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शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

छोटे अखबारों की बड़ी लड़ाई
एस0राजेन टोडरिया
आने वाला इतिहास जब कभी मौजूदा मुख्यमंत्री के राजनीतिक सफर को बयां करेगा वह यह भी दर्ज करेगा कि उन्होने अपनी राजनीति का ककहरा भले ही शिशु मंदिर के शिक्षक के रुप में सीखा हो पर राजनीति में उनकी उड़ान की शुरुआत टूटे अक्षरों की इबारत वाले एक चार पेजी अखबार से हुई थी। विडंबना यह है कि वही इतिहास उन्हे पूरी शक्ति,सामर्थ्य और जुनून के साथ छोटे अखबारों के गला घोंटने के लिए भी याद करेगा। भविष्य मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के व्यक्तित्व को इस विरोधाभास की रोशनी में पढ़ेगा और इस अजूबे से विस्मय में भी पड़ेगा। वह शायद इतिहास में अकेले ऐसे पत्रकार राजनेता होंगे जो मात्र कुछ सैकड़ा बंटने वाले छोटे-छोटे अखबारों में भी असहमति और आलोचना के स्वर बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं। यह इस बात का भी सबूत है कि सत्ता आदमी को किस हद तक दुर्बल,दयनीय और असहिष्णु बना देती है।उत्तराखंड में बड़े अखबारों और क्षेत्रीय चैनलों को मिलाकर मीडिया की कुल जमा जो तस्वीर बनती है वह चारण अखबारों और चमचा चैनलों की बनती है। काश! हमारे समय में भी कोई भारतेंदु हरिश्चंद्र होते तो मीडिया की इस दुर्दशा पर कोई नाटक जरुर लिखते। फिर भी मीडिया की इस दुर्दशा का पूरा श्रेय सिर्फ मौजूदा मुख्यमंत्री के पुरूषार्थ को देना ठीक नहीं होगा। एनडी तिवारी ने अपने राजनीतिक जीवन के पूरे अनुभव को झोंकते हुए करोड़ों रु0 की खनक के बूते मीडिया की इन कुलीन कुलवधुओं को नगरवधू बना दिया। तिवारी की ही परंपरा पर चलते हुए मौजूदा मुख्यमंत्री ने इन्हे हरम पहुंचा दिया है। विज्ञापन का बजट हर रोज छलांगें मार रहा है। अंतःपुर के कारिंदे रोज किसी न किसी को लाख-दो लाख से लेकर तीस-तीस लाख के पैकेजों की बख्शीशें दिला रहे है। राजा ने अपना खजाना खोल दिया है, ‘‘लूट सके तो लूट’’। प्रदेश में अभूतपूर्व आपदा है, पहाड़ के गांवों में लोग एक-एक पैसे और एक टाइम के खाने के लिए जूझ रहे हैं पर सरकार है कि चैनलों में प्राइम टाइम में दस साल का जश्न पर करोड़ों के विज्ञापन लुटा रही है। विधानसभा चुनाव से पहले की इस लूट में मीडिया मस्त है और पत्रकारिता पस्त है। यह सुनकर अजीब लगे पर सच यही है कि आपदा के दौरान भी उत्तराखंड के दैनिक अखबारों और क्षेत्रीय चैनलों के लिए विज्ञापन कम नहीं हुए उल्टे बढ़ गए । आपदा को लेकर दिए गए विज्ञापनों के आंकड़े इस उलटबांसी के गवाह हैं। अखबारों ने आपदा के नाम पर भी विज्ञापन कमाई के जरिये निकाल लिए।एक हिंदी अखबार ने राहत कार्यों पर सरकार की चमचागिरी का नया रिकार्ड कायम कर दिया। ऐसा घटियापन कि कल्पना करना मुश्किल है कि खरबों रु0 का मीडिया हाउस चलाने वाली कंपनी का एक अखबार मात्र 28 लाख रु0 के पैकेज के लिए इस हद तक गिर जाएगा!लेकिन यह कोई अपवाद नहीं है। ऐसे वाकये अक्सर होते रहते हैं सिर्फ अखबारों के नाम बदल जाते हैं। कुछ अखबार चमचागिरी में शऊार बरतते हैं तो कुछ नंग-धड़ंग होकर 17 वीं सदी के भांडों की तरह इसे अंजाम दे रहे हैं। उत्तराखंड में बड़े दैनिकों ने संपादक को ऐसे प्राणी में बदल दिया गया है जो सरकारी विज्ञापनों के लिए मुख्यमंत्री को रिझाने और पटाने के वे सारे गुण जानता हो जो एक समय गणिकाओं के लिए जरुरी माने जाते थे। माहौल ऐसा है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग सुबहो शाम समाचार माध्यमों में ‘तन डोले मेरा मन डोले’ की धुन ही सुनना चाहते हैं। मुख्यधारा के इस रवैये ने राज्य की पत्राकारिता को भांडगिरी में बदल दिया है। एक अखबार ने मुख्यमंत्री के पुतले जलाने की घटनाओं की खबरें छपने से रोकने के लिए संवाददाताओं को पुतलादहन की खबरें न भेजने का फरमान जारी कर दिया तो दूसरे ने राजनीतिक खबरें छोटी और बाजार से जुड़ी खबरें बड़ी छापने की आचार संहिता लागू कर दी है। अखबार और चैनलों के दफ्तरों में ऐसी खबरों का गर्भपात कर दिया जाता है जिनमें थोड़ा भी मुख्यमंत्री विरोध की गंध आती हो। मंत्रियों और अफसरों के खिलाफ छापिए पर उतना ही जितने में मुखिया की छवि पर असर न पड़े, यह अलिखित आचार संहिता अखबारों और चैनलों के ऑफिसों में लागू है। खबरें न छापना आज सबसे बड़ा कारोबार बन गया है। पत्रकारिता की पेशेवर ईमानदारी का हाल यह है कि पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी की खबरें अखबारों और चैनलों से सिर्फ इसलिए गायब कर दी गई हैं क्योंकि सत्ता के शिखर पुरूष को चैनलों और अखबारों में जनरल नाम तक देखना पंसद नहीं है। समाचार माध्यम इस संकीर्णता और अनुदारता के राजनीतिक एजेंडे के एजेंट बने हुए हैं। गौरतलब है कि ये वही अखबार और चैनल हैं कि जो जनरल के मुख्यमंत्रित्व काल में उनकी ईमानदारी के कसीदे पढ़ रहे थे। वह वक्त चला गया जब बड़े अखबार सरकारी दबाव झेलने के लिए ज्यादा बेहतर माने जाते थे और तमाम दबावों के बावजूद वे सत्ता की दौलत और ताकत के आगे तने दिखते थे। अब ऐसा समय है जब ये अखबार सरकारी विज्ञापनों के बिना जिंदा ही नहीं रह सकते हैं। पहले छोटे अखबार अपनी आर्थिक संसाधनों की सीमाओं के चलते ज्यादा नाजुक माने जाते थे। बाजार की महिमा देखिये कि उसने कई हजार करोड़ के बड़े-बड़े मीडिया हाउसों को छुईमुई बना दिया है। चारणों और चमचों की पांत में सबसे आगे वे ही हैं जो सबसे बड़े हैं।लेकिन क्षेत्रीय चैनलों और बड़े अखबारों के पतित होने से सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध की आवाजें दबी नहीं हैं। उत्तराखंड के स्थानीय और छोटे अखबारों के एक हिस्से ने सरकार के आगे घुटने टेकने से इंकार कर दिया है। यह एक सकारात्मक बदलाव है। इस हिस्से में लगातार घोटाले छप रहे हैं, मुख्यमंत्री के खिलाफ खबरें और विश्लेषण छप रहे हैं। इससे हैरान और परेशान मुख्यमंत्री ने पहले घोषणापत्र की आड़ में इन छोटे अखबारों को धमकाने की कोशिश की, सूचना विभाग के अफसर खबरों पर संपादकों के जबावतलब करने की हद तक चले गए। इस पर शर्मिंदा होने के बजाय एक छोटे अखबार के स्वामी,प्रकाशक और संपादक रहे राज्य के मुखिया की छाती गर्व से फूलती रही कि उन्होने छोटे अखबारों को उनकी औकात बता दी। उनके मुंहलगे अपफसर और कांरिंदे हर रोज विरोध में लिखने वाले अखबारों का आखेट करने के तौर तरीके खोजने में लगे हैं। इसी के तहत सचिवालय और विधानसभा में छोटे अखबारों के घुसने पर पाबंदी लगा दी है। जबकि बड़े अखबार वहां बांटे जा सकते हैं। सत्ता के इन शुतुरमुर्गों को यह समझ नहीं आ रहा है कि सरकार के कुछ अफसरों और कर्मचारियों के न पढ़ने से क्या मुख्यमंत्राी के खिलाफ आए दिन छपने वाली खबरों और घोटालों की मारक क्षमता कम हो जाएगी? जाहिर है कि आम लोगों तक तो वे पहुंचेंगी ही। ऐसे कदम एक सरकार की बदहवासी और डर को जाहिर करते हैं और उस पर कमजोर सरकार का बिल्ला भी चस्पा कर देती हैं। तानाशाही सनकों से भरे ऐसे फैसलों के बावजूद न छोटे अखबार डर रहे हैं और न मुख्यमंत्री के खिलाफ खबरें छापने से बाज आ रहे हैं। यह एक तरह से छोटे प्रेस की गुरिल्ला लड़ाई है जो सत्ता के महाबली शिखर पुरुष पर हमले कर उसे बेचैन किए हुए है। जिसने मुख्यधारा के मीडिया को लौह कपाट वाले अपने काले-कलूटे गेट पर चौकीदारी के लिए बांध दिया है, ऐसे शिखर पुरुष के खिलाफ छोटे अखबारों की यह लड़ाई महत्वपूर्ण भी है और सत्ताधारियों के लिए चेतावनी भी है कि वे समूचे प्रेस को दुम हिलाने वाला पालतू पशु में नहीं बदल सकते। कुछ लोग हर समय रहेंगे जो सत्ता के खिलाफ सच के साथ रहने का जोखिम उठायेंगे। यह सिलसिला चलता रहेगा। उल्लेखनीय यह है कि चारणकाल में सच कहने की जुर्रत करने वाले इन सारे छोटे अखबारों,पत्रिकाओं की कुल प्रसार संख्या मुश्किल से कुछ हजार ही है। जो लाखों छपने और बंटने वाले दैनिक अखबारों की दस फीसदी भी नहीं है लेकिन इतनी कम संख्या के बावजूद राज्य के मुखिया इनसे घबराये हुए हैं। लाखों पाठक और दर्शक संख्या वाले अखबार और चैनलों सुबह-शाम प्रशस्ति वाचन के कर्मकांड में लगे हुए हैं तब भी विरोध की इन तूतियों से राजा क्यों हैरान हैं? दरअसल इन अखबारों ने खबरों के असर के उस तिलिस्म को तोड़ दिया है जो बड़े अखबार प्रचारित करते रहे हैं। खबरों पर बड़े अखबारों का एकाधिकार ही नहीं टूटा है बल्कि उनकी सीमायें, दरिद्रता और दयनीयता भी उघड़ गई है। पत्रकारिता के इस समर में वे कागजी शेर साबित हो रहे हैं,उनकी कथित ताकत का मिथक टूट रहा है। जनमत को प्रभावित करने में उनकी भूमिका अब सिफर हो गई है। उनकी हर खबर पर उंगलियां उठती हैं और उसे सत्ता या स्थानीय ताकतवर लोगों के हाथों बिकी हुई खबर मान लिया जाता है। उन्हे खबरों का सौदागर करार दिया जा रहा है। उनके दफ्तरों में सच को कत्ल करने के लिए जो कसाईबाड़े बने हैं उनकी दुर्गंध अब जनता तक पहुंचने लगी है। राज्य के लोग समझ रहे हैं कि राजा नंगा है पर खबरों के ये दुकानदार उसके कपड़ों के डिजायन की तारीफ में पन्ने रंग रहे हैं। मुख्यधारा के समाचार माध्यमों की साख के इस तरह निम्नतम स्तर पर पहुंच जाने से ही आम लोग खोज-खोज कर सरकार विरोधी खबरें पढ़ रहे हैं। इससे इतना तो पता चल ही जाता है कि लोगों का रूझान बदल रहा है,जिस पाठक को मीडिया के महारथी ‘विचारविहीन उपभोक्ता’ प्राणी घोषित कर चुके हैं उसका मिजाज बदल रहा है। वह बदलाव के मोर्चे पर भले ही लड़ाई नहीं लड़ रहा हो पर वह सत्ताधरियों के काले सच को विचार के साथ जानना चाहता है। उत्तराखंड कभी भी वैचारिक रुप से गंजे लोगों की नासमझ भीड़ नहीं रहा है। उसके भीतर सच जानने को उत्सुक समाज है। लोकप्रियता में आये इस उछाल से छोटे अखबारों को भी मुगालते में नहीं रहना चाहिए। यह उनका नहीं उस सच का चमत्कार है जो वे छाप रहे हैं। छोटे अखबार यदि अपने हीनताबोध से उबर सकें तो वे साबित कर सकते हैं कि अखबार बड़े या छोटे नहीं होते, ये खबरें हैं जो अखबारों को बड़ा बनाती हैं तो उन्हे छोटा भी साबित कर देती हैं। खबरों की मारक सीमा और क्षमता हर साल जारी होने वाले प्रसार संख्या के निर्जीव और गढ़े गए आंकड़ों से तय नहीं होती। खबरों में सच और दम होता है तो वे एक मुख से दूसरे मुख तक होते हुए या फोटोस्टेट होकर भी कई गुना घातक हो जाती हैं। सच और अपने समाज की समझ मामूली माने जाने वाली खबरों को भी कालजयी बना देती है।उत्तराखंड के पत्रकारिता क्षितिज पर घट रही यह छोटी सी घटना बताती है कि देश के स्तर पर पत्रकारिता को समर्पित छोटे अखबारों,चैनलों और इंटरनेट अखबारांें के बीच यदि राष्ट्रीय स्तर पर तालमेल और संवाद स्थापित हो सके तो जनपक्षीय पत्रकारिता का एक बड़ा गठबंधन भविष्य में उभर सकता है। यह कठिन है पर इस दिशा में गंभीर प्रयास शुरू किए जाने चाहिए। मीडिया हाउसों के एकाधिकारवादी भस्मासुरों के खिलाफ यह पत्रकारिता के जनतंत्राीकरण और विकेंद्रीकरण की शुरूआत हो सकती है।

1 टिप्पणी:

  1. sir apka lekh padkar akhbaro ki frazi khabro ke bare me pta chala or jis des me media power itna mehtav rakhti h us des me media ka is terah se sarkar ke paksh me ho jana ek chinta ka vishay h..........

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