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मंगलवार, 24 नवंबर 2009

उत्तराखंडः लूट और झूठ के नौ साल


आंदोलन के डेढ़ दशक और राज्य बनने के 9 साल के राजनीतिक सफरनामे की उलटबांसी यह है कि उत्तराखंड की राजनीति के खेवनहार वही दल बने हैं जिन्हे आंदोलन ने खारिज कर दिया था ,जिनके नेता लोगों के डर से भाग खड़े हुए थे ।एक राज्य के रुप में उत्तराखंड जब10वें वर्श में दाखिल हो रहा है तब हालात 1994 से ज्यादा बदतर हो चुके हैं । पहाड़ी राज्य का सपना चकनाचूर हो चुका है ।उत्तराखंड आंदोलन के मकसदों को दफनाया जा चुका है । सतह के नीचे असंतोष का लावा फिर जमा हो रहा है । उत्तराखंड एक और आंदोलन के मुहाने की ओर है । पता नहीं कब, कौन सी चिंगारी पूरे पहाड़ को सुलगा दे । उत्तराखंड सदियों से इतिहास की अंधेरी गुफा में बंद रहा है । प्राकृतिक आपदाओं और मानव निर्मित विपदाओं के जिन दौरों से यह समाज गुजरा है उनसे दुनिया के बहुत कम समाज गुजरे होंगे । इतिहास के इस अंधेरे हिस्से में वे अनगिनत काली रातें भी हैं जब 1803 के भीशण भूकंप से तबाह हुए समाज को इतिहास का सबसे बर्बर हमला गोरखा आक्रमण के रुप में झेलना पड़ा था । लगभग तीन लाख लोगों को जानवरों की तरह जंजीरों में जकड़कर गोरखा आक्रमणकारियों ने हरिद्वार और रुद्रपुर की मानव मंडियों में दास बनाकर बेच दिया गया । ऐसी अनेक हृदय विदारक त्रासदियों के साक्षी रहे हिमालय के इस समाज तक आजादी भी आधी - अधूरी ही पहुंची । उत्तराखंड में जनअसंतोष विभिन्न आंदोलनों की भाशा में बोलता रहा लेकिन 1994 का उत्तराखंड बाकी कारणों के साथ पहाड़ियों की पहचान का आंदोलन था । क्षेत्रीयता का यही पुट इसका मुख्य स्वर था । अपनी तमाम तेजस्विता और अनूठेपन के बावजूद उत्तराखंड आंदोलन 1996 के बाद दम तोड़ चुका था ।आंदोलन का ज्वार उतर चुका था । उत्तराखंड आंदोलन की ताकतें तो 1997 से ही चुकने लगीं थी । राज्य बनते - बनते ये ताकतें कुछ खुद के पराक्रम और कुछ जनता की अनदेखी से हाषिये पर चली गईं । 1994 के जनसैलाब के डर से भूमिगत हुए दल और उनके नेता 1995 में ही अपनी राजनीति और इरादों के साथ फिर से प्रगट होने लगे थे ।1996 के लोकसभा चुनाव में लोगों ने चुनाव बहिष्कार के अस्त्र के जरिये उनका प्रतिकार किया पर उसके बाद राजनीति फिर पुराने ढ़र्रे पर लौट आई। 1994 के आंदोलन में सपा,बसपा और कांग्रेस के खिलाफ उमड़ी जनभावनाओं को भुनाने में भाजपा कामयाब रहीं उसके पास आरएसएस और उसके संगठनों का जमीनी नेटवर्क तो था ही साथ राजनीति के दांवपेंचों में माहिर घाघ नेताओं की पूरी फौज थी । उत्तराखंड आंदोलन की फसल भले ही आंदोलनकारियों ने उगाई हो लेकिन जब काटने और संभालने की बारी आई तब उनके पास न तो फसल काटने में कुशल लोग थे और न ही संभालने के लिए अक्ल और कुठार ही थे । लिहाजा आंदोलन से पकी जनमत की फसल भगवा ब्रिगेडें ले उड़ीं । खारिज किए गए नेता ताल ठोंकने लगे थे । उत्तराखंड आंदोलन हार चुका था । इस हार ने उत्तराखंड को हताषा के हिमयुग में धकेल दिया । हताशा के इसी हिमयुग में जब 9 नवंबर 2000 की आधी रात को राज्य बना तब उत्तराखंड के अधिकांश गांव सो रहे थे । अहंकार से भरी केंद्र की एनडीए सरकार ने उत्तराखंड मांग रहे लोगों को उत्तरांचल राज्य दिया । यह जानते हुए भी कि उत्तराखंड में आरएसएस,भाजपा के सिवा ‘उत्तरांचल’ का कोई माई बाप नहीं है पर राजहठ में डूबी सरकार जनता की इच्छा पर अपना नाम थोपने से ही गौरवान्वित थी । बिन मांगे समूचा हरिद्वार जिला उत्तराखंड की झोली में डाल दिया गया , पर आम लोगों ने इसे केंद्र की कृपा मानने के बजाय पहाड़ के मूल निवासियों की आबादी को संतुलित करने वाले क्षेत्रवाद के रुप में देखा । भाजपा को कोई पहाड़ी मुख्यमंत्री तक न मिला और पहला ही मुख्यमंत्री हरियाणवी मूल का बना दिया गया । राजधानी पहाड़ में घोषित करने के बजाय वह भी मैदान में बना दी गई । राज्य पहाड़ी और मुख्यमंत्री से लेकर राजधानी तक सब कुछ मैदान का , ऐसा सलूक शायद ही किसी और समाज के साथ हुआ होगा ! इन सारे कदमों और राज्य पुनर्गठन अधिनियम की व्यवस्थाओं में क्षेत्रवाद का डंक छिपा हुआ था । राज्य तो बन गया लेकिन उत्तराखंड में संदेश यह गया कि केंद्र ने राज्य नहीं दिया बल्कि उन्हे आंदोलन के लिए दंडित किया है । भाजपा को इसका दंड भी भुगतना पड़ा । राज्य निर्माण करने के राजसी अभिमान पर इतरा रही भाजपा को उत्तराखंड की जनता ने वनवास का दंड देकर बताया कि प्रछन्न क्षेत्रवादी एजेंडे को वह भी समझती है । असली खेल तो राज्य बनने के बाद शुरु हुआ । जो मंत्री बने वे पहाड़ के सादेपन के प्रतिनिधि बनने के बजाय यूपी की राजनीतिक कल्चर के इतने उत्साही वारिस साबित हुए कि यूपी के नेता भी उनकी ठसक के आगे पानी भरने लगे । शांत पहाड़ों में रातोंरात गनर वाली प्रजाति के नेता प्रगट हो गए । राजनीति की ये अधभरी गगरियां भौंडेपन के साथ सरेआम छलकने लगीं तो लोगों को लगा कि यह तो यूपी से भी गया- गुजरा प्रदेश बन रहा है । राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के विस्फोट का सिलसिला शुरु हो गया । कारों और टैक्सियों पर नेमप्लेटधारी नेताओं की फौज सड़कों पर उतर आईं । उन्हे सरकारी योजनाओं में अपना हिस्सा चाहिए था । यह नए राज्य में कमीशन के खेल को नए सत्ताधारियों का ग्रीन सिग्नल था । । नए राज्य की जमीन एकाएक नेताओं के लिए उपजाऊ हो गई । इस छोटे राज्य में पैदावार के मामले में नेताओं ने कुकरमुत्तों को पछाड़ दिया । पहले ही विधान सभा चुनाव में उम्मीदवारों की भीड़ नामांकन के लिए उमड़ पड़ी ।
आंदोलन से जनमे राज्य की इससे बड़ी बिडंबना क्या होगी कि सरकार का पहला ही शासनादेश मूल निवासियों के हितों को दूरगामी नुकसान पहुंचाने के इरादे से जारी किया गया । बाद में यह नियुक्तियों में उत्तराखंड के मूल निवासियों के खिलाफ सबसे बड़ा अस्त्र साबित हुआ । जब गैर मूल निवासी को मुख्यमंत्री बनाने पर भाजपा में भी बबाल हुआ तो आलाकमान ने कमान कोश्यारी को सौंप दी । लोगों को हिंदू राष्ट्र की घुट्टी पिलाने वाले व संघ के प्रचारक रहे कोश्यारी भाजपा में ठाकुरवाद की सोशल इंजीनियरिंग के प्रणेता बनकर उभरे । राज्य सरकार की खुफिया एजेंसी एलआईयू के जरिये विधानसभा क्षेत्रवार जातीय गणना कर इस विचार को आंकड़ों के जरिये सिद्धांत का जामा पहना दिया गया । पहले ही साल में नए राज्य में भ्रष्ट और विघटनकारी राजनीति का उदय हो चुका था । इस मैदानी क्षेत्रवाद और जातिवाद की इस राजनीति को जनता ने पूरी तरह खारिज कर दिया । प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री समेत भाजपा के अधिकांश बड़े नेता खेत रहे । भाजपा और कोश्यारी की सोशल इंजीनियरिंग बुरी तरह पिट गई ।भाजपा के खिलाफ उठी लहर से कांग्रेस 1989 के बाद उत्तराखंड में जिंदा हुई । यह वक्त की बिडंबना ही है कि कभी ‘‘ मेरी लाश पर उत्तराखंड बनेगा ’’ जैसा कठोर जुमला कहने वाले नारायण दत्त तिवारी उसी राज्य के मुख्यमंत्री बन गए पर वह बुढ़ापा बिताने पहाड़ आए थे । उनके पास मैदान का विजन था ,जिससे नौएडा तो बन सकता था पर हिमाचल नहीं । वह खांटी पहाड़ी वाईएस परमार या वीरभद्र सिंह नहीं थे । वह छोटे राज्य के बड़े राजा थे । उन्होने 16 वीं सदी के राजा की तरह दोनों हाथों से राजकोश लुटाया । उनका शासनकाल ऐसा दुर्लभ समय था जब मीडिया से लेकर विपक्ष तक सब चारणकाल में पहुंच चुके थे । विधानसभा से लेकर अखबार के पन्नों तक राग दरबारी की धुन बज रही थी । ऐसा करिश्मा बस तिवारी ही कर सकते थे ।चार्वाक का ‘‘कर्ज लो और घी पियो’’दर्शन सरकार का सूत्रवाक्य बन चुका था । लीडर तब डीलर बन चुके थे । रोज कहीं न कहीं घोटाला हो रहा था । देहरादून के ढ़ाबे वाले हों या पंचतारा होटल वाले उन दिनों को याद कर उसे स्वर्णयुग बताते नहीं थकते । बावजूद इसके कांग्रेस सरकार नहीं बच पाई । भ्रष्टाचार की तोहमत उसे ले डूबी । मिस्टर आनेस्ट जनरल बीसी खंडूड़ी के हाथ सत्ता आई तो पहाड़ के लोगों को लगा कि अब राज्य में खांटी पहाड़ी राज स्थापित होगा और 6 सालों में पनपे दलाल राज का खात्मा इसी रिटायर्ड जनरल के हाथों होगा । उनकी तनी हुई झबरीली मूंछें, सख्त चेहरा और फौजी पृष्ठभूमि मिलकर जो छवि बनाते थे उससे लोगों में इस यकीन ने जड़ें भी जमाईं । जनरल सत्ता के घेरे में ऐसे कैद हुए कि वह कैंट रोड के अपने काले लौह दरवाजों के उस पार जनता के लिए ईश्वर की तरह अगम्य बन गए । सिर्फ इतना ही पता चल पाया कि वह सारंगी कुलनाम के किसी मायावी आईएएस के मोहपाश में हैं । मात्र डेढ़ साल में जनरल का करिश्मा और केंद्रीय सड़क मंत्री के रुप में बटोरा पुण्य चुक गया । लोकसभा चुनाव में अपमानजनक हार के रुप में जनता ने उनकी बर्खास्तगी के पत्र पर दस्तखत कर दिए । इसे राज्य स्तर पर कांग्रेस और भाजपा की राजनीतिक कंगाली भी कह सकते हैं कि उनके पास न तो दूर तक देखने वाली दृष्टि है , न ऐसे नेता हैं और न ही वह साहस जो एक नए राज्य की बुनियाद के लिए जरुरी है । यही कारण है कि उत्तराखंड नए राज्यों में अकेला राज्य है जिसके पास अपनी स्थायी राजधानी तक नहीं है । उसके नेताओं में न तो इतनी हिम्मत है कि देहरादून को ही राजधानी घोषित कर दें और न इतना साहस कि गैरसैंण को राजधानी बना दें । ऐसा ही हाल परिसीमन का भी है । परिसीमन का रस्मी विरोध करने के अलावा कोई गंभीर सवाल नहीं उठाया गया । जबकि एक राज्य के रुप में यह उत्तराखंड के जीवन और मरण का सवाल है ।सन् 2012 के विधानसभा चुनाव में पहाड़ की आधा दर्जन सीटें कम हो चुकी हैं । उत्तराखंड विधानसभा का संतुलन अब मैदान की ओर झुक गया है । उत्तराखंड आंदोलन को पराजित करने की जो साजिश राज्य के गठन के समय की गई थी , परिसीमन से वह अब ज्यादा स्पष्ट हो गई है । सन् 2032 में होने वाले परिसीमन के बाद पहाड़ी राज्य का भ्रम पूरी तरह टूट जाएगा और विधानसभा में 51 सीटें मैदानी क्षेत्रों की होंगी और पहाड़ी क्षेत्रों की सीटें घटकर मात्र 19 रह जायेंगी । पहाड़ी राज्य की पूरी अवधारणा को नेस्तनाबूद करने वाला परिसीमन का यह खतरा हो या राजधानी और पलायन के ज्वलंत सवाल उत्तराखंड के नेताओं के पास राजनीतिक चिंता और चिंतन दोनों नहीं हैं अलबत्ता रातों - रात नोटों के ढे़र पर बैठने के हुनर में वे किसी भी मधु कौड़ा या सुखराम का मुकाबला करने की प्रतिभा रखते हैं । प्रदेश में 50 करोड़ से 400 करोड़ रुपए की हैसियत रखने वाले नेताओं की तादाद एक दर्जन से कम नहीं है और करोड़पति नेताओं की तादाद तो सैकड़ों में है । करोड़पति अफसरों की तादाद 1000 से ज्यादा है । राजनीति और सरकारी क्षेत्र में समृद्धि का यह विस्फोट राज्य बनने के बाद हुआ है । बेहतरीन मानव संसाधन और प्राकृतिक संसाधनों का खजाना होने के बावजूद उत्तराखंड नौ वर्ष के अपने सफर में विकास के बुनियादी मानकों पर भी खरा नहीं उतरा । जलवायु में हो रहे बदलावों के कारण राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था बेहाल है । पहाड़ में आय और जीवन निर्वाह के परंपरागत साधन ढ़ह रहे हैं , नए साधन हैं नहीं । राज्य बनने के बाद पलायन रुका नहीं बल्कि बढ़ गया । तेजी से बियाबान होते जा रहे गांव बता रहे हैं कि आने वाले दशक इतिहास के सबसे बड़े विस्थापन की गवाही देंगे । बेरोजगारी खतरनाक स्तर को छू रही है । केंद्र द्वारा घोषित औद्योगिक पैकेज राज्य की कीमती भूमि की लूट, करों की चोरी का जरिया और श्रम कानूनों की कब्रगाह बनकर रह गया है । अरबों रुपए की जमीनें कौड़ियों में लुटाकर राज्य सरकार कुछ हजार रोजगार जुटा पाई । इसमें में भी मूल निवासियों के हिस्से मजदूरी या सुपरवाइजरी स्तर तक नौकरी ही आ पाई तो अधिकांश नदियां, गाड ,गधेरे सरकार बेच चुकी है ,पर पनबिजली प्रोजेक्टों में भी बड़े पदों पर पहाड़ के लोगों को नियुक्त करने पर अघोषित पाबंदी हैं । आयकर विभाग के आंकड़े गवाह हैं कि राज्य बनने के बाद सर्वाधिक समृद्धि मैदानी जिलों में ही आई ।यदि प्रतिव्यक्ति कार व दुपहिया वाहन और प्रतिव्यक्ति इलेक्ट्रानिक गुड्स के आंकड़े देखे जांय तो मैदान और पहाड़ के जीवन स्तर और उपभोग स्तर की विषमता साफ- साफ नजर आ जाती है । जबकि शिमला में ये दोनों ही सूचकांक पूरे देश में सबसे बेहतर हैं । जाहिर है कि इन नौ सालों में जैसा उत्तराखंड राजनेताओं ने बनाया है वह दिल, दिमाग ,आचार और व्यवहार से तो पहाड़ी कतई नहीं है । इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि उसकी विधानसभा पहाड़ की मेधा,भावना,सामान्य बुद्धिमत्ता और सरोकारों का प्रतिनिधित्व तक नहीं करती । यह बिडंबना ही है कि आज का उत्तराखंड पहाड़ और उसके लोगों के तात्कालिक और दीर्घकालिक हितों के खिलाफ है । एक पहाड़ी राज्य के रुप में उत्तराखंड नाकाम हो चुका है । राज्य के पहाड़ विरोधी रंगढंग देखते हुए ही उत्तराखंड जनमंच जैसे आंदोलन में हिस्सा लेने वाले संगठन उत्तराखंड राज्य को विसर्जित करने की मांग उठाने लगे हैं ।

गुरुवार, 12 नवंबर 2009

क्षेत्रीयताओं का द्वंद समझने का समय



मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मध्यप्रदेश की फैक्टरियों में बिहारियों के बजाय मध्यप्रदेश के लोगों को नौकरियां दिये जाने का बयान क्या दिया कि एक बार फिर तूफान खड़ा कर दिया गया । माहौल ऐसा बनाया जा रहा है कि जैसे कोई आसमान टूट पड़ा हो ।शीला दीक्षित से लेकर राज ठाकरे तक न जाने कितने बयानों को लेकर ऐसा माहौल बनाया गया कि जैसे देश खतरे में पड़ गया हो ।अंधाधुंध बिहारी आब्रजन के खिलाफ बोलना कुफ्र मान लिया गया है । बिहारी वर्चस्व वाला हिंदी मीडिया और बिहार के भ्रष्ट और अकर्मण्य नेता अक्सर इन घटनाओं पर आक्रामक प्रतिक्रिया और शोर मचाकर इसे राष्ट्रीय संकट में बदलते रहे हैं । यह उनकी रणनीति है कि कभी राज ठाकरे तो कभी शिवराज के रुप में वे बिहार के लिए एक अदद खलनायक का इंतजाम करते रहते हैं ताकि बिहार के असली खलनायक बिहारी क्षेत्रवाद की ढ़ाल के पीछे नायक बने रहें ।आखिर बिहार के बुनियादी सवालों के बजाय राज ठाकरे और शीला दीक्षित या शिवराज सिंह को गलियाने से बिहार में वोट मिल सकते हैं तो इसमें हर्ज क्या है ।
दरअसल हिंदी मीडिया खासतौर पर इलेक्ट्रानिक मीडिया खुद क्षेत्रवाद के कीचड़ में इतना धंस चुका है कि उसमें आब्जेक्टेविटी गायब हो चुकी है । यदि ऐसा नहीं होता तो वह पंजाब , असम महाराष्ट्र और अब मध्य प्रदेश से आ रही बिहारी विरोधी आवाजों को राष्ट्र विरोधी करार देने पहले यह जरुर विश्लेषित करता कि विभिन्न भारतीय समाजों से एक ही समुदाय के खिलाफ क्यों ऐसी प्रतिक्रिया आ रही है ? क्यों इन समाजों का धैर्य चुक रहा है ? मीडिया के हमले और बिहारी नेताओं की हमलावर रणनीति से भले ही शीला दीक्षित या शिवराज को बचाव पर उतरना पड़ा हो पर सच्चाई यह है कि जिस बिहारीवाद विरोधी जिस वर्ग को ये नेता संदेश देना चाहते थे उसे उन्होने संबोधित कर लिया । बिहारियों के खिलाफ इन समाजों में प्रतिक्रिया तो पहले से ही मौजूद है , नेताओं ने तो उसे सिर्फ वाणी देकर मुद्दा बनाया ।यह बात आईने की तरह साफ है कि अनियंत्रित और अनियोजित बिहारी आब्रजन के खिलाफ विभिन्न समाजों में सतह के तले प्रतिक्रिया हो रही है और राजनीति तो उन भावनाओं पर सवारी गांठना चाहती है । पंजाब में यह प्रतिक्रिया पर्चे - पोस्टर चिपकाने के बाद चुनाव में लुधियाना जैसे शहरों में स्थानीय लोगों की पकड़ कम होने से आई तो महाराष्ट्र के चुनावों ने साबित कर दिया कि वहां बिहारी आब्रजक बड़े राजनीतिक सवाल बन चुके हैं ।दिल्ली में भी यही होने जारहा है तो असम में हिंसा के साथ प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा है । मध्यप्रदेश में यह टकराव का रुप लेने की ओर है । इसमें जो नए प्रदेश भविष्य में जुड़ने वाले हैं उनमें राजस्थान और उत्तराखंड जैसे शांत राज्य भी शामिल हैं ।
जो लोग अंधाधुंध आब्रजन का समर्थन कर रहे हैं वे भारत और उसके समाजों को कितना जानते हैं , यह तो पता नहीं पर ये लोग न तो बिहारियों के हित में है और न देश के हित में है ।भारत एक संघीय गणराज्य है । इस देश को संघीय गणराज्य कोई संविधान ने नहीं बनाया ।भारत स्वभाव और संरचना से ही एक संघीय राष्ट्र है । सदियों के सफर के अनुभवों और जरुरतों ने विभिन्न रीति रिवाजों और मिजाजों के समाजों को अपनी विशिष्ट पहचान के साथ राष्ट्र की एक राजनीतिक ईकाई में पिरोया । भारतीय समाज में यह सामाजिक, सांस्कृृतिक विविधता सदियों से चली आ रही है । रंगों की इसी छटा से भारत बनता है । एक राष्ट्र के रुप में भारत के अस्तित्व की गारंटी भी यही विविधता देती है । क्योंकि यह हर समाज को अपने इलाकों में अपनी परंपराओं, मान्यताओं, रीति-रिवाजों के अनुरुप जीवन बसर करने की आजादी देती है ।अनेक राष्ट्रीयताओं , उपराष्ट्रीयताओं के संगम ने ही भारत जैसे बहुधर्मी ,बहुभाषी, बहुसांस्कृृतिक और विविधवर्णी राष्ट्रराज्य का निर्माण किया है । यह उसकी ताकत भी है और एक राज्य के रुप में उसकी सीमा भी । वह कोई एक ही गोत्र में जन्मे लोगों की मोनोकल्चर प्रजाति जैसी सरल सामाजिक संरचना नहीं है ।अपने क्षेत्र के आर्थिक और प्राकृतिक संसाधनों पर उस अंचल के मूल निवासियों का पहला अधिकार है ।यह अधिकार भारतीय संविधान भले ही न देता हो परंतु यह उनका जन्मजात और प्राकृृतिक अधिकार है और यह सदियों से चला आ रहा है । यह अधिकार अनुल्लंघनीय है और भारत की एकता की गारंटी भी ।
जो लोग संविधान के तहत दी गई कहीं भी बसने और रोजगार पाने के अधिकार के दैवी अधिकार की तरह प्रचारित कर बिहार से हो रहे भारी पलायन को औचित्य प्रदान करने की कोशिश कर रहे हैं उनसे निवेदन है कि संविधान अपने अस्तित्व के लिए जनता की इच्छा पर आश्रित है । जनादेश के बल और वैधता के बिना संविधान एक रद्दी के ढ़ेर में पड़ी किताब है । वह तभी तक प्रभावी है जब तक जनमत उसके साथ है । संविधान यदि देश और समाज की आकांक्षाओं से तालमेल नहीं बिठा पाएगा तो लोग उसे ही बदल देंगे ।लोगों की इच्छा के खिलाफ किसी कानून या संविधान का पालन सिर्फ दमन से संभव है ।क्या यह उचित होगा कि भारतीय राष्ट्र बिहार से बड़े पैमाने पर हो रहे पलायन के कारणों का इलाज करने के बजाय उन समाजों का लाठी - गोली से इलाज करे जो अल्पसंख्यक होने और अपने संसाधनों पर औरों का कब्जा होने के डर से प्रतिक्रिया कर रहे हैं ?
किसी बाहरी तत्व के घुसने पर मानव शरीर भी स्वाभाविक प्रतिक्रिया करता है और एंटीबाॅडी बनाना शुरु कर देता है । शरीर का तापमान बढ़ जाता है और मेडिकल की भाषा में यह बुखार है । ऐसा सिर्फ शरीर के साथ ही नहीं होता बल्कि समाज और यहां तक कि प्रोफेशनल कहे जाने वाले व्यावसायिक और वाणज्यिक संस्थान भी इसी तरह से फारेन बाडीज का प्रतिकार करते हैं । इसलिए महाराष्ट्र ,असम या मध्यप्रदेश से आने वाली बिहारी विरोधी प्रतिक्रियाओं को राष्ट्रविरोधी कहकर प्रचारित कर रहे हैं उन्हे जानना चाहिए कि ये समाज आर्थिक ,राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक बुखार से तप रहे हैं ।इन समाजों को सहानुभूति और केयर की जरुरत है ।उनके भयों और चिंताओं को संबोधित करना होगा । हिंदी मीडिया और बिहार के नेताओं की दुत्कार से यह रोग गंभीर होगा और एक दिन लाइलाज होकर भारतीय राष्ट्रराज्य के लिए खतरा बन जाएगा ।दुख की बात यह है कि हिंदी हार्ट लैंड से समझदारी के स्वर गायब हैं और वे बिहारियों को रोकने वाले मराठियों , मध्यप्रदेशियों, असमियों का सर मांग रहे हैं ।
परंतु अब समय आ गया है कि पलायन को प्रोत्साहित करने वाली राजनीति के मंतव्य समझे जांय और उसे हतोत्साहित किया जाय ।वैज्ञानिक रुप से हर राज्य और शहर की मानव भार वहन करने की क्षमता तय की जाय और उसी के अनुरुप राज्यों या शहरों में आबादी के प्रवाह को नियंत्रित किया जाय । यदि ऐसा नहीं हुआ तो हिंदुस्तान के शहर नरक में बदल जायेंगे और उनके नागरिक जीवन को संचालित करना असंभव हो जाएगा ।दरअसल आब्रजन को लेकर जितना भी शोर उठा है वह बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश से अस्सी के दशक से बड़े पैमाने पर शुरु हुए पलायन की प्रतिक्रिया है ।आर्थिक उदारीकरण ने लोगों के जीवन को ज्यादा संकटपूर्ण बनाया है और उन्हे जानलेवा प्रतिस्पर्धा में झोंक दिया है । इसने नए सामाजिक - आर्थिक तनावों को जन्म दिया है । आज का हर समाज 1980 के मुकाबले ज्यादा चिड़चिड़ा और तुनुक मिजाज हुआ है ।आर्थिक रुप से उपयोगी प्राकृतिक संसाधनों और रोजगार के अवसरों को लेकर जंग तीखी और हिंसक होती जा रही है । बड़े समाजों की आक्रामकता के खिलाफ छोटे समाज लामबंद हो रहे हैं ।भारत कृत्रिम एकात्मकता से संघीय चरित्र और बहुलतावाद की ओर प्रस्थान कर रहा है ।
जब दुनिया के हर राष्ट्र को आब्रजकों की तादाद तय करने का अधिकार है तो हर राज्य को अपनी आबादी के अनुपात और जरुरत के हिसाब से यह तय करने का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए कि उसे कितनी संख्या और किस श्रेणी का मानव संसाधन चाहिए ।
उत्तराखंड,बिहार और पूर्वी यूपी समेत भारत में पलायन के जो भी मुख्यालय रहे हैं वहां रहन-सहन की स्थितियां बेहद खराब, रोजगार के साधनों का अभाव और गरीबी का साम्राज्य रहा है ।यह स्थितियां इन राज्यों के राजनीतिक नेतृत्व के भ्रष्टाचार, निकम्मेपन और स्वार्थी राजनीति के कारण पैदा हुई हैं । इन राज्यों का नेतृत्व अपने नागरिकों को गरिमामय जीवन और जीने की बेहतर परिस्थितियां देने में पूरी तरह विफल हुआ है ।अब सवाल उठता है कि पूर्वी यूपी या बिहार के नेताओं और सरकार की विफलता दंड महाराष्ट्र या मध्य प्रदेश , असम या किसी और राज्य के लोग क्यों भुगतें ? वे अपने रोजगार और अन्य साधनों पर हमले क्यों सहें ? अक्सर यह देखने में आता है कि जैसे ही राज ठाकरे या कोई और बाहरी लोगों के खिलाफ बयान देता है तो बिहार और पूर्वी यूपी के नेता आसमान सर पर उठा देते हैं ।पंजाब से लेकर राजस्थान तक कोई प्रतिक्रिया नहीं होती । साफ है कि इन दो इलाकों के नेता पलायन को जारी रखना चाहते हैं ताकि वे अपनी जनता को सुशासन और बेहतर जीवन देने के झंझट से बचे रहें ।सच यह है कि यदि बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश में जमीन का न्यायसंगत पुनर्वितरण हो जाय तो सारा पलायन रुक जाय ।क्योंकि पलायन करने वालों में अधिकांश गरीब हैं जो सामाजिक- आर्थिक कारणों से बाहर जा रहे हैं ।यदि इन इलाकों में हरित क्रांति के प्रयास युद्धस्तर पर किए जांय तो वहां भी पंजाब की तरह समृद्धि की कथा लिखी जा सकती है ।जाहिर है कि ये कठिन काम हैं जबकि राज ठाकरे को गाली देना आसान है । इससे बिहारी व पूरबिया क्षेत्रवाद भी भड़कता है और उससे वोट भी मिलता है । इस काम में इन नेताओं की मदद के लिये सवर्ण प्रभुत्व वाला हिंदी मीडिया भी जुट जाता है ।बिहार और पूर्वी यूपी की कृषि के सामंती ढ़ांचे के बने रहने में मीडिया के भी अपने स्वार्थ हैं ।
यह आश्चर्यजनक और अफसोसनाक है कि हिंदी मीडिया और बिहार व पूरब के नेता इस अंधाधुंध पलायन पर उंगुली उठाने या उसे रोकने वाली हर कोशिश को आनन फानन में देशद्रोह घोषित कर देते हैं ।पूछा जा सकता है कि क्या देश का मतलब सिर्फ बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश है ? यदि यही देश हैं तो ऐसे देश से भारत को खतरा है ।जो लोग अंधाधुंध आब्रजन का समर्थन कर रहे हैं वे भी क्षेत्रवादी आग्रहों के कारण ही ऐसा कर रहे हैं ।हद तो यह है कि ये क्षेत्र नेता भी निर्यात कर रहे हैं फिर बाकी समाजों के नेता क्यों नहीं विरोध करेंगे ? यदि गणेश उत्सव की प्रतिक्रिया में छठ उत्सव का राजनीतिकरण किया जाएगा तो प्रतिक्रिया क्यों नहीं होगी ? यदि बिहारी या पूर्वी यूपी के प्रवासी मराठी विरोध या अपनी अलग क्षेत्रीय राजनीतिक पहचान के लिए किसी अबु आजमी या कृपाशंकर को चुनेंगें तो सामान्य सोच का मराठी उनसे खतरा क्यों नहीं महसूस करेगा ? वह अपनी जमीन पर किसी और का राजनीतिक प्रभुत्व क्यों स्वीकार करेगा ? उसने महाराष्ट्र के निर्माण की लड़ाई कोई बिहार और पूर्वी यूपी के नेताओं के लिए थोड़े ही लड़ी है ।यह कैसे हो सकता है कि मीडिया और बिहार के नेता क्षेत्रवाद की राजनीति करते रहें और बाकी समाज देशहित में चुपचाप बैठे रहें ? यह स्वाभाविक है कि जैसी राजनीति आप करेंगे वैसा ही जवाब आपको मिलेगा ।
हमें इस सच को स्वीकार करना होगा कि कोई भी समाज अपने संसाधनों व रोजगार पर हमला बर्दाश्त नहीं करेगा और न ही अपनी भूमि पर अल्पसंख्यक होने की नियति स्वीकार करने को तैयार होगा ।आधुनिक लोकतंत्र के मक्का कहे जाने वाले पश्चिमी देशों तक में हिंसक प्रतिक्रियायें होने लगी हैं । यह इस बात का द्योतक है कि हर समाज एक निश्चित सीमा में ही बाहरी लोगों को बर्दाश्त कर सकता है । तिब्बत और पूर्वी तुर्किस्तान के मूल निवासियों को अल्पसंख्यक बनाने की चीनी नीति यदि गलत है तो ऐसी कोशिशें भारत में सही कैसे हो सकती है ? त्रिपुरा का उदाहरण सामने है जहां मूल निवासी अल्पसंख्यक हो गए और वे त्रिपुरा उपजाति समिति के तहत हिंसक आंदोलन करते रहे हैं । वहां माकपा का आधार माक्र्सवाद नहीं बल्कि बंगाली क्षेत्रवाद है । अन्य राज्यों में मूल निवासी अल्पसंख्यक हुए तो वे भी क्या हिंसक प्रतिरोध की ओर नहीं जायेंगे ? यह दुखद है कि हिंदी मीडिया भी इसे हवा दे रहा है । उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने एक ट्रेन मे महाराष्ट्र के निवासियों को खोज-खोज कर बेल्टों से पीटा । महाराष्ट्र में ऐसी ही घटना पर ‘‘राज के गुंडे’’ जैसे आक्रामक जुमले इस्तेमाल करने के लिए कुख्यात किसी हिंदी चैनल ने इसे गुंडागर्दी करार देना तो दूर ढंग से रिपोर्ट तक नहीं किया । राजठाकरे के खिलाफ अपने संपादकीयों में जहर उगलने वाले हिंदी अखबारों ने एक भी संपादकीय सपा की करतूत पर नहीं लिखा ।यह हिंदी मीडिया का अघोषित क्षेत्रवाद नहीं है तो क्या है ? यह अजीब रस्म है कि एक समुदाय क्षेत्रवाद चलाए तो सही और बाकी आत्मरक्षा में क्षेत्रवाद करें तो गलत ।वो कत्ल भी करें.....
मीडिया का यह क्षेत्रवाद हाल में अबु आजमी प्रकरण से भी नंगा हुआ है ।आजमी पर मनसे के विधायकों के हमले की रिपोर्टिंग पूरी तरह से विषाक्त और एकपक्षीय रही । न्यूज चैनलों में तो सदा की तरह इस पर भी हाहाकार मचा रहा । उनके यहां तो यह मुद्दा पाकिस्तान के हमले जैसा राष्ट्रीय संकट बना रहा । अखबारों ने भी पत्रकारिता की मर्यादाओं को लांघ दिया । उत्तर भारत के एक प्रमुख दैनिक ने शीर्षक दिया,‘ हिंदी पर हमला ’ दूसरे ने भी कुछ ऐसी ही भड़काऊ हैडिंग लगाई । इन हैडिंगों को देखकर अयोध्या में कारसेवकों पर हुए गोलीकांड के दौरान की गई सांप्रदायिक रिपोर्टिंग याद आ गई ।अबु आजमी हिंदी मीडिया के नए हीरो हैं क्योंकि वह अंग्रेजी के नहीं बल्कि मराठी के विरोधी हैं । हिंदी को भारतीय भाषाओं के खिलाफ खड़ा करने की इन साजिशों के कामयाब होने से हिंदी को ही घाटा होगा ।मराठी के विरुद्व हिंदी के लिए शोर मचाने वाला हिंदी मीडिया उन फिल्मी सितारों के आगे तो बिछा रहता जो नमक तो हिंदी का खाते हैं और मीडिया से बात अंग्रेजी में करते हैं ।किसी हिंदी अखबार या हिंदी चैनल ने हिंदी के साथ नमकहरामी करने वाले इन सितारों को छापने या टेलिकास्ट करने से इंकार नहीं किया ।
हिंदी के नाम पर हिंदी मीडिया के उन्माद के कोरस में सुधीश पचौरी का शामिल होना चकित करता है । उन्होने तो आजमी को मराठी के विरुद्ध हिंदी के धर्मयुद्ध का योद्धा तक घोषित कर दिया ।गनीमत है कि उन्होने आजमी को आज का लोहिया नहीं बताया । । राजनीति की वैतरणी पार करने के लिए हिंदी की पूंछ पकड़ने वाले आजमी किस किस्म के नेता हैं यह कौन नहीं जानता ।हिंदी को महाराष्ट्र में जिंदा रहने के लिए आजमी या किसी नेता की जरुरत पड़े ईश्वर करे ऐसा दिन हिंदी के इतिहास में कभी न आए ।हिंदी महाराष्ट्र में आजमी के लिए नहीं बल्कि अपने समृद्ध साहित्य व भाषायी सौंदर्य के लिए जानी जाय , पढ़ी जाय और उससे आम मराठी इसलिए नफरत न करें कि वह आजमी जैसे नफरत की राजनीति करने वाले नेताओं की भी भाषा है , काश! ऐसा हो ।पत्रकारिता की बुनियादी सिद्धांतों को ताक पर रखने वाले हाहाकारी हिंदी मीडिया को 10 नवंबर 09 के मराठी अखबार जरुर पढ़ने चाहिए जिनमें हिंदी को लेकर बबाल मचाने पर मनसे की लानत- मलामत की गई है ।पत्रकारिता का धर्म अखबार बेचने के लिए उन्माद पैदा करना नहीं है ।जो ऐसा कर रहे हैं वे अपने बाजारु स्वार्थ के लिए देश की एकता तोड़ रहे हैं और देशद्रोह इसी को कहते हैं ।इस सारी बहस का मतलब यही है कि क्षेत्रीयता और छोटे समाजों के मनोविज्ञान को समझा जाय और उनके द्वंदों को संबोधित करते हुए पलायन और आब्रजन पर कोई राष्ट्रीय नीति बने ।

शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2009

कठिन वक्त में भाजपा

दो दशकों की सबसे भीषण मंहगाई और दो बार सत्तारुढ़ रहने से उपजा सत्ताविरोधी रुझान फिर भी भाजपा को महाराष्ट्र में मुंह की खानी पड़ी । लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के हाथों मात खा चुकी भाजपा के लिए यह कोई मामूली झटका नहीं है बल्कि इसका संदेश दूरगामी है । हरियाणा से लेकर अरुणाचल और महाराष्ट्र तक कहीं से भी उसके लिए दिल बहलाने के लिए भी कोई खबर नहीं है ।देश में सवाल पूछा जाने लगा है कि क्या भाजपा के दिन लद चुके हैं ? क्या भारतीय राजनीति में वह अप्रांसगिक हो चुकी है ? निश्चित तौर पर भाजपा के लिए यह कठिन समय है । बिडंबना यह है कि ऐसे वक्त में उसके पास न तो वाजपेयी जैसा नेता है जो अपनी छवि के बूते उदार हिंदुओं को मोह सके और न बाबरी मस्जिद जैसी कोई निर्जीव और कमजोर खलनायक जो उसकी झोली वोटों से भर दे ।
एक दल के रुप में भाजपा के सामर्थ्य और सीमाओं पर बात करने से पहले महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव नतीजों का विश्लेषण किया जाना जरुरी है । महाराष्ट्र में दस सालों से कांग्रेस की सरकार है और घोर कांग्रेसी भी यह मानेगा कि महाराष्ट्र में सरकार के खाते में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसके बूते उसे तीसरी बार सत्ता में बैठने का नैतिक अधिकार दिया जा सके । न तो उसके पास शीला दीक्षित की तरह विकास की जादुई छड़ी थी और न बेहतर कानून व्यवस्था और साफ-सुथरा प्रशासन कायम करने का यश । जनता के पास ऐसा कोई कारण नहीं था कि वह कांग्रेस को वोट दे ।इन सबसे ऊपर पिछले दो दशकों की ऐसी भीषण महंगाई है जिससे सिर्फ देश का गरीब तबका ही नहीं बल्कि मध्यवर्ग और उच्च मध्यवर्ग भी त्राहिमाम कर रहा है । लोगों की रोजी और रोटी दोनों खतरे में डाल दी गई हों , उनके भोजन की बुनियादी जरुरत दाल को रातों रात गायब कर दिया गया हो तब भी देश का सबसे मुखर और बड़बोला विपक्ष हार जाय ! महाराष्ट्र में भाजपा की हार को इसीलिए मामूली घटना मानकर हवा में नहीं उड़ाया जा सकता । क्योंकि यह प्रतिपक्ष के रुप में उसकी राजनीति और रणनीति के साथ नेतृत्व की भी हार है । भाजपा के नेतृत्व को राजनीतिक हालातों की कितनी समझ है इसका अंदाजा हरियाणा में अकेले चुनाव लड़ने के उसके फैसले से लगाया जा सकता है । यदि भाजपा इनेलो के साथ वहां चुनाव लड़ती तो हरियाणा से कांग्रेस का बिस्तर बंध गया होता । पार्टी ने यह फैसला तब भी वापस नहीं लिया जब हुड्डा ने विपक्ष में बिखराव देखते हुए समय से पहले चुनावों का ऐलान कर दिया । भाजपा के नेतृत्व ने संकीर्ण दलीय हितों के बजाय अपने दूरगामी हित सोचे होते तो उसे हरियाणा में मुंह छिपाने की जगह मिल गई होती ।दरअसल वस्तुगत परिस्थितियां विपक्ष के साथ होने के बावजूद यदि वह हार गई तो उसे अपने गिरेबान में झांकना चाहिए ।एमएनएस को वोट बंटवारे का दोषी ठहराने की कवायद खंभा नोचने जैसा खिसयाया विश्लेषण है ।क्या भाजपा इतनी नादान पार्टी है कि उसे यह भी पता नहीं कि लोकतंत्र में कोई न कोई वोट बांटने वाला हर चुनाव में मौजूद रहेगा । उसके वोट न बंटे यह पुरुषार्थ तो उसे ही दिखाना है ।भाजपा या किसी भी विपक्षी दल को वोट देने के लिए जनता के पास कोई वैध कारण और तर्क होना चाहिए । जनता को यदि यह भरोसा है कि अमुक दल के सत्ता में आने से उसके हालात बदलेंगे तो वह परिवर्तन के लिए वोट देगा । मनुष्य का स्वभाव परिवर्तन की इच्छा और यथास्थिति बनाए रखने की चाह का घालमेल है । परिवर्तन की पक्षधर ताकतें लोगों में यदि बेहतर कल के सपने को संचरित करने में कामयाब रहती हैं तो आम लोग परिवर्तन के पक्ष में लामबंद हो जाते हैं अन्यथा लोग जड़ता में पड़ा रहना पसंद करते हैं । जड़त्व का नियम सिर्फ निर्जीव वस्तुओं पर लागू नही होता वह समाजों और लोगों पर भी लागू होता है ।वस्तुओं की तरह समाज भी तभी आगे या पीछे सरकते हैं जब उन्हे कोई हिलाता - डुलाता है ।
यदि सन् 2004 से लेकर 2009 तक भाजपा की राजनीतिक सक्रियता का विश्लेषण किया जाय तो यह आईने की तरह स्पष्ट है कि इन पांच सालों में भाजपा ने ऐसा कोई पुरुषार्थ नहीं दिखाया कि वह उत्तर भारत की जनता को अपने पक्ष में वोट करने को प्रेरित कर सके ।इसे यूं भी कहा जा सकता है कि उसने लोकतंत्र में प्रतिपक्ष का अपना धर्म नहीं निभाया । भाजपा को इस मुगालते में रहने का अधिकार है कि संसद में मात्र उसका संख्याबल ही उसे देश का मुख्य प्रतिपक्षी दल बना देता है , पर व्यवहार में ऐसा है नहीं ।यदि राजनीतिक दल जनता के लिए निरंतर संघर्ष कर राजनीतिक पूंजी नहीं बटोरते तो उनका पूर्व के संघर्षों का संचित पुण्य भी क्षरित होने लगता है और एक दिन ऐसा भी आता है कि वे अतीत की पार्टियां बन जाती हैं । क्या भाजपा के साथ भी यही दोहराया जाने वाला है ? भाजपा की मुश्किल यह है कि वह सत्ता में तो आना चाहती है लेकिन उसके लिए जमीन पर लड़ना नही चाहती । उसके नेता अब सत्ता में आने के लिए सत्ता विरोधी रुझान के भरोसे बैठे हैं । उन्हे लगता है कि यह असंतोष उन्हे प्रतिपक्ष से उठाकर सत्ता में बैठा देगा ।सत्ता की राजनीति ने एक जमाने की इस लड़ाकू दक्षिणपंथी पार्टी को आरामतलब और शाही विपक्ष में रुपांतरित कर डाला है ।विहिप और आरएसएस जरुर चुनावों के आसपास यात्रायें और आक्रामक अभियान चलाकर उसके लिए हिंदू वोटों का जुगाड़ करते हुए दिखाई देते हैं । बदले हुए समय में संघ परिवार के ये उपक्रम कट्टर हिंदुओं को तो उसकी झोली में बनाए रखते हैं पर नया कुछ जोड़ते नहीं ।
अटल बिहारी वाजपेयी के राजनीतिक परिदृश्य से हटने के बाद उसके पास मध्यवर्ग को भा जाने वाला नेता नहीं है और कट्टरपंथी राजनीति की सीमायें बाबरी मस्जिद कांड के बाद साफ हो चुकी हैं ।करिश्माई नेता के नाम पर उसके पास सिर्फ नरेंद्र मोदी है लेकिन वह उन्ही हिंदुओं के नायक हैं जो पहले ही भाजपा के साथ हैं । राजनीतिक संस्कृति और आर्थिक नीतियों के सवाल पर भाजपा कांग्रेस का विकल्प नहीं बल्कि पूरक है । महंगाई,कालाबाजारी,जमाखोरी , मिलावटबाजी और रोजगार असुरक्षा के मुद्दे पर दोनों दलों ने आपस में राष्ट्रीय सहमति कायम कर ली है ।यानी दोनों दलों में कोई भी सत्ता में आए ये समस्यायें ऐसी ही रहेंगी ।जब जनता को यह बुनियादी बात पता है कि भाजपा के सत्ता में आने पर भी उसे कोई राहत नहीं मिलनी है तब वह क्यों भाजपा के पक्ष में खड़ी हो ? रही बात उच्च वर्ग की , तो वह मनमोहन सिंह , चिदंबरम से खुश है ही , इसलिए मीडिया भी उन पर मुग्ध है ।सवाल यह है कि ऐसी स्थिति में भाजपा किस वर्ग की राजनीतिक जरुरत है जो उसे सत्ता में आता हुआ देखना चाहेगा ? इस सवाल का जवाब ही तय करेगा कि भाजपा का क्या होगा ।भाजपा के लिए यह समय अपनी पूरी राजनीति पर समग्रता से सोचने का है । उसे तय करना होगा कि 21वीं सदी के भारत को क्या वह जनसंघ के नजरिये से देखना चाहती है या फिर कोई नया प्रस्थान बिंदु खोजना चाहती है । उसे ही तय करना है कि वह स्वायत्त राजनीतिक दल बनेगा या आनुषांगिक संगठन की नियति स्वीकार करेगा ।







शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2009

चिदंबरम के भारत को चाहिए गुलाम आदिवासी



देश के न्यूज चैनलों में इन दिनों एक बच्चे का रुदन है और उसका गुस्सा भी है, जिसमें वह बड़ा होकर पुलिस बनने की शपथ ले रहा है। आज से लगभग 10 साल बाद वह बच्चा जब पुलिस में भर्ती होने लायक होगा तब तक पुलिस कांस्टेबल के पद पर भर्ती होने की घूस कितनी होगी, यह कड़वा सच वह बच्चा नहीं जानता पर चैनल वाले जानते हैं लेकिन बताते नहीं क्योंकि सच बताने से उनकी नक्सलवाद विरोधी मुहिम की पोल खुल सकती है ।
न्यूज चैनलों के खबरनवीस और मालिक लोग चूंकि चिदंबरम के भारत के गणमान्य नागरिक हैं इसलिए ऐसे समय में जब पूरा देश मंहगाई और आर्थिक असुरक्षा से त्राहिमाम कर रहा है तब वे नक्सलवाद से परेशान हैं । हम सबको याद है कि नक्सलवाद के खिलाफ चैनलों के दुलारे चिदंबरम दरअसल इस देश और पाश्चत्य दुनिया में उदारीकरण के पोस्टर ब्वाय रहे हैं । वह भारतीय भद्रलोक के सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली प्रतिनिधियों में से एक हैं । अपने लोकसभा क्षेत्र में चमत्कारिक ढंग से हारते - हारते बचे चिदंबरम के नक्सलवाद विरोधी अभियान के गहरे अर्थ हैं । एक तो यह है कि यूपीए सरकार महंगाई के मोर्चे पर बुरी तरह विफल हुई है । समूचा मध्यवर्ग मंहगाई की मार से त्राहिमाम कर रहा है और केंद्र सरकार और राज्य सरकारें जमाखोरों और मुनाफाखोरों के आगे नतमस्तक हैं । आम लोगों में नौकरियां जाने और मंहगाई की दोहरी मार से गुस्सा है । यह गुस्सा लोगों को नक्सलवाद की ओर धकेल सकता है इससे चिदंबरम और उनका प्रभुवर्ग डरा हुआ है । नक्सलवादियों को तालिबानी टाइप के आतंकवादी के रुप में प्रचारित करने से उनके प्रति आम लोगों के झुकाव को रोका जा सकता है । तीसरा कारण यह है कि मध्यवर्ग आम तौर पर भावुक किस्म का देशभक्त होता है जिसके लिए देशभक्ति सीमा पर लड़ने और आतंकवाद के खिलाफ झंडा बुलंद करने तक सीमित होती है । नक्सलवाद के प्रति मध्यवर्ग के एक छोटे से हिस्से की सहानुभूति रही है । इसमें गांधीवादी, समाजवादी और विभिन्न आदर्शवादी विचारों से जुड़े वे लोग शामिल हैं जो देश के वंचित तबकों के मौजूदा हालातों में बुनियादी बदलाव लाने का सपना देखते हैं । मध्यवर्ग का यही हिस्सा है जो आदिवासियों और गरीबों के साथ पुलिस-प्रशासन,सरकार की ज्यादतियों को एक्सपोज कर देता है। इसलिए भी चिदबंरम चाहते हैं कि मध्यवर्ग में नक्सलियों की छवि देशद्रोही के रुप में स्थापित की जाय। ताकि इस वर्ग में नक्सलियों से सहानुभूति रखने वाले सीमित रहें। यह इसलिए है कि भारत का भद्रलोक देश में विशाल मध्यवर्ग के उभार से चिंतित भी है। उसके लिए यह वर्ग तभी तक प्रिय है जब तक वह उसके उत्पादों को खरीदता रहता है लेकिन यह वर्ग जैसे ही विचारधारा और बुनियादी बदलाव की बात पर आता है तो भद्रलोक चौकन्ना हो जाता है । उसे अपनी रोजी-रोटी कि चक्कर में घनचक्कर बना विचारहीन मध्यवर्ग तो चाहिए लेकिन समाज के मौजूदा ढ़ांचे को सर के बल खड़ा करने वाला सरफिरे(!) विचार के साथ नहीं।
एक और कारण है जिसके चलते माओवादी चिदंबरम और उनके भारत को सबसे ज्यादा चुभ रहे हैं । भारत के झारखंड , छत्तीसगढ़ और उड़ीसा जैसे राज्यों के आदिवासी इलाके संयोग से खनिज संपदा के खजाने भी हैं । इन इलाकों पर सदियों से बाहरी लुटेरों की नजर रही है। इस दौड़ में मल्टीनेशनल कंपनियां भी शामिल हैं । इन इलाकों में माओवादियों के वर्चस्व के चलते सरकार चाहकर भी इन कंपनियों को जमीन से लेकर सुरक्षा तक जरुरी सुविधायें नहीं उपलब्ध करा पा रही है। हाल ही में स्टील किंग लक्ष्मी निवास मित्तल द्वारा फैक्टरी न लगाने की धमकी को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए । यदि आदिवासी इलाकों को मल्टीनेशनल की चारागाह के रुप में विकसित किया जाना है तब आदिवासी प्रतिरोध को जड़मूल नष्ट करना चिदंबरम के भारत की जरुरत है। यह भारत दरअसल कई खतरों से दो चार है। मजदूर आक्रामक हो रहे हैं और वे उद्योगों के आला अफसरों पर हमला कर रहे हैं । शहरी भारत गरीबी के महासागर से घिरा है । आर्थिक विषमता भयावह रुप से बढ़ रही है जिसके परिणामस्वरुप आम जीवन में हिंसा बढ़ रही है। मामूली विवाद भी हिंसक रुप ले रहे हैं । यह फुटकर और निजी किस्म हिंसा है जो कि सरकारी आर्थिक नीतियों की अप्रत्यक्ष हिंसा का काउंटर प्रोडक्ट है। यह सब उस भारत को संकटग्रस्त कर रहा है जो आर्थिक कुंठाओं की सुनामी के बीच एक टापू बनकर रह गया है ।
इसीलिए कारपोरेट न्यूज चैनलों से लेकर चिदंबरम तक इलीट भारत नक्सलवाद का ऐसा हौवा खड़ा कर रहा है जिससे भारत की एक फीसदी जनता भी प्रभावित नहीं है और जिससे भारत के दो प्रतिशत समृद्ध आबादी के अलावा किसी को खतरा नहीं है। जब जनता के नाम पर नक्सलियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो सकती है तो चिदंबरम और राज्यों की पुलिस कालाबाजारियों व जमाखोरों के खिलाफ उतना सख्त रुख क्यों नहीं अपनाती । जबकि ये लोग देशद्रोही और जनता के दुश्मन नं0 1 हैं । क्या हम ऐसे अभिजात्य लोकतंत्र में रह रहे हैं जिसमें देश के सर्वशक्तिमान दो प्रतिशत हिस्से के दुश्मनों के खिलाफ तो कार्रवाई होती है पर 98 फीसदी लोगों के शत्रुओं को जनद्रोह करने की आजादी है।
माओवादियों की हिंसा पर अनेक सवाल उठाए जा सकते हैं और उठाए जाते रहेंगे । शायद माओवादियों को भी भविष्य में इस सवाल से जूझना पड़े । जैसा विषम और अन्यायपूर्ण भारत मनमोहन, चिदंबरम और उनका प्रभुवर्ग बना रहा है उसमें हिंसक टकराव होते रहेंगे। सेना को नक्सलियों के मैदान में उतारने से सेना की छवि को तो नुकसान होगा ही साथ ही यह कदम आने वाले 25-30 सालों में गृहयुद्ध की पटकथा भी लिख देगा । चिदंबरम भारत को सीमित नागरिक आजादी वाला पुलिस राज्य बनाने की ओर चल पड़े हैं । पहला हमला आदिवासियों पर हो रहा है । यदि यह कामयाब रहा तो आदिवासी तीरकमान के साथ फिर कभी लड़ते नहीं दिखाई देंगे । चिदंबरम के भारत का आदिवासी उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के मंच पर तीर कमान थामे तो दिखेगा पर बस्तर से लेकर संथाल और अबूझमाड़ की अपनी धरती पर हक के लिए तीर कमान के साथ नहीं बल्कि मजदूर के रुप में मल्टीनेशनल कंपनियों के अफसरों के सामने घुटने टेके दिखेगा । यदि यह हमारे सपनों का भारत है तो पाश के शब्दों को दोहराते हुए कहना चाहूंगा कि इस देश से मेरा नाम काट दो ।


सोमवार, 21 सितंबर 2009

रिपोर्ताज ‘रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून’

मानव के आदिम इतिहास में महाद्वीपों के इस छोर से उस छोर को नंगे पैरों से नापने वाले कितने काफिलों, कितने लश्करों अपने डेरे पानी से लबालब नदियों किनारे डाले तो फिर हिले नहीं । दुनिया की महान सभ्यतायें इन नदियों के पानी में स्नान कर या वजू कर खुद को धन्य मानती रहीं । इन आदिम काफिलों में से अनेक जब एंडीज, आल्प्स से लेकर हिंदूकुश और हिमालय के पहाड़ों से गुजरे तो उनके कदम वहीं थम गए और पहाड़ी झरनों और चश्मों के करीब उन्होने अपनी बस्तियां बसा डालीं । वे कबीले थे और आदिम भी मगर हजारों साल पहले वे मानव अस्तित्व का मूलमंत्र जानते थे । उन्हे पता था कि जहां पानी है , जीवन भी वहीं है । पानी के करीब, पानी की सरपरस्ती में सभ्यतायें सरसब्ज होकर फलती - फूलती रहीं । उन्होने नदियों की शान में जटिल काव्यमय ऋचायें, मंत्र रचकर उनके प्रति अपनी कृतज्ञता भी जताई । नदियां बची रहें , पानी न सूखे इसलिए वे नदियों और पानी को पवित्र घोषित कर गए । सफर आगे बढ़ा तो पनघटों में गीत गूंजने लगे । प्यार की कितनी ही कहानियों ने पानी भरने के दौरान अंगड़ाईयां लीं ,पनघटों की शीतलता के बीच ये कहानियां जवान भी होती रही होंगी । वे किस्से फिर गीत बनकर अगली पीढ़ियों को कभी दर्द से भिगोती रहीं तो कभी रोमांस के रोमांच से गुदगुदाती रहीं । तब पनघट पर मीठी ठिठोलियां या छेड़खानियां हुआ करती थीं ।इसी माहौल पर जब ‘‘मोहे पनघट पे नंदलाल छेड़ गयो रे’’ जैसे गीत आया तो पनघट जैसे और भी रुमानी हो गए ।
लेकिन सभ्यता का सफर अब नाजुक मुकाम पर पहुंच गया है । पानी को लेकर जो रुमानी संसार 19 वीं और 20 वीं सदी में रचा गया था वह खंड-खंड होकर बिखर गया है । गीतों की गूंज के बदले गालियों का शोर है । पानी भरने के दौरान प्यार श् नहीं झगड़े हो रहे हैं । पहाड़ ऊपर से चाहे कितने सख्त और रुखे क्यों न लगते रहे हों लेकिन सबसे ज्यादा पानी उन्ही के पास रहा है । यहां तक कि वे नंग-धड़ंग काले कलूटे पहाड़ भी,जो अपनी छाती पर पेड़ तो दूर नाजुक-नरम घास को भी जड़ें जमाने की इजाजत नहीं देते, उनके भीतर भी पानी के असंख्य सोते छलछलाते रहे हैं । हजारों-हजार झरनों,चश्मों के संगीत से गंूजने वाला गंगा और यमुना का यह मायका भी जल अभाव से होने वाले कलह से अछूता नहीं रहा । पहाड़ी समाज को आम तौर पर लड़ाई-झगड़े से दूर रहने वाला और शांतिप्रिय माना जाता रहा है, पर पानी के संकट से इसका मिजाज बदल रहा है । संयम टूट रहा है , लोग चिड़चिड़े और परले दर्जे के स्वार्थी होते जा रहे हैं । वहां भी पानी को लेकर सर फूट रहे हैं । गाली-गलौच के बीच लगता ही नहीं कि आप उस पहाड़ में हैं जिसके लोगों की भलमनसाहत का कायल सात संमदर पार से आया अंग्रेज एटकिंशन भी रहा,जिसने 19 वीं सदी में लिखे अपने ‘‘एटकिशन गजेटियर’’ यहां के लोगों की सज्जनता की शान में कसीदे पढ़े थे ।
लगभग 170 साल की लंबी यात्रा में पौड़ी के लिए यह पहला मौका है जब उसे एक-एक बूंद पानी के लिए तरसना पड़ा। यह सचमुच एक कठोर और कठिन साल रहा जब पौड़ी के लोगों को पानी के लिए रतजगा करना पड़ा । बात यहीं तक होती तो गनीमत थी । पानी के लिए वहां झगड़े भी हुए,सर भी फूटे । लोगों का गुस्सा आपस में भी फूटा तो प्रशासन पर भी । नगर पालिका के चेयरमैन से लेकर पानी बांटने वाले विभाग के अफसर तक पिटे ।
बद्रीनाथ के रास्ते पर एक कस्बा है गौचर । 19 वीं सदी के उत्तरार्ध में दो-चार घरों की इस चट्टी में बद्रीनाथ के यात्री अपनी थकान उतारते थे । 25-30 साल पहले भी यह छोटी सी बस्ती हुआ करती थी । दूर-दूर तक फैले समतल खेत इसे सुंदर भी बनाते हैं और बसने के लिए एक माकूल जगह भी । इसलिए हाल के वर्शों में गौचर में आबादी बढ़ी और पानी की खपत भी बढ़ी पर पुराने सोते एक-एक कर सूखते रहे । अब हर गर्मियों में पानी के लिए जूझना, भिड़ना गौचर के जीवन का हिस्सा बन चुका है । लेकिन ये गर्मियां गौचर पर भी भारी गुजरीं । पानी को लेकर यह तस्वीर सिर्फ इन दो कस्बों की नहीं है । राज्य के दो दर्जन से ज्यादा कस्बों में पानी को ले कर हाहाकार मचा । पानी को लेकर सर फुटव्वल, लड़ाई, झगड़े धरना,प्रदर्शन और अफसरों का घेराव जैसे वाकये आम होते जा रहे हैं । पर तस्वीर इससे ज्यादा भयावह और चिंताजनक है । उत्तराखंड की एक तिहाई बस्तियां जल संकट से ग्रस्त हैं । हजार से ज्यादा गांवों में पानी बिल्कुल सूख गया है । लगभग सात हजार गांव ऐसे हैं जिनमें जल श्रोतों का प्रवाह आधे से लेकर 70 फीसदी तक कम हो गया है । राज्य में ऐसा कोई गांव नहीं है जिसमें पानी के श्रोत में पानी कम न हुआ हो । अपने वेग और गर्जना से डराने वाली भागीरथी इतनी दुबली-पतली हो गई है कि उसे देखकर तरस आता है कि आदमी ने एक भरी-पूरी नदी की क्या गत बना दी है । यही हाल अलकनंदा जैसी पानी से लबालब धीर गंभीर नदी का भी है भागीरथी में पानी कम होने से दस हजार करोड रुपए़ की लागत और एक लाख की आबादी को उजाड़ कर बना टिहरी बांध तीन सालों में ही दम तोड़ने लगा है । वनों से पोषित नदियां ही नहीं बल्कि ग्लेसियरों से पैदा होने वाली नदियों में भी पानी तेजी से घट रहा है । पनबिजली परियोजनाओं के बूते अपनी अर्थव्यवस्था को बेहतर करने का सपना खतरे में है ।
यदि पानी के श्रोतों के सूखने की रफ्तार यही रही तो भी अगले दस वर्षों में पहाड़ के अस्सी फीसदी गांवों में पानी के लिए त्राहि-त्राहि मची होगी लेकिन इन सुदूर गांवों में पानी पहुंचाने में सरकार के पसीने छूट जायेंगे । प्रदेश में पानी को लेकर दंगों के हालात बन जायेंगे । एक ओर शहरी आबादी के लिए पेयजल योजनायें बनाने में सरकार को अपने अधिकतम संसाधन झोंकने होंगे । नदियों का पानी चिंताजनक रुप से कम हो जायेगा । वन पोषित अधिकांश नदियां या तो सूख चुकी होंगी ।

सन््् 1970 के बाद समय बदलने लगा था । जो प्रकृति हिमालय के इन पहाड़ों पर मेहरबान थी,हमारे लालचों और लुटेरे मानव गिरोहों की हरकतों के चलते वह रूठने लगी थी । हर समय छलछलाते रहने वाली जलधारायें चुपके-चुपके दम तोड़ रही थीं । सदियों से हमारी प्यास के ये साथी बीमार थे और इस कारण कमजोर होते जा रहे थे । लेकिन हम कभी समझ ही नहीं पाए कि हमारा सबसे करीबी दोस्त और पहाड़ की जीवनरेखा बीमार है । हम एक सोते के सूख जाने पर दूसरे श्रोत तक जाते रहे । लेकिन पहले वाला क्यों रुठकर गायब हो गया ,यह हमें कभी पता भी नही चला । सातवें-आठवें दशक तक पानी गांव से दूर भागने लगा था । गांव से दूर होते इस पाणी को लेकर बहुओं का दुख अब लोकगीतों में बोलने लगा था । मुझे अपने बचपन का वह समय याद आता है जब माॅं पानी लेकर लौटती थी तो उसके चेहरे पर थकान साफ-साफ बोल रही होती थी । निरंतर दूर होते जा रहे पानी के कारण ही बरसात होने पर वह पतनालों के नीचे बड़े बर्तन रख देती थी । इनके भर जाने के बाद पतीलियां,लोटे भी लगे हाथ भर लिए जाते थे । इन बर्तनों में गिरती बारिश की बंूदों का भी एक संगीत होता था । हर बर्तन का अपना खास संगीत ! खाली बरतन पर गिरती बंूदों का संगीत अधभरे बर्तन से अलग होता था । ज्यांे-ज्यों बर्तन भरता जाता था वह गुरु गंभीर आवाज में गूंजने लगता था । बर्तन आकंठ भर कर पानी अब बाहर बहने लगा है ,इसका पता भी बारिश का यही संगीत देता था । हम नींद में भी इस संगीत का मजा लेते थे , वे बरसातें और उनका वह संगीत आज भी स्मृतियों में गूंजता है । बूंदों की भाषा में खाली और भरे बर्तन का फर्क बताने वाला वह संगीत बेहद याद आता है ।
पहले पानी के श्रोत गायब हुए पर अब ऐसा वक्त आ गया है कि हैंडपंप भी संकट में हैं। पानी की तलाश में उन्हे हर साल धरती की कोख में और गहरे धंसना पड़ रहा है । बावजूद इसके एक-दो साल में ही उनका गला भी सूखने लगता है और देखते ही देखते वे दम तोड़ देते हैं । पहाड़ों पर सैकड़ों हैंडपंपों के अस्थिकलश बता रहे हैं कि कभी यहां भी पानी था ।
प्रख्यात कवि,कथाकार रसूल हमजातोव के ‘‘मेरा दागिस्तान’’ के एक किस्से में झुकी हुई कमर और झुर्रीदार चेहरे वाली एक बुढ़िया है जो पानी की उम्मीद में हर रोज फावड़े से जमीन खोदती है । हर सुबह वह उम्मीद से खोदना शुरु करती है और हर तलाश के बाद निराश कदमों से लौटती है । रसूल के किस्सों की वह बुढ़िया कहीं मेरा पहाड़ तो नहीं जो पानी खोज रहा है और उसे पानी का श्रोत ढंूढे नहीं मिल रहा ! गढ़वाल की लोककथाओं में प्यास से बेचैन एक चिड़िया का जिक्र आता है जो कातर स्वर में आसमान से पानी मांगती रहती है । गरमियों की उदास दोपहर में इस चिड़िया के स्वर की कातरता विचलित करती है । आने वाले सालों में क्या पूरा पहाड़ इस चिड़िया में बदलने वाला है, कौन जानता है ? रहीम बहुत पहले चेता गए थे कि बिना पानी के सब सूना है । हम इन पंक्तियों की संदर्भ सहित व्याख्या करने और विद्वान उन पर पोथी लिखने में लगे रह गए और उधर पानी सिधार गया ।
सभ्यता की इस यात्रा में हमने बहुत कुछ ऐसा खोया जो हमारे वजूद के लिए जरुरी थे । इनमें अधिकांश प्राकृतिक रुप से हमारे मित्र और करीबी रिश्तेदार भी थे । पेड़-पौधे, पशुू-पक्षी और बर्फ जैसी असंख्य नेमतें हमसे रुठ रही हैं । हर साल बर्फ आती और धरती की सारी खुश्की को अपने आॅंचल में समेट लेती । झक सफेद बालों वाली यह बर्फ किसी बुजुर्ग की तरह कभी नरम तो कभी सख्त रुप में पेश आती पर महीनों तक खेत,खलिहान और आॅंगन को अपने स्नेह से भिगोती रहती थी । लाख हटाने के बाद भी जीम रहती थी । अब वही बर्फ मेहमानों की तरह फिल्मी नायिकाओं के नाज-नखरों के साथ आती है और सरकारी कर्मचारियों के अंदाज में ड्यूटी बजा कर गायब हो जाती है । हमने हिरन के करीबी बंधु-बांधवों घुरड़,काखड़ जैसे मासूम जानवरों से उनके जंगल छीन लिए । रंग-बिरंगी नाजुक चिड़ियाओं से उनके गीत गाने की वजह छीन ली । अपने सबसे करीबी बुजुर्गों पीपल, बरगद और नीम को हमने आऊट डेटेड घोषित कर उन्हे दरवाजा दिखा दिया । शीतल हवा और बर्फ सा ठंडा पानी देने वाले बांज जैसे सबसे अनमोल मित्र को हमने अच्छी क्वालिटी के कोयले के लिए लालच की भट्टी में झोंक दिया । जिन दुर्लभ और अनमोल प्रजातियों की रचना करने में प्रकृति ने हजारों-हजार साल खपा दिए उन्हे मिटाने में हमने एक सदी भी नहीं लगाई । हमारी इन निर्ममताओं और आत्मघाती हरकतों पर कुदरत भला क्यों खफा न हो । उसके दंड कीशुरुआत हवा और पानी से हो चुकी है ।

गुरुवार, 14 मई 2009

'लौट आए हैं 18वीं सदी के पिंडारी गिरोह'


इतिहास के प्रतीक अक्सर राजनीति में आकर हमें बताते रहते हैं कि समय की सदियों लंबी यात्रा में पात्र बदलते हैं, उनके चेहरे बदलते हैं, भाषाएं बदलती हैं, वेशभूषाएं बदलती हैं लेकिन सत्ता की अंतर्वस्तु नहीं बदलती है। यानी सत्ता की बुनियादी चीजें वही रहती हैं। परंतु राजनीति की विडंबना यह नहीं है कि उसमें इतिहास के पात्र या प्रतीक खुद को दोहराते हैं बल्कि हमारे समय की राजनीति की त्रासदी यह है कि उसके नायक इतिहास के अंधेरे कालखंडों के खलनायकों से अद्भुत समानता रखते हैं। ऐसे में यदि 18वीं सदी में मध्य भारत को थर्रा देने वाले पिंडारी ठगों के गिरोह इतिहास की किताबों में आराम करने के बजाय चुनाव में परगट होते लग रहे हैं तो इसका श्रेय लेखकीय कल्पनाओं के बजाय हमारे नेताओं को दिया जाना चाहिए क्योंकि उन्हीं के पुरूषार्थ से हम लोग इतिहास में दफन उन क्रूर पात्रों से रूबरू हो पा रहे हैं।
15वीं लोकसभा के चुनावों पर बात की शुरूआत इतिहास के सबसे खूंखार और कुख्यात ठग गिरोह से करना अजीब जरूर लग सकता है परंतु यह जिक्र अप्रासंगिक तो कतई नही है, यही भारतीय लोकतंत्र और राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना है। खूंखार ठग 18वीं सदी के दौरान उस समय अस्तित्व में आए जब मुगल साम्राज्य जमीन पर खत्म हो चुका था, उसकी सत्ता अपने कारिंदों और चापलूस दरबारियों तक सिमट कर रह गई थी। यह वह समय था जब ईस्ट इंडिया कंपनी के कंपनी बहादुर भारत में दाखिल हो कर इस देश पर काबिज होने की कोशिशों में जुट गए थे। लुंज पुंज केंद्रीय सत्ता के चलते पिंडारी गिरोहों की बर्बरता चरम पर थी।
यदि 18वीं सदी के पूर्वाद्ध के उस दौर और वर्तमान भारत की तुलना की जाए तो हमें कई आश्चर्यजनक समानताएं दिखाई देती हैं। अंबानियों, टाटा, मित्तलों जैसे कंपनी बहादुरों पर मुग्ध लोगों को यह तुलना नागवार गुजर सकती है, लेकिन 18वीं और २१ सदी के भारत में बहुत अंतर नहीं आया है। तब भी भारत की केंद्रीय सत्ता जर्जर हो चुकी थी आज भी केंद्रीय सत्ता जर्जर है। अंतर बस इतना है कि तब केंद्रीय सत्ता का प्रशासनिक और सैन्य वर्चस्व के साथ राजनीतिक व नैतिक बल भी लगभग खत्म हो चुका था तो वर्तमान में भारतीय केंद्रीय सत्ता की कार्यपालिका और न्यायपालिका तो कायम है परंतु उसका राजनीतिक व नैतिक वर्चस्व खत्म हो चुका है। एक भी दल या नेता ऐसा नहीं है जिसका नेतृत्व स्वीकार करने को देश की बहुसंख्य जनता तैयार हो। इसी जर्जर नेतृत्व का नतीजा है कि भारत की केंद्रीय सत्ता के भाग्य का फैसला तम भी क्षत्रप कर रहे थे अब भी क्षत्रप कर रहे हैं। गरीब भारत के प्रति जो उपेक्षा तब था वही आज भी है। जर्जर नेतृत्व का फायदा उठाकर तब भी कंपनी बहादुर भारत की आर्थिक एवं राजनीतिक सत्ता पर काबिज होने को मैदान में उतर चुके थे आज के कंपनी बहादुर भी इसी अभियान में जुटे हैं। अंतर बस इतना है कि तब सिर्फ एक ईस्ट इंडिया कंपनी थी आज कई देशी और विदेशी कंपनियां भारतीय अर्थव्यवस्था और राजनीति पर काबिज हो रही हैं। यदि शासकों और शासितों के बीच की खाई तीन सदी बाद भी लगभग वही है तो इसे भारतीय लोकतंत्र और राजनीति की दरिद्रता न कहें तो क्या कहें?
अब 18वीं सदी के पिंडारियों के किस्से पर लौटें। पिंडारी कुख्यात ठग थे, जो भोले-भाले लोगों को लूटते और निर्ममतापूर्वक उनकी हत्या कर देते थे। 15वीं लोकसभा के चुनाव में जिन दलों व एलायंसों को पूरा देश देख रहा था वे पिंडारी ठगों की यादें ताजा कर रहे हैँ। इतिहास का यही एकमात्र ऐसा प्रतीक है जो देश में चल रही क्रूर राजनीतिक ठगी को पूरे तीखेपन के साथ बयान करता है। इसी पिंडारीपन की बानगी देखिए। जो नीतिश कुमार बिहार में मतदान से पहले नरेंद्र मोदी के खिलाफ ऐसे तेवर दिखा रहे थे मानो एनडीए में मोदी मार्का सांप्रदायिकता के खिलाफ वही अकेले सेकुलर योद्धा हों। उन्होंने बाकायदा ऐलान भी किया कि वह मोदी के साथ मंच साझा नहीं करेंगे। बिहार के मुस्लिम वोट बिदक न जाएं इसलिए नीतिश ने मोदी को बिहार में घुसने तक नहीं दिया। चुनाव प्रचार के मोर्चे पर दिग्विजय को निकलने भाजपा के सबसे बड़े स्टार प्रचारक मोदी को मन मसोस कर रहना पड़ा। लेकिन जैसे ही बिहार का चुनाव निपटा, नीतिश न केवल मोदी के बगलगीर हुए बल्कि दोनों ने एक-दूसरे का हाथ थामकर हवा में लहराया मानो मतदाताओं को चुनौती दे रहे हों। अब जिन मुस्लिमों या सेकुलर किस्म के मतदाताओं ने नीतिश के मोदी विरोधी तेवरों के झांसे में आकर उनकी पार्टी को वोट डाला होगा उन वोटरों के साथ की गई यह राजनीतिक ठगी क्या पिंडारियों की याद नहीं दिलाती! एक और बानगी अपने लालबुझक्कड़ वामपंथी साथियों की है। खुद को कांग्रेस-भाजपा का विकल्प बताने वाले कामरेड करात और वर्धन ने टीआरएस के साथ गठबंधन कर उस पर सेकुलर और प्रगतिशील होने का जो तमगा लगाया उस मैडल को उसने आंध्र प्रदेश में चुनाव निपटते ही एनडीए की रैली के दौरान मोदी और आडवाणी के चरणों में अर्पित कर दिया। पूरे देश ने देखा कि किस तरह कामरेड करात द्वारा प्रमाणित 'सेकूलर योद्धा' चंद्रशेखर राव ने दो-दो हिंदू हृदय सम्राटों के चरणों में गोता लगाकर वाम स्पर्श के दोष से मुक्ति पा ली। जो वोट वामपंथियों को मजबूत करने के लिए डाला गया था वह 'भगवा ब्रिगेडों' को सत्ता में लाने के काम आ रहा है। इन चुनावों में नास्तिक संसदीय कम्युनिस्टों की दो अराध्य देवियां रही हैं। एक उत्तर में मायावती और दूसरी सुदूर दक्षिण में जयललिता। कामरेडों की ये कुलदेवियां चुनाव के बाद किसे 'सत्तारूढ़ भव:' का वरदान देती हैं, यह करात और वर्धन जैसे सांसारिक प्राणी तो क्या दैव भी नहीं जानते। यदि तीसरे मोर्चे के घटकों की अवसरवादिता के कारण केंद्र में भगवा ब्रिगेडों की सरकार बन जाती है तो यह क्या उन वोटरों के साथ विश्वासघात नहीं होगा जिन्होंने वामपंथियों के कारण टीआरएस, बसपा, जयललिता, टीडीपी जैसे दलों को वोट दिया।
तीसरी बानगी कांग्रेस की है जो चुनाव में ममता बनर्जी के साथ मिलकर कम्युनिस्ट विरोधी वोट हड़पती है परंतु चुनाव के बाद उन्हीं वामपंथियों से हाथ मिलाने को तैयार बैठी है। यह क्या पश्चिम बंगाल और केरल के उन वोटरों के साथ ठगी नहीं है जिन्होंने कम्युनिस्ट विरोध के चलते कांग्रेस को वोट दिया। जाहिर है कि इस चुनावी समर में जो दल हैं वे दरअसल 18वीं सदी के पिंडारी गिरोहों का पुनर्जन्म है। इस चुनावी संग्राम में दक्षिण से लेकर ठेठ वाम तक जो योद्धा हैं उनके भीतर लार्ड विलियम बैंटिक के हाथों मारे गए पिंडारी सरदारों की अतृप्त आत्माएं जब-तब दिखाई देती हैं। हां, इतना अवश्य कहा जा सकता है कि वे आत्माएं 18वीं सदी के क्रूड फार्म में नहीं हैं उनके जेनेटिक कोड को 21वीं सदी के हिसाब से संशोधित व परिवर्द्धित कर दिया गया है।
कम वोटिंग को लेकर शाहरूख, आमिर समेत कई सेलेब्रिटीज इस बार खासी परेशान नजर आईं। न्यूज चैनलों ने उन्हें धर दबोचा और 'वोट दो- वोट दो' की दिहाड़ी पर लगा दिया। एनडीटीवी समेत कई न्यूज चैनलों द्वारा किए गए इस धुआंधार प्रचार से कई बार ऐसा लगा कि यदि इस बार वोट न दिया तो आने वाली केंद्र सरकार के गलत फैसलों के लिए अपन को दोषी ठहराया जा सकता हैपर जब पहले चरण में मतदान प्रतिशत लुढ़क गया तो अपनी जान में जान आई कि वोट न देने की हिमाकत करने वाले अपन कोई अकेले नहीं हैं।परंतु एनडीटीवी और अन्य न्यूज चैनलों को जब खुद ही यह पता नहीं है कि वे जिन दलों, प्रत्याशियों को ज्यादा वोटिंग का लाभ मिलने वाला है वे कहां जाएंगे, किसकी सरकार बनाएंगे, ऐसे राजनीतिक ठगों को वोट देने के लिए प्रेरित करने का क्या फायदा? बेहतर होता यदि ये चैनल जनता को प्रत्याशी खारिज करने और जनप्रतिनिधि वापस बुलाने का अधिकार दिए जाने की मुहिम छेड़ते। यह एक ऐसा रास्ता हो सकता है जो लोगों को इन उन्नत नस्ल के पिंडारी गिरोहों से मुक्ति दिलाए।

मंगलवार, 5 मई 2009

धधकता हिमालय और फारेस्ट के नीरो


हिमालय के जंगल धधक रहे हैं और उत्तराखंड के प्रमुख वन संरक्षक आरबीएस रावत को फुर्सत नहीं है। वह सुबह से शाम तक जंगल की आग पर आए दिन राजधानी में होने वाली बैठकों में व्यस्त हैं। जंगल की आग से लड़ते हुए सात लोगों की मौत और १५ लोगों के घायल होने के बाद चैन की बांसुरी बजा रहे वन विभाग के नीरों हरकत में आ गए हैं। वन विभाग की सक्रियता उम्मीद नहीं जगाती बल्कि निराश करती है। ग्रामीणों की मौत पर होने वाले विलाप के स्वर जैसे धीमे पडेंगे फारेस्ट डिपार्टमेंट में फिर चैन की बांसुरी बजने लगेगी। एक के बाद एक हिमालय जंगल स्वाह हो रहे हैं पर सरकार बैठक दर बैठक कर जंगल की आग पर काबू पा लेना चाहती है। राजधानी में वन विभाग के आला अफसर कागजों का पेट आंकड़ों से भर रहे हैं। सचिव से लेकर प्रमुख वन संरक्षक और क्षेत्रीय वन संरक्षकों तक के दफ्तरों में कंप्यूटर और फैक्स बिजी हो गए हैं। इधर जंगल में आग लगी हुई है उधर प्रदेश में आइएएस और आइएफएस सेवाओं के सबसे ज्यादा योग्य और प्रतिभावान बाबू एक के बाद एक रिपोर्ट तलब कर रहे हैं। ग्रामीणों की मौत से सहमी सरकार ने दस करोड़ रुपये की मदद की मांग कर जंगल की आग को केंद्र सरकार के पाले में सरका दिया है।
ऐसा नहीं है कि हिमालय के जंगलों में इसी वर्ष आग लगी हो लेकिन इस वर्ष अप्रैल के अंतिम व मई के प्रथम हफ्ते में लगी भीषण दावाग्नि में सात ग्रामीणों के जलने की घटना के बाद हर साल बढ़ रही आग की घटनाओं को एकाएक फोकस में ला दिया है। वन विभाग में व्याप्त लापरवाही की हद यह है कि जंगल में भीषण आग की चपेट में एक गांव के आने की भनक भी वन विभाग के कारिंदों को नहीं लगी। सिर्फ हरी टहनियों के बूते जंगल की भयावह आग से जूझने वाले ये ग्रामीण इस जंग में अकेले थे। पर्यावरण और वन प्रबंधन के नाम पर हर साल करोड़ों रुपए हजम करने वाला फारेस्ट का अमला मोर्चे से गायब था।

हिमालय के जंगलों की यह त्रासदी है कि जैसे-जैसे वन विभाग के अमले पर खर्च बढ़ता गया वैसे-वैसे ही आग से प्रभावित वन क्षेत्र भी बढ़ता रहा है। सन 2000-2001 में आग की चपेट में आने वाला वन क्षेत्र सिर्फ 925 हैक्टेयर था। राज्य बनने के इन नौ वर्षों में वन विभाग में प्रमुख वन संरक्षक रैंक के 14, वन संरक्षक रैंक के 27 और प्रभागीय वनाधिकारी स्तर के 87 अधिकारी तैनात हैं। विडंबना यह है कि जिन जंगलों की देखभाल के लिए अफसरों का यह भारी-भरकम अमला बनाया गया उन जंगलों में से 23000 हैक्टेयर जंगल इन नौ वर्षों में स्वाह हो गए। सन 2000-2001 के मुकाबले आग से प्रभावित होने वाला वन क्षेत्र औसतन तीन गुने से पांच गुने तक बढ़ गया है। केवल 20006-07 और 08-09 में ही यह औसत कम रहा है तो यह वन विभाग का नहीं बल्कि अप्रैल, मई और जून में होने वाली वर्षा का कमाल है। इस वर्ष भी अभी तक 2800 हैक्टेयर जंगल स्वाह हो चुका है। जाहिर है कि अफसरों का भारी-भरकम अमला जंगलों को बचाने में विफल साबित हुआ है क्योंकि आग से लड़ने के लिए विभाग के पास न तो जमीनी स्टाफ है और न जरुरी तैयारी ही। अब जंगल की आग का मुकाबला करने के लिए मानदेय पर सीजनल मजदूर रखे जाते हैं जो फील्ड पर कम और कागजों पर ज्यादा होते हैं। जंगल की आग पर काबू पाने के लिए विश्व स्तर पर अपनाए जाने वाली नई तकनीक अपनाना तो दूर वन विभाग ने फायर लाइन और कंट्रोल बर्निंग ब्रिटिशकालीन तकनीक भी छोड़ दी है।जंगल की आग को एक हिस्से में सीमित करने वाली इन फायर लाइनों की देखभाल न होने से वहां भी जंगल ऊग आए हैं। फलतः आग की घटनाएं और प्रभावित क्षेत्रफल दोनों में भारी वृद्धि हो रही है।

जंगल की आग लगने की घटनाओं में हो रही वृद्धि के कई कारण हैं। मानव निर्मित कारणों में सबसे पहला कारण यह है कि जंगलों से सबसे करीब रहने वाले और उन पर आश्रित समाजों को सरकार और वन विभाग ने सुनियोजित रुप से वन प्रबंधन और स्वामित्व दोनों से बेदखल कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के 1994 गोडा वर्मन बनाम भारत सरकार मामले में दिए गए फैसले के बाद तो वनों के करीबी समाजों का वनों में पत्तियां बीनना तक अपराध हो गया। केंद्र और राज्य की सरकारें चाहती तो वनों पर आश्रित समाजों को वन प्रबंधन व स्वामित्व में भागीदार बना सकती थी। लेकिन वन विभाग खुद में इतने निहित स्वार्थों का गठबंधन बन चुका है कि वह जंगलों पर अपना एकाधिकार चाहता है। इससे स्थानीय लोगों का जंगलों के प्रति लगाव कम हुआ है और वे वनों की रक्षा के प्रति उदासीन हुए हैं। इसके बावजूद वे ही जंगल की आग का मुकाबला करने के लिए अग्रिम मोर्चे पर हैं। ग्रामीण भी बरसात में अच्छी घास पाने के लिए जंगलों में आग लगाते हैं, लेकिन यह अकेला कारण नहीं है। फर्जी वृक्षारोपण के सबूत मिटाने के लिए भी जंगल की आग का खेल खेला जाता है।

आग की घटनाओं के काबू से बाहर होने के लिए आदमी ही जिम्मेदार है। 19वीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में मिश्रित वनों के निर्मम सफाये के बाद वन विभाग ने चीड़ वनों के विस्तार की जो सुनियोजित मुहिम चलाई उसके चलते ही जंगल में आग अब हद से बाहर हो रही है। उत्तराखंड के जंगलों में चीड़ बडे भाई की तरह सबसे बड़े हिस्से पर काबिज है। वनों के व्यापारिक दोहन के १४० वर्ष के भीतर ही बांज-बुरांस के मिश्रित वन छोटे भाई की तरह कोने में सिमट जाने को मजबूर हो गए हैं। उत्तराखंड़ के ३९३०३६ हैक्टेयर में चीड़ का राज है। सेटेलाइट से प्राप्त चित्रों से जाहिर है कि आग उन्हीं इलाकों में अपना रोद्र रूप दिखा रही है जिनमें बड़े भाई चीड़ का राज है। यह इलाका ४ हजार से लेकर ६ हजार फीट तक फैला है। ऐसा चीड़ की सूखी पत्तियों के अति अधिक ज्वलनशील होने के कारण है। इसके अलावा चीड़ वनों में नमी का स्तर न्यूनतम होता है। नमी न होने से यह इलाका आग के प्रति ओर भी संवेदनशील हो जाता है। ग्लोबल वार्मिंग से पिछली एक सदी में तापमान में हुई बढ़ोत्तरी और अक्सर सूखा पड़ने से जंगल ज्यादा खुश्क हुए हैं तो चीड़ की पत्तियां तेजी से सूख रही हैं। पिछले ५० वर्षों में वनपोषित जलस्रोतों में से ५० फीसदी या तो सूख गए हैं या फिर उनके जल प्रवाह में ७० फीसदी तक की कमी आई है। इसने भी आग को हवा देने का काम किया है।
हिमालय के जंगल जिस तरह से धधक रहे हैं उससे अनिष्ट की आशंकाएं ही प्रबल हो रही हैं। आग से हिमालय के गर्म होने की प्रकिया तेज होगी जो ग्लेशियरों को गलाने की रफ्तार बढ़ा देगा। रहे-सहे वनपोषित जल स्रोत सूखेंगे और यह गंगा के मैदान के मरूस्थल में बदलने की शुरूआत होगी। आग से नष्ट मिश्रित वनों का स्थान चीड़ वन ले लेंगे और फिर जंगल की आग सुरसा के मुंह की तरह हिमालय के ऊपरी हिस्से तक पहुंच जाएगी। आने वाली पीढियां बांज-बुरांस के जंगलों को इंटरनेट की फोटो गैलरियों में ही देख सकेगी। हमारी मूर्खताओं का कुल गुणनफल प्रकृति के इन सबसे खूबसूरत जंगलों को लील लेगा। धधकते जंगल बता रहे हैं कि हिमालय संकट में है। जलते हुए पेड़ों की इस चेतावनी को गौर से सुना जाना चाहिए।

सोमवार, 27 अप्रैल 2009

बदल रही है युवा सपनों की तासीर

चकराता। बर्फ से ढ़के पहाड़ और हरे भरे जंगलों के ऐसे दृष्य कि आप अपनी सुध बुध खो बैठें। जिन्हें स्वर्ग बहुत लुभाता है, वे इसे स्वर्ग से सुंदर कह दें तो भी इंद्र की शान में गुस्ताखी नहीं होगी और न मेनका और रंभा जैसी वे अप्सरायें नाराज होंगी जो स्वर्ग को उसकी दिव्यता के बीच मानवीय बनाती हैं। कभी-कभी लगता है कि मैदान की गर्मियों से त्रस्त होकर ईश्वर ने चकराता के सुंदर पहाड़ बनाये होंगे। जौनसार का समाज कई मायनों में अनूठा है। गढ़वाल के पहाड़ी समाज से अलग इसका अपना खास रंग है। यह समाज सदियों से बाहरियों को लुभाता रहा है, और कहावतें बनती रही कि जो जौनसार गया वह फिर कभी लौटा नहीं। बाहर से देखने वालों के लिए वह आश्चर्य में लिपटा रहस्यमय लोक बना रहा। किस्से और दंतकथाएं रहस्य की इन परतों को और भी गहरा करती रही। आजादी की आधी सदी गुजर चुकी है लेकिन चकराता अभी भी विकास का ककहरा पढ़ रहा है। अलबत्ता उसके नेता भ्रष्टाचार की विधा में पारंगत हो गए हैं। अपने आप सिमटा, सकुचाया रहने वाला जौनसारी समाज भी बदलाव की अंगड़ाई ले रहा है। उसके भीतर मौजूद आत्मविश्वास अब बोलने लगा है। दरअसल जब सपने बदलते हैं तो समाज भी बदलते हैं। यह किस्सा सपने बदल जाने का ही है।
चकराता के पास एक छोटा सा गांव है। आम पहाड़ी गांव की तरह। करीने से लगे देवदार के जंगल, पहाड़ी ढ़लान पर छोटे-छोटे पर हरे-भरे खेत और सामने दिव्य हिमालय। सदियों से मौसम की विभीषिकाओं, आपदाओं की त्रासदियों के बीच निरे आम लोगों ने इस गांव को एक सुंदर भू-दृश्य में बदला है। उन्हीं आम-अनाम लोगों के श्रम की गंध से इस गांव के खेत और मकान आज भी महकते हैं।
हर गांव की तरह गांव के पास परंपराओं की अपनी बेडियां हैं। परंतु परंपराओं की जकड़न के बीच हर नई पीढ़ी अपने लिए आकांक्षाओं के नए आकाश चुनती है। परंपराओं की बेडियां ढ़ीली पड़ती हैं और मानव सभ्यता थोड़ा आगे सरक जाती है। इसी गांव की एक लड़की है नीलम चौहान। खास बात यह थी कि नीलम को सपना देखना भी आता था और उसके पास वह जिद भी थी जो सपनों को धरती पर उतारने के जरूरी होती है। नीलम का परिवार संयुक्त परिवार है, इतना बड़ा परिवार कि दिल्ली-मुम्बई के लोगों को यह परिवार नहीं बल्कि बारात जैसा लगे। ६० लोगों का परिवार। चकराता के इर्द-गिर्द के इलाके में दूसरा सबसे बड़ा परिवार है। जितना बड़ा परिवार, रिश्तों के धागे में उतने ही गहरा गुंथा हुआ। इतने बड़े परिवार को यदि एक रखना है तो जाहिर है कि परंपराओं और अनुशासन की सख्त चाबुक भी चाहिए होगी। कई पुरूषों और उनकी हां में हां मिलाने वाली महिला सदस्यों के इस भरे-पूरे परिवार में एक किशोर लड़की शादी के सिवा दूसरा सपना देखे भी तो कैसे? पर नीलम ने यह गुस्ताखी कर ही डाली। नीलम ने यदि डाक्टर, इंजीनीयर या टीचर वगैरह बनने का सपना देखा होता तो घर में तूफान न मचा होता, लेकिन परंपराओं में जकड़े समाज ने फैशन को कैरियर बनाना तो किसी कुफ्र से कम न था। सबसे मुश्किल यह थी कि इस लड़ाई में उसके सामने कोई पराये नहीं थे। जिनके खिलाफ उसे अपनी आवाज बुलंद करनी थी, वे सारे के सारे अपने ही थे। वही ताऊजी जिनकी उंगली पकड़ कर उसने चलना सीखा तो वही चाचा-चाचियां जिनके दुलार से राजकुमारी की तरह इतराती थी। यह कठिन परीक्षा थी परंतु घर के इस विरोध में उसके पिता और मां उसके साथ खड़े रहे। एक दिन पूरे गांव ने आश्चर्य के साथ देखा कि बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध की परंपरा में रह रहे समाज की एक लड़की मॉडलिंग के वर्जित क्षेत्र में चली गई। पूरा गांव जैसे डोल गया।
किसी को लगा कि उनका समाज जैसे तहस-नहस हो जाएगा। गांव की बूढ़ी औरतों के लिए यह घोर कलयुग के आने का शंखनाद था। अनर्थ की इन बूढ़ी आशंकाओं के बीच नीलम मिस दून चुनी गई तो उसके सपनों को जैसे पंख लग गए। यह उस सपने की भी जीत थी जो लालटेन की रौशनी में ठेठ पहाड़ी गांव में देखा गया था। इसके बाद नीलम ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और अक्सर होने वाले फैशन शोज में वह सबसे पसंदीदा चेहरा बन गई। आज नीलम एक प्रतिष्ठित एयरलाइंस में एयर होस्टेस है। वह जब गांव लौटती है हमउम्र और किशोर लड़कियां उसे आश्चर्य मिश्रित कौतुहल के साथ देखती हैं कि वह उन्हीं में से एक है क्या! आज उसके संयुक्त परिवार को नीलम पर नाज है। नीलम को देखकर उसके गांव और आसपड़ोस के गांव की लड़कियों की आंखों में सपने जगमगाने लगे हैं। सपने संक्रामक रोग की तरह होते हैं। वे लोगों की शिराओं में दौड़ते हैं, उन्हें भीतर ही भीतर बदल डालते है। दुनिया की हर क्रांति से पहले भी सपने ही शिराओं में दौड़ते हैं। फर्क फकत इतना ही है कि क्रांतियां गर्जना करती हैं, लेकिन समाजों के भीतर बदलाव बहुत धीमे, बेहद आहिस्ता-आहिस्ता होते हैं। बसंत की तरह दबे बदलाव समाज की शिराओं में दाखिल होता है और किसी दिन पूरे समाज का रंग-ढ़ंग बदल देता है जैसे बसंत पूरे जंगल को बदल देता है।
नीलम को मुग्ध भाव से देखने वाली ग्रामीण लड़कियों के भीतर भी ग्लैमर की दुनिया में जाने हसरतें हिलोरे ले रही हैं, लेकिन उन इच्छाओं पर वर्जनाओं के पहरे भी हैं। इन सबके बीच नीलम सिर्फ लड़की भर नहीं है। वह उत्तराखंड की लड़कियों की इच्छाओं का चेहरा है, जिनके सपनों का रंग बदल रहा है। पिछले दशकों का वह दौर अब पीछे छुटता जा रहा है जब लड़कियां बीटीसी और बीएड कर सरकारी स्कूलों में टीचर हो जाना चाहती थी। स्कूल में स्वेटर बुनती अध्यापिकाओं के चित्र लड़कियों के दिमाग में दर्ज रहते थे। मध्यवर्गीय और निम्न मध्यवर्गीय परिवारों की लड़कियां अक्सर ऐसा ही कोई सपना देखा करती थी। यह उस समय का सपना था, जो आमतौर पर मध्यवर्ग और निम्न मध्य वर्गीय परिवारों की लड़कियां देखा करती थीं। हालांकि एक छोटी संख्या में लड़कियां डाक्टर, इंजीनियर बनने जैसा सपना तब भी देख रही थी, लेकिन यह आम सपना नहीं था। पिछले पांच-सात सालों में युवाओं और युवतियों में सपनों के स्तर पर बदलाव आए हैं। सिर्फ माता-पिता या परिवार वालों की इच्छा पर आंख मूंदकर बीए, बीएससी या बीकाम करने वाली पीढ़ी धीरे-धीरे कम होती जा रही है। आज के युवा और युवतियां अपनी पसंद के विषय चुनने के जिद भी कर सकते हैं और वे अपने तर्कों से परिजनों को अपनी पसंद मनवाने का माद्दा भी रखते हैं। परिवारों के भीतर पिता की सत्ता कमजोर हो रही है। परिवारों के भीतर लड़कियां भी हाशिये पर नहीं हैं। वे भी बराबरी की ओर बढ़ रही है। यह जो बदलाव है वह भी आज के युवा वर्ग की आकांक्षाओं के दबाव से ही पैदा हुए हैं। इस बदलाव को परिवार नाम की संस्था के ज्यादा लोकतांत्रिक होने का भी लक्षण माना जा सकता है।
हम अपने सामने जो पीढ़ी देख रहे हैं, वह बिल्कुल वैसी नहीं है, जो हमें बीसवीं सदी के नवें और आखिरी दशक के शुरूआती सालों में दिखाई देती है। उस पीढ़ी और मौजूदा पीढ़ी के सपनों का रंग काफी अलग है। दरअसल बीसवीं सदी के आखिरी सालों में जब आर्थिक उदारीकरण के नतीजे आने लगे तब से हम एक नई तरह की युवा पौध देख रहे हैं। यह पौध आत्मविश्वास में पिछली पीढ़ी से आगे है ही, लेकिन उससे कई गुना ज्यादा महत्वाकांक्षी भी है। उसमें आठवें और नवें दशक के युवा की तरह सरकारी नौकरी हासिल कर जीवन को आराम से गुजारने की ललक की जगह निजी क्षेत्र की नौकरियों का जोखिम उठाने का साहस है। लड़कियां मॉडलिंग, एयर होस्टेस से लेकर होटल मैनेजमेंट तक उन पाठ्यक्रमों में जाना पसंद कर रही है, जिनका जिक्र करते हुए भी आठवें व नौवें के दशक युवतियां घबरा जाती थी। यही बात आज के युवाओं पर भी लागू होती है। वे आगे बढ़ने के लिए जो जोखिम उठाने को तैयार हैं, उत्तराखंड के परंपरांगत समाज के नजरिये से देखें तो यह अहम बदलाव है। युवाओं की मनोदशा में आज यह बदलाव जब-तब सवर्णों के भीतर अंतर्जातीय विवाहों की शक्ल में भी सामने आ जाता है। धीरे-धीरे अंतर्जातीय विवाह भी बढ़ रहे हैं, और अब ऐसे विवाहों में परिवार की नाराजगी के बजाय भागीदारी बढ़ रही है।
हम अपने समय की ऐसी महत्वाकांक्षी पीढ़ी को देख रहे हैं, जो अपनी उपस्थिति भी जता रही है और अपने इरादों को लेकर मुखर भी है। लेकिन वे विशेषताएं मौजूद युवा पीढ़ी को खास बनाती है। यह भी नहीं भूला जाना चाहिए कि उन पर अपनी पूर्ववर्ती पीढियों से कहीं ज्यादा उम्मीदों का बोझ है।

मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

छोटे दल, मनमोहन का डर

जब से बाईपास सर्ज्ञरी हुई है तब से सुस्त और उदासीन से दिखने वाले मनमोहन सिंह पूरी फारम में लौट आए हैं। उनके दिल को खून की आपूर्ति क्या बहाल हुई कि वह ताबड़तोड़ हमले करने में जुट गए हैं। दिल जब आपका साथ देता है तो मनमोहन भी आडवाणी को ललकार सकते हैं। चुनावी ललकारों के बीच मनमोहन ने क्षेत्रीय दलों को देश के लिए नुकसानदेह बताकर एक नई बहस को जन्म दिया है। यह मनमोहन का राजनीतिक अग्यान भी है कि वह इस देश और उसके विभिन्न समाजों के बारे में कितना कम जानते हैं।

पीएम की इस टिप्पणी के जवाब में देश भर से कई प्रतिक्रियाएं आईं जिनमें मनमोहन की आलोचना की गई थी। दरअसल क्षेत्रीय दलों के चरित्र पर बहस शुरू करने से पहले मनमोहन के इस बयान के निहितार्थ समझे जाने चाहिए। भारतीय राजनीति में 1966 को एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाना चाहिए। 1962 के भारत चीन युध्द में हुई हार से नेहरू और कांग्रेस का पतन शुरू हो गया। विकल्प के अभाव और नेहरू जैसे व्यक्तित्व के कारण कांग्रेस की लोकप्रियता में पड़ रही दरारें दिखाई नहीं दे रहीं थी लेकिन वक्त की धूप, हवा और पानी ने इस किले को भीतर और बाहर दोनों ओर से खाना शुरू कर दिया था। 1964 में नेहरू के अवसान के साथ कांग्रेस की रक्षा करने वाली उनकी विराट छवि भी न रही। १९६७ आते-आते उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक कांग्रेसी किले में पड़ रहीं दरारें दिखने लगी थी। इंदिरा गांधी के उदय से कांग्रेस की विशाल इमारत का दरकना रूक गया। इंदिरा के करिश्मे ने कांग्रेस से मोहभंग की प्रक्रिया को रोक दिया। लेकिन यह इतिहास की विडंबना ही है कि उसी इंदिरा गांधी की इमरजेंसी ने इस प्रक्रिया को आंधी में बदल दिया। 1977 में कांग्रेस की अजेयता को जो चुनौती मिली वह 1989 में दोहराई गई और फिर लगातार दोहराई जा रही है। बीसवीं सदी के आखिरी दशक को भारतीय राजनीति में आये सबसे बुनियादी बदलाव के लिए रेखांकित किया जाना चाहिए। यह वही दशक था जब न केवल भारत का प्राकृतिक मौसम बदल रहा था बल्कि देश की राजनीतिक आबोहवा भी बदल रही थी। देश की राजनीति की भाषा व्याकरण में भी बुनियादी बदलाव तो आए ही साथ ही राष्ट्रीय राजनीति से एकाधिकार का युग भी विदा हो गया।
21वीं सदी में हम जिस राजनीतिक भारत का नक्शा देख रहे हैं वह न तो कांग्रेसी और न ही भगवा रंग में रंगा हुआ है। यह ऐसा बहुरंगी भारत है जिसमें पूर्वोतर से लेकर सुदूर दक्षिण तक मौजूद जातियां और क्षेत्र अपने-अपने रंगों के साथ उपस्थित हैं। मनमोहन सिंह की मुश्किल यह है कि वह ऐसा भारत चाहते हैं जो भले ही जातियों क्षेत्रों और आर्थिक आधार पर विभिन्न स्तरों पर विभाजित हो लेकिन राजनीतिक रूप से वह एक रूप हो। दरअसल कांग्रेस को 1952 वाला भारत चाहिए तो भाजपा कांग्रेस वाले भारत में भगवा रंग भरकर अपने वाला एक रूप भारत चाहती है। यानी ठीक वैसा भारत जैसा आरएसएस के बंच आफ थाट्स में लिख दिया गया है। लेकिन इस देश के साथ मुश्किल यह है कि यह न तो कांग्रेस और न भाजपा की राजनीतिक भाषा, व्याकरण में बोल रहा है। 21वीं सदी के राजनीतिक भारत की सामाजिक- राजनीतिक आकांक्षाएं अपने-अपने सुरों में बोल रही हैं। अगर ये सुर मनमोहन को रास नहीं आ रहे हैं तो यह उनकी राजनीति और समझ की समस्या है न कि भारतीय समाज की। मनमोहन को जानना चाहिए कि भारत को यदि एक संघीय गणराज्य बनाने का संविधान निमार्ताओं का निर्णय आखिर यूं ही हवा-हवाई नहीं था। वे जानते थे कि भारतीय समाज जापानियों अंग्रेजों या जर्मनों की तरह सपाट समाज नहीं है। भाषा, जातियां, धार्मिक विश्वास़, भूगोल और संस्कृतियां भारतीय समाज को कई राष्ट्रीयताओं और उपराष्ट्रीयताओं में बांटते हैं। हम भारत नाम के जिस राष्ट्र राज्य को प्रशासनिक तौर पर देख रहे हैं वह दरअसल इन्हीं विभिन्न वर्णी समाजों का संघीय रूप है। भारतीय संविधान ने इस सच्चाई को स्वीकार कर इसे एक प्रशासनिक ईकाई बनाया है। इससे पहले भी अंग्रेजों से लेकर अकबर तक और उससे पहले के मध्यकालीन भारत में भी जो भी साम्राज्य आए उन्होंने अपने माताहत रियासतों की पहचान में कोई छेड़खानी नहीं की। इसलिए मनमोहन सिंह को यह जानना चाहिए कि वह भारत के विभिन्न समाजों की राजनीतिक पहचानों में जिन विविधताओं से हैरान हैं वह दरअसल भारत के डीएनए में है। 1952 से 1962 के एक दशक में यह विविधता भले ही नेहरू गांधी के करिश्मे में ढंक गई हो लेकिन तब भी इसकी अंतर्धाराएं लगातार मौजूद रहीं। कांग्रेस के पुण्यों और करिश्मे का ग्लेशियर जैसे ही पिघलने लगा तो द्रविड़ से लेकर मलयाली बंगाली तक सारी अंतर्धाराएं दिखने लगीं। मनमोहन जिन राजनीतिक शक्तियों के उभार से परेशान हैं वे सारी की सारी गैर कांग्रेसवाद की कोख से जनमी हैं। कांग्रेस की विफलताओं ने ही गैर कांग्रेसवाद जैसी नकारात्मक राजनीति को विचारधारा में बदल दिया। छोटे दलों के उभार पर मनमोहन को शिकायत करने का नैतिक अधिकार नहीं है। मनमोहन छोटे दलों के उभार से इसलिए भी नाराज हैं क्योंकि इन दलों के कारण ही वह अपने उस आर्थिक एजेंडे को पूरी तरह लागू नहीं कर पा रहे हैं जो विश्व बैंक़, डब्लूटीओ और बहुराष्ट्रीय कंपनियां चाह रही हैं। हालांकि वह काफी हद तक भारत की परंपरागत अर्थव्यवस्थाकी रीढ तोड़ने में कामयाब रहे हैं लेकिन यह उतनी तेजी से नहीं हो पा रहा है जितना कि उदारीकरण के मालिक लोग अपने भारतीय कर्मचारियों से चाह रहे हैं।
दरअसल उदारीकरण की सबसे बड़ी चैंपियन पार्टियां कांग्रेस और भाजपा देश में अमेरिका की तरह दो दलीय लोकतंत्र चाहती हैं। यह सिर्फ संयोग नहीं है कि विश्व बैंक़ डब्लूटीओ भी यही चाहते हैं क्योंकि दो दलीय लोकतंत्र को अमेरिका की तरह कारपोरेट लोकतंत्र में बदला जा सकता है। कांग्रेस और भाजपा कारपोरेट हितों की रक्षा करने में अपने कौशल को साबित कर चुकी हैं। इसलिए भारतीय हो या विदेशी कारपोरेट जगत यही चाहता है कि चुनाव कांग्रेस और भाजपा के बीच सीमित हो जाए ताकि ऐसे दल सत्ता में न आ सकें जिन पर वोटर का करीबी नियंत्रण है। छोटे दलों का अस्तित्व ही चूंकि लोकप्रियतावादी नीतियों पर टिका है इसलिए समर्थकों की प्रतिक्रियाओं से भी इन दलों की नीतियां बनती-बिगड़ती रहती हैं। तो मनमोहन अकेले नहीं है और न ही हेडगेवार अकेले थे जिन्हे गंजे की तरह सपाट भारत चाहिए था वह अकेले नहीं जिन्हें गरीब और अमीर की वर्गीय विविधता वाला भारत तो चाहिए लेकिन राजनीतिक रूप से सपाट देश चाहिए। लेकिन इन महानुभावों की त्रासदी यह है कि वे देश नहीं चुन सकते इसलिए विधवा विलाप करते हुए भी उन्हें इसी भारत में रहना है।

लेकिन इन तर्कों में देश के छोटे दलों की राजनीति का औचित्य साबित करने का खतरा भी छुपा है। दरअसल भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का उभार दक्षिण भारत से शुरू हुआ जहां द्रविड़ राजनीति के सूत्रधार के रूप में डीएमके, एआईडीएमके, टीडीपी ने अपना सफर शुरू किया। लेकिन अब भारतीय राजनीति में छोटे दलों की भरमार है। बीसवीं सदी के नवें दशक और 21वीं सदी के पहले दशक में इन छोटे दलों में से अधिकांश ने केंद्र और राज्य स्तर पर गठबंधन की जो राजनीति की है वह भारतीय राजनीति में अवसरवाद की पराकाष्ठा है। भारतीय राजनीति के बहुध्रुवीय और विकेंद्रीयकृत होने की जो उम्मीद इन छोटे दलों से जगी थी उसे इस अवसरवाद ने चूर-चूर कर दिया। इनमें से कई छोटे दलों ने यह भी साबित कर दिया की बौने नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की निकृष्ट अभिव्यक्ति हैं। इनमें से अधिकांश दलों ने अपने आचार- व्यवहार और राजनीति से ऐसा कुछ भी साबित नहीं किया जिससे यह लगे कि देश और दुनिया के बारे में इन दलों का अपना कोई नजरिया है। देश और दुनिया के बारे में न कोई समझ, न कोई सपना, अधिकांश छोटे दलों के बारे में सच्चाई यही है। इसलिए इन दलों को कभी भाजपा, कभी कांग्रेस तो कभी कम्युनिस्टों के साथ गठबंधन करने में न झिझक महसूस होती है और न शर्म ही आती है। इस वैचारिक अराजकता और परले दर्जे की सत्तालिप्सा ने ही कांग्रेस और भाजपा को छोटे दलों के खिलाफ माहौल बनाने का मसाला दिया है। देश में मध्यवर्ग के एक हिस्से में कांग्रेस और भाजपा का यह प्रचार असर भी दिखा रहा है। छोटे दलों की यह विफलता देश को दो दलीय राजनीति की ओर ले जाएगी जिसके नतीजे देश के लिए खतरनाक होंगे । क्योंकि आर्थिक नीतियों से लेकर भ्रष्टाचार सत्ता के चरित्र तक ये दोनों दल एक दूसरे के क्लोन हैं। अंतर इतना ही है कि भाजपा में भगवा रंग वाला डीएनए थोड़ा गाढे रंग और कांग्रेस में यह डीएनए हल्के भगवे रंग का है।
दुर्भाग्य से यदि राजनीति कांग्रेस और भाजपा तक सीमित हुई तो ये दोनों दल सड़क से लेकर संसद तक फ्रेंडली मैच खेलेंगे और हर पांच वर्ष दल तो बदलेंगे लेकिन हालात वही रहेंगे। देश को यदि बड़े दलों की आपदा से बचना है तो उसे सही मायनों में क्षेत्रीय या आंचलिक सवालों पर राजनीति करने वाले दलों की जरूरत है। तब जाकर ही भारतीय संसद और राजनीति का चरित्र सही मायनों में संघीय हो सकेगा।

शनिवार, 28 मार्च 2009

भाजपा - फिर से उन्मादम् शरणम् गाच्छामि

भारतीय राजनीति को विकास, गरीबी, अमीरी,मंहगाई, बेरोजगारी के मुद्दों से भटकाकर उसे धार्मिक उन्माद के बीहड़ में धकेलने के लिए यदि किसी एक राजनीतिक दल ने सर्वाधिक योगदान दिया है तो वह भारतीय जनता पार्टी ही है। इसे आत्मविश्वास की कमी कहें या सुविधाजनक रास्ता पकडने की आदत भाजपा जनसंघ के जमाने से ही भावनात्मक मुद्दों की तलाश में भटकती रही। बाबरी मस्जिद के ध्वंस से लेकर गुजरात दंगों तक कई कुख्यात कांडों को अंजाम देने वाली इस पार्टी की मुश्किल यह है कि वह भारतीय जनमानस पर यकीन करने के बजाय अयातुल्ला खुमैनी की विचारधारा पर ज्यादा यकीन रखती है।
आपातकाल में कई नृशंस कांडों के खलनायक रहे संजय गांधी और इंसानों के बजाय जानवर प्रेमी मेनका गांधी के पुत्र वरुण गांधी आरएसएस की नेकर पहनें या कुछ भी न पहनें इसे लेकर अपने को कोई समस्या नहीं है। वरुण संजय गांधी नाम के इस शख्स के नाम के साथ गांधी का जुडना उतना ही अटपटा लगता है जितना कि उसके पिता के नाम के साथ। लेकिन फिर भी यह कोई ऐसी बात नहीं है जिसे लेकर हाय-तौबा मचाई जाय। यदि गांधी के नाम से इंदिरा गांधी से लेकर राहुल गांधी तक कईयों का भला हो गया है तो वरुण गांधी का भी हो जाय तो इस देश का क्या जाता है। लेकिन आपत्तिजनक यह है कि जो व्यक्ति अपने भाषण में गांधी को दुनिया का सबसे बड़ा बेवकूफ बता रहा हो उसे गांधी के नाम का इस्तेमाल करने में शर्म क्यों नहीं आ रही है। वरुण यदि गांधी से इतनी नफरत करते हैं तो वह अपने नाम से गांधी हटा दें और वरुण संजय या वरुण फिरोज के नाम से राजनीति करने का साहस दिखायें। गांधी को गाली और उसी गांधी के नाम का लाभ उठाना यह कहां की नैतिकता है। वरुण संजय गांधी ने गांधी के विचारों के प्रति जो नफरत व्यक्त की है वह दरअसल वही है जो नाथूराम गोडसे सन् १९४८ में अपनी गोली और बोली से व्यक्त कर चुके थे। इसे इतिहास की बिडंबना कहें कि आजादी की आधी सदी के बाद भारत के भाग्य में ऐसा गांधी देखना भी लिखा था जो गांधी के हत्यारे गोडसे की विरासत का वारिस है।
गोपाल गोडसे की गांधी वध क्यों किताब को गीता की तरह पढने वाली भगवा ब्रिगेडों के लिए वरुण संजय गांधी ऐसे गांधी के रुप में मिले हैं जो गांधी के विचार से लड़ने के लिए सबसे उपयुक्त हैं। वरुण संजय गांधी अपने पहले भाषण में यदि सीधे गांधी पर हमला करते हैं तो यह भगवा ब्रिगेडों की सुचिंतित रणनीति का हिस्सा है। अब भगवा गांधी ही गांधी पर हमला करेगा।
भगवा ब्रिगेडों को गांधी से सर्वाधिक परेशानी होती है। वे मार्क्स, लेनिन, माओ को बाहरी बताकर उनकी विचारधाराओं को विदेशी करार दे सकते हैं लेकिन गांधी के विचारों का वे कुछ नहीं कर सकते। क्योंकि गांधी धार्मिक भी हैं तो धर्मनिरपेक्ष भी। वह ऐसी विरासत हैं जो गोडसे की राजनीतिक वंशावली के लिए सबसे बड़ा सरदर्द है। भगवा ब्रिगेडों सवर्ण कट्टरपंथी वर्णव्यवस्था के ध्वसं के लिए गांधी को १९२४ से निर्बाध गाली देते रहे हैं। लेकिन बावजूद इसके गांधी ज्यादा ताकतवर होते गए। इस वैचारिक शत्रुता के लिए जिस सेनापति की जरुरत थी वह उन्हें वरुण संजय गांधी के रुप में मिल गया है। क्योंकि वरुण एक साथ गांधी भी हैं तो नेहरु भी, इसलिए गांधी के विरुद्ध ऐसा सेनापति भगवा ब्रिगेडों को कहां मिलता।
लेकिन इस दीर्घकालीन राजनीति के अलावा चुनावी रणनीति भी है। वरुण संजय गांधी के कंधे पर सवार होकर भाजपा और संघ परिवार १९९१ की तरह उत्तर प्रदेश को सांप्रदायिक उन्माद में झोंकना चाहते हैं। दरअसल भाजपा और संघ परिवार की यह बेचैनी तबसे और भी बढ़ गई जब उसके अपने गोपनीय सर्वेक्षणों और जनमत सर्वेक्षणों से भाजपा का ग्राफ नीचे गिरता दिखाई दे रहा है। यूपी में वह सन् २००४ के बराबर सीटें लाने की स्तिथि में नहीं है तो उत्तराखण्ड, राजस्थान, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, पंजाब में भी वह पहले जैसी कामयाबी दोहराने की स्थिति में नहीं है। इसके अलावा भाजपा के दूसरी पांत के नेता आड़वाणी के बजाय सन् २०१४ के प्रधानमंत्री की तैयारी में जुटे हैं। ऐसी स्थिति में लगातार दस वर्ष तक केंद्र की सत्ता से बाहर रहने की संभावना से भगवा कतारों में हड़कंप मचा हुआ है। इन ब्रिगेडों की कई परियोजनायें तो केंद्र सरकार की वित्तीय मदद पर ही पलती रही हैं। इसके अलावा इन ब्रिगेडों के कई पदाधिकारी और नेताओं को सरकारी संरक्षण इतना रास आ गया है कि अब वे भाजपा के सत्ता से बाहर होने की कल्पना मात्र से ही कांप जाते है। इसके अलावा भगवा ब्रिगेडों का पराक्रम भी तब ही ज्यादा जोर मारता है जब केंद्र और राज्य में उनकी अपनी सरकार हो। औरों की सरकार के रहते हुए भगवा ब्रिगेडें पंगा लेते हुए खौफ खाती हैं। इसलिए भाजपा और संघ परिवार दोनों को केंद्र में एक अदद अपनी सरकार चाहिए। इसके लिए उसने अब विकास, बेरोजगारी, मंहगाई, आर्थिक मंदी जैसे मुद्दे छोड़ दिए हैं। वह एक बार फिर उन्माद की शरण में है। अंत में एक दिलचस्प सवाल - संजय गांधी के जैविक उत्तराधिकारी वरुण क्या अपने पिता की राजनीतिक विरासत को भी वहन करने का साहस दिखायेगे। क्या वह नेहरु को कश्मीर समस्या समेत भारत की तमाम समस्याओं के लिए जिम्मेदार ठहरा सकेंगे।

मंगलवार, 24 मार्च 2009

ऐसे समय में शब्द संसद

हम ऐसे समय मे हैं जब शब्दों के लिए परंपरागत माध्यम माने जाने वाले समाचार माध्यम छोटे पड़ रहे हैं शब्दों का स्थान शोर ने ले लिया है। शब्दों की सबसे बड़ी संसद कहे जाने वाले समाचार माध्यमों में बाजार का शोर है तो लोकतंत्र का मक्का कहे जाने वाली संसद में शोर सबसे बड़ा तर्क है। शोर का सबसे बड़ा तर्क यही होता है कि वह हर अर्थवान आवाज पर भारी होती है। अब आप मुझसे शब्द संसद में यहां मुलाकात कर सकेंगे ताकि अर्थवान आवाजों को निगलने को आतुर शोर की सत्ता का हम अपनी तरह से परतिकार कर सकें। सन्नाटे का प्रतिवाद, शोर का प्रतिकार और बेजुबान का हथियार यही शब्द संसद का मतलब और मकसद है, यदि इसे हासिल कर पाए तो मैं समझूंगा कि यह प्रयास बेकार नहीं हुआ।

गुरुवार, 19 मार्च 2009

नमस्‍कार

माननीय साथियो,
आज से मैं भी आपके साथ ब्‍लागजगत में दिखाई दूंगा। कोशिश होगी कि सीधी-सच्‍ची बात कहूं। कुछ आपके मन की, कुछ अपने मन की। संसद से सड़क तक उस आदमी की जो रोटी बेलता है और उसकी भी, जो रोटी से खेलता है। शब्द संसद में जो भी होगा वह आपके दिल की बात होगी। यहां आप हामिद से भी मिलेंगे और होरी से भी। कोशिश होगी कि इस संसद में जो भी शब्‍द हों वो मेरे, आपके और उनके दिल की बात हो। आवाज हो जो उनके कानों में गूंजे जो मेरे और आपकी रोटी से खेलते हैं।
आशा है आप सभी मुझे रास्‍ता दिखाएंगे। भटकने नहीं देंगे।
आपका
एस राजन टोडरिया