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शुक्रवार, 17 जून 2011

जेपी, वीपी और अब रामादेव

राजेन टोडरिया
आडवाणी जब यह कह रहे थे कि रामदेव प्रकरण भारतीय राजनीति में टर्निंग प्वांइट हो सकता है तो वह यूंही नहीं कह रहे थे। संघ परिवार के ये भीष्म पितामह भले ही पिछले लोकसभा चुनाव के बाद कलियुगी और कांग्रेसी मनमोहन के कारण शरसैया पर लेटने को मजबूर हों लेकिन उनकी इस बात में इतिहास की अनुगूंजें भी हैं और अनुभव भी। आडवाणी आरएसएस की उस टीम के महत्वपूर्ण मेंबर रहे है जिसने 1974 के जेपी आंदोलन और 1989 के वीपी आंदोलन के लिए जमीन तैयार की। इसी टीम ने इन दोनों आंदोलनों के लिए जरुरी खाद-पानी और गोला बारुद जमा किया। इन दोनों आंदोलनों से सबसे ज्यादा लाभ भी संघ परिवार को हुआ क्योंकि उसके पास जनअसंतोष को भुनाने के लिए ग्रास रुट तक संगठन था जबकि इन आंदोलनों के नेताओं का अपना कोई सांगठनिक आधार नहीं था। 1974 और 1989 की वही राजनीतिक पटकथा इस समय भी मंचित की जा रही है। मंच पर दिखने वाले पात्र और नायक बदल गए हैं पर सूत्रधार संघ परिवार ही है।अब जरा 1974 और 1989 के कालखंड की यात्रा करने चलें। अतीत की यात्रायें इसलिए भी की जानी चाहिए कि वे हमें अपने समाजों को जानने का मौका तो देती ही हैं साथ ही वे भविष्य में झांकने का अवसर भी मुहैया कराती हैं। कहते हैं कि इतिहास खुद को दोहराता है लेकिन हिंदी फिल्मों या धारावाहिकों की तरह उबाऊ और नीरस तरीके से नहीं दोहराता। वह हर बार नएपन के साथ आता है ताकि उसका रहस्य और रोमांच बचा रहे। 1974 और 1989 भारतीय राजनीति के ऐसे कालखंड रहे हैं जब कांग्रेस अभूतपूर्व कामयाबी के साथ सत्ता में आई थी। सन् 1974। बैंकों के राष्ट्रीयकरण,बांग्लादेश विजय जैसी विराट उपलब्धियों और गरीबी हटाओं के करिश्माई नारे की पीठ पर सवार होकर 1971 में कांग्रेस को दैत्याकार कामयाबी मिली। लेकिन 1974 आते- आते सारा प्रभामंडल फीका हो गया।लेकिन अहंकार के मद में चूर कांग्रेस को लगा ही नहीं कि उसके पैरों के तले जमीन खिसक रही है। लोगों की जिंदगी के बुनियादी सवाल जस के तस थे और मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग असंतोष से लबालब था। 1989 का साल। इंदिरा गंाधी की हत्या की सहानुभूति और सिख आतंकवाद के खिलाफ हिंदू बैकलैश से 1984 की भयंकर जीत ने कांग्रेस को अजेय होने के अहंकार से फिर भर दिया था। लेकिन लोगों की समस्याओं का कोई समाधान सरकार के पास नहीं था। जनता अपने आर्थिक संकटों से परेशान थी। 1974 और 1989 दोनों ही जनआकांक्षाओं के ज्वार के बाद की हताशा से जनमे। जेपी और वीपी ने इस हताशा को संबोधित किया और वे मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग में एक उम्मीद की तरह उभरे और एक आंदोलन जड़़ पकड़ता दिखा। हिंदू मध्यवर्ग के एक हिस्से में पैठ रखने वाले अपने के जरिये आरएसएस को पता चल गया कि इन दोनों आंदोलनों के भीतर एक बड़े जनांदोलन की संभावना है। आरएसएस जानता था कि 1974 का जनसंघ और 1989 की भाजपा और उसके नेताओं के बूते देश भर में मध्यवर्ग का एक बड़ा आंदोलन नहीं चलाया जा सकता। इसलिए उसने अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी को पृष्ठभूमि में सरका दिया और एक ही जैसे हालात में एक बार जेपी को आगे किया और इस घटना के ठीक 15 साल बाद बीपी सिंह को आगे कर दिया। इन दोनों के पीछे लोग जरुर थे और वे मध्यवर्ग के लोकप्रिय चेहरा भी थे लेकिन दोनों का अपना कोई सांगठनिक आधार नहीं था। आरएसएस यह जानता था कि जमीनी नेटवर्क न होने से इस आंदोलन से पैदा होने वाली ताकत से उसे नया विस्तार मिलेगा। उसने 1974 और 1989 के आंदोलनों के लिए देश भर में भीड़ जुटाने के काम में अपना कैडर झोंक दिया। इन दोनों आंदोलनों में एक और समानता है। ये दोनों आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरु हुए। इन दोनों ने सरकारी भ्रष्टाचार और कांग्रेस की लीडरशिप को निशाना बनाया। इस प्रकार महंगाई,बेरोजगारी,भुखमरी और गरीबी से जनमे गुस्से को सरकारी भ्रष्टाचार के राजनीतिक एजेंडे में बदल दिया गया। दिलचस्प बात यह है कि भ्रष्टाचार की इस लड़ाई में मुनाफाखोरों,कालाबाजारियों और नाजायज दाम वसूलने वाले निजी क्षेत्र के भ्रष्टाचार पर कोई उंगली नहीं उठाई गई। कटु सच यह है कि इसी वर्ग के गैर कांग्रेसी हिस्से ने इन आंदोलनों के लिए फंड जुटाया और गोयनका के मीडिया हाउस ने इसके प्रचार का जिम्मा उठाया। इन आंदोलनों का एक विशेषता और थी कि इन्होने बेहद चालाकी से महंगाई,गरीबी जैसे बुनियादी सवालों को बहस से हटाकर पूरी लड़ाई भ्रष्टाचार पर केंद्रित कर दी ताकि देश में बुनियादी बदलाव के लिए कोई आंदोलन पैदा होने से रोका जाय और जन असंतोष को सरकारी भ्रष्टाचार तक सीमित रखा जाय। इन दोनों आंदोलनों का लक्ष्य उत्तर भारत का मध्यवर्ग था। इन आंदोलनों को व्यापक बदलाव का औजार नहीं बनने दिया गया। इन आंदोलनों का निशाना साफ था। उनका लक्ष्य जनता की बुनियादी समस्याओं के हल के बजाय कांग्रेस की जगह चुनावी राजनीति में पराजित और पस्त दलों और नेताओं को पिछले दरवाजे से लाकर मंच पर प्रतिष्ठित करना था। दोनो आंदोलन मानते थे कि कांग्रेस के सत्ता से हटने से जनता की सारी मुश्किलें हल हो जाएंगी। दोनों आंदोलनों का सबसे ज्यादा लाभ संघ परिवार की राजनीतिक भुजा जनसंघ और भाजपा को हुआ। जबकि दोनों आंदोलनों से पहले इन्हे अपमानजनक हार झेलनी पड़ी थी। इससे साफ है कि आंदोलनों का राजनीतिक लाभ उठाने की क्षमता और योग्यता आरएसएस में सर्वाधिक है। हालांकि बीपी सिंह शातिर राजनेता थे उन्होने मंडल का अमोघ अस्त्र चलाकर संघ परिवार के कट्टर हिंदूवाद के रास्ते में पिछड़ावाद का स्पीड ब्रेकर लगा दिया। बावजूद इसके 1991 से लेकर 1999 तक भाजपा के उत्कर्ष की कहानी प्रस्तावना तो बीपी सिंह के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने ही लिखी।आज के हालात का जायजा लें तो कहा जा सकता है कि एक बार फिर भारत का मध्यवर्ग बेचैन है। उदारीकरण के बाद जितनी तेजी से देश बदला है उसने गरीबों और मध्यवर्ग के सामने नए संकट पैदा किए हैं। आर्थिक असुरक्षा, महंगाई, बेरोजगारी, भुखमरी के चजते देश के भीतर एक असंतोष घुमड़ रहा है। जाहिर है कि लोगों में सरकार के खिलाफ गुस्सा है लेकिन केंद्र की कांग्रेस सरकार अपने जीत के अहंकार में भी है और उसने तय कर लिया है कि चार साल तक वह लोगों के असंतोष की अनदेखी करने का जोखिम ले सकती है। चूंकि लोगों की नाराजी को संबोधित करने के लिए सरकार तैयार नहीं है और संसदीय विपक्ष जनता के मूल सवालों पर जनांदोलन छेड़ने की स्थिति में इसलिए नहीं है क्योंकि उसकी साख ही नहीं बची है। उसका चरित्र कांग्रेस से भी गया बीता है। इसलिए लोगों के भीतर जो गुबार है उसे निकासी का रास्ता चाहिए। यह असंतोष कहीं भट्टा परसोल के किसान विद्रोह के रुप में सामने आ रहा है तो कहीं माओवादी संघर्ष के रुप में। इस असंतोष को बुनियादी बदलाव की लड़ाई में बदलने से रोकने के लिए व्यवस्था का प्रतिरक्षा तंत्र सक्रिय हो गया है और उसने एंटीबॉडी बनानी शुरु कर दी हैं। अन्ना हजारे या बाबा रामदेव और तथाकथित सिविल सोसाइटी के नेता दरअसल यही एंटीबॉडी हैं। उदारीकरण से जनमे गरीबी,भुखमरी,बेरोजगारी,आर्थिक असुरक्षा और महंगाई के बुनियादी सवालों को सिर्फ सरकारी भ्रष्टाचार तक सीमित करने का यह पूरा आंदोलन उदारीकरण के जनविरोधी चेहरे से ध्यान हटाने की सोची समझी रणनीति है ताकि लोगों को बुनियादी बदलाव के क्रांतिकारी रास्ते पर जाने से रोका जा सके। 1974 और 1989 की तरह जनता की पूरी ऊर्जा को सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ मोड़ने से लाभ यह है कि लोगों का यकीन मनमोहन सिंह आडवाणी में भले ही न रहे पर वह अन्ना हजारे और बाबा रामदेव में बना रहेगा। इससे यह साबित नहीं होगा कि भ्रष्टाचार का यह चरम दरअसल उस उदारीकरण की उपज है जिसके विश्वकर्मा मनमोहन,चिदंबरम,यशवंत सिन्हा रहे हैं। भारतीय कारपोरेट की नजर में मनमोहन सिंह की उपयोगिता खत्म हो चुकी है और अब उसे नया चेहरा चाहिए। इसलिए अन्ना हजारे,रामदेव भारतीय कारपोरेट के सबसे दुलारे चेहरे हैं। इसलिए भी कि ये दोनों ही उस भारतीय मध्यवर्ग के लोकप्रिय आइकॉन हैं जो आईपॉड,कंप्यूटर, ब्रांडेडजीन्स,जूते जैसे उत्पादों का उपभोक्ता भी है। यह वही वर्ग है जो मोबाइल पर बतियाता है, कार,मोटर साइकिल पर सवार है। उदारीकरण से पैदा हुए इस अंधाधुंध उपभोक्तावाद में अन्ना हजारे गांधीवाद का और रामदेव धर्म का तड़का भी लगा देते हैं। इससे पूरी उपभोक्तावादी मध्यवर्गीय क्रांति थोड़ी और टेस्टी हो जाती है। भाजपा और आरएसएस को यह जायका इसलिए खास पंसद है क्योंकि वह जानते हैं कि अन्न्ना और रामदेव जो खीर पका रहे हैं वह आखिरकार उसी की प्लेट में आनी है। आरएसएस को तो बस इतना ही चाहिए कि जेपी और बीपी की तरह इस बार कांग्रेस का बिस्तर तो अन्ना हजारे और बाबा रामदेव बांध दें। मध्यवर्ग की क्रांति भी हो जाएगी और भ्रष्टाचार को जनम देने वाली उदारीकरण की व्यवस्था भी बची रहेगी। इसीलिए उसने रामदेव के पीछे एस गुरुमूर्ति, गोविंदाचार्य और आईबी के पूर्व चीफ अजीत डोबाल को लगाया। अब बाबा और अन्ना से जनता यह पूछने से तो रही कि कांग्रेस के सांपनाथ की जगह आप भाजपा के नागनाथ को क्यों ले आए?यह उनकी जवाबदेही भी नहीं है। ठगी हुई जनता खुद को कोसती हुई एक-दो दशक इसी अफसोस में गुजार देगी। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव का प्रभामंडल बनाने में चौबीसों घंटे जुटे न्यूज चैनलों की जिद है कि वे अपने बूते देश के मध्यवर्ग को सड़क पर उतार कर रहेंगे। कारपोरेट हितों के पहरुआ टीवी चैनलों के हाथों में मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग को अपना खिलौना बनाने की ताकत का आ जाना लोकतंत्र के लिए ही खतरनाक नहीं है बल्कि बुनियादी बदलाव के संघर्षों के लिए यह बुरी खबर है। न्यूज चैनलों का पूरा ध्यान इसी वर्ग पर है क्योंकि यह उपभोक्ता भी है और आंदोलनकारी भी। यह वर्ग चूंकि उदारीकरण और कारपोरेट के खिलाफ भी नहीं है इसलिए इसे लड़ाई का अगुआ बनाने में कोई जोखिम भी नहीं है। बाबा रामदेव के योगा समेत बाकी उत्पादों को भी इसी वर्ग की जरुरत है और अन्ना हजारे को चंदा देने वाली हिंदुस्तान लीवर को भी यही मध्यवर्ग रास आता है।

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