद्यालयों के लिए केंद्र सरकार के मानक 3 लाख रु0प्रति विद्यालय और राज्य सरकार के मानक दो लाख रु0 प्रति विद्यालय है। केंद्रीय मानकों के अनुसार 2,356 विद्यालयों को फिर से नया बनाने के लिए 70 करोड़ और राज्य के मानकों के हिसाब से 47 करोड़ रु0 चाहिए पर डिमांड पांच से आठ गुना ज्यादा 360 करोड़ रु0 की है। इस प्रकार राज्य सरकार द्वारा की गई इस 20,336 करोड़ रु0 की डिमांड की असलियत यह है कि उसके नुकसान के आंकड़ों में छेड़खानी किए बगैर उन सुविधाओं को पहले जैसा करने और 233 गांवों को शानदार ढंग से बसाने पर भी 5000 करोड़ रु0ही खर्च आएगा जबकि सरकारी आंकड़ों में यह चार गुना बढ़ा दी गई है।सवाल उठता है कि सरकार ने राहत के मानकों को जानते हुए भी ऐसे आंकड़े क्यों पेश किये जो मानकों से तो कई गुना ज्यादा थे ही पर वास्तविकता से भी परे थे। यह सही है कि देश की लगभग हर राज्य सरकार प्राकृतिक आपदाओं के लिए केंद्रीय मदद मांगती हैं तो वे नुकसान के आंकड़ों को कुछ हद तक बढ़ा चढाकर पेश करती हैं। यह सामान्य प्रवृत्ति है। लेकिन हर राज्य सरकार यह भी ध्यान रखती हैं कि उनके द्वारा दिये गये आकलन की विश्वसनियता बनी रहे। यह राज्य और सरकार दोनों की साख के लिए जरुरी होता है। यदि आंकड़ा बेसिरपैर का हो तो शर्मिंदगी सरकार को ही उठानी पड़ेगी। ऐसा हुआ भी है। केंद्र सरकार ने अभूतपूर्व फैसला लेते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह प्रत्येक निर्माण कार्य से पहले और बाद की स्थिति की वीडियोग्राफी कराये। पहली बार किसी राज्य सरकार के कामकाज पर केंद्र ने इस तरह का खुला संदेह व्यक्त किया है। जाहिर है कि राज्य सरकार की साख सवालों के घेरे में है।ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि राज्य सरकार ने ऐसा आंकड़ा क्यों प्रचारित किया जो पहली ही नजर में अविश्वसनीय लग रहा हो। जिससे और तो दूर खुद भाजपा ही नहीं पचा पा रही हो। दरअसल यह राजनीतिक आंकड़ा है जो सन् 2012 के विधानसभा चुनाव की जरुरत से पैदा हुआ है। मुख्यमंत्री और उनके रणनीतिक सलाहकार जानते हैं कि केंद्र कुछ भी कर ले पर 21000 करोड़ रु0 की राहत मंजूर नहीं करेगा। ऐसे में भाजपा यह प्रचार कर सकेगी कि कांग्रेस ने आपदा में भी लोगों की पर्याप्त मदद नहीं की और जरुरत से बहुत कम सहायता दी। मुख्यमंत्री चालाक राजनेता हैं और चुनावी शतरंज की बिसात पर अपना एक-एक मोहरा शातिर तरीके से चल रहे हैं। यही वजह है कि 500 करोड़ रुपये की केंद्रीय मदद के बावजूद कांग्रेस बचाव की मुद्रा में है और एक धेला खर्च किए बगैर राज्य सरकार हमलावर है। बारीकी से बुनी गई इस रणनीति के तहत ही ग्राम स्तर पर मौजूद सरकारी अमला आपदा पीड़ितो को समझा रहा है कि उन्हे पर्याप्त राहत इसलिए नहीं मिल सकती क्योंकि केंद्र सरकार के मानक यही हैं। लोगों का गुस्सा कांग्रेस की ओर मोड़ने के इस नायाब तरीके के लिए ही 21000 करोड़ की राहत का फार्मूला निकाला गया है। इसे राजनीतिक रुप से कैश करने का बाकी काम जिला स्तर पर बन रही भाजपा की राहत कमेटियां करेंगी जो सरकारी राहत से अपने वोटबैंक का भला भी करेंगी और नाकाफी राहत से पैदा होने वाले गुस्से को कांग्रेस की ओर भी मोड़ेंगी।इसका एक और कोण है जो कांग्रेस देख रही है। कांग्रेस उपाध्यक्ष सुबोध उनियाल का कहना है कि विभागों को मिलने वाली केंद्रीय मदद का इस्तेमाल सरकार चुनावी फंड एकत्र करने में करना चाहती है। राज्य के आपदा पीड़ित इलाकों में आजकल आम चर्चा है कि निर्माण और मरम्मत कार्यों से जुड़े हर विभाग को दस लाख रु0 प्रति डिवीजन के हिसाब से ऊपर पहुंचाने को कहा गया है। गांवों की चौपालों पर यह भी खबर उड़ाइ जा रही है कि राजस्व, कृषि, उद्यान जैसे विभागों को 6 प्रतिशत ऊपर देने को कहा गया है। इन चर्चाओं का आधार तो पता नहीं पर इतना जरुर है कि इनसे गांवों की राजनीति गूंज रही है।आपदा में भ्रष्टाचार को लेकर आने वाले समय में जबरदस्त बबंडर उठने वाला है। खुद सरकारी अफसरों का कहना है कि यदि सरकार को फर्जी कामों से बचना है तो हर सिंचाई,लोनिवि, लघु सिंचाई, प्राथमिक विद्यालयों, शहरी निकायों और बिजली विभागों से जुड़ी सभी क्षतियों की वीडियोग्राफी गैर सरकारी स्वयंसेवी संगठनों और निष्पक्ष एजेंसियों से कराई जाय और सभी निर्माण एजेंसियों के कामों का सोशल ऑडिट कराया जाय ताकि भ्रष्टाचार की संभावना को न्यूनतम किया जा सके। उधर कांग्रेस का कहना है कि किसी भी हालत में कुंभ को दोहराने का मौका नहीं देंगे। कांग्रेस नेता केंक्त से यह भी मांग कर सकते हैं कि केंद्रीय मदद पर नजर रखने के लिए उसी तरह के इंतजाम किए जांय जिस तरह कॉमनवेल्थ के निर्माणकार्यों की जांच के लिए किए गए हैं।

रविवार, 29 अगस्त 2010


टूट रहा है लाल दुर्ग का तिलिस्म


आखिरी मुगल बनने की ओर प्रकाश का प्रस्थान



माकपा जब पश्चिम बंगाल में चुनाव के जरिये सत्ता पर काबिज हुई तो इसे भारतीय राजनीति में एक अजूबा माना गया। देश में काफी लोग थे जिन्हे तब लगा कि जैसे भारतीय लोकतंत्र पर आफत आ गई हो। कईयों को बैलेट बॉक्स से निकला यह कम्युनिस्ट राज कौम नष्ट करने वाला लगा। आठवें दशक से लेकर बीसवीं सदी तक भारतीय मीडिया को बंगाल का यूं लाल होना अच्छा नहीं लगा और समय-समय पर वह इस पर लाल पीला होकर अपनी कम्युनिस्ट विरोधी ग्रंथि को उजागर भी करता रहा। माकपा की कामयाबी पर भारत के कम्युनिस्टों की संसदीय प्रजाति मुग्ध रही है। माकपा के लिए भले ही केरल को छोड़कर शेष भारत की राजनीति सहारा का मरुस्थल बनी रही हो पर बंगाल उनके लिए नखलिस्तान से कम नहीं रहा। अपने इस साम्राज्य पर देश भर के माकपा नेता और कार्यकर्ता छाती फुलाते रहे हैं। उन्हे बराबर लगता रहा है कि देश में सिर्फ वही हैं जो संसदीय राजनीति के खांचे में अजेय साम्राज्य स्थापित करने का हुनर जानते हैं। इस अहसास के अहंकार से लबालब होकर वे छलकते भी रहे हैं। बंगाल माकपाईयों का राजनीतिक मक्का बना हुआ है और वे मीटिंगों, बहसों और अपने लेखों में बंगाल सरकार की नीतियों का पाठ कुरान की आयतों की तरह करते रहे हैं। माकपा की धर्मपुस्तक में बंगाल सरकार के खिलाफ बोलना कुफ्र माना जाता रहा है। चार दशक से चला आ रहा यह दुर्ग अब मुगल साम्राज्य के आखिरी समय के दौर से गुजर रहा है। वामपंथ के इस किले की अजेयता का तिलिस्म टूट रहा है और किताबी मार्क्सवाद के पंडित प्रकाश करात आखिरी मुगल होने की त्रासदी की ओर प्रस्थान कर चुके हैंं।पहले केरल और आठवें दशक में पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों के चुनाव के जरिये सत्ता में आने से भारतीय राजनीति संसदीय कम्युनिज्म का उदय हुआ। नंबूदरिपाद और ज्योति बसु समेत भाकपा और माकपा के कम्युनिस्ट नेता इसके शिल्पकार रहे हैं। ज्योति बसु का दर्जा माकपा की राजनीति में कुछ वैसा ही माना जा सकता है जिस तरह मुगलों में अकबर को हासिल था। उन्होने पश्चिम बंगाल में वामपंथी सरकार चलाने का अपना व्याकरण गढ़ा और संसदीय कम्युनिस्ट राजनीति को उस ऊंचाई तक पहुंुचाया जहां आकर वह खुद को अजेय मानने के स्वर्ग में विचर सकती थी। बसु एक करिश्माई नेता थे उसी तरह जैसे कांग्रेस में जवाहर लाल नेहरू और दक्षिणपंथी राजनीति में अटल बिहारी वाजपेयी थे। उनकी माकपा संसदीय कम्युनिज्म की बंगाली कलम थी। जो बंगाल की आबोहवा के मुताबिक विकसित की गई थी। यह बारीकी से बुना गया ऐसा राजनीतिक मिक्सचर था जिसमें बांग्ला उपराष्ट्रªªवाद और अभिजात्यवाद के रेशे भी मौजूद थे तो मार्क्सवाद के धागे भी। ऑपरेशन बर्गा ने अधिकांश ग्रामीण इलाकों में माकपा को लगभग अजेय बना दिया।लगातार जीतों से माकपा की कतारें खुद को अजेय मानने लगीं। ज्योति बसु बूढ़े हो चले थे और उनका बनाये राजनीतिक फॉर्मूले का असर अब कम हो रहा था। माकपा के अकबर ज्योति बसु आखिरकार रिटायर हो गए। उनकी जगह चुने गए बुद्धदेव भट्टाचार्य और उनके राजनीतिक कद के बीच जमीन और आसमान का फर्क था। बंगाल की राजनीति में एकाएक खालीपन आ गया। बुद्धदेव जननेता नहीं थे। वह न तो जनता की नब्ज के राजनीतिक वैद्य थे और न उनके पास ऐसा आला था जिससे वह लोगों दिल की धड़कन को महसूस कर सकते थे। वह ऐसे साहसी और प्रतिभा संपन्न नेता भी नहीं थे जो संसदीय राजनीति और मार्क्सवाद के इस घालमेल को सिंकारा जैसे टॉनिक में बदल पाते। ऊपर से निर्द्वंद सत्ता ने पार्टी का शाररिक और मानसिक तंत्र इतना बीमार कर दिया कि वह सत्ता के सन्निपात में अराजक हो गया। जनता और नेतृत्व के बीच का पुल टूट चुका था। ऐसे में ईश्वर ही उसे बचा सकता था। चूंकि मार्क्सवादी ईश्वर पर भरोसा नहीं करते इसलिए हो सकता है कि उसने भी उन्हे सद्बुद्धि देने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई हो। माकपा में कांग्रेस के जीन का रोपण तो बसु के जमाने में ही शुरू हो चुका था और बीसवीं सदी की शुरुआत से उसे लाल कांग्रेस के उपनाम से जाना जाने लगा था। उसका डीएनए कांग्रेस से मैच करने लगा था और लाल रंग वाले गुणसूत्रों को छोड़कर उसमें और कांग्रेस में फक करना मुष्किल था। बसु के बाद तो माकपा विचारधारा की ढ़लान पर जैसे लुढ़कने लगी। माकपा के बुद्ध ने मान लिया था कि उनका कोई विकल्प नहीं है। माकपा ने बंगाल में पूंजीपतियों के लिए सेज की सेज सजानी शुरू कर दी। लेकिन पहले नंदीग्राम और फिर सिंगूर में जनता ने बताया कि निर्विकल्प कुछ भी नहीं है। यह जनता का ही कमाल है कि उसने राजनीति की राख में से ममता बनर्जी को निकाला और उसे फीनिक्स में बदल दिया। अजेय माकपा को सड़क से लेकर पंचायतों और नगर निकायों तक पराजयों के सिलसिले से गुजरना पड़ा है। मार्क्सवाद को कंठस्थ रखने वाले कम्युनिस्ट ब्यूरोक्रेट प्रकाश करात आखिरी मुगल की तरह साम्राज्य को ध्वस्त होते देख रहे हैं। वह भी नेतृत्व की उन पांतों शामिल रहे हैं जिन्होने माकपा के पतन की गति को तेज किया है। दरअसल माकपा के नेतृत्व पर सालों से ऐसे लोगों का कब्जा चल रहा है जिसने उसे जनता की पार्टी बनाने के बजाय उसमें नौकरशाह दल में बदल दिया है। पूरे देश में संगठन के महत्वपूर्ण पदों पर अधिकांश वे नेता काबिज हैं जो किसी आंदोलन में जेल नहीं गए। उनकी योग्यता बस इतनी है कि वे किताबी मार्क्सवाद के पंडे हैं। माओवादी नेता आजाद की पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने पर माकपा ने जिस तरह से सवाल उठाए हैं उससे यह गलत फहमी भी दूर हो गई है कि उसमें कम्युनिस्ट होने का कोई लक्षण बाकी है। माओवादियों को लेकर भाजपा और माकपा एक साथ खड़ी है तो इस श्रेय के हकदार भी करात ही हैं। प्रकाश करात, सीताराम येचुरी, अरुण जेटली, चिदंबरम संसदीय लोकतंत्रा के सबसे बड़े वकील के रुप में उभरे हैं। संयोग ये सभी भारतीय कुलीन वर्ग के प्रतिनिधि हैं। माओवादियों के दमन पर भाजपा के सबसे करीब इस समय माकपा है।यह राजनीतिक विडंबना ही है कि माकपा का विकल्प ममता के रुप में सामने आया है। ममता बनर्जी जिस तरह से अविवेकपूर्ण लोकप्रियतावादी राजनीति कर रही हैं उससे उनसे कोई उम्मीद नहीं बंधती। उनकी राजनीति की सीमायें भी स्पष्ट हैं और उनके रंगढ़ंग ऐसे ही रहे तो पतन भी पटकथा भी दीवार पर लिख दी गई है। लोगों में उम्मीद के पहाड़ खड़े करना आसान भले ही हो पर यह शेर की सवारी है जिसमें शिकार होना तय है। ममता में जननेता के काफी गुण हैं पर दूरदर्शी नेता उम्मीदों के ऐसे पहाड़ खड़े नहीं करते जिनके नीचे दबकर वे मारे जायें।

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

महंगाई पर नीति में नहीं नीयत में खोट

महंगाई पर संसद में जबरदस्त बहस और केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के बयान के बावजूद मंहगाई की इस अंधी सुरंग से निकलने का कोई रास्ता निकलता नहीं दिख रहा। राजनीति की भूलभूलैया में यह मुद्दा बस बहस में ही समाप्त होकर रह गया। इस पूरी बहस से इतना तो पता चल ही गया कि महंगाई के मुद्दे पर राजनीतिक दलों की नीयत साफ नहीं है। सोनिया गांधी की गरीब फ्रैंडली मुद्रा के बावजूद इस समस्या की जड़ें प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की उस कुलीन आर्थिक राजनीतिक अवधारणा में है जो गरीब विरोधी और देश के सामाजिक आर्थिक ढ़ांचे को तहस नहस कर देने वाली है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ईमानदार और बेदाग प्रधानमंत्री के खिताब से नवाजे जाते रहे हैं। उनकी इस ईमानदारी के बावजूद कांग्रेस संसदीय चुनावों के लिए कई हजार करोड़ जुटाने में कामयाब रही। जाहिर है कि यह पैसा उस आम आदमी ने नहीं दिया जिसके साथ कांग्रेस हाथ होने की बात कही जा रही थी। यह पैसा उन लोगों ने दिया है जो इस देश को बाजार अर्थव्यवस्था के हिसाब से चलाने की आजादी चाहते हैं ताकि उनका मुनाफा कुलांचे भरता रहे। कहीं महंगाई का यह दौर उसी वर्ग के चुनावी कर्ज उतारने से तो नहीं पैदा हुआ। कांग्रेस के लोग इससे असहमत हो सकते हैं पर मंहगाई पर केंद्र जिस तरह से हाथ पर हाथ धरे हुए बैठा है उससे क्या इस आरोप का औचित्य साबित नहीं होता। इस पूरे प्रकरण से उन लोगों की आंखे खुल जानी चाहिए जो प्रधानमंत्री की ईमानदारी के कसीदे पढ़कर इसे कांग्रेस को वोट देने का सबसे बड़ा कारण बता रहे थे। साफ है कि व्यक्तिगत ईमानदारी का सवाल राजनीति में बहुत मायने नहीं रखता। भ्रष्टाचार के तंत्र को फलने-फूलने की आजादी देने वाला एक ईमानदार आदमी भी भ्रष्ट व्यवस्था के शिखर पर जमे रह सकता है। एक जनविरोध्ी तंत्र को भी अपनी साख बनाए रखने के लिए कुछ साफ सुथरा चेहरों की जरुरत होती है। उदारीकरण और भूमंडलीकरण के जिस आदमखोर पशु से हमारा पाला पड़ा है उसके सिद्धांतकारों में मनमोहन सिंह समेत कई ईमानदार और समर्पित हस्तियां हैं। लोकसभा में सुषमा स्वराज और राज्यसभा में अरुण जेटली ने इशारों- इशारों में इसे कहा भी। महंगाई के गणित के सूत्र मनमोहन के आर्थिक विकास दर वाले अर्थशास्त्र से भी निकलते हैं। लेकिन बीमारी सिपर्फ इतनी ही नहीं है बल्कि इससे ज्यादा गंभीर और चिंता में डालने वाली है। विदेशी स्वामियों को खुश करने के लिए भारत सरकार ने उदारीकरण और भूमंडलीकरण के रास्ते को चुनने में वे मूलभूत सावधानियां भी नहीं बरतीं जो अमेरिका समेत सभी विकसित देशों ने बरती। यह ऐसा देश है जिसके पास बाजार का नियमन करने के लिए न कड़े उपभोक्ता कानून हैं और न ही कोई नियामक संस्था। लाइसेंस राज तो खत्म हो गया लेकिन बाजार का अंधेर राज कायम कर दिया गया। आज एक आम आदमी के पास अनुचित मूल्य या घटिया सामग्री का प्रतिकार करने के लिए कोई प्रभावी तंत्र नहीं है। आम उपभोक्ता बाजार में असहाय और दयनीय आदमी है जिसके पास व्यापारी की बात मानने और जेब से दाम चुकाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। उसके पास यह जानने का न साधन है और न अधिकार कि वह जो खरीद रहा है उसका लागत मूल्य कितना है। वह समझ पाने में असमर्थ है कि एक ब्रांड की मुहर लगने मात्रा से किसी वस्तु का दाम कैसे 500 से 700 गुना तक बढ़ जाता है। उसके पास नकली सामान, प्रदूषित और खतरनाक खाद्य पदार्थों से बचने का कोई रास्ता नहीं है। उसका सामना हर रोज ऐसे सर्वशक्तिमान और स्वेच्छाचारी बाजार से होता है जो देश के कानूनों से ऊपर एक संविधानेतर और संप्रभु सत्ता है। स्पष्ट है कि भारत की सरकार और भारतीय राज्य की सहमति के बिना देश में ऐसी असंवैधानिक सत्ता नहीं चल सकती। भारतीय बाजार का कोई तर्कशास्त्र नहीं है। वहां जंगल राज है।उसमें एक ओर बिना मांग के ही दामों को कई गुना बढ़ाने वाला सट्टा बाजार है तो दूसरी ओर मुनाफाखोरी में माहिर देशी रुप से विकसित ऐसा आढ़त बाजार है जिसमें भाव अकारण ही कई गुना बढ़ा दिए जाते हैं। आम लोगों तक कभी यह जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती कि खाद्यान्न वायदा कारोबारियों ने सिर्फ सट्टबाजी कर साल भर में कितने हजार करोड़ रुपए बना लिए या आढ़तियों के तंत्र ने सिर्फ दामों की हेराफेरी कर साल भर में कितना मुनाफा कमाया। जाहिर है कि सरकार नहीं चाहती कि लोग कभी यह जान पायें कि अनाज का एक दाना पैदा किए बिना ही कुछ बिचौलिए हजारों करोड़ कैसे कमा रहे हैं। पंजाब कृषि विवि के एक अध्ययन के अनुसार पंजाब के आढ़तियों ने बिना कुछ किए धरे 1990 से 2007 के बीच लगभग 8000 करोड़ रुपए कमाए। यह है बिचौलियों का तंत्र! सरकार में अहम पदों पर बैठे लोग भी स्वीकार करते हैं कि खाद्य पदार्थों के दाम उपभोक्ता तक पहुंचते-पहुंचते 700 गुना तक बढ़ जाते हैं लेकिन इस नपुंसक आत्मस्वीकृति से लोगों को राहत नहीं मिल सकती। आखिर लागत और विक्रय मूल्य के बीच कोई लॉजिकल सम्बंध क्यों नहीं होना चाहिए? यह इसलिए नहीं होता चूंकि देश के राजनीतिक दलों, नगर से लेकर विधानसभाओं और संसद तक मौजूद उनके कारिंदों को इस काली कमाई का एक बड़ा हिस्सा जाता है। चुनावों और महंगाई के बीच के अवैध संबंध जब तब जाहिर होते रहते हैं। इसलिए यह कहना कि सरकार के पास महंगाई से निपटने की कोई नीति नहीं है, एक अर्द्धसत्य है। केंद्र सरकार के पास ऐसे दिमागों की कमी नहीं है जो इसका हल चुटकियों में निकाल सकते हैं पर वे ऐसा चाहते नहीं हैं। इसके पीछे मनमोहनोमिक्स तो है ही साथ में ऐसी सरकार भी है जिसने अपनी अंतरात्मा और ईमान बाजार के हाथों गिरवी रख दिया है। यही कारण है कि सरकार के गोदामों में गेहूं चावल सड़ रहा है और देश का दरिद्रनारायण भूखों मर रहा है। क्योंकि सरकार जानती है कि यदि वह गोदामों के गेहूं और चावल को रियायती दरों पर बाजार में लाई तो खाद्यान्न के दाम गिर जायेंगे और उसके खेवनहार बिचौलिए और वायदा कारोबारी कंगाल हो जायेंगे। इसलिए लाखों टन अनाज सड़ता रहता है। वरना सरकार चाहती तो इन 63 सालों में पनपे बिचौलियों को एक ही झटके में खत्म कर देती तथा हर वस्तु पर लागत और विक्रय मूल्य दर्ज करना जरुरी कर देती। पूंजीवाद के तमाम दुर्गणों को अपनाने वाली सरकारों ने ही वायदा कारोबार के राक्षस को पैदा किया है। महंगाई से लेकर मिलावट तक फैले जनविरोधी तंत्र पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने न तो आवश्यक वस्तु अधिनियम को कड़ा बनाया और न मिलावट रोकने के लिए कोई सख्त कानून बनाने की कोशिश की। यही नहीं एनडीए ने जनवितरण प्रणाली को ध्वस्त करने का जो सिलसिला शुरु किया था उसे यूपीए वन और टू ने जारी रखकर साबित कर दिया कि वे एनडीए की सच्ची वारिस हैं। क्योंकि एक जनमुखी जनवितरण प्रणाली बाजार की अराजकता और स्वेच्छाचारिता पर लगाम लगाने का सबसे बड़ा साधन है। इसे नष्ट किए बिना बाजार अंधाधुंध मुनाफा नहीं कमा सकता। इसीलिए इससे पहले एपीएल के नाम पर निम्न मध्यवर्ग को अलग किया गया और अब इसे लुंजपुंज बनाकर गरीबों के लिए भी इसे निरर्थक बना दिया गया है। ये सारी बातें इसी सत्य को उजागर करती हैं कि खोट सरकार की नीयत में है। मनरेगा जैसे सांकेतिक उपाय कर वह इस पाप से पीछा नहीं छुड़ा सकती। पहले गरीबों की तादाद बढ़ाने जैसी महामारी पैदा करना और फिर मनरेगा का मानवीय चेहरा सामने लाने से बात नहीं बनेगी। सरकार में यदि थोड़ी भी लोकलाज बची है तो उसे गरीबी और भुखमरी पैदा करने वाले सामूहिक विनाश के अस्त्रों की अपनी फैक्टरियों को बंद करना होगा।

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

विकीलीक्स ने तोड़ा सूचना पर सरकारी एकाधिकार

दुनिया की सबसे चर्चित वेबसाइट विकीलीक्स के खुलासों ने अमेरिका और पाकिस्तान को हिला दिया है। पेंटागन के रहस्यलोक में दुनिया की सबसे कड़ी चौकसी में रखे गए एक लाख से ज्यादा सर्वाधिक संवेदनशील खुफिया फौजी दस्तावेजों को इंटरनेट पर जारी कर विकीलीक्स ने दुनिया भर में तहलका मचा दिया है। पहली बार व्हाइट हाउस और पेंटागन में सूचना की ताकत से हड़कंप मचा हुआ है। इन रहस्योद्घाटनों से साफ हो गया है कि आतंकवाद निर्यात करने वाले देशों में पाकिस्तान अभी भी टॉप पर है और यह सब वह अमेरिका की जानकारी में कर रहा है। इसी के साथ आंतकवाद के खिलाफ अमेरिकी जंग के पाखंड का भी पर्दाफाश हो गया है। ये दस्तावेज बताते हैं कि काबुल में भारतीय दूतावास से लेकर भारतीय संस्थानों पर तालिबानी हमले आईएसआई द्वारा प्रायोजित होने की जानकारी अमेरिका को थी। जाहिर है कि भारत के साथ उसकी दोस्ती सिर्फ कूटनीतिक धोखाधड़ी से ज्यादा कुछ नहीं है। इससे अमेरिका के प्रति भारत सरकार के झुकाव पर भी सवालिया निशान लग गया है और पाक के साथ उसकी बातचीत भी अमेरिकी हितों के लिए की गई कवायद ही प्रतीत होती है। इंटरनेट की दुनिया के इस सबसे बड़े खुलासे से दुनिया की सारी सरकारों के माथे पर बल पड़ गए हैं क्योंकि जनता से छुपाकर रखे गए उनके खुफिया राज कभी लीक हो सकते हैं। सूचना की आजादी के नजरिये से यह बड़ी घटना है। अभी तक सूचनाओं की राजनीति के जरिये कभी चीन तो कभी ईरान तो कभी रुस को काबू में करने में लगे अमेरिका के लिए विकीलीक्स दुस्वप्न बनकर आया है। पिछले महीनों गूगल और चीन के विवाद में चीन को इंटरनेट पर सूचनाओं की आजादी का पाठ पढ़ाने वाले अमेरिका को अब खुद इसका मजा चखना पड़ रहा है। अपने प्रतिद्वंदी देशों के असंतुष्टों और विद्रोहियों के प्रचार को मदद देने के लिए अमेरिका सूचना की आजादी का सबसे बड़ा समर्थक रहा है। दुनिया में समाचार और सूचनाओं के अधिकांश माध्यमों में सूचनाओं का प्रवाह एकपक्षीय रहा है। ईरान,इराक से लेकर क्यूबा तक पाश्चात्य दुनिया के सारे माध्यमों में सूचनाओं का समूचा प्रवाह अमेरिका की ओर रहा। अपने दुश्मनों से निपटने के लिए उसने सूचनाओं को हथियार के रुप में इस्तेमाल किया। इससे सूचना की आजादी अमेरिकी हितों की पर्याय हो गई। लेकिन विकीलीक्स ने सूचनाओं के इस खेल का पासा पलट दिया है। इंटरनेट पर अब तक के सबसे बड़े खुलासे को अंजाम देते हुए उसने अमेरिका को सांसत में डाल दिया है। आईएसआई और पाक फौज से उसके रिश्तों के चलते आतंकवाद के खिलाफ उसकी बहुप्रचारित लड़ाई की पोल खुल गई है। यह भी जग जाहिर हो गया है कि उसे हामिद करजई और भारत के खिलाफ किए जाने वाले हमलों की जानकारी थी। उसके लिए सबसे असुविधाजनक यह है कि उसे अमेरिकी जनता को जबाब देना होगा कि वह खरबों डालर उन संस्थाओं पर क्यों खर्च कर रहा है जो ग्लोबल आतंकवाद के सबसे बड़े निर्यातक हैं। दुनिया की हर सरकार गोपनीयता और राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सूचनाओं को आम लोगों तक नहीं पहुंचने देती। यहां तक दुनिया में लोकतंत्र के सबसे बड़े पहरेदार होने का दावा करने वाले देश भी इसके अपवाद नहीं हैं। विकीलीक्स ने सूचनाओं की दुनिया पर सरकारों के एकाधिकार को खत्म कर दिया है। सरकार के कड़े पहरों के बीच उसने चोर दरवाजे खोज लिए हैं। यह सही मायनो में सूचना की आजादी और उसके निर्बाध संचरण की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। इससे साबित हो गया हैै कि इंटरनेट की तरंगों पर अब अमेरिकी लगाम के दिन भी लद गए है। भविष्य में हर देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं होगी जो सरकारों की गोपनीयता के परखच्चे उड़ाने के लिए विकीलीक्स को खुफिया दस्तावेज मुहैया करायेंगे। इसे सरकारों के कामकाज में साफगोई और पारदर्शिता की शुरुआत माना जाना चाहिए। सूचनाओं के तंत्र पर सरकारी एकाधिकार टूटने से उम्मीद की जाने चाहिए कि इसके बाद किसी न किसी दिन नागरिकों के खिलाफ इस्तेमाल होने वाली अंधाधुंध हिंसा पर राज्य का एकाध्किार भी टूटेगा। दिन ब दिन हिंसक,गैर जबाबदेह और गैर जिम्मेदार होते जा रहे आधुनिक राज्यों पर जनशक्ति का अंकुश लग सकेगा।

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

सरकार को निजी हाथों में सौंपो

हाल ही में यूएनडीपी के आंकड़े आए हैं जिनसे पता चलता है कि भारत के ग्लोबल आर्थिक महाशक्ति बनने का जो तिलिस्म भारत सरकार, राजनेता और मीडिया बना रहा था वह सफेद झूठ के सिवा कुछ नहीं है। वह भी ऐसा झूठ जिसके पैर भारत की जमीन के बजाय अमेरिका में हैं। यूएनडीपी की रिपोर्ट हमें यह गर्व करने का दुर्लभ मौका देती है कि आजादी के 63 सालों में गरीबी और भुखमरी के मोर्चे पर हमसे आगे सिर्फ अफ्रीकी देश हैं। जितनी निष्ठा, लगन और समर्पण के साथ देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गृहमंत्री चिदंबरम और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह काम कर रहे हैं उससे यह भरोसा मजबूत होता है कि अगले चार सालों में हम गरीबी के मोर्चे पर होंडुरास, हैती,चाड जैसे पिद््््दी देशों को पछाड़ने में कामयाब हो जायेंगे।
पिछले दिनों कई खबरें चर्चा में रही जिनमें मिलावटखोरी से लेकर महंगाई तक कई मुद्दे थे। देश में मिलावटखोरों के हौसले की तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होने प्रधानमंत्री को भी नहीं बख्शा। मिलावटखोरों को लगा होगा कि पीएम यूपी आ रहे हैं तो वे प्रदेश के सबसे बड़े जायके से रुबरु हुए बगैर कैसे जा सकते हैं। मिलावटखोरों की इस लोकतांत्रिक भावना का भी सम्मान किया जाना चाहिए कि वे मिलावट के मामले में आम आदमी और प्रधानमंत्री में भेदभाव नहींे करते। अब हर रोज मिलावट के एक से एक मामले सामने आ रहे हैं। यूपी के सकल घरेलू उत्पाद में मिलावट का कितना योगदान है,इस पर अर्थशास्त्रियों को शोध करना चाहिए। मिलावटखोरों की सत्ता जिस निर्विघ्नता से फल-फूल रही है उससे लगता ही नहीं कि इस देश में कोई सरकार है। ऐसा लगता है कि सरकार बाजार को मिलावटखोरों के हवाले कर भाग गई है। उधर अपराधों के मामले सरकार को नदारद हुए एक अर्सा हो गया है। अपराधों को लेकर जो थोड़ा बहुत पुलिसिया हलचल दिखाई देती है वह भी इसलिए कि आम आदमी को लगता रहे कि देश में पुलिस है और सरकार भी। ताकि आम आदमी डरा रहे और पुलिस पर अरबों रुपए के खर्च जस्टिफिकेशन होता रहे। इधर महंगाई के मामले में भी सरकार सीन से गायब हो गई है। इस बार वह बिना बताए गायब नहीं हुई बल्कि उसने ढ़ोल पीटकर बताया कि महंगाई बाजार और लोगों के बीच का मामला है इसलिए इसमें सरकार का क्या काम ? पेट्रोल, डीजल में भी सरकार ने मोर्चा अब अंतराष्ट्रीय बाजार के हवाले कर दिया है। अनाज की उपलब्धता से लेकर कीमतों तक का सारा काम सरकार ने वायदा बाजार को सौंप दिया है।अब यह उसकी मर्जी है कि कौन सा अनाज कब बाजार से गायब होगा और कब,किस भाव से बाजार मे कब आएगा । सरकार इस झंझट में नहीं पड़ेगी। अतिक्रमण से लेकर पानी, बिजली, सफाई, स्वास्थ्य और टैªिफक जैसी जरुरी व्यवस्थाओं से सरकार ने 90 के दशक में ही विदाई ले ली थी। यूएनडीपी की रिपोर्ट बता रही है कि गरीबी के मामले में भारत का मुकाबला अब सिर्फ अफ्रीकी देशों से है। 55 फीसदी आबादी गरीब है। यह उस देश का हाल है जिसके बारे में कहा जा रहा है कि वह विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है।हालांकि देश के न्यूज चैनल अरबपतियों और करोड़पतियों की बढ़ती तादाद के आंकड़े पेश कर आम लोगों को इस पर छाती फुलाने के लिए उकसाते नजर आते हैं।गरीबों की इस बढ़ती तादाद से यह भ्रम भी दूर हो गया है कि इस देश में गरीबों की रक्षा के लिए सरकार की जरुरत है। गरीबी के महासागर में मनरेगा के छुटपुट टापुओं को छोड़ दें तो आम आदमी के लिए सरकार की उपयोगिता सिफर है। सरकार की आखिरी जरुरत जिस न्याय के लिए पड़ती है उसका हाल सब जानते हैं कि वह पैसे और प्रभुत्व वाले वर्ग के लिए आरक्षित है।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब सरकार न रोजी, न रोटी, न कपड़ा, न मकान, न दवा, न इलाज ,न सुरक्षा और न्याय दे पा रही हो और तो और वह अपने नागरिकों के जीवन जीने के नैसर्गिक अधिकार की रक्षा करने में भी असमर्थ हो तो फिर नागरिकों के लिए उसकी जरुरत क्या है? नेताओं, अफसरों और सरकारी अमले पर खर्च होने वाले अरबों-खरबों रुपए का बोझ लोग क्यों उठायें? सरकार को बेवजह ढ़ोने का क्या तुक है ?जब निजी क्षेत्र ही सारी बीमारियों का इलाज है तो सरकार को भी क्यों न उसी निजी क्षेत्र के हवाले कर दिया जाय?इससे देश को भ्रष्ट और अयोग्य नेताओं के उस झुंड से छुटकारा मिलेगा जो हर चुनाव में झूठ और हराम के पैसों के बल पर विधानसभाओं और संसद में काबिज हो जाता है। बोनस के तौर पर लोगों को उन अफसरों और सरकारी तंत्र से भी निजात मिलेगी जिनकी लालफीताशाही से सारा देश त्रस्त है। क्योंकि भारत में सरकार अब जनकल्याण के लिए नहीं बल्कि सरकारी अमले के भरण पोषण और भ्रष्टाचार के लिए चलाई जारही है।

शनिवार, 19 जून 2010

बर्बर! अमानुषिक !! और पाशविक!!!

जिन लोगों को भारतीय राज्य में मानवीयता के अंश होने का भ्रम हो वे जरा लालगढ़ में मुठभेड़ में मारे गए माओवादियों की मृत देहों से भारतीय सुरक्षाबलों द्वारा किए गए सलूक के फोटो देख लें तो निश्चित तौर पर उनका यह भ्रम जाता रहेगा। डंडों से बंधी मृत पुरुष और महिलाओं की देहें सांमतकाल के दौर के शिकारियों की याद दिलाती हैं।जब शिकार पर गए राजा और सामंत इसी तरह से गर्व के साथ डंडों पर बांधकर मारे गए जंगली जानवरों को लेकर लौटते थे। ये फोटोग्राफ्स और वीडियो फुटेज बताते हैं कि भारतीय राज्य ऐसे आदमखोर दैत्य में बदल चुका है जो अपने ही नागरिकों का आखेट बर्बर, अमानुषिक और पाशविक तरीकों से करने में यकीन रखता है। लालगढ़ में सुरक्षा बलों के हमले का एक साल पूरा होने का उत्सव माओवादियों को मुठभेड़ में मारकर मनाया गया। यह सिर्फ संयोग नहीं है कि निकाय चुनावों में हार के बाद पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार माओवादियों के खिलाफ ज्यादा आक्रामक नजर आ रही है। यह उसकी खिसियाहट भी हो सकती है और विधानसभा चुनाव से पहले माओवादियों से सहानुभूति रखने वाले जनसंगठनों के सफाये की रणनीति भी। सीपीएम भली भांति जानती है कि अकेले ममता उसे नही हरा सकती। लेकिन ममता और अति वामपंथियों का गठजोड़ उसके लिए मारक साबित हो सकता है। क्योंकि अति वामपंथियों की उपस्थति के चलते उसके प्रगतिशील मुखौटे के पीछे छिपा गरीब विरोधी हिंस्त्र चेहरा दिखाई देता है और कम्युनिस्ट होने का जो तिलिस्म उसने इतने सालों से तैयार किया है वह बिखरने लगता है।इसलिए माकपा यदि माओवादियों और उनसे सहानुभूति रखने वालों को निपटाने की हड़बड़ी में दिखाई दे रही है तो यह उसकी चुनावी मजबूरी भी है और आत्मरक्षा की आखिरी कोशिश भी।मगर लालगढ़ की जो तस्वीरें अखबारों में दिखी हैं वे बर्बरता की हद हैं। लकड़ी के डंडे पर हाथ-पैर बांधकर मरे हुए पशुओं की तरह मुठभेड़ में मारे गए माओवादियों को ढ़ोये जाने की इस घटना से जाहिर है कि भारतीय सुरक्षा बल माओवादियों के मृत देहों से भी प्रतिशोध ले रहे हैं।मृत शरीरों कंे साथ इस तरह के दुर्व्यवहार के जरिये पश्चिम बंगाल और केंद्रीय सुरक्षा बल यदि यह संदेश देंना चाहते हैं कि माओवादी और उनसे सहानुभूति रखने वालों की लाशों की भी दुर्गति की जाएगी, तो यह दुर्भाग्यपूर्ण से ज्यादा एक पाशविक कृत्य है और जेनेवा कन्वेंशन के तहत युद्ध अपराध है। भारत ही नहीं पूरी दुनिया में परंपरा रही है कि मारे जाने के बाद शत्रु के शव के साथ गरिमा और सम्मानपूर्ण व्यवहार किया जाता है।सभ्य समाज सदियों से इस आचरण संहिता का पालन करते रहे हैं। यदि आदिम काल के बर्बर दौर को छोड़ दे तो इतिहास में मंगोलों समेत बहुत कम बर्बरतापूर्ण हमले ही मिलते हैं जब शत्रुओं के शवों के साथ बर्बर व्यवहार किया गया हो। मृत देहों को अपमानित करना विजयी शासकों और समाजों का सामान्य व्यवहार नहीं रहा। जाहिर है कि माओवादियों के शवों के साथ दुव्यवहार कर भारतीय राज्य ने इतना तो साबित कर ही दिया है कि माओवादियों के खिलाफ बदले की भावना से ग्रस्त होकर वह बर्बरता के मामले में मध्ययुग के मंगोल आक्रमणकारियों की याद दिला रहा है।आश्चर्य है कि एक लोकतांत्रिक देश के सुरक्षाबलों द्वारा शवों के साथ किए गए इस दुर्व्यवहार पर खबरिया चैनल धृतराष्ट्र बने हुए हैं।दंतेवाड़ा हमले पर माओवादियों के खिलाफ गला फाड़कर चिल्लाने वाले प्रतापी एंकर, विद्वान संपादक और उत्तेजना में कांपते रिपोर्टर सब खामोश हैं। कोई यह कहने कहने को तैयार नहीं है कि भारतीय राज्य और उसके सुरक्षा बलों का आचरण असभ्यता पूर्ण और बर्बर है। इनमें से कोई भी नहीं कहता कि यह युद्ध अपराध की तरह गंभीर अपराध है जिसके लिए जिम्मेदार लोगों को दंडित किया जाना चाहिए। कम से कम भारतीय राज्य से मध्ययुग के सभ्य राज्य की तरह बर्ताव करने की उम्मीद तो की जा सकती है।यदि वह अपने शत्रुओं के साथ तीसरी सदी के सिकंदर की तरह उदार बर्ताव नहीं कर सकता तो उनके शवों के साथ तो गरिमा के साथ पेश तो आ ही सकता है। हम भारतीय राज्य से नागरिक अधिकारों और मानवाधिकारों की रक्षा का सवाल नहीं उठा रहे हैं क्योंकि भारतीय राज्य और उसके समांतर खड़े माओवादियों के बीच चल रहे इस युद्ध में नागरिक अधिकार भले ही स्थगित कर दिए गए हों।इसलिए मुठभेड़ों के औचित्य पर कोई सवाल न उठाते हुए बस इतनी अपील तो की जा सकती है कि भारतीय राज्य बर्बर समाजों की तरह माओवादियों के शवों के साथ पेश न आए।

बुधवार, 9 जून 2010

भोपाल के बूचड़खाने में सब नंगे हैं

कहते हैं कि ईश्वर के घर में देर है पर अंधेर नहीं। पर भारतीय अदालतों के बारे में ऐसा कतई नहीं कहा जा सकता। देर और अंधेर उनकी बुनियादी और इनबिल्ट विशेषतायें हैं या कह सकते हैं कि मैैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट हैं। वे फैसले करने में अन्याय की हद तक देर लगाती हैं और उस पर तुर्रा यह कि उनके अधिकांश फैसले से अंधेर जैसे निराश कर देने वाले लगते हैं। बाजार की सेल्स प्रमोशन स्कीमों की तरह न्याय चाहने वाले लोगो को एक आफत के साथ दूसरी आफत मुफ्त में मिलती है। हालांकि साख बचाए रखने लायक अपवाद वहां भी होते हैं । हर व्यवस्था की तरह यह उसकी जरुरत भी है या कहें कि मजबूरी भी। भोपाल गैस त्रासदी पर जब अदालत का फैसला आया तो मीडिया में मची चीख पुकार के बावजूद अदालत ने वही किया जो उसकी बड़ी बहनें अब तक करती आई हैं। वर्ना इतने बड़ी तादाद में हुए नरसंहार और लाखों लोगों को यातनाओं के नरक में धकेलने वाले इस कारपोरेट अपराध पर 25 साल बाद फैसला सुनाना तो मूल अपराध से भी बड़ा अपराध है।इससे पहले 1989 और 1996 में सुप्रीम कोर्ट भी गैस पीड़ितों के खिलाफ अपना फैसला सुना चुका है। इसलिए इस फैसले को ‘‘देर और अंधेर’’ के रुप में याद रखा जाना चाहिए। भोपाल गैस कांड भारतीयों को गिरमिटियों के रुप में बेचे जाने के बाद पहला मौका था जब विश्व बाजार में भारतीयों को इतनी कम कीमत पर बेचा गया।यदि मृतकों की जान की औसत कीमत और विकलांग हुए जिंदा लोगों के न्यूनतम गुजर बसर की लागत,जिसमें दवाईयों पर होने वाला न्यूनतम खर्च भी शामिल है, को मुआवजे का आधार माना जाय, इस कंजूस आकलन पर भी गैस पीड़ितों को 1737 अरब रुपए बतौर मुआवजा मिलना चाहिए था। मुआवजे के इस आकलन में पीड़ितों का औसत जीवन काल 25 साल माना गया है। यदि हर्जाने के तौर पर इसका आकलन किया जाय तो मुआवजे की राशि कई सौ खरब में पहुंच जाएगी।यदि भारतीयों की औसत उम्र पर हर्जाने की गणना की जाय तो यह कई गुना अधिक होगी। यदि अमेरिका या पश्चिमी देशों में ऐसा नरसंहार हुआ होता तो दोषियों को सजा के साथ इतना हर्जाना देना पड़ता कि उससे यूनियन कार्बाइड दिवालिया हो गई होती। मगर भारतीय न्यायपालिका ने ऐसा न पहली बार किया है और न आखिरी बार।इसे दुर्लभतमों में से दुर्लभ खराब फैसला भी नहीं कहा जा सकता। भारतीय राज्य और कारपोरेट घरानों के पक्ष और आम लोगों के विपक्ष में ऐसे फैसले आते रहते हैं। सिर्फ इतना हुआ है कि उदारीकरण के बाद न्यायपालिका ने उस लबादे को भी उतार फेंका है जो उसकी मिथकीय निष्पक्षता का आभामंडल बनाता था।उदारीकरण के बाद आए अनगिनत फैसलों के जरिये न्यायपालिका ने पहले ही यह साफ कर दिया है कि उसका भी अपना एक खास वर्ग और पक्ष है जो अक्सर पीड़ितों के खिलाफ दिखाई देता है।अलबत्ता अदालतें कभी-कभार ऐसे फैसले भी करती हैं जो लोगों को ढ़ाढ़स बंधाते दिखते हैं। ऐसे फैसलों से लगता है कि देश की न्यायव्यवस्था का सूरज आखिरी तौर पर अभी डूबा नहीं है।चमत्कृत कर देने वाले ग्रीक, रोमन उद्धरणों, अंग्रेजी के खूबसूरत शब्दों में गंुथे प्रभावोत्पादक भाषा वाले ये फैसले जजों की विद्वता पर भरोसा बंधाते हैं। न्यायिक इतिहास में रुचि रखने वाले लोग इन्हे नक्काशीदार फ्रेमों में जड़कर रख सकते हैं। ऐसे फैसले सूक्तियों की तरह याद रखे जाते हैं। देर और अंधेर के अंधेरों के बीच पेंसिल टॉर्च की तरह टिमटिमाने इन फैसलों की रोशनी आम लोगों को निराश नहीं होने देती।पर बावजूद इसके ये फैसले लोगों की रोजमर्रा के जीवन में राज्य और प्रभावशाली लोगों के द्वारा किए जा रहे अन्याय को कम नहीं कर पाते और न ही वे अन्याय और दमन की मशीनरी को भयभीत कर पाने में समर्थ होते हैं। नवें दशक तक जनांदोलन और न्यायपालिका मिलकर जन असंतोष के दबाव को कम करने के लिए सेफ्टी वाल्व का काम करते थे। दोनो मिलकर लोकतंत्र में लोगों का भरोसा कायम रखते थे। बीसवीं सदी के आखिरी दशक में जब उदारीकरण का दौर आया तो अदालतें पूरी तरह से उदारीकरण की चपेट में आ गईं। देश के हाईकोर्टों और सुप्रीम कोर्ट के द्वारा 1991 और उसके बाद किए गए फसलों की समीक्षा करें तो यह साफ नजर आ जाता है कि इस दौर में अदालतों के अधिकांश दूरगामी फैसले मजदूरों, किसानों, विस्थापितों, कर्मचारियों जैसे सामान्य वर्ग के लोगों के खिलाफ गए हैं। इसी दौर में न्यायपालिका ने हड़तालों,जुलूसों और सभाओं पर पाबंदी लगाने जैसे फैसले किए जो दरअसल अराजनीतिक उच्च वर्ग और उच्च मध्यवर्ग को खुश करने के लिए गए जैसे महसूस किए गए। हजारों लाखों लोगों की भागीदारी वाले टिहरी बांध से लेकर नर्मदा बांध विरोधी आंदोलनों को अदालती फैसलों ने एक झटके में ही धूल चटा दी।इन अहिंसक आंदोलनो को सजा ए मौत का फैसला अदालतों ने ही सुनाया। इसी दौर में सबसे ज्यादा फैसले भी कारपोरेट कंपनियों के पक्ष में हुए। चाहे वे हड़तालों और सेवा संबधी मामलों के रहे हों या फिर कारपोरेट घरानों से जुड़े अन्य हितों के। कारपोरेटी समूहगान में विधायिका, कार्यपालिका के साथ न्यायपालिका के भी खड़े होने का ही परिणाम था कि उदारीकरण के बाद देश में औद्योगिक मजदूरों की हालत बद से बदतर हो गई। आउट सोर्सिंग के चोर दरवाजे के चलते निजी क्षेत्र में बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में मजदूर आंदोलनों से हासिल हुई अधिकांश सुविधायंे खत्म कर दी गई हैं। उदारीकरण के दौर में एक ओर जहां लोगों के संकट बढ़ते रहे वहीं न्यायपालिका सामान्य लोगों के बुनियादी सवालों के प्रति अनुदार होती गई।हालांकि राजनेताओं और कुछ हाई प्रोफाइल लोगों के खिलाफ फैसले सुनाकर उसने मीडिया से तालियां भी बटोरी और यह आभास कराने की कोशिश भी की कि सरकारी तंत्र के लिए उसके पास काटने वाले दांत भी हैं।पर यह सब वाहवाही लूटने से आगे का खेल नहीं था।ऐसा उदाहरण खोजना मुश्किल है जब कोई कोर्ट हस्तक्षेप कर किसी जनाधिकारों के पक्ष में आगे आया हो।छत्तीसगढ़ से लेकर उड़ीसा तक अहिंसक आंदोलन सरकारों के दमन के आगे असहाय और पराजित होते रहे पर अदालतें लोगों के जीने के अधिकार की गारंटी नहीं कर पाईं। आदिवासियों को खदेड़ने पर तुले कारपोरेट राक्षसों पर देश की अदालतें चुप हैं। जाहिरा तौर पर यह जनअसंतोष को सुरक्षित रास्ता देने की पुरानी लोकतांत्रिक रणनीति में बदलाव का संकेत है। भारतीय शासन व्यवस्था में आंदोलनों और जनअसंतोष के प्रति बढ़ रही इस अनुदारता की काली छाया न्यायपालिका पर भी दिख रही है। उदारीकरण के आगमन के बाद से यदि भारतीय जनजीवन में हिंसा बढ़ी है तो इसका कारण भी यही है कि लोकतंत्र के चारों पाए अब घोषित रुप से कारपोट लोकतंत्र के पक्ष में हैं।न्यायपालिका पर अनास्था रखने वाले समूह बढ़ रहे हैं। यह आखिरी किला था जो भारतीय लोकतंत्र की वर्गीय पक्षधरता को संतुलित करता था। इसकी वर्गीय पक्षधरता भी उजागर होने के बाद किस मुंह से भारतीय राज्य खुद के लोकतंत्र होने का दावा कर सकेगा? भोपाल गैस कांड यह सवाल भी देश के लोकतंत्र से पूछ रहा है।पांच लाख से ज्यादा लोगों से उनके स्वाभाविक रुप से जीने का प्राकृतिक और संवैधानिक अधिकार छीनने के दोषी लोगों में से एक के खिलाफ भी कोई कार्रवाई न हो ऐसा अंधेर तो इसी देश में संभव है। भोपाल के इस कारपोरेट बूचड़खाने में भारतीय कारपोरेट कंपनियां, कार्यपालिका,विधायिका और न्यायपालिका सब के सब नंगे खड़े हैं। एंेसे में भोपाल गैस कांड के पीड़ितों को न्याय के लिए शायद अगले जन्म का इंतजार करना होगा। क्या इस न्यायिक अंधेर पर किसी को कभी शर्म आएगी?

मंगलवार, 25 मई 2010

कुंभ के बहाने संतों का सच


कुंभ के बहाने संतों का सच कुंभ और उसके बाद यह सवाल लगातार उठ रहा है कि जिन्हे भारतीय समाज सन्यासी,साधु और संत जैसे सम्मानपूर्ण पदवियों से नवाजता रहा है वे लोग क्या वाकई इन विशेषणों के योग्य हैं भी कि नहीं ।कहीं वे गृहस्थ जीवन की कठिनाईयों या दुखों से भागने वाले कुंठित और अतृप्त लोग तो नहीं हैं ? भारतीय जीवन दर्शन में सन्यासी होने का तात्पर्य गृहस्थ जीवन के भगोड़ों से नहीं है।जिंदगी की मुश्किलों से डरे, घबराए और भागे हुए लोग वीतरागी नहीं हो सकते। असफल गृहस्थ सन्यासी नहीं हो सकता क्योंकि सन्यास पलायन नहीं है बल्कि जीवन की निस्सारता से एक व्यक्ति का व्यक्तिगत साक्षात्कार है। वैराग्य के इस दर्शन से असहमति या सहमति हो सकती है पर सन्यास अहंकारी, अतृप्त, असंतुष्ट और कुंठित लोगों का सम्प्रदाय तो कतई नहीं है । यह अपने प्रियजनों से नाराज या घर से भागे हुए लोगों की छुपने की जगह भी नहीं है । यह परजीवियों के धार्मिक दुर्ग या मठ भी नहीं है। यह धर्म की सतह के नीचे बदबू मार रहे ऐयाशी के अंधेरे तहखाने नहीं है। सिद्धार्थ का बुद्ध हो जाना ही सन्यास है।लेकिन सन्यासी बुद्ध ने न आश्रम बनाया, मठ भी नहीं बनाया। स्वामी विवेकानंद ने सन्यासी जीवन को ‘ करतल भिक्षा,तरुतल वास’ में देखा । अपरिग्रह यानी कि कुछ भी संचित न करना सन्यास की पहली शर्त है। सत्कर्म के अलावा कुछ भी संचय करना सन्यासी के लिए वर्जित है। सांसारिक सुखों का निषेध उसकी आचार संहिता का सबसे जरुरी हिस्सा है । सूरदास ने कहा ,‘संत का सीकरी से क्या लेना-देना ?’ जो सत्ता से दूर अपनी फक्कड़ी में मस्त है वही सन्यासी है। इसीलिए कबीर कहते हैं,‘ माया महाठगिनी हम जानी।’ आज सन्यासियों की नई प्रजाति से हमारा सामना हो रहा है। यह एक तरह से परजीवियों की जमात है जो लोगों को भोगविलास से दूर रहने की नसीहत देती है और खुद भोगों में मस्त है। ऐसे बिरले ही मठ और आश्रम होंगे जिन्होने सरकारी या समाज की जमीन पर अतिक्रमण न किया हो। अधिकांश मठों और आश्रमों के खिलाफ पुलिस में मामले दर्ज हैं। कईयों पर तो हिस्ट्रीशीटरों की तरह दर्जनों मुकदमे चल रहे हैं। जिस धर्म को ऐसे लोग संचालित कर रहे हों उसे दुश्मन की जरुरत ही क्या है? कुंभ के दौरान खुद को संत घोषित करने वाले ये लोग सरकार को तिगनी का नाच नचाते रहे। मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाने वाली भाजपा की सरकार रोज अखाड़ों के साधु - सन्यासी के सामने घुटने टेकती रही। हर सप्ताह कोई न कोई अखाड़ा सरकार को घुड़कियां देता रहा। कुंभ पर स्नान जिस तरह से अखाड़ों और शंकराचार्यों ने अपना विशेषाधिकार बना लिया है उससे यह सवाल उठ खड़ा है कि क्या कुंभ अखाड़ों और शंकराचार्यों के लिए आयोजित किए जाने वाला जमावड़ा है या फिर यह भारत के आम लोगों का मेला है ? कुंभ यदि इतना बड़ा सांस्कृतिक समागम बन सका है तो इसके पीछे सदियों से उस गरीब और साधनहीन भारतीय की आस्था रही है पर मठों और महंतों के संगठित व ताकतवर तंत्र ने कुंभ को हथिया लिया है। इतिहास गवाह है कि मध्यकाल से पहले कुंभ स्नान में सन्यासियों को वरीयता दिये जाने की कोई व्यवस्था नहीं थी। तब यह आम लोगों का मेला था। महान चीनी यात्री ह्वेन सांग और फाहियान के यात्रा विवरणों में साधुओं या सन्यासियों को कुंभ में प्राथमिकता दिए जाने का कहीं भी उल्लेख नहीं है। मध्यकाल में कुंभ स्नान को लेकर अखाड़ों के अहंकार आपस में टकराने लगे थे। सन्यासियों के इस दंभ और अहंकारों के चलते कई बार कुंभ की पवित्र धरती खून से लाल हुई । हजारों लोग इन अहंकारी साधुओं के टकराव में मारे गए। अखाड़ों के महंतों और महामंडलेश्वरों के अहं की तुष्टि और हिंसक टकरावों को टालने के लिए अंग्रेजों ने शाही स्नान की परंपरा डाली। आजाद भारत में ऐसी परंपरा कोई स्थान नहीं होना चाहिए। सन्यासियों को आम आदमी की तरह आम लोगों के साथ क्यों नहीं नहाना चाहिए? जिनके भीतर इतना अहंकार, द्वेष, क्रोध, और आडंबर है क्या वे साधु हैं? कुंभ यदि आज हिंदुओं की आस्था का प्रतीक है तो इसके पीछे उस आम किंतु गरीब हिंदू की धार्मिकता है जो रेलों, बसों में धक्के खाते हुए गंगा स्नान करने आता है । गांधी का यह दरिद्रनारायण कभी -कभी तो कर्ज लेकर भी कुंभ आता है। वे करोड़ों लोग जो अपने जीवन की मुश्किलों के बावजूद गंगास्नान करने चले आते हैं वे सन्यासियों के अखाड़ों और शंकराचार्यों के लिए नहीं आते। इस कुंभ में कई बार लगा कि जैसे सरकार को अखाड़े, विश्व हिंदू परिषद और शंकराचार्य ही चला रहे हों। सन्यासियों के ये समूह सरकार को अपनी शर्तें डिक्टेट करते रहे परंतु वे करोड़ों लोग, जिनके लिए धर्म न धंधा है और न आजीविका का साधन, उनकी असुविधाओं के बारे में सरकार ने शायद ही चिंता की हो। इन सच्चे तीर्थयात्रियों को मुफ्त में न सही पर कम कीमत पर हरिद्वार में रहने की जगह या सस्ता खाना मिल सके, इस पर सरकार, साधु और धर्म के ठेकेदार चुप रहे। धर्मशालाओं के किराये होटलों को मात करने लगे। दिल्ली के पत्रकार मित्र ने बताया कि हर की पैड़ी में एक नामी मंहत के आश्रम के एक कमरे का किराया पंचतारा होटल के बराबर था। इन आश्रमों और धर्मशालाओं की ऑन लाइन बुकिंग एक होटल की वेबसाइट के जरिये हो रही थी। इनके लिए लोकल स्तर पर ग्राहक भी होटल वाले ही भेज रहे थे।कुंभ आते ही हरिद्वार में धर्मशालाओं और होटलों के किराये दस गुने से ज्यादा बढ़ गए। होटलों को सरकार ने लूट का ग्रीन सिग्नल दे दिया था। देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाली धर्मपरायण जनता के लिए किसी का दिल नहीं पसीजा, न साधुओं का, न हिंदू धर्म के महामंडलेश्वरों का, न शंकराचार्यों का और न विहिप का। उत्तराखंड सरकार की यह कैसी आतिथ्य परंपरा है जो अतिथियों की जेब पर डाका डालने की छूट देती है। यह किस तरह का धर्म है जो आश्रमों और धर्मशालाओं को होटलों में बदल देता है। हद तो यह है कि एक अखाड़े ने हरिद्वार में कुंभ का लाभ उठाते हुए सरकारी जमीन पर ही कई मंदिर बना दिए और धर्म के नाम पर लोकल प्रशासन को ही आंखे दिखानी शुरु कर दी। कुंभ का यह सच उनका है धर्म के नाम पर समाज से सिर्फ लेना जानते हैं। एक सच सरकारी तंत्र का भी है जिसने 700 करोड़ रुपए की दीवाली मनाई और अब मूंछों पर ताव देते हुए अपनी पीठ खुद ही ठोंक रहा है पर उसकी कारगुजारियों खुलासा फिर कभी।

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

युद्ध है या गृहयुद्ध ?

दंतेवाड़ा में मारे गए सीआरपीएफ के जवानों के परिजनों का विलाप किसी भी आदमी के लिए एक विचलित करने वाला अनुभव है । कोई भी मौत हर उस आदमी की संवेदनशीलता को झकझोरती है जो मानता है कि हर परिजन को अपनों का न रहना एक ही तरह से दुख देता है। आदमी बुरा हो सकता है, उसके मकसद हमसे जुदा हो सकते हैं लेकिन उसके परिजनों के दुख उतने ही असली और विचलित करने वाले हो सकते हैं जितने कि उनके जिनके पक्ष में हम होते हैं । इसीलिए महान सैनिक और युद्धों के नायक अपने खिलाफ बहादुरी से लड़ने वालों को सलाम करते हैं।इसी भावना से मृत दुश्मन से गरिमापूर्ण व्यवहार करने की युद्ध आचार संहिता भी निकली है । उत्तराखंड से लेकर असम तक माओवादियों के हमले में मारे गए सीआरपीएफ के जवानों के परिजनों के विलाप के दुख और शोक में डूबे दृश्यों ने पूरे देश को हिलाया है । इन जवान मौतों ने लाखों लोगों को विचलित किया है । टीवी चैनलों में देशभक्ति के ज्वार के बीच जिन दृश्यों को दिखाया गया है उससे केंद्र और राज्य सरकारों को आपरेशन ग्रीन हंट के लिए जो जनमत की जो हरी झंडी चाहिए थी वह मिल गई लगती है । इन दृश्यों से पैदा हुआ जनमत दोनों सरकारों को यह अधिकार देता है कि वे भी माओवादियों को उसी तरह मार डालें जिस तरह उन्होने सीआरपीएफ के जवानों को मारा है । टीवी चैनलों को इस बात का श्रेय दिया ही जाना चाहिए कि वे इस देश को ऐसी भीड़ में बदलने की कूव्वत रखते हैं जो खून के बदले खून मांगती हो। आदिवासी इलाकों को तबाही की कगार पर पहुंचाने वाले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह और केंद्रीय गृहमंत्री चिदंबरम को ऐसी ही भीड़ पसंद है और उन्हे ऐसी भीड़ की सर्वाधिक जरुरत भी है। आने वाले समय में हम राज्य और केंद्र के सुरक्षा बलों को माओवादियों का इसी तरह संहार करते हुए भी देखेंगे । हममें से जो भी इन मुठभेड़ों पर सवाल उठायेगा वह देशद्रोही करार दे दिया जाएगा । यानी न अदालत, न मुकदमा सीधे ऑन द स्पॉट सफाया !! लेकिन तब कोई न्यूज चैनल मुठभेड़ में मारे गए माओवादियों के बिलखते परिजनों के विचलित करने वाले विजुअल्स इसलिए नहीं दिखाएगा कि कहीं इससे उनके प्रति सहानुभूति पैदा न हो जाय । किसी चैनल ने यह खबर दिखाने का कष्ट नहीं किया कि दंतेवाड़ा कांड से पहले किस तरह से निर्दोष आदिवासियों को पकड़कर बुरी तरह पीटा गया और उनकी स्त्रियों को सरेआम अपमानित किया गया । पूछा जा सकता है कि खबरनवीस खबेसों की यह कैसी संवेदनशीलता है जो सिर्फ सरकारी पक्ष के लिए आरक्षित है ? इस रवैये के संदर्भ में जॉर्ज बुश का वह बहुचर्चित बयान याद करना उचित होगा जो उसने 9/11 के हमले के बाद दिया था । जबरदस्त गुस्से और गम से विचलित अमेरिकी समाज से वादा करते हुये तब बुश ने कहा था कि 9/11 के हमले के दोषियों चाहे वे कहीं भी क्यों न हों ,को न्याय की चौखट पर लाया जाएगा । गौर करें कि बुश ने यह नहीं कहा कि अमेरिकी फौजें दोषियों का सफाया कर देंगी । लोकतांत्रिक होने का अर्थ सिर्फ चुनाव जीतना नहीं होता बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की पवित्रता बनाए रखना भी होता है । दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहे जाने वाले देश का दुर्भाग्य यह है कि उसका गृहमंत्री कभी माओवादियों को न्याय की चौखट पर लाने का नहीं बल्कि हर तीसरे दिन उनका सफाया करने की धमकी देता है। जिस लोकतंत्र का गृहमंत्री ही कानून के राज और न्यायपालिका में यकीन न रखता हो वह लोकतंत्र भयभीत करता है। वह जनमत इसे और भी खतरनाक बना रहा है जिसे इस देश के न्यूज चैनल रोज तैयार कर रहे हैं । वे ‘‘खून के बदले खून’’ और ‘‘जान के बदले जान’’ का उन्मादी जनमत बनाने में जुटे हैं।जाने अनजाने में वे लोकतंत्र के भीतर एक जुनूनी फासीवाद के लिए रास्ता साफ कर रहे हैं।मानवाधिकारों की रक्षा के मामले में दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में फिसड्डी देश के शासकों को ऐसे ही उन्मादी जनमत की जरुरत है जो मानवाधिकारों से छूट देकर उन्हे आदिवासी इलाकों में मुठभेड़ों के निर्द्वंद अधिकार को वैधता प्रदान करता हो। कानून के दायरे बाहर जाकर सफाया करने के चिदंबरम के माओवादी विरोधी सिद्धांत और मोदी के मुस्लिम विरोधी सिद्धांत में कोई बुनियादी फर्क नहीं है । क्योंकि दोनों ही अपने विरोधी समूह के सफाये में यकीन रखते हैं । इस पूरे वाकये को जिस तरह से माओवादी बनाम देश की लड़ाई के रुप में पेश किया जा रहा है वह क्या सच है या सरकारी लड़ाई को देश की लड़ाई बनाने का खेल खेला जा रहा है ? क्या वाकई यह देश की लड़ाई है?उत्तराखंड आंदोलन के दौरान मसूरी गोलीकांड में एक पुलिस अफसर मारा गया था और कई आंदोलनकारी भी मारे गए थे । सरकार के लिए उसका अफसर शहीद था पर आम लोगों के लिए उत्तराखंड के लिए मर मिटने वाले लोग शहीद थे ।आज इन्हे उत्तराखंड की सरकार भी शहीद मानती है । तब सरकार की ओर से गोलीबारी कराने वाले बुआ सिंह और ए0पी0 सिंह आज भी उत्तराखंड की जनता के बीच सबसे बड़े खलनायक हैं । ऐसा अनेक आंदोलनों में होता है जब जनता के नायक सरकार के लिए अपराधी होते हैं लेकिन इतिहास में जिंदा तो जनता के नायक ही रहते हैं सरकार के नायक नहीं । देश के भीतर जब भी संघर्ष होंगे तब शहादतों पर भी राय बंटी रहेगी । जाहिर है कि बाहरी दुश्मनों का हमला और देश के भीतर सरकारी नीतियों के खिलाफ होने वाले संघर्ष अलग - अलग घटनायें हैं । जिसे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री देश की लड़ाई का नाम दे रहे हैं वह दरअसल दो अलग-अलग व्यवस्थाओं में यकीन रखने वाले समूहों के बीच का गृहयुद्ध है। क्योंकि माओवादी सरकार के खिलाफ हैं न कि देश की अखंडता के । अलबत्ता इतना जरुर कहा जा सकता है कि वे मौजूदा तंत्र का तख्तापलट कर अपनी विचारधारा पर आधारित तंत्र कायम करना चाहते हैं। इस लड़ाई की त्रासदी यह है कि इसमें दोनों ओर से साधारण लोगों के बेटे ही मारे जा रहे हैं । इस युद्ध का ऐलान करने वाले नेताओं और अफसरों को खरोंच तक नहीं आ रही है।देश के मात्र आदिवासी हिस्सों तक सिमटे माओवादियों से वास्तविक खतरा कितना असली है यह तो पता नहीं पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि देश की 85 से 90 फीसदी जनता इसकी चपेट में नहीं है।फिर इतना हल्ला और युद्ध का शोर मचाये जाने पर शक होता है कि कहीं इसके पीछे और कारण तो नहीं हैं? वह भी तब जब इस आदिवासी बहुल इलाके की खनिज संपदा के दोहन के लिए 200 से ज्यादा एमओयू साइन किए जा चुके हैं। इससे सवाल उठता है कि कहीं केंद्रीय और राज्यों के सुरक्षा बलों को पास्को सहित बहुराष्ट्रीय कंपनियों और मित्तलों और जिंदलों के लिए रास्ता साफ करने के लिए तो युद्ध में नहीं झोंका जा रहा है ? जिसे देश की लड़ाई बताया जा रहा है वह कहीं इन खरबपतियों की लड़ाई तो नहीं है ? देश की राजनीति और राजनेताओं का जो चरित्र है उसे देखते हुए यह आशंका निराधार नहीं है । वर्ना सरकार आदिवासी इलाकों में किए गए खनन के एमओयू रद्द कर राजनीतिक हल की कोशिश कर सकती थी । छत्तीसगढ़ की राज्य सरकार और केंद्र सरकार दोनों ही नहीं चाहती कि इस इलाके में कोई लोकतांत्रिक आंदोलन जिंदा रहे इसलिए उसने सभी आंदोलनों और संस्थाओं को माओवादियों के साथ सहानुभूति रखने वाला करार देकर वहां लोकतांत्रिक प्रतिरोध का स्पेस खत्म कर दिया गया।हिंसक आंदोलनों से निपटने में पुलिस और सरकारों को दमन का लाइसेंस मिल जाता है इसलिए एक रणनीति के तहत यह सब किया गया । यह रणनीति माओवादियों को भी रास आती है । इससे आम तौर पर हिंसा से दूर रहने वाले लोगों के पास भी हथियार उठाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता । इस तरह की सीधी लड़ाई से माओवादियों को नया कैडर मिल जाता है । हिंसक संघर्ष दोनों ही पक्षों की जरुरत है न कि देश की । एक ओर प्रधानमंत्री और गृहमंत्री माओवादियों को सरकार का सबसे बड़ा खतरा बता रहे हैं तो दूसरी ओर भाजपा नेता अरुण जेटली भी उनके सुर में सुर मिलाकर इसे संसदीय लोकतंत्र के लिए घातक करार दे रहे हैं । अचरज यह है कि देश को बाजार अर्थव्यवस्था के अंधेरे कुयें में धकेलने वाले मनमोहन,चिदंबरम की जोड़ी गरीबी, बेरोजगारी और महंगाई को देश के लिए खतरा नहीं मानती उनकी तरफदारी कर रहे जेटली को लोकसभा में मौजूद तीन सौ करोड़पति सांसदों और कई हजार करोड़ के चुनाव खर्चे से संसदीय लोकतंत्र को कोई खतरा नजर नहीं आता । जिस देश में 76 फीसदी लोग 20 रु0 रोज पर गुजारा कर रहे हों वहां यदि कुछ लोग हथियार उठाकर बदलाव करना चाहते हैं तो किसका दोष है? सरकार का या भूखे लोगों का ? वह भी तब जब महंगाई जैसे ज्वलंत सवाल पर देश के राजनीतिक दल आंदोलन की औपचारिकता निभा रहे हों ।भाजपा से लेकर सीपीएम तक इस देश के नेता होने का दावा करने वालों से पूछा जाना चाहिए कि उनमें गरीबी,बेरोजगारी और महंगाई के !सवाल पर देश की जेलें भर देने का साहस क्यों नहीं है ? इतिहास गवाह है कि जब -जब समाज से लोकतांत्रिक संघर्ष गायब हुए हैं तब -तब आम लोग हिंसक संघर्षों की ओर आकृष्ट हुए हैं । मौजूदा दौर भी उसी ओर जा रहा है । समाज में राजनेताओं की साख बनाए रखने व लोकतांत्रिक संघर्षों के लिए स्पेस बचाए रखने का काम पुलिस और फौज नहीं कर सकती । राजनीतिक नालायकी और निकम्मेपन से उपजे जन असंतोष का फौजी हल संभव नहीं है ।

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

जगह अब भी मौजूद है

‘‘लोग सेलेब्रेटीज और पेज थ्री की हस्तियों की रंगीनियों और उनके भव्य जीवन के बारे में पढ़ना चाहते हैं ’’ इस ऐलान के साथ जब नवभारत टाईम्स ने अपना चोला बदला था तब हिंदी अखबारों में ऐसे मालिकों और संपादकों की कमी नहीं थी जिन्होने इस पर नाक - भौंे सिकोड़ी थी । एक दषक पहले अंग्रेजी अखबारों की तरह वह उदारीकरण और ग्लोबलाइजेषन के नषे में चूर था । पिछले दस वर्षों में अंतर इतना ही हुआ है कि नवभारत टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया के उसी रास्ते को भारतीय और खास तौर पर हिंदी पत्रकारिता का मुक्तिमार्ग मान लिया गया है । ‘‘महाजनो गतो येन सः पंथा ’’ के सूत्र वाक्य का पालन करते हुए पत्रकारिता उसी रास्ते पर चल पड़ी है । फर्क बस इतना है कि इस सूत्र वाक्य में वर्णित महाजन का अर्थ महान लोग हैं पर पत्रकारिता के मौजूदा पाणिनियों ने इस वाक्य का अर्थ सामंतकालीन महाजन का अनुसरण करना माना । बड़े जोर शोर से घोषणा कर दी गई कि गरीबी , बेरोजगारी ,भुखमरी जैसी खबरें लोगों के मुंह का जायका खराब करती हैं , इनसे खाते - पीते लोगों के आनंद में खलल पड़ता है , इसलिए ऐसी खबरों का कोई भविष्य नहीं है । खबरें ऐसी हों कि समाज के मोगेंबो खुष हो जांय । लेकिन हाल ही में आजादी के बाद के दौर की पत्रकारिता के एक नामचीन पत्रकार की जन्म शताब्दी के मौके पर बड़ी तादाद में जुटे लोगों ने बताया कि जनपक्ष में लिखी जाने वाली खबरों का बाजार भी है , भूख भी है और कद्रदान भी हैं ।आचार्य गोपेष्वर कोठियाल हिंदी की मुख्यभूमि के पत्रकार नहीं थे । वे उस हाषिये के पत्रकार थे जो भूगोल के आधार पर निर्मित किए गए हैं । भूगोल के बीहड़ में पड़े पहाड़ जैसी पिछड़ी जगह के पत्रकार जिसके बारे में हिंदी का मेनलैंड उतना ही जानता है जितना औसत अमेरिकी भारत के बारे में । उत्तराखंड भारत में ऐसी जगह है जिसका नक्षा तब खोजा जाता है जब कोई बस दुर्घटना या भूस्खलन जैसी आपदा घटती है । उत्तराखंड का भी अपना हाषिया है जो किसी भूगोल ने नहीं बल्कि लगभग 132 साल पुरानी राजषाही ने टिहरी और उत्तरकाषी के रुप में तैयार किया है । इसी अंधेरे हिस्से के एक बाषिंदे थे गोपेष्वर कोठियाल । आजादी के दौर में जब वह पत्रकारिता को अपना भविष्य के रुप में चुन रहे थे तब पत्रकारिता एक ऐसा रुखा - सूखा पेषा था जो कबीर की ‘‘ जो घर फंूकनो आपनो चलो हमारे साथ ’’ जैसे फक्कड़पन की याद दिलाता था । वह दौर जुनूनी पत्रकारिता और मिषनरी भावुकता समय था । देष और समाज को रास्ता दिखाने की बेचैनी में बंधकर लोग पत्रकारिता में आते थे और ऐसे समाज और शक्तियों के बीच पत्रकारिता के लोकतांत्रिक हथियार का उपयोग करते थे जो मिजाज में सांमती था । 17 वीं सदी के संस्कारों और सीमाओं में बंधे समाजों में पत्रकारिता करना खतरनाक और उल्टी गंगा बहाने जैसा दुश्कर काम रहा होगा । ऐसे समय में जब टिहरी में राजषाही की अंतिम दौर में थी और अपनी आसन्न मौत से घबराई यह राजषाही हर रोज बर्बरता के नए हथियार आजमा रही थी तब आचार्य गोपेष्वर कोठियाल पत्रकारिता में आए और इस राजषाही के खिलाफ कलम को हथियार की तरह इस्तेमाल करने के इरादे के साथ आए । वह चाहते तो बेहतर जीवन और भविष्य चुन सकते थे । मास्टर हो जाते और प्राध्यापकी करते हुए किताबें लिखते व पढ़ते - पढ़ाते आराम से जीवन गुजार देते । उस जमाने में जब पांचवीं पास लोग भी चिराग लेकर खोजने से नहीं मिलते थ तब वह काषी हिंदू विष्वविद्यालय से संस्कृत में आचार्य की डिग्री लेकर पहाड़ लौटे थे । उन्ही गोपेष्वर कोठियाल को जन्म शती के मौके पर याद करने के लिए देहरादून में हाल ही में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था । देहरादून का जिक्र आते ही एक ऐसा शहर जेहन में घूमता है जो फिरंगी साहबों से विरासत में मिले चिकनी - चुपड़ी लकड़ी के छोटे से रुल को हाथ में लिए अफसरी ठसक के साथ घूमते रिटायर्ड अफसरों का स्वर्ग माना जाता था । ये अफसर बुढ़ापा बिताने मसूरी की तलहटी में बसे इस शहर में आते । शहर की आबोहवा में मसूरी की ठंडक और मैदान की गर्मी दोनों का ऐसा नायाब मिश्रण था कि देसी अफसर आजादी से पहले और उसके बाद इस शहर के दीवाने रहे । यह सेना और सिविल सर्विसेज के रिटायर्ड अफसरों के शहर के रुप में ही जाना जाता था । ये दोनों मिलकर इसे एक आधा ब्रिटिष और आधा इंडियन कस्बा बनाते थे । ठीक उस काले एंग्लो इंडियन जैसा जो भारतीय दिखने को तैयार नहीं था परंतु दुर्भाग्य से भारत में ही छूट गया था । इन साहबों का छोटा सा डंडा कुछ नहीं बोलता था लेकिन साहब और उनका रुल दोनों की देह की भाषा यह बता देतीे थी कि वे हिंदुस्तान पर ‘रुल’ करके निवृत हुए हैं । उनकी ठसक इस शहर को भले ही ब्रिटेन के करीब ले जाती हो पर देसी साहबों का मिजाज शहर को नफासत भी बख्शता था । इसे सुसंस्कृत बनाने में अ्रंग्रेजियत के वारिस रहे इन अफसरों का योगदान भी कम नहीं रहा । इसके मिजाज में वो साहबी अंदाज आखिर यूंही तो नहीं आया ।लेकिन ये साहब अकेले नहीं थे जिन्होने इसे देहरादून बनाया । कलाकारों , साहित्यकारों , पत्रकारों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की एक ऐसी आकाषगंगा भी इस अंग्रेजी मिजाज के शहर में चमकती रही जिसने इसे हिंदुस्तानियत का रंग बख्शा और उसे राजनीतिक चेतना से धड़कता शहर बनाया । इनके साथ वे आम लोग भी थे जो पहाड़ और मैदान के गांवों और कस्बों से आए थे जिन्होने ठेठ देसीपन का छौंक लगाकर इसे ज्यादा मानवीय शहर बनाया । राजधानी बनने के बाद शहर का मिजाज भी बदला और जीवन भी । इत्मीनान की जिंदगी गुजारने की लत की जगह भागदौड़ की आदत ले रही है । फुरसत के पल सिमट रहे हैंे और हड़बड़ी का आलम सड़कों पर पसर रहा है । लोग जल्दी में हैं इसलिए शहर में हर रोज कोई न कोई कुचल जाता है । कभी सड़क पर चलने वाले किसी बूढ़े या बच्चे वाले को कुचलकर मोटर साइकिल वाला फुर्र हो जाता है तो कभी मोटर साइकिल वाले कीे कुचलकर कोई कार या ट्रक फरार हो जाता है । यह ऐसा शहर में बदल रहा है जहां लोग मिलने के मौके के लिए ाादी - ब्याह का इंतजार करते हैं । सीएमआई या दून अस्पताल में भर्ती हुए बगैर मित्रों और परिचितों से मिलना मुमकिन नहीं हो पाता । दिल में लीची की मिठास और व्यवहार में बासमती की खुषबू लिए गरमजोषी के साथ मिलनेवाली प्रजाति लीचियों और बासमती की तरह दुर्लभ होती जा रही है । ऐसे शहर में बीते जमाने के प़त्रकार को जन्म के सौ साल बाद याद करने का आयोजन करना खतरे से खाली नहीं था । वह भी ऐसे समय में जब पत्रकारिता की साख नेताओं के चरित्र के सूचकांक की तरह हर रोज कुछ और नीचे गिर जाती हो । लेकिन इसके बावजूद आयोजन में लोग न केवल बड़ी तादाद में आयोजन में पहुंचे बल्कि पूरे समय तक कार्यक्रम में मौजूद भी रहे । भले ही तथाकथित बड़े अखबारों के स्वनामधन्य पत्रकारों को पत्रकारिता के इस पुरखे को याद करने की जरुरत महसूस न हुई हो परंतु इससे पत्रकारिता की विरासत और उसके प्रति कृतज्ञता जताने को लेकर उनकी अरुचि जरुर झलकती है । लेकिन मुख्यधारा की पत्रकारिता की कृतघ्नता से परे हटकर देखें तो यह साफ दिखा कि आम लोगों ने इस मौके पर आकर पत्रकारिता के उस पुरखे के प्रति अपनी कृतज्ञता जताने में कोई कंजूसी नहीं दिखाई वह भी तब जब शहर संवेदना के स्तर पर मरुस्थल में बदल रहा हो । लोगों का यह लगाव और जुड़ाव बताता है कि जनपक्षधर पत्रकारिता को बीते जमाने का शगल करार देने की तमाम कोषिषों के बावजूद जनता के पक्ष में खड़ी पत्रकारिता के कायल लोग हैं । वह भी तब जब कहा जा रहा हो कि मध्यवर्ग हल्की - फुल्की खबरें पढ़ना चाहता है । मध्यवर्ग से जुड़े लोगों की भीड़ और उनकी चिंताओं ने बताया कि जैसे - जैसे मुख्यधारा के अखबार सूचना पत्र में बदल रहे हैं वैसे - वैसे खबरों की भूख भी बढ़ रही है । इसका सीधा मतलब है कि मुख्य धारा के अखबार अलोकतांत्रिक तरीके से आम पाठकों पर अपनी पसंद का कंटेंट थोप रहे हैं ।अखबारों के दफ्तरों में लोकरुचि के नाम पर विचार और जनपक्षधरता की खबरों की हत्यायें किए जाने की घटनाओं के बीच यह सुकून से भर देने वाली घटना है जिसे रेखांकित किए जाने की जरुरत है ताकि आने वाले इतिहास में यह जरुर दर्ज किया जाय कि बड़े अखबार जब लोगों के पक्ष में खड़ी खबरों के कत्ल में जुटे थे तब लोग उनके साथ नहीं थे । यह वाकया उम्मीद जगाता है । यह एक मौका है उन लोगों के लिए जो पत्रकारिता को उसकी पेषागत ईमानदारी के साथ अंजाम देना चाहते हैं । यह चुनौती भी है । क्योंकि 21 वीं सदी की पत्रकारिता आठवें दषक की जनपक्षधरता वाले स्टाइल में नहीं चल सकती । उसे अपने लिए किसी ताजे मुहावरे, षिल्प और भाषा की तलाष करनी होगी । नवें दषक में जनसत्ता और नवभारत टाईम्स ने प्रभाष जोषी और राजेंद्र माथुर की अगुआई में पत्रकारिता की नई भाषा और षिल्प ईजाद कर उसे आजादी के दौर की जड़ता से मुक्त किया था । अब समय है कि 21 वीं सदी की पत्रकारिता अपने समय के साथ कदम ताल करते हुए पिछले दो दषकों से आई जड़ता को तोड़कर नई जमीन तलाषे । पत्रकारिता के सामने नए षिल्प और मुहावरे की तलाषने की चुनौती हर समय रहेगी क्योंकि संप्रेषण के माध्यम की तकनीक हर रोज बदल जारही है तो बाजारवाद लोगों की रुचियों को अपने हिसाब से तय करने पर आमादा है । ऐसे में जनपक्ष आउटडेटेड होने वाला नहीं है । एक हथियार के तौर पर उसकी जरुरत बढ़ती रहने वाली है । आचार्य गोपेष्वर कोठियाल की जन्म शती के मौके पर आई भीड़ यही कहना चाहती है ।

बुधवार, 6 जनवरी 2010

छोटे राज्यों के बड़े सवाल

लगभग समूचा देश अलग राज्यों की आग और बहस से गुजर रहा है । इसे भारतीय राष्ट्र राज्य की सीमा भी मान सकते हैं और बिडंबना भी कि आजादी के 62 वर्षों बाद भी हम विकास का ऐसा रास्ता नहीं खोज पाए हैं जो विकास के नक्शे से बाहर कर दिए गए क्षेत्रों और लोगों को पिछड़ेपन और उपेक्षित रह जाने के अहसास से मुक्ति दिला सकें । न हमने ऐसी राजनीति और राजनीतिक प्रक्रिया को ईजाद किया जो निर्णय लेने की परिधि से बाहर रह रहे लोगों की राजनीतिक भागीदारी तय कर सके । छोटे राज्यों की आग यदि बड़ी दिखाई दे रही है तो इसकी बुनियाद में भारतीय राष्ट्रराज्य की विफलताओं के शव हैं । ऐसी स्थिति में छोटे राज्यों की कामयाबी और नाकामी की बहस का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि यह भूगोल का नहीं बल्कि राजनीतिविज्ञान का सवाल है ।
हम एक बार फिर छठे और सातवें दशक की उस बहस में वापस लौट रहे हैं जो तब महाराष्ट्र से लेकर आंध्र प्रदेश तक गठन को लेकर चली थी । मजेदार बात यह है कि बीसवीं सदी के मध्य के उस दौर में भी देश की हवाओं राज्यों के विभाजन को लेकर वही भय और आशंकायें तैर रही थीं जो आज 21 वीं सदी के इस पूर्वार्द्ध में गूंज रही हैं । राज्यों के विभाजन के प्रेत से देश के बाल्कनीकरण का भस्मासुर पैदा होने की आशंका में दुबले होने वाले चिंतक और नेताओं की फौज तब भी थी और आज भी है । लेकिन देश की जनता ने साबित किया कि उसे राज्य की जरुरत और अलगाव के बीच मौजूद नियंत्रण रेखा की समझ हमारे नेताओं से कहीं ज्यादा है । इसीलिए देश के भीतर समय - समय पर चलने वाले अलगाववादी आंदोलन आए और कुछ घावों को छोड़कर विदा हो गए । छठे दशक की चिंताओं को छोड़कर ये राज्य आगे बढ़ गए । इनमें से कई तो विकसित राज्यों की पांत में भी षामिल हैं । सातवें और आठवें दशक की शुरुआत में बने छोटे राज्यों ने कामयाबी के झंडे गाड़े तो लगा कि लोगों की खुशहाली का रास्ता इसी माॅडल में निहित है । पंजाब, हरियाणा और हिमाचल की उपलब्धियों को तो जैसे विकास की बाइबिल मान लिया गया । मानव विकास मानकों , प्रति व्यक्ति आय ,विकास दर और सकल घरेलू उत्पाद के नजरिये से इन राज्यों की उपलब्धियां चमत्कृत करने वाली रही हैं । विकास अपने आप में एक संक्रामक प्रक्रिया है । इसलिए सदियों से दमित और उपेक्षित समाजों को लगा कि नियति बदलने का रास्ता छोटे राज्यों से होकर जाता है । इन राज्यों की उपलब्धियों ने पूरे देश में छोटे राज्यों के समर्थकों को तर्क और औचित्य के हथियार के साथ - साथ आंदोलन का ईंधन भी मुहैय्या कराया । इन राज्यों में हुए विकास के हवाले से उत्तराखंड , झारखंड जैसे पिछड़े इलाकों और उपेक्षित इलाकों में आम लोगों में बदलाव की उम्मीदें जगाए जाने लगीं । ये इलाके देश के ऐसे हिस्से थे जहां राष्ट्रीय राजनीतिक दल जनाकांक्षाओं की कसौटी पर नाकाम साबित हो चुकीं थी और उनकी जगह जो दल आए वे अपने - अपने जातीय घेरों के बंदी थे । ऐसे यूपी और बिहार के इन हिस्सों में अलगाव का अहसास बढ़ा । झारखंड और उत्तराखंड के आंदोलनों के गर्भ से तीन नये राज्यों का जन्म हो गया । संयोग से इन राज्यों की बहुसंख्या सांस्कृतिक और नृवंशीय नजरिये से अपने पूर्ववर्ती राज्यों से काफी अलग थे । इसलिए ये मूलतः सांस्कृतिक पहचान के आंदोलन थे जिन्हे पिछड़ेपन के आर्थिक कारणों और यूपी - बिहार की अधीनता के राजनीतिक कारणों ने हवा दी ।
जाहिर है कि अब छोटे राज्यों के दो माॅडल सामने हैं । एक ओर सत्तर के दशक में बने हरियाणा, पंजाब और हिमाचल हैं जिन्हे फलने - फूलने के लिए हरित क्रांति का दौर तो मिला ही साथ ही वह कालखंड भी मिला जब राजनीति और सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार न्यूनतम था । लेकिन विकास का यह माडल भी 20 वीं सदी के आखिरी दशक ठहराव की ओर है , या यूं कहें कि चरमरा रहा है तो गलत नहीं होगा । हिमाचल में सेब क्रांति चरम पर पहुंचने के बाद जमीन की कमी , अत्यधिक कीटनाशकों ,खादों के प्रयोग और ग्लोबल वार्मिंग के कारण झटके झेल रही है तो पंजाब और हरियाणा में भी जमीन की ताकत और भूजल दोनों ही चुकने जा रहे हैं ।विकास के इन स्वर्गों में मरुस्थल दिखने लगे हैं । दूसरी ओर उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ हैं जिन्हे बने नौ साल बीत चुके हैं । झारखंड एक ओर नक्सलवाद के उभार के लिए चर्चा में है नीम पर जा चढ़े करेले की तरह अब वह मधु कौड़ा के पराक्रम के बहाने राजनीतिक भ्रष्टाचार के लिए भी पूरे देश में जाना जा रहा है । छत्तीसगढ़ नक्सलवाद , सलवां जुड़म और कीमती खनिजों के लिए थोक के भाव से हो रहे एमओयू के लिए सुर्खियों में है । उसके आदिवासी बहुल जिलों के सकल घरेलू उत्पाद में बृद्धि नहीं हो रही है । उत्तराखंड में भी इन नौ सालों में ऐसा कोई उल्लेखनीय उपलब्धि नहीं है जो छोटे राज्यों के औचित्य को साबित करे उल्टे नौकरशाही का कार्यकुशलता का ग्राफ यूपी से बदतर हो गया है । भ्रश्टाचार और राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते सरकारी तंत्र चरमरा गया है । हालात यह हैं कि पहाड़ के स्कूलों में तैनात शिक्षकों को पढ़ाने के लिए स्कूल भेजने के लिए सरकार को अपने डीएम,एसडीएम से लेकर पटवारी तक मोर्चे पर तैनात करने पड़ रहे हैं । मैदानी जिलों को छोड़ दे ंतो पहाड़ी जिलों में सकल घरेलू उत्पाद गिर रहा है । राज्य की अर्थव्यवस्था कर्ज से ही नहीं चरमरा रही है बल्कि उसमें बुनियादी दोश आ गए हैं । सर्विस सेक्टर का योगदान 50 फीसदी तक जा पहुंचा है । कृषि सेक्टर का योगदान निरंतर उतार पर है ।
छोटे राज्यों की राजनीति की खासियत यह है कि सरकार के फैसलों को प्रभावित करने की जनता की ताकत बढ़ जाती है । मात्र एक हजार वोटों के इधर - उधर हो जाने से जब विधानसभा सीट के नतीजे बदल सकते हों तब लोगों के छोटे समूहों के जनमत भी महत्वपूर्ण होंगे ही । लेकिन हाल में बने राज्यों की बिडंबना यह है कि वहां सत्ता का विकेंद्रीकरण के जरिये निर्णय लेने की प्रक्रिया में जनता की भागीदारी तो बढ़ी नहीं उल्टे राजनीतिक और प्रशासनिक सत्ता का केंद्रीयकरण राज्य की राजधानी में हो गया । इसलिए नौ साल पहले बने राज्य हिमाचल, पंजाब और हरियाणा की तरह विकास के बजाय अपनी विफलताओं के लिए याद किए जा रहे हैं । इन हालातों में जब छोटे राज्यों को खुशहाली का रामवाण नुस्खा नहीं कहा जा सकता । किसी राज्य की कामयाबी भूगोल से नहीं बल्कि शासन चलाने की गुणवत्ता सत्ता के विकेंद्रीकरण और निर्णय लेने की प्रक्रिया में आम लोगों की भागीदारी से तय होगी ।
कामयाबी और नाकामी के इस शास्त्रीय बहस से बहस से निकलकर देखें तो लोकतंत्र लोगों को अपने भाग्य और भविष्य चुनने की आजादी देता है । यदि जनाकांक्षायें अलग राज्य मांगती हैं तो उसे लेकर क्यों किसी सरकार या राजनीतिक दल को अपने पूर्वाग्रह या राजहठ पर अड़़ा रहना चाहिए ? आखिर देश की संसद का काम भी तो जनाकांक्षाओं के अनुरुप ही देश का निर्माण करना ही तो है । इस नजरिये देखें तो आंध्र प्रदेश के बाकी हिस्सों में चल रहा अखंड आंध्र का आंदोलन अलोकतांत्रिक और अपने मिजाज में तानाशाही पूर्ण है । क्षेत्र विशेष की आबादी अपनी इच्छा को किसी और पर थोपने की जिद कैसे कर सकती है ? क्षेत्रीय पहचानों का जो विस्फोट हम देख रहे हैं वह दरअसल 62 साल की हमारी राजनीति की विफलता से उपजी निराशा है । इस देश की राजनीति और कर्णधार चकरा देने करने वाली विविधताओं से भरे इस देश के समाजों को संबोधित तक नहीं कर पाए हैं । विकास से लेकर न्याय तक फैली राज्य की ममतापूर्ण भुजायें उन समाजों तक नहीं पहुंची अलबत्ता शोषण और दमन से लैस सहस्त्रबाहु राज्य जरुर उन तक पहुंच गया । नए राज्यों की जरुरत यहीं से पैदा हुई है । एक अर्थ में यह भारतीय राष्ट्र और समाज के संघीय चरित्र की वापसी भी है जिसे हमने कृत्रिम तरीके से बड़े राज्यों में कैद कर दिया था । जिस देश में इतने सारे समाज पहचान के संकट से दो चार हों और इतनी सारी जनांकाक्षायें आर्थिक सामाजिक न्याय की तलाश कर रही हों उस देश को अपनी पूरी राजनीतिक यात्रा पर चिंता और चिंतन करना चाहिए कि उसकी सत्ता की परिधि के बाहर बेचैन समाजों की तादाद क्यों बढ़ रही है । इसमें कोई शक नहीं कि नए राज्य बनें लेकिन वे अपने पूर्ववर्ती राज्यों के छोटे भौगोलिक संस्करण न बनकर जनाकांक्षाओं के साथ न्याय करें इसके लिए कोई मैकेनिज्म होना चाहिए । साथ किसी राज्य का निर्माण सामान्य जनइच्छा है या कुछ महत्वाकांक्षी नेताओं का खेल है, इसे जांचने के लिए जनमतसंग्रह के लोकतांत्रिक औजार को आजमाने में कोई बुराई नहीे होनी चाहिए । इस बात को ध्यान में रखना होगा कि कोई राज्य एक अदद मुख्यमंत्री, कुछेक मंत्रियों और कुछ सैकड़ा अफसरों का वनविहार न बन जाय ।