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मंगलवार, 5 मई 2009

धधकता हिमालय और फारेस्ट के नीरो


हिमालय के जंगल धधक रहे हैं और उत्तराखंड के प्रमुख वन संरक्षक आरबीएस रावत को फुर्सत नहीं है। वह सुबह से शाम तक जंगल की आग पर आए दिन राजधानी में होने वाली बैठकों में व्यस्त हैं। जंगल की आग से लड़ते हुए सात लोगों की मौत और १५ लोगों के घायल होने के बाद चैन की बांसुरी बजा रहे वन विभाग के नीरों हरकत में आ गए हैं। वन विभाग की सक्रियता उम्मीद नहीं जगाती बल्कि निराश करती है। ग्रामीणों की मौत पर होने वाले विलाप के स्वर जैसे धीमे पडेंगे फारेस्ट डिपार्टमेंट में फिर चैन की बांसुरी बजने लगेगी। एक के बाद एक हिमालय जंगल स्वाह हो रहे हैं पर सरकार बैठक दर बैठक कर जंगल की आग पर काबू पा लेना चाहती है। राजधानी में वन विभाग के आला अफसर कागजों का पेट आंकड़ों से भर रहे हैं। सचिव से लेकर प्रमुख वन संरक्षक और क्षेत्रीय वन संरक्षकों तक के दफ्तरों में कंप्यूटर और फैक्स बिजी हो गए हैं। इधर जंगल में आग लगी हुई है उधर प्रदेश में आइएएस और आइएफएस सेवाओं के सबसे ज्यादा योग्य और प्रतिभावान बाबू एक के बाद एक रिपोर्ट तलब कर रहे हैं। ग्रामीणों की मौत से सहमी सरकार ने दस करोड़ रुपये की मदद की मांग कर जंगल की आग को केंद्र सरकार के पाले में सरका दिया है।
ऐसा नहीं है कि हिमालय के जंगलों में इसी वर्ष आग लगी हो लेकिन इस वर्ष अप्रैल के अंतिम व मई के प्रथम हफ्ते में लगी भीषण दावाग्नि में सात ग्रामीणों के जलने की घटना के बाद हर साल बढ़ रही आग की घटनाओं को एकाएक फोकस में ला दिया है। वन विभाग में व्याप्त लापरवाही की हद यह है कि जंगल में भीषण आग की चपेट में एक गांव के आने की भनक भी वन विभाग के कारिंदों को नहीं लगी। सिर्फ हरी टहनियों के बूते जंगल की भयावह आग से जूझने वाले ये ग्रामीण इस जंग में अकेले थे। पर्यावरण और वन प्रबंधन के नाम पर हर साल करोड़ों रुपए हजम करने वाला फारेस्ट का अमला मोर्चे से गायब था।

हिमालय के जंगलों की यह त्रासदी है कि जैसे-जैसे वन विभाग के अमले पर खर्च बढ़ता गया वैसे-वैसे ही आग से प्रभावित वन क्षेत्र भी बढ़ता रहा है। सन 2000-2001 में आग की चपेट में आने वाला वन क्षेत्र सिर्फ 925 हैक्टेयर था। राज्य बनने के इन नौ वर्षों में वन विभाग में प्रमुख वन संरक्षक रैंक के 14, वन संरक्षक रैंक के 27 और प्रभागीय वनाधिकारी स्तर के 87 अधिकारी तैनात हैं। विडंबना यह है कि जिन जंगलों की देखभाल के लिए अफसरों का यह भारी-भरकम अमला बनाया गया उन जंगलों में से 23000 हैक्टेयर जंगल इन नौ वर्षों में स्वाह हो गए। सन 2000-2001 के मुकाबले आग से प्रभावित होने वाला वन क्षेत्र औसतन तीन गुने से पांच गुने तक बढ़ गया है। केवल 20006-07 और 08-09 में ही यह औसत कम रहा है तो यह वन विभाग का नहीं बल्कि अप्रैल, मई और जून में होने वाली वर्षा का कमाल है। इस वर्ष भी अभी तक 2800 हैक्टेयर जंगल स्वाह हो चुका है। जाहिर है कि अफसरों का भारी-भरकम अमला जंगलों को बचाने में विफल साबित हुआ है क्योंकि आग से लड़ने के लिए विभाग के पास न तो जमीनी स्टाफ है और न जरुरी तैयारी ही। अब जंगल की आग का मुकाबला करने के लिए मानदेय पर सीजनल मजदूर रखे जाते हैं जो फील्ड पर कम और कागजों पर ज्यादा होते हैं। जंगल की आग पर काबू पाने के लिए विश्व स्तर पर अपनाए जाने वाली नई तकनीक अपनाना तो दूर वन विभाग ने फायर लाइन और कंट्रोल बर्निंग ब्रिटिशकालीन तकनीक भी छोड़ दी है।जंगल की आग को एक हिस्से में सीमित करने वाली इन फायर लाइनों की देखभाल न होने से वहां भी जंगल ऊग आए हैं। फलतः आग की घटनाएं और प्रभावित क्षेत्रफल दोनों में भारी वृद्धि हो रही है।

जंगल की आग लगने की घटनाओं में हो रही वृद्धि के कई कारण हैं। मानव निर्मित कारणों में सबसे पहला कारण यह है कि जंगलों से सबसे करीब रहने वाले और उन पर आश्रित समाजों को सरकार और वन विभाग ने सुनियोजित रुप से वन प्रबंधन और स्वामित्व दोनों से बेदखल कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के 1994 गोडा वर्मन बनाम भारत सरकार मामले में दिए गए फैसले के बाद तो वनों के करीबी समाजों का वनों में पत्तियां बीनना तक अपराध हो गया। केंद्र और राज्य की सरकारें चाहती तो वनों पर आश्रित समाजों को वन प्रबंधन व स्वामित्व में भागीदार बना सकती थी। लेकिन वन विभाग खुद में इतने निहित स्वार्थों का गठबंधन बन चुका है कि वह जंगलों पर अपना एकाधिकार चाहता है। इससे स्थानीय लोगों का जंगलों के प्रति लगाव कम हुआ है और वे वनों की रक्षा के प्रति उदासीन हुए हैं। इसके बावजूद वे ही जंगल की आग का मुकाबला करने के लिए अग्रिम मोर्चे पर हैं। ग्रामीण भी बरसात में अच्छी घास पाने के लिए जंगलों में आग लगाते हैं, लेकिन यह अकेला कारण नहीं है। फर्जी वृक्षारोपण के सबूत मिटाने के लिए भी जंगल की आग का खेल खेला जाता है।

आग की घटनाओं के काबू से बाहर होने के लिए आदमी ही जिम्मेदार है। 19वीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में मिश्रित वनों के निर्मम सफाये के बाद वन विभाग ने चीड़ वनों के विस्तार की जो सुनियोजित मुहिम चलाई उसके चलते ही जंगल में आग अब हद से बाहर हो रही है। उत्तराखंड के जंगलों में चीड़ बडे भाई की तरह सबसे बड़े हिस्से पर काबिज है। वनों के व्यापारिक दोहन के १४० वर्ष के भीतर ही बांज-बुरांस के मिश्रित वन छोटे भाई की तरह कोने में सिमट जाने को मजबूर हो गए हैं। उत्तराखंड़ के ३९३०३६ हैक्टेयर में चीड़ का राज है। सेटेलाइट से प्राप्त चित्रों से जाहिर है कि आग उन्हीं इलाकों में अपना रोद्र रूप दिखा रही है जिनमें बड़े भाई चीड़ का राज है। यह इलाका ४ हजार से लेकर ६ हजार फीट तक फैला है। ऐसा चीड़ की सूखी पत्तियों के अति अधिक ज्वलनशील होने के कारण है। इसके अलावा चीड़ वनों में नमी का स्तर न्यूनतम होता है। नमी न होने से यह इलाका आग के प्रति ओर भी संवेदनशील हो जाता है। ग्लोबल वार्मिंग से पिछली एक सदी में तापमान में हुई बढ़ोत्तरी और अक्सर सूखा पड़ने से जंगल ज्यादा खुश्क हुए हैं तो चीड़ की पत्तियां तेजी से सूख रही हैं। पिछले ५० वर्षों में वनपोषित जलस्रोतों में से ५० फीसदी या तो सूख गए हैं या फिर उनके जल प्रवाह में ७० फीसदी तक की कमी आई है। इसने भी आग को हवा देने का काम किया है।
हिमालय के जंगल जिस तरह से धधक रहे हैं उससे अनिष्ट की आशंकाएं ही प्रबल हो रही हैं। आग से हिमालय के गर्म होने की प्रकिया तेज होगी जो ग्लेशियरों को गलाने की रफ्तार बढ़ा देगा। रहे-सहे वनपोषित जल स्रोत सूखेंगे और यह गंगा के मैदान के मरूस्थल में बदलने की शुरूआत होगी। आग से नष्ट मिश्रित वनों का स्थान चीड़ वन ले लेंगे और फिर जंगल की आग सुरसा के मुंह की तरह हिमालय के ऊपरी हिस्से तक पहुंच जाएगी। आने वाली पीढियां बांज-बुरांस के जंगलों को इंटरनेट की फोटो गैलरियों में ही देख सकेगी। हमारी मूर्खताओं का कुल गुणनफल प्रकृति के इन सबसे खूबसूरत जंगलों को लील लेगा। धधकते जंगल बता रहे हैं कि हिमालय संकट में है। जलते हुए पेड़ों की इस चेतावनी को गौर से सुना जाना चाहिए।

7 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी चिन्ताएं वाजिब हैं, पर यह तो हर वर्ष का हाल है। संरक्सित वन क्षेत्र के नाम पर स्थानियता को बेद्खल कर क्या इस आग पर काबू पाया जा सकता है ?

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  2. बहुत ही बढ़िया आलेख। पहाड़ों की हकीकत से अनजान लोगों को लग सकता है कि बढ़ाचढ़ाकर बात की गई है। लेकिन जंगल के साथ जो अत्याचार हो रहे रहें हैं अब उसकी कीमत चुकाने का समय आ रहा है।

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  3. kya jangal ke bare mein hamari chintayein wazib hain? athawa ye sirf aag ki awsarvadita bhar hai. hum kabhi aag ke bina bhi jangal ki tapti deh ko sanjidagi se lene mein smarth hain?

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  4. उत्तराखंड के जंगलों को तो उनके पैरोकारों ने भी खूब भुनाया. आपका लेख बहुत पसंद आया. इतना आक्रामक होने की अब ज़रूरत है. आपके नाम से परिचित हूँ, अमर उजाला के दिनों से. आप शायद ना जानते हों मुझे. ब्लॉग जगत में आपका स्वागत और शुभकामनायें !

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  5. बेहतरीन। पहाड़ों से छीजती हरियाली बहुत भयावह है। हमने हरिद्वार की शिवालिक रेंज को रूप बदलते देखा है...
    आपकी चिन्ताएं कुछ सकारात्मक असर पैदा करेंगी इस उम्मीद के साथ...शब्द संसद में साथ है शब्दों का सफर...

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  6. ज़बरदस्त विचारोत्तेजक पोस्ट टोडरिया जी!

    बने रहें.

    आपके ब्लॉग का लिंक कबाड़खाने में लगा कर धन्य हूं. आपसे भविष्य में और और जानने-सुनने की इच्छा रहेगी.

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  7. खास तौर पर उत्तराखंड के जंगलों की आग की खबरें कई साल से पढ़-सुन रही थी। इस पर एक परिपूर्ण लेख आखिर अब पढ़ने को मिला। इस व्यापक विमर्ष के लिए बधाई और धन्यवाद।

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