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शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

छोटे अखबारों की बड़ी लड़ाई
एस0राजेन टोडरिया
आने वाला इतिहास जब कभी मौजूदा मुख्यमंत्री के राजनीतिक सफर को बयां करेगा वह यह भी दर्ज करेगा कि उन्होने अपनी राजनीति का ककहरा भले ही शिशु मंदिर के शिक्षक के रुप में सीखा हो पर राजनीति में उनकी उड़ान की शुरुआत टूटे अक्षरों की इबारत वाले एक चार पेजी अखबार से हुई थी। विडंबना यह है कि वही इतिहास उन्हे पूरी शक्ति,सामर्थ्य और जुनून के साथ छोटे अखबारों के गला घोंटने के लिए भी याद करेगा। भविष्य मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के व्यक्तित्व को इस विरोधाभास की रोशनी में पढ़ेगा और इस अजूबे से विस्मय में भी पड़ेगा। वह शायद इतिहास में अकेले ऐसे पत्रकार राजनेता होंगे जो मात्र कुछ सैकड़ा बंटने वाले छोटे-छोटे अखबारों में भी असहमति और आलोचना के स्वर बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं। यह इस बात का भी सबूत है कि सत्ता आदमी को किस हद तक दुर्बल,दयनीय और असहिष्णु बना देती है।उत्तराखंड में बड़े अखबारों और क्षेत्रीय चैनलों को मिलाकर मीडिया की कुल जमा जो तस्वीर बनती है वह चारण अखबारों और चमचा चैनलों की बनती है। काश! हमारे समय में भी कोई भारतेंदु हरिश्चंद्र होते तो मीडिया की इस दुर्दशा पर कोई नाटक जरुर लिखते। फिर भी मीडिया की इस दुर्दशा का पूरा श्रेय सिर्फ मौजूदा मुख्यमंत्री के पुरूषार्थ को देना ठीक नहीं होगा। एनडी तिवारी ने अपने राजनीतिक जीवन के पूरे अनुभव को झोंकते हुए करोड़ों रु0 की खनक के बूते मीडिया की इन कुलीन कुलवधुओं को नगरवधू बना दिया। तिवारी की ही परंपरा पर चलते हुए मौजूदा मुख्यमंत्री ने इन्हे हरम पहुंचा दिया है। विज्ञापन का बजट हर रोज छलांगें मार रहा है। अंतःपुर के कारिंदे रोज किसी न किसी को लाख-दो लाख से लेकर तीस-तीस लाख के पैकेजों की बख्शीशें दिला रहे है। राजा ने अपना खजाना खोल दिया है, ‘‘लूट सके तो लूट’’। प्रदेश में अभूतपूर्व आपदा है, पहाड़ के गांवों में लोग एक-एक पैसे और एक टाइम के खाने के लिए जूझ रहे हैं पर सरकार है कि चैनलों में प्राइम टाइम में दस साल का जश्न पर करोड़ों के विज्ञापन लुटा रही है। विधानसभा चुनाव से पहले की इस लूट में मीडिया मस्त है और पत्रकारिता पस्त है। यह सुनकर अजीब लगे पर सच यही है कि आपदा के दौरान भी उत्तराखंड के दैनिक अखबारों और क्षेत्रीय चैनलों के लिए विज्ञापन कम नहीं हुए उल्टे बढ़ गए । आपदा को लेकर दिए गए विज्ञापनों के आंकड़े इस उलटबांसी के गवाह हैं। अखबारों ने आपदा के नाम पर भी विज्ञापन कमाई के जरिये निकाल लिए।एक हिंदी अखबार ने राहत कार्यों पर सरकार की चमचागिरी का नया रिकार्ड कायम कर दिया। ऐसा घटियापन कि कल्पना करना मुश्किल है कि खरबों रु0 का मीडिया हाउस चलाने वाली कंपनी का एक अखबार मात्र 28 लाख रु0 के पैकेज के लिए इस हद तक गिर जाएगा!लेकिन यह कोई अपवाद नहीं है। ऐसे वाकये अक्सर होते रहते हैं सिर्फ अखबारों के नाम बदल जाते हैं। कुछ अखबार चमचागिरी में शऊार बरतते हैं तो कुछ नंग-धड़ंग होकर 17 वीं सदी के भांडों की तरह इसे अंजाम दे रहे हैं। उत्तराखंड में बड़े दैनिकों ने संपादक को ऐसे प्राणी में बदल दिया गया है जो सरकारी विज्ञापनों के लिए मुख्यमंत्री को रिझाने और पटाने के वे सारे गुण जानता हो जो एक समय गणिकाओं के लिए जरुरी माने जाते थे। माहौल ऐसा है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग सुबहो शाम समाचार माध्यमों में ‘तन डोले मेरा मन डोले’ की धुन ही सुनना चाहते हैं। मुख्यधारा के इस रवैये ने राज्य की पत्राकारिता को भांडगिरी में बदल दिया है। एक अखबार ने मुख्यमंत्री के पुतले जलाने की घटनाओं की खबरें छपने से रोकने के लिए संवाददाताओं को पुतलादहन की खबरें न भेजने का फरमान जारी कर दिया तो दूसरे ने राजनीतिक खबरें छोटी और बाजार से जुड़ी खबरें बड़ी छापने की आचार संहिता लागू कर दी है। अखबार और चैनलों के दफ्तरों में ऐसी खबरों का गर्भपात कर दिया जाता है जिनमें थोड़ा भी मुख्यमंत्री विरोध की गंध आती हो। मंत्रियों और अफसरों के खिलाफ छापिए पर उतना ही जितने में मुखिया की छवि पर असर न पड़े, यह अलिखित आचार संहिता अखबारों और चैनलों के ऑफिसों में लागू है। खबरें न छापना आज सबसे बड़ा कारोबार बन गया है। पत्रकारिता की पेशेवर ईमानदारी का हाल यह है कि पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी की खबरें अखबारों और चैनलों से सिर्फ इसलिए गायब कर दी गई हैं क्योंकि सत्ता के शिखर पुरूष को चैनलों और अखबारों में जनरल नाम तक देखना पंसद नहीं है। समाचार माध्यम इस संकीर्णता और अनुदारता के राजनीतिक एजेंडे के एजेंट बने हुए हैं। गौरतलब है कि ये वही अखबार और चैनल हैं कि जो जनरल के मुख्यमंत्रित्व काल में उनकी ईमानदारी के कसीदे पढ़ रहे थे। वह वक्त चला गया जब बड़े अखबार सरकारी दबाव झेलने के लिए ज्यादा बेहतर माने जाते थे और तमाम दबावों के बावजूद वे सत्ता की दौलत और ताकत के आगे तने दिखते थे। अब ऐसा समय है जब ये अखबार सरकारी विज्ञापनों के बिना जिंदा ही नहीं रह सकते हैं। पहले छोटे अखबार अपनी आर्थिक संसाधनों की सीमाओं के चलते ज्यादा नाजुक माने जाते थे। बाजार की महिमा देखिये कि उसने कई हजार करोड़ के बड़े-बड़े मीडिया हाउसों को छुईमुई बना दिया है। चारणों और चमचों की पांत में सबसे आगे वे ही हैं जो सबसे बड़े हैं।लेकिन क्षेत्रीय चैनलों और बड़े अखबारों के पतित होने से सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध की आवाजें दबी नहीं हैं। उत्तराखंड के स्थानीय और छोटे अखबारों के एक हिस्से ने सरकार के आगे घुटने टेकने से इंकार कर दिया है। यह एक सकारात्मक बदलाव है। इस हिस्से में लगातार घोटाले छप रहे हैं, मुख्यमंत्री के खिलाफ खबरें और विश्लेषण छप रहे हैं। इससे हैरान और परेशान मुख्यमंत्री ने पहले घोषणापत्र की आड़ में इन छोटे अखबारों को धमकाने की कोशिश की, सूचना विभाग के अफसर खबरों पर संपादकों के जबावतलब करने की हद तक चले गए। इस पर शर्मिंदा होने के बजाय एक छोटे अखबार के स्वामी,प्रकाशक और संपादक रहे राज्य के मुखिया की छाती गर्व से फूलती रही कि उन्होने छोटे अखबारों को उनकी औकात बता दी। उनके मुंहलगे अपफसर और कांरिंदे हर रोज विरोध में लिखने वाले अखबारों का आखेट करने के तौर तरीके खोजने में लगे हैं। इसी के तहत सचिवालय और विधानसभा में छोटे अखबारों के घुसने पर पाबंदी लगा दी है। जबकि बड़े अखबार वहां बांटे जा सकते हैं। सत्ता के इन शुतुरमुर्गों को यह समझ नहीं आ रहा है कि सरकार के कुछ अफसरों और कर्मचारियों के न पढ़ने से क्या मुख्यमंत्राी के खिलाफ आए दिन छपने वाली खबरों और घोटालों की मारक क्षमता कम हो जाएगी? जाहिर है कि आम लोगों तक तो वे पहुंचेंगी ही। ऐसे कदम एक सरकार की बदहवासी और डर को जाहिर करते हैं और उस पर कमजोर सरकार का बिल्ला भी चस्पा कर देती हैं। तानाशाही सनकों से भरे ऐसे फैसलों के बावजूद न छोटे अखबार डर रहे हैं और न मुख्यमंत्री के खिलाफ खबरें छापने से बाज आ रहे हैं। यह एक तरह से छोटे प्रेस की गुरिल्ला लड़ाई है जो सत्ता के महाबली शिखर पुरुष पर हमले कर उसे बेचैन किए हुए है। जिसने मुख्यधारा के मीडिया को लौह कपाट वाले अपने काले-कलूटे गेट पर चौकीदारी के लिए बांध दिया है, ऐसे शिखर पुरुष के खिलाफ छोटे अखबारों की यह लड़ाई महत्वपूर्ण भी है और सत्ताधारियों के लिए चेतावनी भी है कि वे समूचे प्रेस को दुम हिलाने वाला पालतू पशु में नहीं बदल सकते। कुछ लोग हर समय रहेंगे जो सत्ता के खिलाफ सच के साथ रहने का जोखिम उठायेंगे। यह सिलसिला चलता रहेगा। उल्लेखनीय यह है कि चारणकाल में सच कहने की जुर्रत करने वाले इन सारे छोटे अखबारों,पत्रिकाओं की कुल प्रसार संख्या मुश्किल से कुछ हजार ही है। जो लाखों छपने और बंटने वाले दैनिक अखबारों की दस फीसदी भी नहीं है लेकिन इतनी कम संख्या के बावजूद राज्य के मुखिया इनसे घबराये हुए हैं। लाखों पाठक और दर्शक संख्या वाले अखबार और चैनलों सुबह-शाम प्रशस्ति वाचन के कर्मकांड में लगे हुए हैं तब भी विरोध की इन तूतियों से राजा क्यों हैरान हैं? दरअसल इन अखबारों ने खबरों के असर के उस तिलिस्म को तोड़ दिया है जो बड़े अखबार प्रचारित करते रहे हैं। खबरों पर बड़े अखबारों का एकाधिकार ही नहीं टूटा है बल्कि उनकी सीमायें, दरिद्रता और दयनीयता भी उघड़ गई है। पत्रकारिता के इस समर में वे कागजी शेर साबित हो रहे हैं,उनकी कथित ताकत का मिथक टूट रहा है। जनमत को प्रभावित करने में उनकी भूमिका अब सिफर हो गई है। उनकी हर खबर पर उंगलियां उठती हैं और उसे सत्ता या स्थानीय ताकतवर लोगों के हाथों बिकी हुई खबर मान लिया जाता है। उन्हे खबरों का सौदागर करार दिया जा रहा है। उनके दफ्तरों में सच को कत्ल करने के लिए जो कसाईबाड़े बने हैं उनकी दुर्गंध अब जनता तक पहुंचने लगी है। राज्य के लोग समझ रहे हैं कि राजा नंगा है पर खबरों के ये दुकानदार उसके कपड़ों के डिजायन की तारीफ में पन्ने रंग रहे हैं। मुख्यधारा के समाचार माध्यमों की साख के इस तरह निम्नतम स्तर पर पहुंच जाने से ही आम लोग खोज-खोज कर सरकार विरोधी खबरें पढ़ रहे हैं। इससे इतना तो पता चल ही जाता है कि लोगों का रूझान बदल रहा है,जिस पाठक को मीडिया के महारथी ‘विचारविहीन उपभोक्ता’ प्राणी घोषित कर चुके हैं उसका मिजाज बदल रहा है। वह बदलाव के मोर्चे पर भले ही लड़ाई नहीं लड़ रहा हो पर वह सत्ताधरियों के काले सच को विचार के साथ जानना चाहता है। उत्तराखंड कभी भी वैचारिक रुप से गंजे लोगों की नासमझ भीड़ नहीं रहा है। उसके भीतर सच जानने को उत्सुक समाज है। लोकप्रियता में आये इस उछाल से छोटे अखबारों को भी मुगालते में नहीं रहना चाहिए। यह उनका नहीं उस सच का चमत्कार है जो वे छाप रहे हैं। छोटे अखबार यदि अपने हीनताबोध से उबर सकें तो वे साबित कर सकते हैं कि अखबार बड़े या छोटे नहीं होते, ये खबरें हैं जो अखबारों को बड़ा बनाती हैं तो उन्हे छोटा भी साबित कर देती हैं। खबरों की मारक सीमा और क्षमता हर साल जारी होने वाले प्रसार संख्या के निर्जीव और गढ़े गए आंकड़ों से तय नहीं होती। खबरों में सच और दम होता है तो वे एक मुख से दूसरे मुख तक होते हुए या फोटोस्टेट होकर भी कई गुना घातक हो जाती हैं। सच और अपने समाज की समझ मामूली माने जाने वाली खबरों को भी कालजयी बना देती है।उत्तराखंड के पत्रकारिता क्षितिज पर घट रही यह छोटी सी घटना बताती है कि देश के स्तर पर पत्रकारिता को समर्पित छोटे अखबारों,चैनलों और इंटरनेट अखबारांें के बीच यदि राष्ट्रीय स्तर पर तालमेल और संवाद स्थापित हो सके तो जनपक्षीय पत्रकारिता का एक बड़ा गठबंधन भविष्य में उभर सकता है। यह कठिन है पर इस दिशा में गंभीर प्रयास शुरू किए जाने चाहिए। मीडिया हाउसों के एकाधिकारवादी भस्मासुरों के खिलाफ यह पत्रकारिता के जनतंत्राीकरण और विकेंद्रीकरण की शुरूआत हो सकती है।

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

21000 करोड़ का झूठ

बरसात का कहर अभी थमा भी न था कि मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार से 21हजार करोड़ का राहत पैकेज मांगकर अपने अफसरों से लेकर भाजपा के बड़े नेताओं को हैरत में डाल दिया। विशेषज्ञ सशंकित थे कि नौकरशाही मुख्यमंत्री के भारी भरकम आंकड़े के बराबर की आपदा को फाइलों में कैसे डिजायन कर सकेगी। राजनीतिक दबाव में सरकारी अमले ने 21000 करोड़ रुपए की आपदा को फाइलों में पैदा कर दिखा दिया कि आंकड़ेबाजी की कला में वे देश के सबसे बेहतरीन सरकारी तंत्र हैं। केंद्र में कई जिम्मेदारियां निभा चुके एक रिटायर्ड आईएएस अफसर ने इस आंकड़े पर टिप्पणी करते हुए कहा,‘ अविश्वसनीय! विचित्र!! और बचकाना!!! उन्होने आगे कहा,‘ लगता है आपके मुख्यमंत्री पिस्तौल पाने के लिए तोप का लाइसेंस मांग रहे हैं।’ आपदा राहत के इतिहास के दस सबसे बड़े राहत पैकेजों में से एक के लिए इतना भारी भरकम आंकड़ा खोजकर खुद को कोलबंस मान रही सरकार को शायद पता भी न हो उसके आंकड़े ही इस फर्जीवाड़े की पोल खेल रहे है। इन आंकड़ों का विश्लेषण साबित कर देता है कि इसमें बुनियादी बातों का भी ध्यान नहीं रखा गया। सारे कामों की वीडियोग्रापफी कराने के केंक्त के अभूतपूर्व फैसले ने इन आंकड़ों की साख पर सवालिया निशान लगा दिया है। विडंबना यह है कि इस महाकाय राशि में में आपदा पीड़ितों के हिस्से बस एक फीसदी ही आएगा । उनमें से अधिकांश को 2,250 रु0 से ज्यादा नहीं मिलेंगे । राहत की मलाई सरकारी विभागों के लिए आरक्षित होगी।राज्य सरकार द्वारा केंद्र को भेजे गए 21000 करोड़ रुपए की राहत की डिमांड का विश्लेषण करने से पहले यह जानना उचित होगा कि यह आंकड़ा किस तरह से तैयार हुआ। दैवी आपदा के आकलन का ग्रास रूट पर पटवारी ही एकमात्र सरकारी कर्मचारी है। इस समय पहाड़ में 1,220 पटवारी हैं जिनमें से हरेक को औसतन सात गांव देखने पड़ते हैं। इन्ही पटवारियों से मिली सूचना के अनुसार सरकार से उन्हे 25 सितंबर को आपदा से हुए पूरे नुकसान की रिपोर्ट भेजने का आदेश मिला और अक्तूबर के पहले सप्ताह में उन्होने रिपोर्ट जिला प्रशासन को भेज दी। इन रिपोर्टों को संकलित करने में यदि दो दिन भी लगे हों तब भी यह रिपोर्ट दस अक्तूबर को ही राज्य मुख्यालय पहुंच पाई होगी। लेकिन मुख्यमंत्री ने 21000 करोड़ के नुकसान का बयान 22-23 सितंबर को हुए विधानसभा सत्र के दौरान ही दे दिया था। सचिव आपदा डा0राकेश कुमार के अनुसार नुकसान के इस आकलन को केंद्रीय राहत दल के आने से पहले 30 सितंबर को अंतिम रुप दे दिया गया था। क्या मात्रा एक सप्ताह में लगभग एक लाख 20 हजार लंबी सड़कों, नहरों और बिजली लाइनों, साढ़े सात लाख हेक्टेयर कृषि भूमि, दो लाख हेक्टेयर बगीचों,23 लाख मकानों और लगभग 22 हजार स्कूल भवनों का सर्वे किया जा सकता है? वह भी सिर्फ दो हजार कर्मचारियों द्वारा? 670 कृषि कर्मी एक सप्ताह में 7 लाख 16 हजार हैक्टेयर यानी एक कर्मचारी ने प्रतिदिन 4 गांवों की 7600 नाली जमीन पर खड़ी फसल का सर्वे किया। एक उद्यानकर्मी ने प्रतिदिन में 6 गांवों में जाकर 2300 नाली में स्थित बगीचों का सर्वे कर लिया। यदि ऐसा हुआ है तो यह चमत्कारिक है। आश्चर्यजनक यह भी है कि सार्वजनिक संपत्तियों और कृषि भूमि को हुई क्षति के आकलन के लिए सरकार ने ग्राम स्तर पर समितियों के गठन का शासनादेश 13 अक्तूबर को जारी किया। इस आदेश में सभी जिलों के डीएम को ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य, ग्राम विकास अधिकारी और स्थानीय प्राइमरी विद्यालय के शिक्षक की चार सदस्यीय समिति गठित करने का निर्देश दिया गया। समितियों को क्षतियों के विवरण भेजने के लिए एक सप्ताह का समय दिया गया। जाहिर है कि यह ब्यौरा 20 अक्तूबर तक जिलाधिकारियों तक पहंुचा होगा और जिलों से संकलित होकर 23 अक्तूबर तक यह सचिवालय आया होगा।अब सवाल यह उठता है कि जब 23 अक्तूबर तक अंतिम रिपोर्ट नहीं आई तब मुख्यमंत्री ने एक माह पहले, सचिवालय ने तीन सप्ताह पहले कैसे 21000 करोड़ रु0 के नुकसान का सटीक पूर्वानुमान लगा दिया और यही नहीं इस अनुमान को आंकड़ों में ढ़ालकर केंक्तीय दल और प्रधनमंत्राी को भी सौंप दिया। गजब यह कि ऐसा पटवारियों द्वारा भेजी गई पहली रिपोर्ट से भी पहले ही कर दिया गया। इसी संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि सरकार में आपदा के आकलन को लेकर खासा कन्फ्यूजन व्याप्त है। इसी कारण से नुकसान के आकलन को लेकर शासन में रिपोर्टों के प्रारूप बदलते रहे। 4 सितंबर को शासन ने सभी विभागों को पत्र भेजकर केंद्र के मानकों के आधार पर रिपोर्ट तलब की फिर 14 सितंबर को नया प्रारुप भेजकर आंकड़ों को नये सिरे से मंगाया गया। इस प्रारूप में मानक बदल दिए गए। सूत्रों का कहना है कि नुकसान के सूचकांक को 21000 करोड़ रु0तक पहुंचाने का ड्रीम प्रोजेक्ट इसी प्रारूप के साथ शुरू हुआ। अब एक बार फिर समितियां बनाकर नुकसान का जायजा लिया जा रहा है। इस प्रकार विभागों से तीन बार रिपोर्टें मंगाई गईं। यह कन्फ्यूजन आंकड़ों के पीछे चल रहे खेल को उजागर कर देता है।भूस्खलन से प्रभावित गांवों को लेकर केंद्र को भेजी गई रिपोर्ट से भी यही जाहिर होता है। सर्वे के लिए अभी भूविज्ञानियों के दल बाद में गठित किए गए और उनका सर्वे अभी तक पूरा नहीं हुआ पर सरकार सितंबर में ही इस नतीजे पर पहुंच गई कि 233 गांव अब लोगों के रहने के लिए खतरनाक हो चुके हैं और इनके पूर्ण विस्थापन के अलावा कोई विकल्प नहीं है। चंूकि मांगी गई राहत का 57 फीसदी इन गांवों के ही पुनर्वास पर खर्च किया जाना है इसलिए इस आंकड़े की विश्वसनियता मायने रखती है। इसका न केवल वैज्ञानिक आधार होना चाहिए बल्कि राज्य और केंद्र द्वारा प्रति परिवारके लिए निर्धरित पुनर्वास राशि के मानक पर इस आंकड़े को खरा उतरना चाहिए पर सच्चाई यह है कि सरकार के इस आंकड़े का कोई वैज्ञानिक आधार अभी तक स्थापित नहीं हो पाया है और यह केवल प्रथम दृष्ट्या सतही अनुमान मात्र है।अब जरा तथ्यों और तर्क पर सरकार के आंकड़ों को परखा जाय। राज्य सरकार के आंकड़े के हिसाब से 233 गांवों के 3049 परिवारों के पुनर्वास के लिए 12000 करोड़ रूपए उसे चाहिए। यानी वह पुनर्वास के लिए प्रति परिवार पर 4 करोड़ रुपए खर्च करेगी। यदि ऐसा है तो देश की सबसे बेहतरीन पुनर्वास नीति और मानक तय करने के लिए उसकी पीठ थपथपाई जानी चाहिए। क्या वह निजी और सरकारी क्षेत्र के बिजली प्रोजेक्टों के विस्थापितों को वह इसी दर से मुआवजा देगी? टिहरी बांध के नए विस्थापितों के लिए सरकार जमीन इत्यादि का इंतजाम करने के बजाय एकमुश्त 38 लाख रु0 देने पर विचार कर रही है जो कि केंद्र को भेजे गए प्रति परिवार पुनर्वास खर्च का मात्र दसवां हिस्सा है। सरकार यदि एक करोड़ रु0 भी प्रति परिवार एकमुश्त भुगतान करने को तैयार हो तो इन 233 गांवों के लोग अपने लिए खुद ही जमीन का इंतजाम कर लेंगे। सरकार को उन पर 12000 करोड़ के बजाय सिर्फ 3000 करोड़ ही खर्च करने हैं। जाहिर है कि पुनर्वास पर आने वाला खर्च अव्यवहारिक और बढ़ाचढा कर पेश किया गया है। इसके पीछे इन गांवों को बसाने की मंशा नहीं बल्कि केंद्र को इस प्रस्ताव को नामंजूर करने के लिए बाध्य करने की रणनीति है।नुकसान दूसरा सबसे बड़ा आंकड़ा पीडब्लूडी का है जिसकी 13,600 किमी सड़कें तबाह हुई बताई गई हैं। इसके लिए केंद्र से पांच हजार पांच सौ 17 करोड़ रु0 मांगे गए हैं। यह कुल राहत का लगभग एक चौथाई है। यह आंकड़ा इसलिए चकित करता है कि राज्य में सड़कों की कुल लंबाई 26000किमी के आसपास है। इस आंकड़े के हिसाब से राज्य की आधी सड़कें पूरी तरह से नष्ट हो गई हैं। दूसरी ओर लोनिवि का दावा है कि उसने 90 फीसदी सड़कों पर यातायात बहाल कर दिया है। इस आंकड़े में केंद्र से हर सड़क के लिए प्रति किमी 37 लाख रु0 मांगे गए हैं। लोनिवि के सूत्र बताते हैं कि बिलकुल नई सड़क बनाने के लिए भी खर्च 30-35 लाख रु0 आता है। यदि बिल्कुल चट्टान काटकर बनानी है तो यह खर्च अधिकतम 45 लाख रु0 आएगा। तो क्या लोनिवि ये 13600 किमी पहले बन चुकी सड़कें चट्टानें काटकर बनाने वाली है। जाहिर है कि आंकड़े इतने बड़े कर दिये गए हैं कि एस्टीमेट की साख गिरकर शून्य हो गई है।विभागीय सूत्रों का कहना है कि यदि इतने ही किमी सड़कें वाकई प्रभावित हुई हैं तो भी पहले बनी सड़कों को ठीक करने पर अल्पकालीन और दीर्घकालीन खर्च 1000 करोड़ रु0 से ज्यादा नहीं आएगा। यानी केंद्र को पांच गुना ज्यादा का आंकड़ा भेजा गया है। शहरी क्षेत्रों में एक किमी सड़क बनाने के लिए 39 लाख 14 हजार रु0 की दर से 327 किमी सड़कें पूरी तरह से नई बनाने के लिए 128 करोड़ रु0 की डिमांड की गई है। क्या शहरों में 470 किमी सड़कें बह गई हैं? क्या सरकार शहरी निकायों को 39 लाख रु0 की इसी दर पर रखरखाव का खर्च दे रही है? जबकि इतनी ही किमी सड़कों को फिर से ठीक-ठाक करने पर वास्तविक व्यय 22 करोड़ आएगा। इसी प्रकार सिंचाई विभाग में यदि 1813 किमी नहरें और 470किमी तटबंध यदि पूरी तरह बह भी गए हैं तब भी 18 लाख प्रति किमी की दर से नहर और 60 लाख प्रति किमी की दर से बाढ़ सुरक्षा ढ़ांचे को तैयार करने में भी 611 करोड़ रु0 का खर्च आएगा जबकि सरकार ने इसका तिगुना 1522 करोड़ रु0 का एस्टीमेट केंद्र को भेजा है। बिजली विभाग की क्षति सरकारी आकलन के अनुसार एक किमी बिजली की लाइन का खर्च 15 लाख रु0है। सरकार के हिसाब से 1369 किमी बिजली की लाइनें पोल सहित नष्ट हो गई हैं। यानी हर जिले में 100 किमी बिजली की लाइनें पूर्ण नष्ट हो चुकी हैं। उस पर तुर्रा यह कि यूपीसीएल भी दावा कर रहा है कि सभी शहरी इलाकों और अधिकांश ग्रामीण इलाकों में बिजली आपूर्ति सामान्य है। सरकार के आंकड़ों का यकीन करें तो राज्य की पांच हजार पेयजल योजनायें नष्ट हो चुकी हैं। इन पर प्रति योजना 20 लाख 60 हजार रु0 का एस्टीमेट केंद्र को भेजा गया है। प्रधनमंत्री को दिए गए पत्र में दिए क्षति के आंकड़ों के अनुसार राज्य के 2356 विद्यालय नष्ट हुए हैं। इसके लिए राज्य सरकार हर विद्यालय के लिए 15 लाख 28000रु0 मांगे हैं। जबकि विश्वबैंक परियोजना के तहत बनने वाले प्राथमिक विद्यालयों के लिए केंद्र सरकार के मानक 3 लाख रु0प्रति विद्यालय और राज्य सरकार के मानक दो लाख रु0 प्रति विद्यालय है। केंद्रीय मानकों के अनुसार 2,356 विद्यालयों को फिर से नया बनाने के लिए 70 करोड़ और राज्य के मानकों के हिसाब से 47 करोड़ रु0 चाहिए पर डिमांड पांच से आठ गुना ज्यादा 360 करोड़ रु0 की है। इस प्रकार राज्य सरकार द्वारा की गई इस 20,336 करोड़ रु0 की डिमांड की असलियत यह है कि उसके नुकसान के आंकड़ों में छेड़खानी किए बगैर उन सुविधाओं को पहले जैसा करने और 233 गांवों को शानदार ढंग से बसाने पर भी 5000 करोड़ रु0ही खर्च आएगा जबकि सरकारी आंकड़ों में यह चार गुना बढ़ा दी गई है।सवाल उठता है कि सरकार ने राहत के मानकों को जानते हुए भी ऐसे आंकड़े क्यों पेश किये जो मानकों से तो कई गुना ज्यादा थे ही पर वास्तविकता से भी परे थे। यह सही है कि देश की लगभग हर राज्य सरकार प्राकृतिक आपदाओं के लिए केंद्रीय मदद मांगती हैं तो वे नुकसान के आंकड़ों को कुछ हद तक बढ़ा चढाकर पेश करती हैं। यह सामान्य प्रवृत्ति है। लेकिन हर राज्य सरकार यह भी ध्यान रखती हैं कि उनके द्वारा दिये गये आकलन की विश्वसनियता बनी रहे। यह राज्य और सरकार दोनों की साख के लिए जरुरी होता है। यदि आंकड़ा बेसिरपैर का हो तो शर्मिंदगी सरकार को ही उठानी पड़ेगी। ऐसा हुआ भी है। केंद्र सरकार ने अभूतपूर्व फैसला लेते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह प्रत्येक निर्माण कार्य से पहले और बाद की स्थिति की वीडियोग्राफी कराये। पहली बार किसी राज्य सरकार के कामकाज पर केंद्र ने इस तरह का खुला संदेह व्यक्त किया है। जाहिर है कि राज्य सरकार की साख सवालों के घेरे में है।ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि राज्य सरकार ने ऐसा आंकड़ा क्यों प्रचारित किया जो पहली ही नजर में अविश्वसनीय लग रहा हो। जिससे और तो दूर खुद भाजपा ही नहीं पचा पा रही हो। दरअसल यह राजनीतिक आंकड़ा है जो सन् 2012 के विधानसभा चुनाव की जरुरत से पैदा हुआ है। मुख्यमंत्री और उनके रणनीतिक सलाहकार जानते हैं कि केंद्र कुछ भी कर ले पर 21000 करोड़ रु0 की राहत मंजूर नहीं करेगा। ऐसे में भाजपा यह प्रचार कर सकेगी कि कांग्रेस ने आपदा में भी लोगों की पर्याप्त मदद नहीं की और जरुरत से बहुत कम सहायता दी। मुख्यमंत्री चालाक राजनेता हैं और चुनावी शतरंज की बिसात पर अपना एक-एक मोहरा शातिर तरीके से चल रहे हैं। यही वजह है कि 500 करोड़ रुपये की केंद्रीय मदद के बावजूद कांग्रेस बचाव की मुद्रा में है और एक धेला खर्च किए बगैर राज्य सरकार हमलावर है। बारीकी से बुनी गई इस रणनीति के तहत ही ग्राम स्तर पर मौजूद सरकारी अमला आपदा पीड़ितो को समझा रहा है कि उन्हे पर्याप्त राहत इसलिए नहीं मिल सकती क्योंकि केंद्र सरकार के मानक यही हैं। लोगों का गुस्सा कांग्रेस की ओर मोड़ने के इस नायाब तरीके के लिए ही 21000 करोड़ की राहत का फार्मूला निकाला गया है। इसे राजनीतिक रुप से कैश करने का बाकी काम जिला स्तर पर बन रही भाजपा की राहत कमेटियां करेंगी जो सरकारी राहत से अपने वोटबैंक का भला भी करेंगी और नाकाफी राहत से पैदा होने वाले गुस्से को कांग्रेस की ओर भी मोड़ेंगी।इसका एक और कोण है जो कांग्रेस देख रही है। कांग्रेस उपाध्यक्ष सुबोध उनियाल का कहना है कि विभागों को मिलने वाली केंद्रीय मदद का इस्तेमाल सरकार चुनावी फंड एकत्र करने में करना चाहती है। राज्य के आपदा पीड़ित इलाकों में आजकल आम चर्चा है कि निर्माण और मरम्मत कार्यों से जुड़े हर विभाग को दस लाख रु0 प्रति डिवीजन के हिसाब से ऊपर पहुंचाने को कहा गया है। गांवों की चौपालों पर यह भी खबर उड़ाइ जा रही है कि राजस्व, कृषि, उद्यान जैसे विभागों को 6 प्रतिशत ऊपर देने को कहा गया है। इन चर्चाओं का आधार तो पता नहीं पर इतना जरुर है कि इनसे गांवों की राजनीति गूंज रही है।आपदा में भ्रष्टाचार को लेकर आने वाले समय में जबरदस्त बबंडर उठने वाला है। खुद सरकारी अफसरों का कहना है कि यदि सरकार को फर्जी कामों से बचना है तो हर सिंचाई,लोनिवि, लघु सिंचाई, प्राथमिक विद्यालयों, शहरी निकायों और बिजली विभागों से जुड़ी सभी क्षतियों की वीडियोग्राफी गैर सरकारी स्वयंसेवी संगठनों और निष्पक्ष एजेंसियों से कराई जाय और सभी निर्माण एजेंसियों के कामों का सोशल ऑडिट कराया जाय ताकि भ्रष्टाचार की संभावना को न्यूनतम किया जा सके। उधर कांग्रेस का कहना है कि किसी भी हालत में कुंभ को दोहराने का मौका नहीं देंगे। कांग्रेस नेता केंक्त से यह भी मांग कर सकते हैं कि केंद्रीय मदद पर नजर रखने के लिए उसी तरह के इंतजाम किए जांय जिस तरह कॉमनवेल्थ के निर्माणकार्यों की जांच के लिए किए गए हैं।