दो दशकों की सबसे भीषण मंहगाई और दो बार सत्तारुढ़ रहने से उपजा सत्ताविरोधी रुझान फिर भी भाजपा को महाराष्ट्र में मुंह की खानी पड़ी । लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के हाथों मात खा चुकी भाजपा के लिए यह कोई मामूली झटका नहीं है बल्कि इसका संदेश दूरगामी है । हरियाणा से लेकर अरुणाचल और महाराष्ट्र तक कहीं से भी उसके लिए दिल बहलाने के लिए भी कोई खबर नहीं है ।देश में सवाल पूछा जाने लगा है कि क्या भाजपा के दिन लद चुके हैं ? क्या भारतीय राजनीति में वह अप्रांसगिक हो चुकी है ? निश्चित तौर पर भाजपा के लिए यह कठिन समय है । बिडंबना यह है कि ऐसे वक्त में उसके पास न तो वाजपेयी जैसा नेता है जो अपनी छवि के बूते उदार हिंदुओं को मोह सके और न बाबरी मस्जिद जैसी कोई निर्जीव और कमजोर खलनायक जो उसकी झोली वोटों से भर दे ।
एक दल के रुप में भाजपा के सामर्थ्य और सीमाओं पर बात करने से पहले महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव नतीजों का विश्लेषण किया जाना जरुरी है । महाराष्ट्र में दस सालों से कांग्रेस की सरकार है और घोर कांग्रेसी भी यह मानेगा कि महाराष्ट्र में सरकार के खाते में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसके बूते उसे तीसरी बार सत्ता में बैठने का नैतिक अधिकार दिया जा सके । न तो उसके पास शीला दीक्षित की तरह विकास की जादुई छड़ी थी और न बेहतर कानून व्यवस्था और साफ-सुथरा प्रशासन कायम करने का यश । जनता के पास ऐसा कोई कारण नहीं था कि वह कांग्रेस को वोट दे ।इन सबसे ऊपर पिछले दो दशकों की ऐसी भीषण महंगाई है जिससे सिर्फ देश का गरीब तबका ही नहीं बल्कि मध्यवर्ग और उच्च मध्यवर्ग भी त्राहिमाम कर रहा है । लोगों की रोजी और रोटी दोनों खतरे में डाल दी गई हों , उनके भोजन की बुनियादी जरुरत दाल को रातों रात गायब कर दिया गया हो तब भी देश का सबसे मुखर और बड़बोला विपक्ष हार जाय ! महाराष्ट्र में भाजपा की हार को इसीलिए मामूली घटना मानकर हवा में नहीं उड़ाया जा सकता । क्योंकि यह प्रतिपक्ष के रुप में उसकी राजनीति और रणनीति के साथ नेतृत्व की भी हार है । भाजपा के नेतृत्व को राजनीतिक हालातों की कितनी समझ है इसका अंदाजा हरियाणा में अकेले चुनाव लड़ने के उसके फैसले से लगाया जा सकता है । यदि भाजपा इनेलो के साथ वहां चुनाव लड़ती तो हरियाणा से कांग्रेस का बिस्तर बंध गया होता । पार्टी ने यह फैसला तब भी वापस नहीं लिया जब हुड्डा ने विपक्ष में बिखराव देखते हुए समय से पहले चुनावों का ऐलान कर दिया । भाजपा के नेतृत्व ने संकीर्ण दलीय हितों के बजाय अपने दूरगामी हित सोचे होते तो उसे हरियाणा में मुंह छिपाने की जगह मिल गई होती ।दरअसल वस्तुगत परिस्थितियां विपक्ष के साथ होने के बावजूद यदि वह हार गई तो उसे अपने गिरेबान में झांकना चाहिए ।एमएनएस को वोट बंटवारे का दोषी ठहराने की कवायद खंभा नोचने जैसा खिसयाया विश्लेषण है ।क्या भाजपा इतनी नादान पार्टी है कि उसे यह भी पता नहीं कि लोकतंत्र में कोई न कोई वोट बांटने वाला हर चुनाव में मौजूद रहेगा । उसके वोट न बंटे यह पुरुषार्थ तो उसे ही दिखाना है ।भाजपा या किसी भी विपक्षी दल को वोट देने के लिए जनता के पास कोई वैध कारण और तर्क होना चाहिए । जनता को यदि यह भरोसा है कि अमुक दल के सत्ता में आने से उसके हालात बदलेंगे तो वह परिवर्तन के लिए वोट देगा । मनुष्य का स्वभाव परिवर्तन की इच्छा और यथास्थिति बनाए रखने की चाह का घालमेल है । परिवर्तन की पक्षधर ताकतें लोगों में यदि बेहतर कल के सपने को संचरित करने में कामयाब रहती हैं तो आम लोग परिवर्तन के पक्ष में लामबंद हो जाते हैं अन्यथा लोग जड़ता में पड़ा रहना पसंद करते हैं । जड़त्व का नियम सिर्फ निर्जीव वस्तुओं पर लागू नही होता वह समाजों और लोगों पर भी लागू होता है ।वस्तुओं की तरह समाज भी तभी आगे या पीछे सरकते हैं जब उन्हे कोई हिलाता - डुलाता है ।
यदि सन् 2004 से लेकर 2009 तक भाजपा की राजनीतिक सक्रियता का विश्लेषण किया जाय तो यह आईने की तरह स्पष्ट है कि इन पांच सालों में भाजपा ने ऐसा कोई पुरुषार्थ नहीं दिखाया कि वह उत्तर भारत की जनता को अपने पक्ष में वोट करने को प्रेरित कर सके ।इसे यूं भी कहा जा सकता है कि उसने लोकतंत्र में प्रतिपक्ष का अपना धर्म नहीं निभाया । भाजपा को इस मुगालते में रहने का अधिकार है कि संसद में मात्र उसका संख्याबल ही उसे देश का मुख्य प्रतिपक्षी दल बना देता है , पर व्यवहार में ऐसा है नहीं ।यदि राजनीतिक दल जनता के लिए निरंतर संघर्ष कर राजनीतिक पूंजी नहीं बटोरते तो उनका पूर्व के संघर्षों का संचित पुण्य भी क्षरित होने लगता है और एक दिन ऐसा भी आता है कि वे अतीत की पार्टियां बन जाती हैं । क्या भाजपा के साथ भी यही दोहराया जाने वाला है ? भाजपा की मुश्किल यह है कि वह सत्ता में तो आना चाहती है लेकिन उसके लिए जमीन पर लड़ना नही चाहती । उसके नेता अब सत्ता में आने के लिए सत्ता विरोधी रुझान के भरोसे बैठे हैं । उन्हे लगता है कि यह असंतोष उन्हे प्रतिपक्ष से उठाकर सत्ता में बैठा देगा ।सत्ता की राजनीति ने एक जमाने की इस लड़ाकू दक्षिणपंथी पार्टी को आरामतलब और शाही विपक्ष में रुपांतरित कर डाला है ।विहिप और आरएसएस जरुर चुनावों के आसपास यात्रायें और आक्रामक अभियान चलाकर उसके लिए हिंदू वोटों का जुगाड़ करते हुए दिखाई देते हैं । बदले हुए समय में संघ परिवार के ये उपक्रम कट्टर हिंदुओं को तो उसकी झोली में बनाए रखते हैं पर नया कुछ जोड़ते नहीं ।
अटल बिहारी वाजपेयी के राजनीतिक परिदृश्य से हटने के बाद उसके पास मध्यवर्ग को भा जाने वाला नेता नहीं है और कट्टरपंथी राजनीति की सीमायें बाबरी मस्जिद कांड के बाद साफ हो चुकी हैं ।करिश्माई नेता के नाम पर उसके पास सिर्फ नरेंद्र मोदी है लेकिन वह उन्ही हिंदुओं के नायक हैं जो पहले ही भाजपा के साथ हैं । राजनीतिक संस्कृति और आर्थिक नीतियों के सवाल पर भाजपा कांग्रेस का विकल्प नहीं बल्कि पूरक है । महंगाई,कालाबाजारी,जमाखोरी , मिलावटबाजी और रोजगार असुरक्षा के मुद्दे पर दोनों दलों ने आपस में राष्ट्रीय सहमति कायम कर ली है ।यानी दोनों दलों में कोई भी सत्ता में आए ये समस्यायें ऐसी ही रहेंगी ।जब जनता को यह बुनियादी बात पता है कि भाजपा के सत्ता में आने पर भी उसे कोई राहत नहीं मिलनी है तब वह क्यों भाजपा के पक्ष में खड़ी हो ? रही बात उच्च वर्ग की , तो वह मनमोहन सिंह , चिदंबरम से खुश है ही , इसलिए मीडिया भी उन पर मुग्ध है ।सवाल यह है कि ऐसी स्थिति में भाजपा किस वर्ग की राजनीतिक जरुरत है जो उसे सत्ता में आता हुआ देखना चाहेगा ? इस सवाल का जवाब ही तय करेगा कि भाजपा का क्या होगा ।भाजपा के लिए यह समय अपनी पूरी राजनीति पर समग्रता से सोचने का है । उसे तय करना होगा कि 21वीं सदी के भारत को क्या वह जनसंघ के नजरिये से देखना चाहती है या फिर कोई नया प्रस्थान बिंदु खोजना चाहती है । उसे ही तय करना है कि वह स्वायत्त राजनीतिक दल बनेगा या आनुषांगिक संगठन की नियति स्वीकार करेगा ।
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शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2009
कठिन वक्त में भाजपा
शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009
चिदंबरम के भारत को चाहिए गुलाम आदिवासी
देश के न्यूज चैनलों में इन दिनों एक बच्चे का रुदन है और उसका गुस्सा भी है, जिसमें वह बड़ा होकर पुलिस बनने की शपथ ले रहा है। आज से लगभग 10 साल बाद वह बच्चा जब पुलिस में भर्ती होने लायक होगा तब तक पुलिस कांस्टेबल के पद पर भर्ती होने की घूस कितनी होगी, यह कड़वा सच वह बच्चा नहीं जानता पर चैनल वाले जानते हैं लेकिन बताते नहीं क्योंकि सच बताने से उनकी नक्सलवाद विरोधी मुहिम की पोल खुल सकती है ।
न्यूज चैनलों के खबरनवीस और मालिक लोग चूंकि चिदंबरम के भारत के गणमान्य नागरिक हैं इसलिए ऐसे समय में जब पूरा देश मंहगाई और आर्थिक असुरक्षा से त्राहिमाम कर रहा है तब वे नक्सलवाद से परेशान हैं । हम सबको याद है कि नक्सलवाद के खिलाफ चैनलों के दुलारे चिदंबरम दरअसल इस देश और पाश्चत्य दुनिया में उदारीकरण के पोस्टर ब्वाय रहे हैं । वह भारतीय भद्रलोक के सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली प्रतिनिधियों में से एक हैं । अपने लोकसभा क्षेत्र में चमत्कारिक ढंग से हारते - हारते बचे चिदंबरम के नक्सलवाद विरोधी अभियान के गहरे अर्थ हैं । एक तो यह है कि यूपीए सरकार महंगाई के मोर्चे पर बुरी तरह विफल हुई है । समूचा मध्यवर्ग मंहगाई की मार से त्राहिमाम कर रहा है और केंद्र सरकार और राज्य सरकारें जमाखोरों और मुनाफाखोरों के आगे नतमस्तक हैं । आम लोगों में नौकरियां जाने और मंहगाई की दोहरी मार से गुस्सा है । यह गुस्सा लोगों को नक्सलवाद की ओर धकेल सकता है इससे चिदंबरम और उनका प्रभुवर्ग डरा हुआ है । नक्सलवादियों को तालिबानी टाइप के आतंकवादी के रुप में प्रचारित करने से उनके प्रति आम लोगों के झुकाव को रोका जा सकता है । तीसरा कारण यह है कि मध्यवर्ग आम तौर पर भावुक किस्म का देशभक्त होता है जिसके लिए देशभक्ति सीमा पर लड़ने और आतंकवाद के खिलाफ झंडा बुलंद करने तक सीमित होती है । नक्सलवाद के प्रति मध्यवर्ग के एक छोटे से हिस्से की सहानुभूति रही है । इसमें गांधीवादी, समाजवादी और विभिन्न आदर्शवादी विचारों से जुड़े वे लोग शामिल हैं जो देश के वंचित तबकों के मौजूदा हालातों में बुनियादी बदलाव लाने का सपना देखते हैं । मध्यवर्ग का यही हिस्सा है जो आदिवासियों और गरीबों के साथ पुलिस-प्रशासन,सरकार की ज्यादतियों को एक्सपोज कर देता है। इसलिए भी चिदबंरम चाहते हैं कि मध्यवर्ग में नक्सलियों की छवि देशद्रोही के रुप में स्थापित की जाय। ताकि इस वर्ग में नक्सलियों से सहानुभूति रखने वाले सीमित रहें। यह इसलिए है कि भारत का भद्रलोक देश में विशाल मध्यवर्ग के उभार से चिंतित भी है। उसके लिए यह वर्ग तभी तक प्रिय है जब तक वह उसके उत्पादों को खरीदता रहता है लेकिन यह वर्ग जैसे ही विचारधारा और बुनियादी बदलाव की बात पर आता है तो भद्रलोक चौकन्ना हो जाता है । उसे अपनी रोजी-रोटी कि चक्कर में घनचक्कर बना विचारहीन मध्यवर्ग तो चाहिए लेकिन समाज के मौजूदा ढ़ांचे को सर के बल खड़ा करने वाला सरफिरे(!) विचार के साथ नहीं।
एक और कारण है जिसके चलते माओवादी चिदंबरम और उनके भारत को सबसे ज्यादा चुभ रहे हैं । भारत के झारखंड , छत्तीसगढ़ और उड़ीसा जैसे राज्यों के आदिवासी इलाके संयोग से खनिज संपदा के खजाने भी हैं । इन इलाकों पर सदियों से बाहरी लुटेरों की नजर रही है। इस दौड़ में मल्टीनेशनल कंपनियां भी शामिल हैं । इन इलाकों में माओवादियों के वर्चस्व के चलते सरकार चाहकर भी इन कंपनियों को जमीन से लेकर सुरक्षा तक जरुरी सुविधायें नहीं उपलब्ध करा पा रही है। हाल ही में स्टील किंग लक्ष्मी निवास मित्तल द्वारा फैक्टरी न लगाने की धमकी को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए । यदि आदिवासी इलाकों को मल्टीनेशनल की चारागाह के रुप में विकसित किया जाना है तब आदिवासी प्रतिरोध को जड़मूल नष्ट करना चिदंबरम के भारत की जरुरत है। यह भारत दरअसल कई खतरों से दो चार है। मजदूर आक्रामक हो रहे हैं और वे उद्योगों के आला अफसरों पर हमला कर रहे हैं । शहरी भारत गरीबी के महासागर से घिरा है । आर्थिक विषमता भयावह रुप से बढ़ रही है जिसके परिणामस्वरुप आम जीवन में हिंसा बढ़ रही है। मामूली विवाद भी हिंसक रुप ले रहे हैं । यह फुटकर और निजी किस्म हिंसा है जो कि सरकारी आर्थिक नीतियों की अप्रत्यक्ष हिंसा का काउंटर प्रोडक्ट है। यह सब उस भारत को संकटग्रस्त कर रहा है जो आर्थिक कुंठाओं की सुनामी के बीच एक टापू बनकर रह गया है ।
इसीलिए कारपोरेट न्यूज चैनलों से लेकर चिदंबरम तक इलीट भारत नक्सलवाद का ऐसा हौवा खड़ा कर रहा है जिससे भारत की एक फीसदी जनता भी प्रभावित नहीं है और जिससे भारत के दो प्रतिशत समृद्ध आबादी के अलावा किसी को खतरा नहीं है। जब जनता के नाम पर नक्सलियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो सकती है तो चिदंबरम और राज्यों की पुलिस कालाबाजारियों व जमाखोरों के खिलाफ उतना सख्त रुख क्यों नहीं अपनाती । जबकि ये लोग देशद्रोही और जनता के दुश्मन नं0 1 हैं । क्या हम ऐसे अभिजात्य लोकतंत्र में रह रहे हैं जिसमें देश के सर्वशक्तिमान दो प्रतिशत हिस्से के दुश्मनों के खिलाफ तो कार्रवाई होती है पर 98 फीसदी लोगों के शत्रुओं को जनद्रोह करने की आजादी है।
माओवादियों की हिंसा पर अनेक सवाल उठाए जा सकते हैं और उठाए जाते रहेंगे । शायद माओवादियों को भी भविष्य में इस सवाल से जूझना पड़े । जैसा विषम और अन्यायपूर्ण भारत मनमोहन, चिदंबरम और उनका प्रभुवर्ग बना रहा है उसमें हिंसक टकराव होते रहेंगे। सेना को नक्सलियों के मैदान में उतारने से सेना की छवि को तो नुकसान होगा ही साथ ही यह कदम आने वाले 25-30 सालों में गृहयुद्ध की पटकथा भी लिख देगा । चिदंबरम भारत को सीमित नागरिक आजादी वाला पुलिस राज्य बनाने की ओर चल पड़े हैं । पहला हमला आदिवासियों पर हो रहा है । यदि यह कामयाब रहा तो आदिवासी तीरकमान के साथ फिर कभी लड़ते नहीं दिखाई देंगे । चिदंबरम के भारत का आदिवासी उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के मंच पर तीर कमान थामे तो दिखेगा पर बस्तर से लेकर संथाल और अबूझमाड़ की अपनी धरती पर हक के लिए तीर कमान के साथ नहीं बल्कि मजदूर के रुप में मल्टीनेशनल कंपनियों के अफसरों के सामने घुटने टेके दिखेगा । यदि यह हमारे सपनों का भारत है तो पाश के शब्दों को दोहराते हुए कहना चाहूंगा कि इस देश से मेरा नाम काट दो ।
सोमवार, 21 सितंबर 2009
रिपोर्ताज ‘रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून’
मानव के आदिम इतिहास में महाद्वीपों के इस छोर से उस छोर को नंगे पैरों से नापने वाले कितने काफिलों, कितने लश्करों अपने डेरे पानी से लबालब नदियों किनारे डाले तो फिर हिले नहीं । दुनिया की महान सभ्यतायें इन नदियों के पानी में स्नान कर या वजू कर खुद को धन्य मानती रहीं । इन आदिम काफिलों में से अनेक जब एंडीज, आल्प्स से लेकर हिंदूकुश और हिमालय के पहाड़ों से गुजरे तो उनके कदम वहीं थम गए और पहाड़ी झरनों और चश्मों के करीब उन्होने अपनी बस्तियां बसा डालीं । वे कबीले थे और आदिम भी मगर हजारों साल पहले वे मानव अस्तित्व का मूलमंत्र जानते थे । उन्हे पता था कि जहां पानी है , जीवन भी वहीं है । पानी के करीब, पानी की सरपरस्ती में सभ्यतायें सरसब्ज होकर फलती - फूलती रहीं । उन्होने नदियों की शान में जटिल काव्यमय ऋचायें, मंत्र रचकर उनके प्रति अपनी कृतज्ञता भी जताई । नदियां बची रहें , पानी न सूखे इसलिए वे नदियों और पानी को पवित्र घोषित कर गए । सफर आगे बढ़ा तो पनघटों में गीत गूंजने लगे । प्यार की कितनी ही कहानियों ने पानी भरने के दौरान अंगड़ाईयां लीं ,पनघटों की शीतलता के बीच ये कहानियां जवान भी होती रही होंगी । वे किस्से फिर गीत बनकर अगली पीढ़ियों को कभी दर्द से भिगोती रहीं तो कभी रोमांस के रोमांच से गुदगुदाती रहीं । तब पनघट पर मीठी ठिठोलियां या छेड़खानियां हुआ करती थीं ।इसी माहौल पर जब ‘‘मोहे पनघट पे नंदलाल छेड़ गयो रे’’ जैसे गीत आया तो पनघट जैसे और भी रुमानी हो गए ।
लेकिन सभ्यता का सफर अब नाजुक मुकाम पर पहुंच गया है । पानी को लेकर जो रुमानी संसार 19 वीं और 20 वीं सदी में रचा गया था वह खंड-खंड होकर बिखर गया है । गीतों की गूंज के बदले गालियों का शोर है । पानी भरने के दौरान प्यार श् नहीं झगड़े हो रहे हैं । पहाड़ ऊपर से चाहे कितने सख्त और रुखे क्यों न लगते रहे हों लेकिन सबसे ज्यादा पानी उन्ही के पास रहा है । यहां तक कि वे नंग-धड़ंग काले कलूटे पहाड़ भी,जो अपनी छाती पर पेड़ तो दूर नाजुक-नरम घास को भी जड़ें जमाने की इजाजत नहीं देते, उनके भीतर भी पानी के असंख्य सोते छलछलाते रहे हैं । हजारों-हजार झरनों,चश्मों के संगीत से गंूजने वाला गंगा और यमुना का यह मायका भी जल अभाव से होने वाले कलह से अछूता नहीं रहा । पहाड़ी समाज को आम तौर पर लड़ाई-झगड़े से दूर रहने वाला और शांतिप्रिय माना जाता रहा है, पर पानी के संकट से इसका मिजाज बदल रहा है । संयम टूट रहा है , लोग चिड़चिड़े और परले दर्जे के स्वार्थी होते जा रहे हैं । वहां भी पानी को लेकर सर फूट रहे हैं । गाली-गलौच के बीच लगता ही नहीं कि आप उस पहाड़ में हैं जिसके लोगों की भलमनसाहत का कायल सात संमदर पार से आया अंग्रेज एटकिंशन भी रहा,जिसने 19 वीं सदी में लिखे अपने ‘‘एटकिशन गजेटियर’’ यहां के लोगों की सज्जनता की शान में कसीदे पढ़े थे ।
लगभग 170 साल की लंबी यात्रा में पौड़ी के लिए यह पहला मौका है जब उसे एक-एक बूंद पानी के लिए तरसना पड़ा। यह सचमुच एक कठोर और कठिन साल रहा जब पौड़ी के लोगों को पानी के लिए रतजगा करना पड़ा । बात यहीं तक होती तो गनीमत थी । पानी के लिए वहां झगड़े भी हुए,सर भी फूटे । लोगों का गुस्सा आपस में भी फूटा तो प्रशासन पर भी । नगर पालिका के चेयरमैन से लेकर पानी बांटने वाले विभाग के अफसर तक पिटे ।
बद्रीनाथ के रास्ते पर एक कस्बा है गौचर । 19 वीं सदी के उत्तरार्ध में दो-चार घरों की इस चट्टी में बद्रीनाथ के यात्री अपनी थकान उतारते थे । 25-30 साल पहले भी यह छोटी सी बस्ती हुआ करती थी । दूर-दूर तक फैले समतल खेत इसे सुंदर भी बनाते हैं और बसने के लिए एक माकूल जगह भी । इसलिए हाल के वर्शों में गौचर में आबादी बढ़ी और पानी की खपत भी बढ़ी पर पुराने सोते एक-एक कर सूखते रहे । अब हर गर्मियों में पानी के लिए जूझना, भिड़ना गौचर के जीवन का हिस्सा बन चुका है । लेकिन ये गर्मियां गौचर पर भी भारी गुजरीं । पानी को लेकर यह तस्वीर सिर्फ इन दो कस्बों की नहीं है । राज्य के दो दर्जन से ज्यादा कस्बों में पानी को ले कर हाहाकार मचा । पानी को लेकर सर फुटव्वल, लड़ाई, झगड़े धरना,प्रदर्शन और अफसरों का घेराव जैसे वाकये आम होते जा रहे हैं । पर तस्वीर इससे ज्यादा भयावह और चिंताजनक है । उत्तराखंड की एक तिहाई बस्तियां जल संकट से ग्रस्त हैं । हजार से ज्यादा गांवों में पानी बिल्कुल सूख गया है । लगभग सात हजार गांव ऐसे हैं जिनमें जल श्रोतों का प्रवाह आधे से लेकर 70 फीसदी तक कम हो गया है । राज्य में ऐसा कोई गांव नहीं है जिसमें पानी के श्रोत में पानी कम न हुआ हो । अपने वेग और गर्जना से डराने वाली भागीरथी इतनी दुबली-पतली हो गई है कि उसे देखकर तरस आता है कि आदमी ने एक भरी-पूरी नदी की क्या गत बना दी है । यही हाल अलकनंदा जैसी पानी से लबालब धीर गंभीर नदी का भी है भागीरथी में पानी कम होने से दस हजार करोड रुपए़ की लागत और एक लाख की आबादी को उजाड़ कर बना टिहरी बांध तीन सालों में ही दम तोड़ने लगा है । वनों से पोषित नदियां ही नहीं बल्कि ग्लेसियरों से पैदा होने वाली नदियों में भी पानी तेजी से घट रहा है । पनबिजली परियोजनाओं के बूते अपनी अर्थव्यवस्था को बेहतर करने का सपना खतरे में है ।
यदि पानी के श्रोतों के सूखने की रफ्तार यही रही तो भी अगले दस वर्षों में पहाड़ के अस्सी फीसदी गांवों में पानी के लिए त्राहि-त्राहि मची होगी लेकिन इन सुदूर गांवों में पानी पहुंचाने में सरकार के पसीने छूट जायेंगे । प्रदेश में पानी को लेकर दंगों के हालात बन जायेंगे । एक ओर शहरी आबादी के लिए पेयजल योजनायें बनाने में सरकार को अपने अधिकतम संसाधन झोंकने होंगे । नदियों का पानी चिंताजनक रुप से कम हो जायेगा । वन पोषित अधिकांश नदियां या तो सूख चुकी होंगी ।
सन््् 1970 के बाद समय बदलने लगा था । जो प्रकृति हिमालय के इन पहाड़ों पर मेहरबान थी,हमारे लालचों और लुटेरे मानव गिरोहों की हरकतों के चलते वह रूठने लगी थी । हर समय छलछलाते रहने वाली जलधारायें चुपके-चुपके दम तोड़ रही थीं । सदियों से हमारी प्यास के ये साथी बीमार थे और इस कारण कमजोर होते जा रहे थे । लेकिन हम कभी समझ ही नहीं पाए कि हमारा सबसे करीबी दोस्त और पहाड़ की जीवनरेखा बीमार है । हम एक सोते के सूख जाने पर दूसरे श्रोत तक जाते रहे । लेकिन पहले वाला क्यों रुठकर गायब हो गया ,यह हमें कभी पता भी नही चला । सातवें-आठवें दशक तक पानी गांव से दूर भागने लगा था । गांव से दूर होते इस पाणी को लेकर बहुओं का दुख अब लोकगीतों में बोलने लगा था । मुझे अपने बचपन का वह समय याद आता है जब माॅं पानी लेकर लौटती थी तो उसके चेहरे पर थकान साफ-साफ बोल रही होती थी । निरंतर दूर होते जा रहे पानी के कारण ही बरसात होने पर वह पतनालों के नीचे बड़े बर्तन रख देती थी । इनके भर जाने के बाद पतीलियां,लोटे भी लगे हाथ भर लिए जाते थे । इन बर्तनों में गिरती बारिश की बंूदों का भी एक संगीत होता था । हर बर्तन का अपना खास संगीत ! खाली बरतन पर गिरती बंूदों का संगीत अधभरे बर्तन से अलग होता था । ज्यांे-ज्यों बर्तन भरता जाता था वह गुरु गंभीर आवाज में गूंजने लगता था । बर्तन आकंठ भर कर पानी अब बाहर बहने लगा है ,इसका पता भी बारिश का यही संगीत देता था । हम नींद में भी इस संगीत का मजा लेते थे , वे बरसातें और उनका वह संगीत आज भी स्मृतियों में गूंजता है । बूंदों की भाषा में खाली और भरे बर्तन का फर्क बताने वाला वह संगीत बेहद याद आता है ।
पहले पानी के श्रोत गायब हुए पर अब ऐसा वक्त आ गया है कि हैंडपंप भी संकट में हैं। पानी की तलाश में उन्हे हर साल धरती की कोख में और गहरे धंसना पड़ रहा है । बावजूद इसके एक-दो साल में ही उनका गला भी सूखने लगता है और देखते ही देखते वे दम तोड़ देते हैं । पहाड़ों पर सैकड़ों हैंडपंपों के अस्थिकलश बता रहे हैं कि कभी यहां भी पानी था ।
प्रख्यात कवि,कथाकार रसूल हमजातोव के ‘‘मेरा दागिस्तान’’ के एक किस्से में झुकी हुई कमर और झुर्रीदार चेहरे वाली एक बुढ़िया है जो पानी की उम्मीद में हर रोज फावड़े से जमीन खोदती है । हर सुबह वह उम्मीद से खोदना शुरु करती है और हर तलाश के बाद निराश कदमों से लौटती है । रसूल के किस्सों की वह बुढ़िया कहीं मेरा पहाड़ तो नहीं जो पानी खोज रहा है और उसे पानी का श्रोत ढंूढे नहीं मिल रहा ! गढ़वाल की लोककथाओं में प्यास से बेचैन एक चिड़िया का जिक्र आता है जो कातर स्वर में आसमान से पानी मांगती रहती है । गरमियों की उदास दोपहर में इस चिड़िया के स्वर की कातरता विचलित करती है । आने वाले सालों में क्या पूरा पहाड़ इस चिड़िया में बदलने वाला है, कौन जानता है ? रहीम बहुत पहले चेता गए थे कि बिना पानी के सब सूना है । हम इन पंक्तियों की संदर्भ सहित व्याख्या करने और विद्वान उन पर पोथी लिखने में लगे रह गए और उधर पानी सिधार गया ।
सभ्यता की इस यात्रा में हमने बहुत कुछ ऐसा खोया जो हमारे वजूद के लिए जरुरी थे । इनमें अधिकांश प्राकृतिक रुप से हमारे मित्र और करीबी रिश्तेदार भी थे । पेड़-पौधे, पशुू-पक्षी और बर्फ जैसी असंख्य नेमतें हमसे रुठ रही हैं । हर साल बर्फ आती और धरती की सारी खुश्की को अपने आॅंचल में समेट लेती । झक सफेद बालों वाली यह बर्फ किसी बुजुर्ग की तरह कभी नरम तो कभी सख्त रुप में पेश आती पर महीनों तक खेत,खलिहान और आॅंगन को अपने स्नेह से भिगोती रहती थी । लाख हटाने के बाद भी जीम रहती थी । अब वही बर्फ मेहमानों की तरह फिल्मी नायिकाओं के नाज-नखरों के साथ आती है और सरकारी कर्मचारियों के अंदाज में ड्यूटी बजा कर गायब हो जाती है । हमने हिरन के करीबी बंधु-बांधवों घुरड़,काखड़ जैसे मासूम जानवरों से उनके जंगल छीन लिए । रंग-बिरंगी नाजुक चिड़ियाओं से उनके गीत गाने की वजह छीन ली । अपने सबसे करीबी बुजुर्गों पीपल, बरगद और नीम को हमने आऊट डेटेड घोषित कर उन्हे दरवाजा दिखा दिया । शीतल हवा और बर्फ सा ठंडा पानी देने वाले बांज जैसे सबसे अनमोल मित्र को हमने अच्छी क्वालिटी के कोयले के लिए लालच की भट्टी में झोंक दिया । जिन दुर्लभ और अनमोल प्रजातियों की रचना करने में प्रकृति ने हजारों-हजार साल खपा दिए उन्हे मिटाने में हमने एक सदी भी नहीं लगाई । हमारी इन निर्ममताओं और आत्मघाती हरकतों पर कुदरत भला क्यों खफा न हो । उसके दंड कीशुरुआत हवा और पानी से हो चुकी है ।
लेकिन सभ्यता का सफर अब नाजुक मुकाम पर पहुंच गया है । पानी को लेकर जो रुमानी संसार 19 वीं और 20 वीं सदी में रचा गया था वह खंड-खंड होकर बिखर गया है । गीतों की गूंज के बदले गालियों का शोर है । पानी भरने के दौरान प्यार श् नहीं झगड़े हो रहे हैं । पहाड़ ऊपर से चाहे कितने सख्त और रुखे क्यों न लगते रहे हों लेकिन सबसे ज्यादा पानी उन्ही के पास रहा है । यहां तक कि वे नंग-धड़ंग काले कलूटे पहाड़ भी,जो अपनी छाती पर पेड़ तो दूर नाजुक-नरम घास को भी जड़ें जमाने की इजाजत नहीं देते, उनके भीतर भी पानी के असंख्य सोते छलछलाते रहे हैं । हजारों-हजार झरनों,चश्मों के संगीत से गंूजने वाला गंगा और यमुना का यह मायका भी जल अभाव से होने वाले कलह से अछूता नहीं रहा । पहाड़ी समाज को आम तौर पर लड़ाई-झगड़े से दूर रहने वाला और शांतिप्रिय माना जाता रहा है, पर पानी के संकट से इसका मिजाज बदल रहा है । संयम टूट रहा है , लोग चिड़चिड़े और परले दर्जे के स्वार्थी होते जा रहे हैं । वहां भी पानी को लेकर सर फूट रहे हैं । गाली-गलौच के बीच लगता ही नहीं कि आप उस पहाड़ में हैं जिसके लोगों की भलमनसाहत का कायल सात संमदर पार से आया अंग्रेज एटकिंशन भी रहा,जिसने 19 वीं सदी में लिखे अपने ‘‘एटकिशन गजेटियर’’ यहां के लोगों की सज्जनता की शान में कसीदे पढ़े थे ।
लगभग 170 साल की लंबी यात्रा में पौड़ी के लिए यह पहला मौका है जब उसे एक-एक बूंद पानी के लिए तरसना पड़ा। यह सचमुच एक कठोर और कठिन साल रहा जब पौड़ी के लोगों को पानी के लिए रतजगा करना पड़ा । बात यहीं तक होती तो गनीमत थी । पानी के लिए वहां झगड़े भी हुए,सर भी फूटे । लोगों का गुस्सा आपस में भी फूटा तो प्रशासन पर भी । नगर पालिका के चेयरमैन से लेकर पानी बांटने वाले विभाग के अफसर तक पिटे ।
बद्रीनाथ के रास्ते पर एक कस्बा है गौचर । 19 वीं सदी के उत्तरार्ध में दो-चार घरों की इस चट्टी में बद्रीनाथ के यात्री अपनी थकान उतारते थे । 25-30 साल पहले भी यह छोटी सी बस्ती हुआ करती थी । दूर-दूर तक फैले समतल खेत इसे सुंदर भी बनाते हैं और बसने के लिए एक माकूल जगह भी । इसलिए हाल के वर्शों में गौचर में आबादी बढ़ी और पानी की खपत भी बढ़ी पर पुराने सोते एक-एक कर सूखते रहे । अब हर गर्मियों में पानी के लिए जूझना, भिड़ना गौचर के जीवन का हिस्सा बन चुका है । लेकिन ये गर्मियां गौचर पर भी भारी गुजरीं । पानी को लेकर यह तस्वीर सिर्फ इन दो कस्बों की नहीं है । राज्य के दो दर्जन से ज्यादा कस्बों में पानी को ले कर हाहाकार मचा । पानी को लेकर सर फुटव्वल, लड़ाई, झगड़े धरना,प्रदर्शन और अफसरों का घेराव जैसे वाकये आम होते जा रहे हैं । पर तस्वीर इससे ज्यादा भयावह और चिंताजनक है । उत्तराखंड की एक तिहाई बस्तियां जल संकट से ग्रस्त हैं । हजार से ज्यादा गांवों में पानी बिल्कुल सूख गया है । लगभग सात हजार गांव ऐसे हैं जिनमें जल श्रोतों का प्रवाह आधे से लेकर 70 फीसदी तक कम हो गया है । राज्य में ऐसा कोई गांव नहीं है जिसमें पानी के श्रोत में पानी कम न हुआ हो । अपने वेग और गर्जना से डराने वाली भागीरथी इतनी दुबली-पतली हो गई है कि उसे देखकर तरस आता है कि आदमी ने एक भरी-पूरी नदी की क्या गत बना दी है । यही हाल अलकनंदा जैसी पानी से लबालब धीर गंभीर नदी का भी है भागीरथी में पानी कम होने से दस हजार करोड रुपए़ की लागत और एक लाख की आबादी को उजाड़ कर बना टिहरी बांध तीन सालों में ही दम तोड़ने लगा है । वनों से पोषित नदियां ही नहीं बल्कि ग्लेसियरों से पैदा होने वाली नदियों में भी पानी तेजी से घट रहा है । पनबिजली परियोजनाओं के बूते अपनी अर्थव्यवस्था को बेहतर करने का सपना खतरे में है ।
यदि पानी के श्रोतों के सूखने की रफ्तार यही रही तो भी अगले दस वर्षों में पहाड़ के अस्सी फीसदी गांवों में पानी के लिए त्राहि-त्राहि मची होगी लेकिन इन सुदूर गांवों में पानी पहुंचाने में सरकार के पसीने छूट जायेंगे । प्रदेश में पानी को लेकर दंगों के हालात बन जायेंगे । एक ओर शहरी आबादी के लिए पेयजल योजनायें बनाने में सरकार को अपने अधिकतम संसाधन झोंकने होंगे । नदियों का पानी चिंताजनक रुप से कम हो जायेगा । वन पोषित अधिकांश नदियां या तो सूख चुकी होंगी ।
सन््् 1970 के बाद समय बदलने लगा था । जो प्रकृति हिमालय के इन पहाड़ों पर मेहरबान थी,हमारे लालचों और लुटेरे मानव गिरोहों की हरकतों के चलते वह रूठने लगी थी । हर समय छलछलाते रहने वाली जलधारायें चुपके-चुपके दम तोड़ रही थीं । सदियों से हमारी प्यास के ये साथी बीमार थे और इस कारण कमजोर होते जा रहे थे । लेकिन हम कभी समझ ही नहीं पाए कि हमारा सबसे करीबी दोस्त और पहाड़ की जीवनरेखा बीमार है । हम एक सोते के सूख जाने पर दूसरे श्रोत तक जाते रहे । लेकिन पहले वाला क्यों रुठकर गायब हो गया ,यह हमें कभी पता भी नही चला । सातवें-आठवें दशक तक पानी गांव से दूर भागने लगा था । गांव से दूर होते इस पाणी को लेकर बहुओं का दुख अब लोकगीतों में बोलने लगा था । मुझे अपने बचपन का वह समय याद आता है जब माॅं पानी लेकर लौटती थी तो उसके चेहरे पर थकान साफ-साफ बोल रही होती थी । निरंतर दूर होते जा रहे पानी के कारण ही बरसात होने पर वह पतनालों के नीचे बड़े बर्तन रख देती थी । इनके भर जाने के बाद पतीलियां,लोटे भी लगे हाथ भर लिए जाते थे । इन बर्तनों में गिरती बारिश की बंूदों का भी एक संगीत होता था । हर बर्तन का अपना खास संगीत ! खाली बरतन पर गिरती बंूदों का संगीत अधभरे बर्तन से अलग होता था । ज्यांे-ज्यों बर्तन भरता जाता था वह गुरु गंभीर आवाज में गूंजने लगता था । बर्तन आकंठ भर कर पानी अब बाहर बहने लगा है ,इसका पता भी बारिश का यही संगीत देता था । हम नींद में भी इस संगीत का मजा लेते थे , वे बरसातें और उनका वह संगीत आज भी स्मृतियों में गूंजता है । बूंदों की भाषा में खाली और भरे बर्तन का फर्क बताने वाला वह संगीत बेहद याद आता है ।
पहले पानी के श्रोत गायब हुए पर अब ऐसा वक्त आ गया है कि हैंडपंप भी संकट में हैं। पानी की तलाश में उन्हे हर साल धरती की कोख में और गहरे धंसना पड़ रहा है । बावजूद इसके एक-दो साल में ही उनका गला भी सूखने लगता है और देखते ही देखते वे दम तोड़ देते हैं । पहाड़ों पर सैकड़ों हैंडपंपों के अस्थिकलश बता रहे हैं कि कभी यहां भी पानी था ।
प्रख्यात कवि,कथाकार रसूल हमजातोव के ‘‘मेरा दागिस्तान’’ के एक किस्से में झुकी हुई कमर और झुर्रीदार चेहरे वाली एक बुढ़िया है जो पानी की उम्मीद में हर रोज फावड़े से जमीन खोदती है । हर सुबह वह उम्मीद से खोदना शुरु करती है और हर तलाश के बाद निराश कदमों से लौटती है । रसूल के किस्सों की वह बुढ़िया कहीं मेरा पहाड़ तो नहीं जो पानी खोज रहा है और उसे पानी का श्रोत ढंूढे नहीं मिल रहा ! गढ़वाल की लोककथाओं में प्यास से बेचैन एक चिड़िया का जिक्र आता है जो कातर स्वर में आसमान से पानी मांगती रहती है । गरमियों की उदास दोपहर में इस चिड़िया के स्वर की कातरता विचलित करती है । आने वाले सालों में क्या पूरा पहाड़ इस चिड़िया में बदलने वाला है, कौन जानता है ? रहीम बहुत पहले चेता गए थे कि बिना पानी के सब सूना है । हम इन पंक्तियों की संदर्भ सहित व्याख्या करने और विद्वान उन पर पोथी लिखने में लगे रह गए और उधर पानी सिधार गया ।
सभ्यता की इस यात्रा में हमने बहुत कुछ ऐसा खोया जो हमारे वजूद के लिए जरुरी थे । इनमें अधिकांश प्राकृतिक रुप से हमारे मित्र और करीबी रिश्तेदार भी थे । पेड़-पौधे, पशुू-पक्षी और बर्फ जैसी असंख्य नेमतें हमसे रुठ रही हैं । हर साल बर्फ आती और धरती की सारी खुश्की को अपने आॅंचल में समेट लेती । झक सफेद बालों वाली यह बर्फ किसी बुजुर्ग की तरह कभी नरम तो कभी सख्त रुप में पेश आती पर महीनों तक खेत,खलिहान और आॅंगन को अपने स्नेह से भिगोती रहती थी । लाख हटाने के बाद भी जीम रहती थी । अब वही बर्फ मेहमानों की तरह फिल्मी नायिकाओं के नाज-नखरों के साथ आती है और सरकारी कर्मचारियों के अंदाज में ड्यूटी बजा कर गायब हो जाती है । हमने हिरन के करीबी बंधु-बांधवों घुरड़,काखड़ जैसे मासूम जानवरों से उनके जंगल छीन लिए । रंग-बिरंगी नाजुक चिड़ियाओं से उनके गीत गाने की वजह छीन ली । अपने सबसे करीबी बुजुर्गों पीपल, बरगद और नीम को हमने आऊट डेटेड घोषित कर उन्हे दरवाजा दिखा दिया । शीतल हवा और बर्फ सा ठंडा पानी देने वाले बांज जैसे सबसे अनमोल मित्र को हमने अच्छी क्वालिटी के कोयले के लिए लालच की भट्टी में झोंक दिया । जिन दुर्लभ और अनमोल प्रजातियों की रचना करने में प्रकृति ने हजारों-हजार साल खपा दिए उन्हे मिटाने में हमने एक सदी भी नहीं लगाई । हमारी इन निर्ममताओं और आत्मघाती हरकतों पर कुदरत भला क्यों खफा न हो । उसके दंड कीशुरुआत हवा और पानी से हो चुकी है ।
गुरुवार, 14 मई 2009
'लौट आए हैं 18वीं सदी के पिंडारी गिरोह'

इतिहास के प्रतीक अक्सर राजनीति में आकर हमें बताते रहते हैं कि समय की सदियों लंबी यात्रा में पात्र बदलते हैं, उनके चेहरे बदलते हैं, भाषाएं बदलती हैं, वेशभूषाएं बदलती हैं लेकिन सत्ता की अंतर्वस्तु नहीं बदलती है। यानी सत्ता की बुनियादी चीजें वही रहती हैं। परंतु राजनीति की विडंबना यह नहीं है कि उसमें इतिहास के पात्र या प्रतीक खुद को दोहराते हैं बल्कि हमारे समय की राजनीति की त्रासदी यह है कि उसके नायक इतिहास के अंधेरे कालखंडों के खलनायकों से अद्भुत समानता रखते हैं। ऐसे में यदि 18वीं सदी में मध्य भारत को थर्रा देने वाले पिंडारी ठगों के गिरोह इतिहास की किताबों में आराम करने के बजाय चुनाव में परगट होते लग रहे हैं तो इसका श्रेय लेखकीय कल्पनाओं के बजाय हमारे नेताओं को दिया जाना चाहिए क्योंकि उन्हीं के पुरूषार्थ से हम लोग इतिहास में दफन उन क्रूर पात्रों से रूबरू हो पा रहे हैं।
15वीं लोकसभा के चुनावों पर बात की शुरूआत इतिहास के सबसे खूंखार और कुख्यात ठग गिरोह से करना अजीब जरूर लग सकता है परंतु यह जिक्र अप्रासंगिक तो कतई नही है, यही भारतीय लोकतंत्र और राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना है। खूंखार ठग 18वीं सदी के दौरान उस समय अस्तित्व में आए जब मुगल साम्राज्य जमीन पर खत्म हो चुका था, उसकी सत्ता अपने कारिंदों और चापलूस दरबारियों तक सिमट कर रह गई थी। यह वह समय था जब ईस्ट इंडिया कंपनी के कंपनी बहादुर भारत में दाखिल हो कर इस देश पर काबिज होने की कोशिशों में जुट गए थे। लुंज पुंज केंद्रीय सत्ता के चलते पिंडारी गिरोहों की बर्बरता चरम पर थी।
यदि 18वीं सदी के पूर्वाद्ध के उस दौर और वर्तमान भारत की तुलना की जाए तो हमें कई आश्चर्यजनक समानताएं दिखाई देती हैं। अंबानियों, टाटा, मित्तलों जैसे कंपनी बहादुरों पर मुग्ध लोगों को यह तुलना नागवार गुजर सकती है, लेकिन 18वीं और २१ सदी के भारत में बहुत अंतर नहीं आया है। तब भी भारत की केंद्रीय सत्ता जर्जर हो चुकी थी आज भी केंद्रीय सत्ता जर्जर है। अंतर बस इतना है कि तब केंद्रीय सत्ता का प्रशासनिक और सैन्य वर्चस्व के साथ राजनीतिक व नैतिक बल भी लगभग खत्म हो चुका था तो वर्तमान में भारतीय केंद्रीय सत्ता की कार्यपालिका और न्यायपालिका तो कायम है परंतु उसका राजनीतिक व नैतिक वर्चस्व खत्म हो चुका है। एक भी दल या नेता ऐसा नहीं है जिसका नेतृत्व स्वीकार करने को देश की बहुसंख्य जनता तैयार हो। इसी जर्जर नेतृत्व का नतीजा है कि भारत की केंद्रीय सत्ता के भाग्य का फैसला तम भी क्षत्रप कर रहे थे अब भी क्षत्रप कर रहे हैं। गरीब भारत के प्रति जो उपेक्षा तब था वही आज भी है। जर्जर नेतृत्व का फायदा उठाकर तब भी कंपनी बहादुर भारत की आर्थिक एवं राजनीतिक सत्ता पर काबिज होने को मैदान में उतर चुके थे आज के कंपनी बहादुर भी इसी अभियान में जुटे हैं। अंतर बस इतना है कि तब सिर्फ एक ईस्ट इंडिया कंपनी थी आज कई देशी और विदेशी कंपनियां भारतीय अर्थव्यवस्था और राजनीति पर काबिज हो रही हैं। यदि शासकों और शासितों के बीच की खाई तीन सदी बाद भी लगभग वही है तो इसे भारतीय लोकतंत्र और राजनीति की दरिद्रता न कहें तो क्या कहें?
अब 18वीं सदी के पिंडारियों के किस्से पर लौटें। पिंडारी कुख्यात ठग थे, जो भोले-भाले लोगों को लूटते और निर्ममतापूर्वक उनकी हत्या कर देते थे। 15वीं लोकसभा के चुनाव में जिन दलों व एलायंसों को पूरा देश देख रहा था वे पिंडारी ठगों की यादें ताजा कर रहे हैँ। इतिहास का यही एकमात्र ऐसा प्रतीक है जो देश में चल रही क्रूर राजनीतिक ठगी को पूरे तीखेपन के साथ बयान करता है। इसी पिंडारीपन की बानगी देखिए। जो नीतिश कुमार बिहार में मतदान से पहले नरेंद्र मोदी के खिलाफ ऐसे तेवर दिखा रहे थे मानो एनडीए में मोदी मार्का सांप्रदायिकता के खिलाफ वही अकेले सेकुलर योद्धा हों। उन्होंने बाकायदा ऐलान भी किया कि वह मोदी के साथ मंच साझा नहीं करेंगे। बिहार के मुस्लिम वोट बिदक न जाएं इसलिए नीतिश ने मोदी को बिहार में घुसने तक नहीं दिया। चुनाव प्रचार के मोर्चे पर दिग्विजय को निकलने भाजपा के सबसे बड़े स्टार प्रचारक मोदी को मन मसोस कर रहना पड़ा। लेकिन जैसे ही बिहार का चुनाव निपटा, नीतिश न केवल मोदी के बगलगीर हुए बल्कि दोनों ने एक-दूसरे का हाथ थामकर हवा में लहराया मानो मतदाताओं को चुनौती दे रहे हों। अब जिन मुस्लिमों या सेकुलर किस्म के मतदाताओं ने नीतिश के मोदी विरोधी तेवरों के झांसे में आकर उनकी पार्टी को वोट डाला होगा उन वोटरों के साथ की गई यह राजनीतिक ठगी क्या पिंडारियों की याद नहीं दिलाती! एक और बानगी अपने लालबुझक्कड़ वामपंथी साथियों की है। खुद को कांग्रेस-भाजपा का विकल्प बताने वाले कामरेड करात और वर्धन ने टीआरएस के साथ गठबंधन कर उस पर सेकुलर और प्रगतिशील होने का जो तमगा लगाया उस मैडल को उसने आंध्र प्रदेश में चुनाव निपटते ही एनडीए की रैली के दौरान मोदी और आडवाणी के चरणों में अर्पित कर दिया। पूरे देश ने देखा कि किस तरह कामरेड करात द्वारा प्रमाणित 'सेकूलर योद्धा' चंद्रशेखर राव ने दो-दो हिंदू हृदय सम्राटों के चरणों में गोता लगाकर वाम स्पर्श के दोष से मुक्ति पा ली। जो वोट वामपंथियों को मजबूत करने के लिए डाला गया था वह 'भगवा ब्रिगेडों' को सत्ता में लाने के काम आ रहा है। इन चुनावों में नास्तिक संसदीय कम्युनिस्टों की दो अराध्य देवियां रही हैं। एक उत्तर में मायावती और दूसरी सुदूर दक्षिण में जयललिता। कामरेडों की ये कुलदेवियां चुनाव के बाद किसे 'सत्तारूढ़ भव:' का वरदान देती हैं, यह करात और वर्धन जैसे सांसारिक प्राणी तो क्या दैव भी नहीं जानते। यदि तीसरे मोर्चे के घटकों की अवसरवादिता के कारण केंद्र में भगवा ब्रिगेडों की सरकार बन जाती है तो यह क्या उन वोटरों के साथ विश्वासघात नहीं होगा जिन्होंने वामपंथियों के कारण टीआरएस, बसपा, जयललिता, टीडीपी जैसे दलों को वोट दिया।
तीसरी बानगी कांग्रेस की है जो चुनाव में ममता बनर्जी के साथ मिलकर कम्युनिस्ट विरोधी वोट हड़पती है परंतु चुनाव के बाद उन्हीं वामपंथियों से हाथ मिलाने को तैयार बैठी है। यह क्या पश्चिम बंगाल और केरल के उन वोटरों के साथ ठगी नहीं है जिन्होंने कम्युनिस्ट विरोध के चलते कांग्रेस को वोट दिया। जाहिर है कि इस चुनावी समर में जो दल हैं वे दरअसल 18वीं सदी के पिंडारी गिरोहों का पुनर्जन्म है। इस चुनावी संग्राम में दक्षिण से लेकर ठेठ वाम तक जो योद्धा हैं उनके भीतर लार्ड विलियम बैंटिक के हाथों मारे गए पिंडारी सरदारों की अतृप्त आत्माएं जब-तब दिखाई देती हैं। हां, इतना अवश्य कहा जा सकता है कि वे आत्माएं 18वीं सदी के क्रूड फार्म में नहीं हैं उनके जेनेटिक कोड को 21वीं सदी के हिसाब से संशोधित व परिवर्द्धित कर दिया गया है।
कम वोटिंग को लेकर शाहरूख, आमिर समेत कई सेलेब्रिटीज इस बार खासी परेशान नजर आईं। न्यूज चैनलों ने उन्हें धर दबोचा और 'वोट दो- वोट दो' की दिहाड़ी पर लगा दिया। एनडीटीवी समेत कई न्यूज चैनलों द्वारा किए गए इस धुआंधार प्रचार से कई बार ऐसा लगा कि यदि इस बार वोट न दिया तो आने वाली केंद्र सरकार के गलत फैसलों के लिए अपन को दोषी ठहराया जा सकता हैपर जब पहले चरण में मतदान प्रतिशत लुढ़क गया तो अपनी जान में जान आई कि वोट न देने की हिमाकत करने वाले अपन कोई अकेले नहीं हैं।परंतु एनडीटीवी और अन्य न्यूज चैनलों को जब खुद ही यह पता नहीं है कि वे जिन दलों, प्रत्याशियों को ज्यादा वोटिंग का लाभ मिलने वाला है वे कहां जाएंगे, किसकी सरकार बनाएंगे, ऐसे राजनीतिक ठगों को वोट देने के लिए प्रेरित करने का क्या फायदा? बेहतर होता यदि ये चैनल जनता को प्रत्याशी खारिज करने और जनप्रतिनिधि वापस बुलाने का अधिकार दिए जाने की मुहिम छेड़ते। यह एक ऐसा रास्ता हो सकता है जो लोगों को इन उन्नत नस्ल के पिंडारी गिरोहों से मुक्ति दिलाए।
15वीं लोकसभा के चुनावों पर बात की शुरूआत इतिहास के सबसे खूंखार और कुख्यात ठग गिरोह से करना अजीब जरूर लग सकता है परंतु यह जिक्र अप्रासंगिक तो कतई नही है, यही भारतीय लोकतंत्र और राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना है। खूंखार ठग 18वीं सदी के दौरान उस समय अस्तित्व में आए जब मुगल साम्राज्य जमीन पर खत्म हो चुका था, उसकी सत्ता अपने कारिंदों और चापलूस दरबारियों तक सिमट कर रह गई थी। यह वह समय था जब ईस्ट इंडिया कंपनी के कंपनी बहादुर भारत में दाखिल हो कर इस देश पर काबिज होने की कोशिशों में जुट गए थे। लुंज पुंज केंद्रीय सत्ता के चलते पिंडारी गिरोहों की बर्बरता चरम पर थी।
यदि 18वीं सदी के पूर्वाद्ध के उस दौर और वर्तमान भारत की तुलना की जाए तो हमें कई आश्चर्यजनक समानताएं दिखाई देती हैं। अंबानियों, टाटा, मित्तलों जैसे कंपनी बहादुरों पर मुग्ध लोगों को यह तुलना नागवार गुजर सकती है, लेकिन 18वीं और २१ सदी के भारत में बहुत अंतर नहीं आया है। तब भी भारत की केंद्रीय सत्ता जर्जर हो चुकी थी आज भी केंद्रीय सत्ता जर्जर है। अंतर बस इतना है कि तब केंद्रीय सत्ता का प्रशासनिक और सैन्य वर्चस्व के साथ राजनीतिक व नैतिक बल भी लगभग खत्म हो चुका था तो वर्तमान में भारतीय केंद्रीय सत्ता की कार्यपालिका और न्यायपालिका तो कायम है परंतु उसका राजनीतिक व नैतिक वर्चस्व खत्म हो चुका है। एक भी दल या नेता ऐसा नहीं है जिसका नेतृत्व स्वीकार करने को देश की बहुसंख्य जनता तैयार हो। इसी जर्जर नेतृत्व का नतीजा है कि भारत की केंद्रीय सत्ता के भाग्य का फैसला तम भी क्षत्रप कर रहे थे अब भी क्षत्रप कर रहे हैं। गरीब भारत के प्रति जो उपेक्षा तब था वही आज भी है। जर्जर नेतृत्व का फायदा उठाकर तब भी कंपनी बहादुर भारत की आर्थिक एवं राजनीतिक सत्ता पर काबिज होने को मैदान में उतर चुके थे आज के कंपनी बहादुर भी इसी अभियान में जुटे हैं। अंतर बस इतना है कि तब सिर्फ एक ईस्ट इंडिया कंपनी थी आज कई देशी और विदेशी कंपनियां भारतीय अर्थव्यवस्था और राजनीति पर काबिज हो रही हैं। यदि शासकों और शासितों के बीच की खाई तीन सदी बाद भी लगभग वही है तो इसे भारतीय लोकतंत्र और राजनीति की दरिद्रता न कहें तो क्या कहें?
अब 18वीं सदी के पिंडारियों के किस्से पर लौटें। पिंडारी कुख्यात ठग थे, जो भोले-भाले लोगों को लूटते और निर्ममतापूर्वक उनकी हत्या कर देते थे। 15वीं लोकसभा के चुनाव में जिन दलों व एलायंसों को पूरा देश देख रहा था वे पिंडारी ठगों की यादें ताजा कर रहे हैँ। इतिहास का यही एकमात्र ऐसा प्रतीक है जो देश में चल रही क्रूर राजनीतिक ठगी को पूरे तीखेपन के साथ बयान करता है। इसी पिंडारीपन की बानगी देखिए। जो नीतिश कुमार बिहार में मतदान से पहले नरेंद्र मोदी के खिलाफ ऐसे तेवर दिखा रहे थे मानो एनडीए में मोदी मार्का सांप्रदायिकता के खिलाफ वही अकेले सेकुलर योद्धा हों। उन्होंने बाकायदा ऐलान भी किया कि वह मोदी के साथ मंच साझा नहीं करेंगे। बिहार के मुस्लिम वोट बिदक न जाएं इसलिए नीतिश ने मोदी को बिहार में घुसने तक नहीं दिया। चुनाव प्रचार के मोर्चे पर दिग्विजय को निकलने भाजपा के सबसे बड़े स्टार प्रचारक मोदी को मन मसोस कर रहना पड़ा। लेकिन जैसे ही बिहार का चुनाव निपटा, नीतिश न केवल मोदी के बगलगीर हुए बल्कि दोनों ने एक-दूसरे का हाथ थामकर हवा में लहराया मानो मतदाताओं को चुनौती दे रहे हों। अब जिन मुस्लिमों या सेकुलर किस्म के मतदाताओं ने नीतिश के मोदी विरोधी तेवरों के झांसे में आकर उनकी पार्टी को वोट डाला होगा उन वोटरों के साथ की गई यह राजनीतिक ठगी क्या पिंडारियों की याद नहीं दिलाती! एक और बानगी अपने लालबुझक्कड़ वामपंथी साथियों की है। खुद को कांग्रेस-भाजपा का विकल्प बताने वाले कामरेड करात और वर्धन ने टीआरएस के साथ गठबंधन कर उस पर सेकुलर और प्रगतिशील होने का जो तमगा लगाया उस मैडल को उसने आंध्र प्रदेश में चुनाव निपटते ही एनडीए की रैली के दौरान मोदी और आडवाणी के चरणों में अर्पित कर दिया। पूरे देश ने देखा कि किस तरह कामरेड करात द्वारा प्रमाणित 'सेकूलर योद्धा' चंद्रशेखर राव ने दो-दो हिंदू हृदय सम्राटों के चरणों में गोता लगाकर वाम स्पर्श के दोष से मुक्ति पा ली। जो वोट वामपंथियों को मजबूत करने के लिए डाला गया था वह 'भगवा ब्रिगेडों' को सत्ता में लाने के काम आ रहा है। इन चुनावों में नास्तिक संसदीय कम्युनिस्टों की दो अराध्य देवियां रही हैं। एक उत्तर में मायावती और दूसरी सुदूर दक्षिण में जयललिता। कामरेडों की ये कुलदेवियां चुनाव के बाद किसे 'सत्तारूढ़ भव:' का वरदान देती हैं, यह करात और वर्धन जैसे सांसारिक प्राणी तो क्या दैव भी नहीं जानते। यदि तीसरे मोर्चे के घटकों की अवसरवादिता के कारण केंद्र में भगवा ब्रिगेडों की सरकार बन जाती है तो यह क्या उन वोटरों के साथ विश्वासघात नहीं होगा जिन्होंने वामपंथियों के कारण टीआरएस, बसपा, जयललिता, टीडीपी जैसे दलों को वोट दिया।
तीसरी बानगी कांग्रेस की है जो चुनाव में ममता बनर्जी के साथ मिलकर कम्युनिस्ट विरोधी वोट हड़पती है परंतु चुनाव के बाद उन्हीं वामपंथियों से हाथ मिलाने को तैयार बैठी है। यह क्या पश्चिम बंगाल और केरल के उन वोटरों के साथ ठगी नहीं है जिन्होंने कम्युनिस्ट विरोध के चलते कांग्रेस को वोट दिया। जाहिर है कि इस चुनावी समर में जो दल हैं वे दरअसल 18वीं सदी के पिंडारी गिरोहों का पुनर्जन्म है। इस चुनावी संग्राम में दक्षिण से लेकर ठेठ वाम तक जो योद्धा हैं उनके भीतर लार्ड विलियम बैंटिक के हाथों मारे गए पिंडारी सरदारों की अतृप्त आत्माएं जब-तब दिखाई देती हैं। हां, इतना अवश्य कहा जा सकता है कि वे आत्माएं 18वीं सदी के क्रूड फार्म में नहीं हैं उनके जेनेटिक कोड को 21वीं सदी के हिसाब से संशोधित व परिवर्द्धित कर दिया गया है।
कम वोटिंग को लेकर शाहरूख, आमिर समेत कई सेलेब्रिटीज इस बार खासी परेशान नजर आईं। न्यूज चैनलों ने उन्हें धर दबोचा और 'वोट दो- वोट दो' की दिहाड़ी पर लगा दिया। एनडीटीवी समेत कई न्यूज चैनलों द्वारा किए गए इस धुआंधार प्रचार से कई बार ऐसा लगा कि यदि इस बार वोट न दिया तो आने वाली केंद्र सरकार के गलत फैसलों के लिए अपन को दोषी ठहराया जा सकता हैपर जब पहले चरण में मतदान प्रतिशत लुढ़क गया तो अपनी जान में जान आई कि वोट न देने की हिमाकत करने वाले अपन कोई अकेले नहीं हैं।परंतु एनडीटीवी और अन्य न्यूज चैनलों को जब खुद ही यह पता नहीं है कि वे जिन दलों, प्रत्याशियों को ज्यादा वोटिंग का लाभ मिलने वाला है वे कहां जाएंगे, किसकी सरकार बनाएंगे, ऐसे राजनीतिक ठगों को वोट देने के लिए प्रेरित करने का क्या फायदा? बेहतर होता यदि ये चैनल जनता को प्रत्याशी खारिज करने और जनप्रतिनिधि वापस बुलाने का अधिकार दिए जाने की मुहिम छेड़ते। यह एक ऐसा रास्ता हो सकता है जो लोगों को इन उन्नत नस्ल के पिंडारी गिरोहों से मुक्ति दिलाए।
मंगलवार, 5 मई 2009
धधकता हिमालय और फारेस्ट के नीरो

हिमालय के जंगल धधक रहे हैं और उत्तराखंड के प्रमुख वन संरक्षक आरबीएस रावत को फुर्सत नहीं है। वह सुबह से शाम तक जंगल की आग पर आए दिन राजधानी में होने वाली बैठकों में व्यस्त हैं। जंगल की आग से लड़ते हुए सात लोगों की मौत और १५ लोगों के घायल होने के बाद चैन की बांसुरी बजा रहे वन विभाग के नीरों हरकत में आ गए हैं। वन विभाग की सक्रियता उम्मीद नहीं जगाती बल्कि निराश करती है। ग्रामीणों की मौत पर होने वाले विलाप के स्वर जैसे धीमे पडेंगे फारेस्ट डिपार्टमेंट में फिर चैन की बांसुरी बजने लगेगी। एक के बाद एक हिमालय जंगल स्वाह हो रहे हैं पर सरकार बैठक दर बैठक कर जंगल की आग पर काबू पा लेना चाहती है। राजधानी में वन विभाग के आला अफसर कागजों का पेट आंकड़ों से भर रहे हैं। सचिव से लेकर प्रमुख वन संरक्षक और क्षेत्रीय वन संरक्षकों तक के दफ्तरों में कंप्यूटर और फैक्स बिजी हो गए हैं। इधर जंगल में आग लगी हुई है उधर प्रदेश में आइएएस और आइएफएस सेवाओं के सबसे ज्यादा योग्य और प्रतिभावान बाबू एक के बाद एक रिपोर्ट तलब कर रहे हैं। ग्रामीणों की मौत से सहमी सरकार ने दस करोड़ रुपये की मदद की मांग कर जंगल की आग को केंद्र सरकार के पाले में सरका दिया है।
ऐसा नहीं है कि हिमालय के जंगलों में इसी वर्ष आग लगी हो लेकिन इस वर्ष अप्रैल के अंतिम व मई के प्रथम हफ्ते में लगी भीषण दावाग्नि में सात ग्रामीणों के जलने की घटना के बाद हर साल बढ़ रही आग की घटनाओं को एकाएक फोकस में ला दिया है। वन विभाग में व्याप्त लापरवाही की हद यह है कि जंगल में भीषण आग की चपेट में एक गांव के आने की भनक भी वन विभाग के कारिंदों को नहीं लगी। सिर्फ हरी टहनियों के बूते जंगल की भयावह आग से जूझने वाले ये ग्रामीण इस जंग में अकेले थे। पर्यावरण और वन प्रबंधन के नाम पर हर साल करोड़ों रुपए हजम करने वाला फारेस्ट का अमला मोर्चे से गायब था।
हिमालय के जंगलों की यह त्रासदी है कि जैसे-जैसे वन विभाग के अमले पर खर्च बढ़ता गया वैसे-वैसे ही आग से प्रभावित वन क्षेत्र भी बढ़ता रहा है। सन 2000-2001 में आग की चपेट में आने वाला वन क्षेत्र सिर्फ 925 हैक्टेयर था। राज्य बनने के इन नौ वर्षों में वन विभाग में प्रमुख वन संरक्षक रैंक के 14, वन संरक्षक रैंक के 27 और प्रभागीय वनाधिकारी स्तर के 87 अधिकारी तैनात हैं। विडंबना यह है कि जिन जंगलों की देखभाल के लिए अफसरों का यह भारी-भरकम अमला बनाया गया उन जंगलों में से 23000 हैक्टेयर जंगल इन नौ वर्षों में स्वाह हो गए। सन 2000-2001 के मुकाबले आग से प्रभावित होने वाला वन क्षेत्र औसतन तीन गुने से पांच गुने तक बढ़ गया है। केवल 20006-07 और 08-09 में ही यह औसत कम रहा है तो यह वन विभाग का नहीं बल्कि अप्रैल, मई और जून में होने वाली वर्षा का कमाल है। इस वर्ष भी अभी तक 2800 हैक्टेयर जंगल स्वाह हो चुका है। जाहिर है कि अफसरों का भारी-भरकम अमला जंगलों को बचाने में विफल साबित हुआ है क्योंकि आग से लड़ने के लिए विभाग के पास न तो जमीनी स्टाफ है और न जरुरी तैयारी ही। अब जंगल की आग का मुकाबला करने के लिए मानदेय पर सीजनल मजदूर रखे जाते हैं जो फील्ड पर कम और कागजों पर ज्यादा होते हैं। जंगल की आग पर काबू पाने के लिए विश्व स्तर पर अपनाए जाने वाली नई तकनीक अपनाना तो दूर वन विभाग ने फायर लाइन और कंट्रोल बर्निंग ब्रिटिशकालीन तकनीक भी छोड़ दी है।जंगल की आग को एक हिस्से में सीमित करने वाली इन फायर लाइनों की देखभाल न होने से वहां भी जंगल ऊग आए हैं। फलतः आग की घटनाएं और प्रभावित क्षेत्रफल दोनों में भारी वृद्धि हो रही है।
जंगल की आग लगने की घटनाओं में हो रही वृद्धि के कई कारण हैं। मानव निर्मित कारणों में सबसे पहला कारण यह है कि जंगलों से सबसे करीब रहने वाले और उन पर आश्रित समाजों को सरकार और वन विभाग ने सुनियोजित रुप से वन प्रबंधन और स्वामित्व दोनों से बेदखल कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के 1994 गोडा वर्मन बनाम भारत सरकार मामले में दिए गए फैसले के बाद तो वनों के करीबी समाजों का वनों में पत्तियां बीनना तक अपराध हो गया। केंद्र और राज्य की सरकारें चाहती तो वनों पर आश्रित समाजों को वन प्रबंधन व स्वामित्व में भागीदार बना सकती थी। लेकिन वन विभाग खुद में इतने निहित स्वार्थों का गठबंधन बन चुका है कि वह जंगलों पर अपना एकाधिकार चाहता है। इससे स्थानीय लोगों का जंगलों के प्रति लगाव कम हुआ है और वे वनों की रक्षा के प्रति उदासीन हुए हैं। इसके बावजूद वे ही जंगल की आग का मुकाबला करने के लिए अग्रिम मोर्चे पर हैं। ग्रामीण भी बरसात में अच्छी घास पाने के लिए जंगलों में आग लगाते हैं, लेकिन यह अकेला कारण नहीं है। फर्जी वृक्षारोपण के सबूत मिटाने के लिए भी जंगल की आग का खेल खेला जाता है।
आग की घटनाओं के काबू से बाहर होने के लिए आदमी ही जिम्मेदार है। 19वीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में मिश्रित वनों के निर्मम सफाये के बाद वन विभाग ने चीड़ वनों के विस्तार की जो सुनियोजित मुहिम चलाई उसके चलते ही जंगल में आग अब हद से बाहर हो रही है। उत्तराखंड के जंगलों में चीड़ बडे भाई की तरह सबसे बड़े हिस्से पर काबिज है। वनों के व्यापारिक दोहन के १४० वर्ष के भीतर ही बांज-बुरांस के मिश्रित वन छोटे भाई की तरह कोने में सिमट जाने को मजबूर हो गए हैं। उत्तराखंड़ के ३९३०३६ हैक्टेयर में चीड़ का राज है। सेटेलाइट से प्राप्त चित्रों से जाहिर है कि आग उन्हीं इलाकों में अपना रोद्र रूप दिखा रही है जिनमें बड़े भाई चीड़ का राज है। यह इलाका ४ हजार से लेकर ६ हजार फीट तक फैला है। ऐसा चीड़ की सूखी पत्तियों के अति अधिक ज्वलनशील होने के कारण है। इसके अलावा चीड़ वनों में नमी का स्तर न्यूनतम होता है। नमी न होने से यह इलाका आग के प्रति ओर भी संवेदनशील हो जाता है। ग्लोबल वार्मिंग से पिछली एक सदी में तापमान में हुई बढ़ोत्तरी और अक्सर सूखा पड़ने से जंगल ज्यादा खुश्क हुए हैं तो चीड़ की पत्तियां तेजी से सूख रही हैं। पिछले ५० वर्षों में वनपोषित जलस्रोतों में से ५० फीसदी या तो सूख गए हैं या फिर उनके जल प्रवाह में ७० फीसदी तक की कमी आई है। इसने भी आग को हवा देने का काम किया है।
हिमालय के जंगल जिस तरह से धधक रहे हैं उससे अनिष्ट की आशंकाएं ही प्रबल हो रही हैं। आग से हिमालय के गर्म होने की प्रकिया तेज होगी जो ग्लेशियरों को गलाने की रफ्तार बढ़ा देगा। रहे-सहे वनपोषित जल स्रोत सूखेंगे और यह गंगा के मैदान के मरूस्थल में बदलने की शुरूआत होगी। आग से नष्ट मिश्रित वनों का स्थान चीड़ वन ले लेंगे और फिर जंगल की आग सुरसा के मुंह की तरह हिमालय के ऊपरी हिस्से तक पहुंच जाएगी। आने वाली पीढियां बांज-बुरांस के जंगलों को इंटरनेट की फोटो गैलरियों में ही देख सकेगी। हमारी मूर्खताओं का कुल गुणनफल प्रकृति के इन सबसे खूबसूरत जंगलों को लील लेगा। धधकते जंगल बता रहे हैं कि हिमालय संकट में है। जलते हुए पेड़ों की इस चेतावनी को गौर से सुना जाना चाहिए।
ऐसा नहीं है कि हिमालय के जंगलों में इसी वर्ष आग लगी हो लेकिन इस वर्ष अप्रैल के अंतिम व मई के प्रथम हफ्ते में लगी भीषण दावाग्नि में सात ग्रामीणों के जलने की घटना के बाद हर साल बढ़ रही आग की घटनाओं को एकाएक फोकस में ला दिया है। वन विभाग में व्याप्त लापरवाही की हद यह है कि जंगल में भीषण आग की चपेट में एक गांव के आने की भनक भी वन विभाग के कारिंदों को नहीं लगी। सिर्फ हरी टहनियों के बूते जंगल की भयावह आग से जूझने वाले ये ग्रामीण इस जंग में अकेले थे। पर्यावरण और वन प्रबंधन के नाम पर हर साल करोड़ों रुपए हजम करने वाला फारेस्ट का अमला मोर्चे से गायब था।
हिमालय के जंगलों की यह त्रासदी है कि जैसे-जैसे वन विभाग के अमले पर खर्च बढ़ता गया वैसे-वैसे ही आग से प्रभावित वन क्षेत्र भी बढ़ता रहा है। सन 2000-2001 में आग की चपेट में आने वाला वन क्षेत्र सिर्फ 925 हैक्टेयर था। राज्य बनने के इन नौ वर्षों में वन विभाग में प्रमुख वन संरक्षक रैंक के 14, वन संरक्षक रैंक के 27 और प्रभागीय वनाधिकारी स्तर के 87 अधिकारी तैनात हैं। विडंबना यह है कि जिन जंगलों की देखभाल के लिए अफसरों का यह भारी-भरकम अमला बनाया गया उन जंगलों में से 23000 हैक्टेयर जंगल इन नौ वर्षों में स्वाह हो गए। सन 2000-2001 के मुकाबले आग से प्रभावित होने वाला वन क्षेत्र औसतन तीन गुने से पांच गुने तक बढ़ गया है। केवल 20006-07 और 08-09 में ही यह औसत कम रहा है तो यह वन विभाग का नहीं बल्कि अप्रैल, मई और जून में होने वाली वर्षा का कमाल है। इस वर्ष भी अभी तक 2800 हैक्टेयर जंगल स्वाह हो चुका है। जाहिर है कि अफसरों का भारी-भरकम अमला जंगलों को बचाने में विफल साबित हुआ है क्योंकि आग से लड़ने के लिए विभाग के पास न तो जमीनी स्टाफ है और न जरुरी तैयारी ही। अब जंगल की आग का मुकाबला करने के लिए मानदेय पर सीजनल मजदूर रखे जाते हैं जो फील्ड पर कम और कागजों पर ज्यादा होते हैं। जंगल की आग पर काबू पाने के लिए विश्व स्तर पर अपनाए जाने वाली नई तकनीक अपनाना तो दूर वन विभाग ने फायर लाइन और कंट्रोल बर्निंग ब्रिटिशकालीन तकनीक भी छोड़ दी है।जंगल की आग को एक हिस्से में सीमित करने वाली इन फायर लाइनों की देखभाल न होने से वहां भी जंगल ऊग आए हैं। फलतः आग की घटनाएं और प्रभावित क्षेत्रफल दोनों में भारी वृद्धि हो रही है।
जंगल की आग लगने की घटनाओं में हो रही वृद्धि के कई कारण हैं। मानव निर्मित कारणों में सबसे पहला कारण यह है कि जंगलों से सबसे करीब रहने वाले और उन पर आश्रित समाजों को सरकार और वन विभाग ने सुनियोजित रुप से वन प्रबंधन और स्वामित्व दोनों से बेदखल कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के 1994 गोडा वर्मन बनाम भारत सरकार मामले में दिए गए फैसले के बाद तो वनों के करीबी समाजों का वनों में पत्तियां बीनना तक अपराध हो गया। केंद्र और राज्य की सरकारें चाहती तो वनों पर आश्रित समाजों को वन प्रबंधन व स्वामित्व में भागीदार बना सकती थी। लेकिन वन विभाग खुद में इतने निहित स्वार्थों का गठबंधन बन चुका है कि वह जंगलों पर अपना एकाधिकार चाहता है। इससे स्थानीय लोगों का जंगलों के प्रति लगाव कम हुआ है और वे वनों की रक्षा के प्रति उदासीन हुए हैं। इसके बावजूद वे ही जंगल की आग का मुकाबला करने के लिए अग्रिम मोर्चे पर हैं। ग्रामीण भी बरसात में अच्छी घास पाने के लिए जंगलों में आग लगाते हैं, लेकिन यह अकेला कारण नहीं है। फर्जी वृक्षारोपण के सबूत मिटाने के लिए भी जंगल की आग का खेल खेला जाता है।
आग की घटनाओं के काबू से बाहर होने के लिए आदमी ही जिम्मेदार है। 19वीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में मिश्रित वनों के निर्मम सफाये के बाद वन विभाग ने चीड़ वनों के विस्तार की जो सुनियोजित मुहिम चलाई उसके चलते ही जंगल में आग अब हद से बाहर हो रही है। उत्तराखंड के जंगलों में चीड़ बडे भाई की तरह सबसे बड़े हिस्से पर काबिज है। वनों के व्यापारिक दोहन के १४० वर्ष के भीतर ही बांज-बुरांस के मिश्रित वन छोटे भाई की तरह कोने में सिमट जाने को मजबूर हो गए हैं। उत्तराखंड़ के ३९३०३६ हैक्टेयर में चीड़ का राज है। सेटेलाइट से प्राप्त चित्रों से जाहिर है कि आग उन्हीं इलाकों में अपना रोद्र रूप दिखा रही है जिनमें बड़े भाई चीड़ का राज है। यह इलाका ४ हजार से लेकर ६ हजार फीट तक फैला है। ऐसा चीड़ की सूखी पत्तियों के अति अधिक ज्वलनशील होने के कारण है। इसके अलावा चीड़ वनों में नमी का स्तर न्यूनतम होता है। नमी न होने से यह इलाका आग के प्रति ओर भी संवेदनशील हो जाता है। ग्लोबल वार्मिंग से पिछली एक सदी में तापमान में हुई बढ़ोत्तरी और अक्सर सूखा पड़ने से जंगल ज्यादा खुश्क हुए हैं तो चीड़ की पत्तियां तेजी से सूख रही हैं। पिछले ५० वर्षों में वनपोषित जलस्रोतों में से ५० फीसदी या तो सूख गए हैं या फिर उनके जल प्रवाह में ७० फीसदी तक की कमी आई है। इसने भी आग को हवा देने का काम किया है।
हिमालय के जंगल जिस तरह से धधक रहे हैं उससे अनिष्ट की आशंकाएं ही प्रबल हो रही हैं। आग से हिमालय के गर्म होने की प्रकिया तेज होगी जो ग्लेशियरों को गलाने की रफ्तार बढ़ा देगा। रहे-सहे वनपोषित जल स्रोत सूखेंगे और यह गंगा के मैदान के मरूस्थल में बदलने की शुरूआत होगी। आग से नष्ट मिश्रित वनों का स्थान चीड़ वन ले लेंगे और फिर जंगल की आग सुरसा के मुंह की तरह हिमालय के ऊपरी हिस्से तक पहुंच जाएगी। आने वाली पीढियां बांज-बुरांस के जंगलों को इंटरनेट की फोटो गैलरियों में ही देख सकेगी। हमारी मूर्खताओं का कुल गुणनफल प्रकृति के इन सबसे खूबसूरत जंगलों को लील लेगा। धधकते जंगल बता रहे हैं कि हिमालय संकट में है। जलते हुए पेड़ों की इस चेतावनी को गौर से सुना जाना चाहिए।
सोमवार, 27 अप्रैल 2009
बदल रही है युवा सपनों की तासीर
चकराता। बर्फ से ढ़के पहाड़ और हरे भरे जंगलों के ऐसे दृष्य कि आप अपनी सुध बुध खो बैठें। जिन्हें स्वर्ग बहुत लुभाता है, वे इसे स्वर्ग से सुंदर कह दें तो भी इंद्र की शान में गुस्ताखी नहीं होगी और न मेनका और रंभा जैसी वे अप्सरायें नाराज होंगी जो स्वर्ग को उसकी दिव्यता के बीच मानवीय बनाती हैं। कभी-कभी लगता है कि मैदान की गर्मियों से त्रस्त होकर ईश्वर ने चकराता के सुंदर पहाड़ बनाये होंगे। जौनसार का समाज कई मायनों में अनूठा है। गढ़वाल के पहाड़ी समाज से अलग इसका अपना खास रंग है। यह समाज सदियों से बाहरियों को लुभाता रहा है, और कहावतें बनती रही कि जो जौनसार गया वह फिर कभी लौटा नहीं। बाहर से देखने वालों के लिए वह आश्चर्य में लिपटा रहस्यमय लोक बना रहा। किस्से और दंतकथाएं रहस्य की इन परतों को और भी गहरा करती रही। आजादी की आधी सदी गुजर चुकी है लेकिन चकराता अभी भी विकास का ककहरा पढ़ रहा है। अलबत्ता उसके नेता भ्रष्टाचार की विधा में पारंगत हो गए हैं। अपने आप सिमटा, सकुचाया रहने वाला जौनसारी समाज भी बदलाव की अंगड़ाई ले रहा है। उसके भीतर मौजूद आत्मविश्वास अब बोलने लगा है। दरअसल जब सपने बदलते हैं तो समाज भी बदलते हैं। यह किस्सा सपने बदल जाने का ही है।
चकराता के पास एक छोटा सा गांव है। आम पहाड़ी गांव की तरह। करीने से लगे देवदार के जंगल, पहाड़ी ढ़लान पर छोटे-छोटे पर हरे-भरे खेत और सामने दिव्य हिमालय। सदियों से मौसम की विभीषिकाओं, आपदाओं की त्रासदियों के बीच निरे आम लोगों ने इस गांव को एक सुंदर भू-दृश्य में बदला है। उन्हीं आम-अनाम लोगों के श्रम की गंध से इस गांव के खेत और मकान आज भी महकते हैं।
हर गांव की तरह गांव के पास परंपराओं की अपनी बेडियां हैं। परंतु परंपराओं की जकड़न के बीच हर नई पीढ़ी अपने लिए आकांक्षाओं के नए आकाश चुनती है। परंपराओं की बेडियां ढ़ीली पड़ती हैं और मानव सभ्यता थोड़ा आगे सरक जाती है। इसी गांव की एक लड़की है नीलम चौहान। खास बात यह थी कि नीलम को सपना देखना भी आता था और उसके पास वह जिद भी थी जो सपनों को धरती पर उतारने के जरूरी होती है। नीलम का परिवार संयुक्त परिवार है, इतना बड़ा परिवार कि दिल्ली-मुम्बई के लोगों को यह परिवार नहीं बल्कि बारात जैसा लगे। ६० लोगों का परिवार। चकराता के इर्द-गिर्द के इलाके में दूसरा सबसे बड़ा परिवार है। जितना बड़ा परिवार, रिश्तों के धागे में उतने ही गहरा गुंथा हुआ। इतने बड़े परिवार को यदि एक रखना है तो जाहिर है कि परंपराओं और अनुशासन की सख्त चाबुक भी चाहिए होगी। कई पुरूषों और उनकी हां में हां मिलाने वाली महिला सदस्यों के इस भरे-पूरे परिवार में एक किशोर लड़की शादी के सिवा दूसरा सपना देखे भी तो कैसे? पर नीलम ने यह गुस्ताखी कर ही डाली। नीलम ने यदि डाक्टर, इंजीनीयर या टीचर वगैरह बनने का सपना देखा होता तो घर में तूफान न मचा होता, लेकिन परंपराओं में जकड़े समाज ने फैशन को कैरियर बनाना तो किसी कुफ्र से कम न था। सबसे मुश्किल यह थी कि इस लड़ाई में उसके सामने कोई पराये नहीं थे। जिनके खिलाफ उसे अपनी आवाज बुलंद करनी थी, वे सारे के सारे अपने ही थे। वही ताऊजी जिनकी उंगली पकड़ कर उसने चलना सीखा तो वही चाचा-चाचियां जिनके दुलार से राजकुमारी की तरह इतराती थी। यह कठिन परीक्षा थी परंतु घर के इस विरोध में उसके पिता और मां उसके साथ खड़े रहे। एक दिन पूरे गांव ने आश्चर्य के साथ देखा कि बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध की परंपरा में रह रहे समाज की एक लड़की मॉडलिंग के वर्जित क्षेत्र में चली गई। पूरा गांव जैसे डोल गया।
किसी को लगा कि उनका समाज जैसे तहस-नहस हो जाएगा। गांव की बूढ़ी औरतों के लिए यह घोर कलयुग के आने का शंखनाद था। अनर्थ की इन बूढ़ी आशंकाओं के बीच नीलम मिस दून चुनी गई तो उसके सपनों को जैसे पंख लग गए। यह उस सपने की भी जीत थी जो लालटेन की रौशनी में ठेठ पहाड़ी गांव में देखा गया था। इसके बाद नीलम ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और अक्सर होने वाले फैशन शोज में वह सबसे पसंदीदा चेहरा बन गई। आज नीलम एक प्रतिष्ठित एयरलाइंस में एयर होस्टेस है। वह जब गांव लौटती है हमउम्र और किशोर लड़कियां उसे आश्चर्य मिश्रित कौतुहल के साथ देखती हैं कि वह उन्हीं में से एक है क्या! आज उसके संयुक्त परिवार को नीलम पर नाज है। नीलम को देखकर उसके गांव और आसपड़ोस के गांव की लड़कियों की आंखों में सपने जगमगाने लगे हैं। सपने संक्रामक रोग की तरह होते हैं। वे लोगों की शिराओं में दौड़ते हैं, उन्हें भीतर ही भीतर बदल डालते है। दुनिया की हर क्रांति से पहले भी सपने ही शिराओं में दौड़ते हैं। फर्क फकत इतना ही है कि क्रांतियां गर्जना करती हैं, लेकिन समाजों के भीतर बदलाव बहुत धीमे, बेहद आहिस्ता-आहिस्ता होते हैं। बसंत की तरह दबे बदलाव समाज की शिराओं में दाखिल होता है और किसी दिन पूरे समाज का रंग-ढ़ंग बदल देता है जैसे बसंत पूरे जंगल को बदल देता है।
नीलम को मुग्ध भाव से देखने वाली ग्रामीण लड़कियों के भीतर भी ग्लैमर की दुनिया में जाने हसरतें हिलोरे ले रही हैं, लेकिन उन इच्छाओं पर वर्जनाओं के पहरे भी हैं। इन सबके बीच नीलम सिर्फ लड़की भर नहीं है। वह उत्तराखंड की लड़कियों की इच्छाओं का चेहरा है, जिनके सपनों का रंग बदल रहा है। पिछले दशकों का वह दौर अब पीछे छुटता जा रहा है जब लड़कियां बीटीसी और बीएड कर सरकारी स्कूलों में टीचर हो जाना चाहती थी। स्कूल में स्वेटर बुनती अध्यापिकाओं के चित्र लड़कियों के दिमाग में दर्ज रहते थे। मध्यवर्गीय और निम्न मध्यवर्गीय परिवारों की लड़कियां अक्सर ऐसा ही कोई सपना देखा करती थी। यह उस समय का सपना था, जो आमतौर पर मध्यवर्ग और निम्न मध्य वर्गीय परिवारों की लड़कियां देखा करती थीं। हालांकि एक छोटी संख्या में लड़कियां डाक्टर, इंजीनियर बनने जैसा सपना तब भी देख रही थी, लेकिन यह आम सपना नहीं था। पिछले पांच-सात सालों में युवाओं और युवतियों में सपनों के स्तर पर बदलाव आए हैं। सिर्फ माता-पिता या परिवार वालों की इच्छा पर आंख मूंदकर बीए, बीएससी या बीकाम करने वाली पीढ़ी धीरे-धीरे कम होती जा रही है। आज के युवा और युवतियां अपनी पसंद के विषय चुनने के जिद भी कर सकते हैं और वे अपने तर्कों से परिजनों को अपनी पसंद मनवाने का माद्दा भी रखते हैं। परिवारों के भीतर पिता की सत्ता कमजोर हो रही है। परिवारों के भीतर लड़कियां भी हाशिये पर नहीं हैं। वे भी बराबरी की ओर बढ़ रही है। यह जो बदलाव है वह भी आज के युवा वर्ग की आकांक्षाओं के दबाव से ही पैदा हुए हैं। इस बदलाव को परिवार नाम की संस्था के ज्यादा लोकतांत्रिक होने का भी लक्षण माना जा सकता है।
हम अपने सामने जो पीढ़ी देख रहे हैं, वह बिल्कुल वैसी नहीं है, जो हमें बीसवीं सदी के नवें और आखिरी दशक के शुरूआती सालों में दिखाई देती है। उस पीढ़ी और मौजूदा पीढ़ी के सपनों का रंग काफी अलग है। दरअसल बीसवीं सदी के आखिरी सालों में जब आर्थिक उदारीकरण के नतीजे आने लगे तब से हम एक नई तरह की युवा पौध देख रहे हैं। यह पौध आत्मविश्वास में पिछली पीढ़ी से आगे है ही, लेकिन उससे कई गुना ज्यादा महत्वाकांक्षी भी है। उसमें आठवें और नवें दशक के युवा की तरह सरकारी नौकरी हासिल कर जीवन को आराम से गुजारने की ललक की जगह निजी क्षेत्र की नौकरियों का जोखिम उठाने का साहस है। लड़कियां मॉडलिंग, एयर होस्टेस से लेकर होटल मैनेजमेंट तक उन पाठ्यक्रमों में जाना पसंद कर रही है, जिनका जिक्र करते हुए भी आठवें व नौवें के दशक युवतियां घबरा जाती थी। यही बात आज के युवाओं पर भी लागू होती है। वे आगे बढ़ने के लिए जो जोखिम उठाने को तैयार हैं, उत्तराखंड के परंपरांगत समाज के नजरिये से देखें तो यह अहम बदलाव है। युवाओं की मनोदशा में आज यह बदलाव जब-तब सवर्णों के भीतर अंतर्जातीय विवाहों की शक्ल में भी सामने आ जाता है। धीरे-धीरे अंतर्जातीय विवाह भी बढ़ रहे हैं, और अब ऐसे विवाहों में परिवार की नाराजगी के बजाय भागीदारी बढ़ रही है।
हम अपने समय की ऐसी महत्वाकांक्षी पीढ़ी को देख रहे हैं, जो अपनी उपस्थिति भी जता रही है और अपने इरादों को लेकर मुखर भी है। लेकिन वे विशेषताएं मौजूद युवा पीढ़ी को खास बनाती है। यह भी नहीं भूला जाना चाहिए कि उन पर अपनी पूर्ववर्ती पीढियों से कहीं ज्यादा उम्मीदों का बोझ है।
चकराता के पास एक छोटा सा गांव है। आम पहाड़ी गांव की तरह। करीने से लगे देवदार के जंगल, पहाड़ी ढ़लान पर छोटे-छोटे पर हरे-भरे खेत और सामने दिव्य हिमालय। सदियों से मौसम की विभीषिकाओं, आपदाओं की त्रासदियों के बीच निरे आम लोगों ने इस गांव को एक सुंदर भू-दृश्य में बदला है। उन्हीं आम-अनाम लोगों के श्रम की गंध से इस गांव के खेत और मकान आज भी महकते हैं।
हर गांव की तरह गांव के पास परंपराओं की अपनी बेडियां हैं। परंतु परंपराओं की जकड़न के बीच हर नई पीढ़ी अपने लिए आकांक्षाओं के नए आकाश चुनती है। परंपराओं की बेडियां ढ़ीली पड़ती हैं और मानव सभ्यता थोड़ा आगे सरक जाती है। इसी गांव की एक लड़की है नीलम चौहान। खास बात यह थी कि नीलम को सपना देखना भी आता था और उसके पास वह जिद भी थी जो सपनों को धरती पर उतारने के जरूरी होती है। नीलम का परिवार संयुक्त परिवार है, इतना बड़ा परिवार कि दिल्ली-मुम्बई के लोगों को यह परिवार नहीं बल्कि बारात जैसा लगे। ६० लोगों का परिवार। चकराता के इर्द-गिर्द के इलाके में दूसरा सबसे बड़ा परिवार है। जितना बड़ा परिवार, रिश्तों के धागे में उतने ही गहरा गुंथा हुआ। इतने बड़े परिवार को यदि एक रखना है तो जाहिर है कि परंपराओं और अनुशासन की सख्त चाबुक भी चाहिए होगी। कई पुरूषों और उनकी हां में हां मिलाने वाली महिला सदस्यों के इस भरे-पूरे परिवार में एक किशोर लड़की शादी के सिवा दूसरा सपना देखे भी तो कैसे? पर नीलम ने यह गुस्ताखी कर ही डाली। नीलम ने यदि डाक्टर, इंजीनीयर या टीचर वगैरह बनने का सपना देखा होता तो घर में तूफान न मचा होता, लेकिन परंपराओं में जकड़े समाज ने फैशन को कैरियर बनाना तो किसी कुफ्र से कम न था। सबसे मुश्किल यह थी कि इस लड़ाई में उसके सामने कोई पराये नहीं थे। जिनके खिलाफ उसे अपनी आवाज बुलंद करनी थी, वे सारे के सारे अपने ही थे। वही ताऊजी जिनकी उंगली पकड़ कर उसने चलना सीखा तो वही चाचा-चाचियां जिनके दुलार से राजकुमारी की तरह इतराती थी। यह कठिन परीक्षा थी परंतु घर के इस विरोध में उसके पिता और मां उसके साथ खड़े रहे। एक दिन पूरे गांव ने आश्चर्य के साथ देखा कि बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध की परंपरा में रह रहे समाज की एक लड़की मॉडलिंग के वर्जित क्षेत्र में चली गई। पूरा गांव जैसे डोल गया।
किसी को लगा कि उनका समाज जैसे तहस-नहस हो जाएगा। गांव की बूढ़ी औरतों के लिए यह घोर कलयुग के आने का शंखनाद था। अनर्थ की इन बूढ़ी आशंकाओं के बीच नीलम मिस दून चुनी गई तो उसके सपनों को जैसे पंख लग गए। यह उस सपने की भी जीत थी जो लालटेन की रौशनी में ठेठ पहाड़ी गांव में देखा गया था। इसके बाद नीलम ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और अक्सर होने वाले फैशन शोज में वह सबसे पसंदीदा चेहरा बन गई। आज नीलम एक प्रतिष्ठित एयरलाइंस में एयर होस्टेस है। वह जब गांव लौटती है हमउम्र और किशोर लड़कियां उसे आश्चर्य मिश्रित कौतुहल के साथ देखती हैं कि वह उन्हीं में से एक है क्या! आज उसके संयुक्त परिवार को नीलम पर नाज है। नीलम को देखकर उसके गांव और आसपड़ोस के गांव की लड़कियों की आंखों में सपने जगमगाने लगे हैं। सपने संक्रामक रोग की तरह होते हैं। वे लोगों की शिराओं में दौड़ते हैं, उन्हें भीतर ही भीतर बदल डालते है। दुनिया की हर क्रांति से पहले भी सपने ही शिराओं में दौड़ते हैं। फर्क फकत इतना ही है कि क्रांतियां गर्जना करती हैं, लेकिन समाजों के भीतर बदलाव बहुत धीमे, बेहद आहिस्ता-आहिस्ता होते हैं। बसंत की तरह दबे बदलाव समाज की शिराओं में दाखिल होता है और किसी दिन पूरे समाज का रंग-ढ़ंग बदल देता है जैसे बसंत पूरे जंगल को बदल देता है।
नीलम को मुग्ध भाव से देखने वाली ग्रामीण लड़कियों के भीतर भी ग्लैमर की दुनिया में जाने हसरतें हिलोरे ले रही हैं, लेकिन उन इच्छाओं पर वर्जनाओं के पहरे भी हैं। इन सबके बीच नीलम सिर्फ लड़की भर नहीं है। वह उत्तराखंड की लड़कियों की इच्छाओं का चेहरा है, जिनके सपनों का रंग बदल रहा है। पिछले दशकों का वह दौर अब पीछे छुटता जा रहा है जब लड़कियां बीटीसी और बीएड कर सरकारी स्कूलों में टीचर हो जाना चाहती थी। स्कूल में स्वेटर बुनती अध्यापिकाओं के चित्र लड़कियों के दिमाग में दर्ज रहते थे। मध्यवर्गीय और निम्न मध्यवर्गीय परिवारों की लड़कियां अक्सर ऐसा ही कोई सपना देखा करती थी। यह उस समय का सपना था, जो आमतौर पर मध्यवर्ग और निम्न मध्य वर्गीय परिवारों की लड़कियां देखा करती थीं। हालांकि एक छोटी संख्या में लड़कियां डाक्टर, इंजीनियर बनने जैसा सपना तब भी देख रही थी, लेकिन यह आम सपना नहीं था। पिछले पांच-सात सालों में युवाओं और युवतियों में सपनों के स्तर पर बदलाव आए हैं। सिर्फ माता-पिता या परिवार वालों की इच्छा पर आंख मूंदकर बीए, बीएससी या बीकाम करने वाली पीढ़ी धीरे-धीरे कम होती जा रही है। आज के युवा और युवतियां अपनी पसंद के विषय चुनने के जिद भी कर सकते हैं और वे अपने तर्कों से परिजनों को अपनी पसंद मनवाने का माद्दा भी रखते हैं। परिवारों के भीतर पिता की सत्ता कमजोर हो रही है। परिवारों के भीतर लड़कियां भी हाशिये पर नहीं हैं। वे भी बराबरी की ओर बढ़ रही है। यह जो बदलाव है वह भी आज के युवा वर्ग की आकांक्षाओं के दबाव से ही पैदा हुए हैं। इस बदलाव को परिवार नाम की संस्था के ज्यादा लोकतांत्रिक होने का भी लक्षण माना जा सकता है।
हम अपने सामने जो पीढ़ी देख रहे हैं, वह बिल्कुल वैसी नहीं है, जो हमें बीसवीं सदी के नवें और आखिरी दशक के शुरूआती सालों में दिखाई देती है। उस पीढ़ी और मौजूदा पीढ़ी के सपनों का रंग काफी अलग है। दरअसल बीसवीं सदी के आखिरी सालों में जब आर्थिक उदारीकरण के नतीजे आने लगे तब से हम एक नई तरह की युवा पौध देख रहे हैं। यह पौध आत्मविश्वास में पिछली पीढ़ी से आगे है ही, लेकिन उससे कई गुना ज्यादा महत्वाकांक्षी भी है। उसमें आठवें और नवें दशक के युवा की तरह सरकारी नौकरी हासिल कर जीवन को आराम से गुजारने की ललक की जगह निजी क्षेत्र की नौकरियों का जोखिम उठाने का साहस है। लड़कियां मॉडलिंग, एयर होस्टेस से लेकर होटल मैनेजमेंट तक उन पाठ्यक्रमों में जाना पसंद कर रही है, जिनका जिक्र करते हुए भी आठवें व नौवें के दशक युवतियां घबरा जाती थी। यही बात आज के युवाओं पर भी लागू होती है। वे आगे बढ़ने के लिए जो जोखिम उठाने को तैयार हैं, उत्तराखंड के परंपरांगत समाज के नजरिये से देखें तो यह अहम बदलाव है। युवाओं की मनोदशा में आज यह बदलाव जब-तब सवर्णों के भीतर अंतर्जातीय विवाहों की शक्ल में भी सामने आ जाता है। धीरे-धीरे अंतर्जातीय विवाह भी बढ़ रहे हैं, और अब ऐसे विवाहों में परिवार की नाराजगी के बजाय भागीदारी बढ़ रही है।
हम अपने समय की ऐसी महत्वाकांक्षी पीढ़ी को देख रहे हैं, जो अपनी उपस्थिति भी जता रही है और अपने इरादों को लेकर मुखर भी है। लेकिन वे विशेषताएं मौजूद युवा पीढ़ी को खास बनाती है। यह भी नहीं भूला जाना चाहिए कि उन पर अपनी पूर्ववर्ती पीढियों से कहीं ज्यादा उम्मीदों का बोझ है।
मंगलवार, 21 अप्रैल 2009
छोटे दल, मनमोहन का डर
जब से बाईपास सर्ज्ञरी हुई है तब से सुस्त और उदासीन से दिखने वाले मनमोहन सिंह पूरी फारम में लौट आए हैं। उनके दिल को खून की आपूर्ति क्या बहाल हुई कि वह ताबड़तोड़ हमले करने में जुट गए हैं। दिल जब आपका साथ देता है तो मनमोहन भी आडवाणी को ललकार सकते हैं। चुनावी ललकारों के बीच मनमोहन ने क्षेत्रीय दलों को देश के लिए नुकसानदेह बताकर एक नई बहस को जन्म दिया है। यह मनमोहन का राजनीतिक अग्यान भी है कि वह इस देश और उसके विभिन्न समाजों के बारे में कितना कम जानते हैं।
पीएम की इस टिप्पणी के जवाब में देश भर से कई प्रतिक्रियाएं आईं जिनमें मनमोहन की आलोचना की गई थी। दरअसल क्षेत्रीय दलों के चरित्र पर बहस शुरू करने से पहले मनमोहन के इस बयान के निहितार्थ समझे जाने चाहिए। भारतीय राजनीति में 1966 को एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाना चाहिए। 1962 के भारत चीन युध्द में हुई हार से नेहरू और कांग्रेस का पतन शुरू हो गया। विकल्प के अभाव और नेहरू जैसे व्यक्तित्व के कारण कांग्रेस की लोकप्रियता में पड़ रही दरारें दिखाई नहीं दे रहीं थी लेकिन वक्त की धूप, हवा और पानी ने इस किले को भीतर और बाहर दोनों ओर से खाना शुरू कर दिया था। 1964 में नेहरू के अवसान के साथ कांग्रेस की रक्षा करने वाली उनकी विराट छवि भी न रही। १९६७ आते-आते उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक कांग्रेसी किले में पड़ रहीं दरारें दिखने लगी थी। इंदिरा गांधी के उदय से कांग्रेस की विशाल इमारत का दरकना रूक गया। इंदिरा के करिश्मे ने कांग्रेस से मोहभंग की प्रक्रिया को रोक दिया। लेकिन यह इतिहास की विडंबना ही है कि उसी इंदिरा गांधी की इमरजेंसी ने इस प्रक्रिया को आंधी में बदल दिया। 1977 में कांग्रेस की अजेयता को जो चुनौती मिली वह 1989 में दोहराई गई और फिर लगातार दोहराई जा रही है। बीसवीं सदी के आखिरी दशक को भारतीय राजनीति में आये सबसे बुनियादी बदलाव के लिए रेखांकित किया जाना चाहिए। यह वही दशक था जब न केवल भारत का प्राकृतिक मौसम बदल रहा था बल्कि देश की राजनीतिक आबोहवा भी बदल रही थी। देश की राजनीति की भाषा व्याकरण में भी बुनियादी बदलाव तो आए ही साथ ही राष्ट्रीय राजनीति से एकाधिकार का युग भी विदा हो गया।
21वीं सदी में हम जिस राजनीतिक भारत का नक्शा देख रहे हैं वह न तो कांग्रेसी और न ही भगवा रंग में रंगा हुआ है। यह ऐसा बहुरंगी भारत है जिसमें पूर्वोतर से लेकर सुदूर दक्षिण तक मौजूद जातियां और क्षेत्र अपने-अपने रंगों के साथ उपस्थित हैं। मनमोहन सिंह की मुश्किल यह है कि वह ऐसा भारत चाहते हैं जो भले ही जातियों क्षेत्रों और आर्थिक आधार पर विभिन्न स्तरों पर विभाजित हो लेकिन राजनीतिक रूप से वह एक रूप हो। दरअसल कांग्रेस को 1952 वाला भारत चाहिए तो भाजपा कांग्रेस वाले भारत में भगवा रंग भरकर अपने वाला एक रूप भारत चाहती है। यानी ठीक वैसा भारत जैसा आरएसएस के बंच आफ थाट्स में लिख दिया गया है। लेकिन इस देश के साथ मुश्किल यह है कि यह न तो कांग्रेस और न भाजपा की राजनीतिक भाषा, व्याकरण में बोल रहा है। 21वीं सदी के राजनीतिक भारत की सामाजिक- राजनीतिक आकांक्षाएं अपने-अपने सुरों में बोल रही हैं। अगर ये सुर मनमोहन को रास नहीं आ रहे हैं तो यह उनकी राजनीति और समझ की समस्या है न कि भारतीय समाज की। मनमोहन को जानना चाहिए कि भारत को यदि एक संघीय गणराज्य बनाने का संविधान निमार्ताओं का निर्णय आखिर यूं ही हवा-हवाई नहीं था। वे जानते थे कि भारतीय समाज जापानियों अंग्रेजों या जर्मनों की तरह सपाट समाज नहीं है। भाषा, जातियां, धार्मिक विश्वास़, भूगोल और संस्कृतियां भारतीय समाज को कई राष्ट्रीयताओं और उपराष्ट्रीयताओं में बांटते हैं। हम भारत नाम के जिस राष्ट्र राज्य को प्रशासनिक तौर पर देख रहे हैं वह दरअसल इन्हीं विभिन्न वर्णी समाजों का संघीय रूप है। भारतीय संविधान ने इस सच्चाई को स्वीकार कर इसे एक प्रशासनिक ईकाई बनाया है। इससे पहले भी अंग्रेजों से लेकर अकबर तक और उससे पहले के मध्यकालीन भारत में भी जो भी साम्राज्य आए उन्होंने अपने माताहत रियासतों की पहचान में कोई छेड़खानी नहीं की। इसलिए मनमोहन सिंह को यह जानना चाहिए कि वह भारत के विभिन्न समाजों की राजनीतिक पहचानों में जिन विविधताओं से हैरान हैं वह दरअसल भारत के डीएनए में है। 1952 से 1962 के एक दशक में यह विविधता भले ही नेहरू गांधी के करिश्मे में ढंक गई हो लेकिन तब भी इसकी अंतर्धाराएं लगातार मौजूद रहीं। कांग्रेस के पुण्यों और करिश्मे का ग्लेशियर जैसे ही पिघलने लगा तो द्रविड़ से लेकर मलयाली बंगाली तक सारी अंतर्धाराएं दिखने लगीं। मनमोहन जिन राजनीतिक शक्तियों के उभार से परेशान हैं वे सारी की सारी गैर कांग्रेसवाद की कोख से जनमी हैं। कांग्रेस की विफलताओं ने ही गैर कांग्रेसवाद जैसी नकारात्मक राजनीति को विचारधारा में बदल दिया। छोटे दलों के उभार पर मनमोहन को शिकायत करने का नैतिक अधिकार नहीं है। मनमोहन छोटे दलों के उभार से इसलिए भी नाराज हैं क्योंकि इन दलों के कारण ही वह अपने उस आर्थिक एजेंडे को पूरी तरह लागू नहीं कर पा रहे हैं जो विश्व बैंक़, डब्लूटीओ और बहुराष्ट्रीय कंपनियां चाह रही हैं। हालांकि वह काफी हद तक भारत की परंपरागत अर्थव्यवस्थाकी रीढ तोड़ने में कामयाब रहे हैं लेकिन यह उतनी तेजी से नहीं हो पा रहा है जितना कि उदारीकरण के मालिक लोग अपने भारतीय कर्मचारियों से चाह रहे हैं।
दरअसल उदारीकरण की सबसे बड़ी चैंपियन पार्टियां कांग्रेस और भाजपा देश में अमेरिका की तरह दो दलीय लोकतंत्र चाहती हैं। यह सिर्फ संयोग नहीं है कि विश्व बैंक़ डब्लूटीओ भी यही चाहते हैं क्योंकि दो दलीय लोकतंत्र को अमेरिका की तरह कारपोरेट लोकतंत्र में बदला जा सकता है। कांग्रेस और भाजपा कारपोरेट हितों की रक्षा करने में अपने कौशल को साबित कर चुकी हैं। इसलिए भारतीय हो या विदेशी कारपोरेट जगत यही चाहता है कि चुनाव कांग्रेस और भाजपा के बीच सीमित हो जाए ताकि ऐसे दल सत्ता में न आ सकें जिन पर वोटर का करीबी नियंत्रण है। छोटे दलों का अस्तित्व ही चूंकि लोकप्रियतावादी नीतियों पर टिका है इसलिए समर्थकों की प्रतिक्रियाओं से भी इन दलों की नीतियां बनती-बिगड़ती रहती हैं। तो मनमोहन अकेले नहीं है और न ही हेडगेवार अकेले थे जिन्हे गंजे की तरह सपाट भारत चाहिए था वह अकेले नहीं जिन्हें गरीब और अमीर की वर्गीय विविधता वाला भारत तो चाहिए लेकिन राजनीतिक रूप से सपाट देश चाहिए। लेकिन इन महानुभावों की त्रासदी यह है कि वे देश नहीं चुन सकते इसलिए विधवा विलाप करते हुए भी उन्हें इसी भारत में रहना है।
लेकिन इन तर्कों में देश के छोटे दलों की राजनीति का औचित्य साबित करने का खतरा भी छुपा है। दरअसल भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का उभार दक्षिण भारत से शुरू हुआ जहां द्रविड़ राजनीति के सूत्रधार के रूप में डीएमके, एआईडीएमके, टीडीपी ने अपना सफर शुरू किया। लेकिन अब भारतीय राजनीति में छोटे दलों की भरमार है। बीसवीं सदी के नवें दशक और 21वीं सदी के पहले दशक में इन छोटे दलों में से अधिकांश ने केंद्र और राज्य स्तर पर गठबंधन की जो राजनीति की है वह भारतीय राजनीति में अवसरवाद की पराकाष्ठा है। भारतीय राजनीति के बहुध्रुवीय और विकेंद्रीयकृत होने की जो उम्मीद इन छोटे दलों से जगी थी उसे इस अवसरवाद ने चूर-चूर कर दिया। इनमें से कई छोटे दलों ने यह भी साबित कर दिया की बौने नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की निकृष्ट अभिव्यक्ति हैं। इनमें से अधिकांश दलों ने अपने आचार- व्यवहार और राजनीति से ऐसा कुछ भी साबित नहीं किया जिससे यह लगे कि देश और दुनिया के बारे में इन दलों का अपना कोई नजरिया है। देश और दुनिया के बारे में न कोई समझ, न कोई सपना, अधिकांश छोटे दलों के बारे में सच्चाई यही है। इसलिए इन दलों को कभी भाजपा, कभी कांग्रेस तो कभी कम्युनिस्टों के साथ गठबंधन करने में न झिझक महसूस होती है और न शर्म ही आती है। इस वैचारिक अराजकता और परले दर्जे की सत्तालिप्सा ने ही कांग्रेस और भाजपा को छोटे दलों के खिलाफ माहौल बनाने का मसाला दिया है। देश में मध्यवर्ग के एक हिस्से में कांग्रेस और भाजपा का यह प्रचार असर भी दिखा रहा है। छोटे दलों की यह विफलता देश को दो दलीय राजनीति की ओर ले जाएगी जिसके नतीजे देश के लिए खतरनाक होंगे । क्योंकि आर्थिक नीतियों से लेकर भ्रष्टाचार सत्ता के चरित्र तक ये दोनों दल एक दूसरे के क्लोन हैं। अंतर इतना ही है कि भाजपा में भगवा रंग वाला डीएनए थोड़ा गाढे रंग और कांग्रेस में यह डीएनए हल्के भगवे रंग का है।
दुर्भाग्य से यदि राजनीति कांग्रेस और भाजपा तक सीमित हुई तो ये दोनों दल सड़क से लेकर संसद तक फ्रेंडली मैच खेलेंगे और हर पांच वर्ष दल तो बदलेंगे लेकिन हालात वही रहेंगे। देश को यदि बड़े दलों की आपदा से बचना है तो उसे सही मायनों में क्षेत्रीय या आंचलिक सवालों पर राजनीति करने वाले दलों की जरूरत है। तब जाकर ही भारतीय संसद और राजनीति का चरित्र सही मायनों में संघीय हो सकेगा।
पीएम की इस टिप्पणी के जवाब में देश भर से कई प्रतिक्रियाएं आईं जिनमें मनमोहन की आलोचना की गई थी। दरअसल क्षेत्रीय दलों के चरित्र पर बहस शुरू करने से पहले मनमोहन के इस बयान के निहितार्थ समझे जाने चाहिए। भारतीय राजनीति में 1966 को एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाना चाहिए। 1962 के भारत चीन युध्द में हुई हार से नेहरू और कांग्रेस का पतन शुरू हो गया। विकल्प के अभाव और नेहरू जैसे व्यक्तित्व के कारण कांग्रेस की लोकप्रियता में पड़ रही दरारें दिखाई नहीं दे रहीं थी लेकिन वक्त की धूप, हवा और पानी ने इस किले को भीतर और बाहर दोनों ओर से खाना शुरू कर दिया था। 1964 में नेहरू के अवसान के साथ कांग्रेस की रक्षा करने वाली उनकी विराट छवि भी न रही। १९६७ आते-आते उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक कांग्रेसी किले में पड़ रहीं दरारें दिखने लगी थी। इंदिरा गांधी के उदय से कांग्रेस की विशाल इमारत का दरकना रूक गया। इंदिरा के करिश्मे ने कांग्रेस से मोहभंग की प्रक्रिया को रोक दिया। लेकिन यह इतिहास की विडंबना ही है कि उसी इंदिरा गांधी की इमरजेंसी ने इस प्रक्रिया को आंधी में बदल दिया। 1977 में कांग्रेस की अजेयता को जो चुनौती मिली वह 1989 में दोहराई गई और फिर लगातार दोहराई जा रही है। बीसवीं सदी के आखिरी दशक को भारतीय राजनीति में आये सबसे बुनियादी बदलाव के लिए रेखांकित किया जाना चाहिए। यह वही दशक था जब न केवल भारत का प्राकृतिक मौसम बदल रहा था बल्कि देश की राजनीतिक आबोहवा भी बदल रही थी। देश की राजनीति की भाषा व्याकरण में भी बुनियादी बदलाव तो आए ही साथ ही राष्ट्रीय राजनीति से एकाधिकार का युग भी विदा हो गया।
21वीं सदी में हम जिस राजनीतिक भारत का नक्शा देख रहे हैं वह न तो कांग्रेसी और न ही भगवा रंग में रंगा हुआ है। यह ऐसा बहुरंगी भारत है जिसमें पूर्वोतर से लेकर सुदूर दक्षिण तक मौजूद जातियां और क्षेत्र अपने-अपने रंगों के साथ उपस्थित हैं। मनमोहन सिंह की मुश्किल यह है कि वह ऐसा भारत चाहते हैं जो भले ही जातियों क्षेत्रों और आर्थिक आधार पर विभिन्न स्तरों पर विभाजित हो लेकिन राजनीतिक रूप से वह एक रूप हो। दरअसल कांग्रेस को 1952 वाला भारत चाहिए तो भाजपा कांग्रेस वाले भारत में भगवा रंग भरकर अपने वाला एक रूप भारत चाहती है। यानी ठीक वैसा भारत जैसा आरएसएस के बंच आफ थाट्स में लिख दिया गया है। लेकिन इस देश के साथ मुश्किल यह है कि यह न तो कांग्रेस और न भाजपा की राजनीतिक भाषा, व्याकरण में बोल रहा है। 21वीं सदी के राजनीतिक भारत की सामाजिक- राजनीतिक आकांक्षाएं अपने-अपने सुरों में बोल रही हैं। अगर ये सुर मनमोहन को रास नहीं आ रहे हैं तो यह उनकी राजनीति और समझ की समस्या है न कि भारतीय समाज की। मनमोहन को जानना चाहिए कि भारत को यदि एक संघीय गणराज्य बनाने का संविधान निमार्ताओं का निर्णय आखिर यूं ही हवा-हवाई नहीं था। वे जानते थे कि भारतीय समाज जापानियों अंग्रेजों या जर्मनों की तरह सपाट समाज नहीं है। भाषा, जातियां, धार्मिक विश्वास़, भूगोल और संस्कृतियां भारतीय समाज को कई राष्ट्रीयताओं और उपराष्ट्रीयताओं में बांटते हैं। हम भारत नाम के जिस राष्ट्र राज्य को प्रशासनिक तौर पर देख रहे हैं वह दरअसल इन्हीं विभिन्न वर्णी समाजों का संघीय रूप है। भारतीय संविधान ने इस सच्चाई को स्वीकार कर इसे एक प्रशासनिक ईकाई बनाया है। इससे पहले भी अंग्रेजों से लेकर अकबर तक और उससे पहले के मध्यकालीन भारत में भी जो भी साम्राज्य आए उन्होंने अपने माताहत रियासतों की पहचान में कोई छेड़खानी नहीं की। इसलिए मनमोहन सिंह को यह जानना चाहिए कि वह भारत के विभिन्न समाजों की राजनीतिक पहचानों में जिन विविधताओं से हैरान हैं वह दरअसल भारत के डीएनए में है। 1952 से 1962 के एक दशक में यह विविधता भले ही नेहरू गांधी के करिश्मे में ढंक गई हो लेकिन तब भी इसकी अंतर्धाराएं लगातार मौजूद रहीं। कांग्रेस के पुण्यों और करिश्मे का ग्लेशियर जैसे ही पिघलने लगा तो द्रविड़ से लेकर मलयाली बंगाली तक सारी अंतर्धाराएं दिखने लगीं। मनमोहन जिन राजनीतिक शक्तियों के उभार से परेशान हैं वे सारी की सारी गैर कांग्रेसवाद की कोख से जनमी हैं। कांग्रेस की विफलताओं ने ही गैर कांग्रेसवाद जैसी नकारात्मक राजनीति को विचारधारा में बदल दिया। छोटे दलों के उभार पर मनमोहन को शिकायत करने का नैतिक अधिकार नहीं है। मनमोहन छोटे दलों के उभार से इसलिए भी नाराज हैं क्योंकि इन दलों के कारण ही वह अपने उस आर्थिक एजेंडे को पूरी तरह लागू नहीं कर पा रहे हैं जो विश्व बैंक़, डब्लूटीओ और बहुराष्ट्रीय कंपनियां चाह रही हैं। हालांकि वह काफी हद तक भारत की परंपरागत अर्थव्यवस्थाकी रीढ तोड़ने में कामयाब रहे हैं लेकिन यह उतनी तेजी से नहीं हो पा रहा है जितना कि उदारीकरण के मालिक लोग अपने भारतीय कर्मचारियों से चाह रहे हैं।
दरअसल उदारीकरण की सबसे बड़ी चैंपियन पार्टियां कांग्रेस और भाजपा देश में अमेरिका की तरह दो दलीय लोकतंत्र चाहती हैं। यह सिर्फ संयोग नहीं है कि विश्व बैंक़ डब्लूटीओ भी यही चाहते हैं क्योंकि दो दलीय लोकतंत्र को अमेरिका की तरह कारपोरेट लोकतंत्र में बदला जा सकता है। कांग्रेस और भाजपा कारपोरेट हितों की रक्षा करने में अपने कौशल को साबित कर चुकी हैं। इसलिए भारतीय हो या विदेशी कारपोरेट जगत यही चाहता है कि चुनाव कांग्रेस और भाजपा के बीच सीमित हो जाए ताकि ऐसे दल सत्ता में न आ सकें जिन पर वोटर का करीबी नियंत्रण है। छोटे दलों का अस्तित्व ही चूंकि लोकप्रियतावादी नीतियों पर टिका है इसलिए समर्थकों की प्रतिक्रियाओं से भी इन दलों की नीतियां बनती-बिगड़ती रहती हैं। तो मनमोहन अकेले नहीं है और न ही हेडगेवार अकेले थे जिन्हे गंजे की तरह सपाट भारत चाहिए था वह अकेले नहीं जिन्हें गरीब और अमीर की वर्गीय विविधता वाला भारत तो चाहिए लेकिन राजनीतिक रूप से सपाट देश चाहिए। लेकिन इन महानुभावों की त्रासदी यह है कि वे देश नहीं चुन सकते इसलिए विधवा विलाप करते हुए भी उन्हें इसी भारत में रहना है।
लेकिन इन तर्कों में देश के छोटे दलों की राजनीति का औचित्य साबित करने का खतरा भी छुपा है। दरअसल भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का उभार दक्षिण भारत से शुरू हुआ जहां द्रविड़ राजनीति के सूत्रधार के रूप में डीएमके, एआईडीएमके, टीडीपी ने अपना सफर शुरू किया। लेकिन अब भारतीय राजनीति में छोटे दलों की भरमार है। बीसवीं सदी के नवें दशक और 21वीं सदी के पहले दशक में इन छोटे दलों में से अधिकांश ने केंद्र और राज्य स्तर पर गठबंधन की जो राजनीति की है वह भारतीय राजनीति में अवसरवाद की पराकाष्ठा है। भारतीय राजनीति के बहुध्रुवीय और विकेंद्रीयकृत होने की जो उम्मीद इन छोटे दलों से जगी थी उसे इस अवसरवाद ने चूर-चूर कर दिया। इनमें से कई छोटे दलों ने यह भी साबित कर दिया की बौने नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की निकृष्ट अभिव्यक्ति हैं। इनमें से अधिकांश दलों ने अपने आचार- व्यवहार और राजनीति से ऐसा कुछ भी साबित नहीं किया जिससे यह लगे कि देश और दुनिया के बारे में इन दलों का अपना कोई नजरिया है। देश और दुनिया के बारे में न कोई समझ, न कोई सपना, अधिकांश छोटे दलों के बारे में सच्चाई यही है। इसलिए इन दलों को कभी भाजपा, कभी कांग्रेस तो कभी कम्युनिस्टों के साथ गठबंधन करने में न झिझक महसूस होती है और न शर्म ही आती है। इस वैचारिक अराजकता और परले दर्जे की सत्तालिप्सा ने ही कांग्रेस और भाजपा को छोटे दलों के खिलाफ माहौल बनाने का मसाला दिया है। देश में मध्यवर्ग के एक हिस्से में कांग्रेस और भाजपा का यह प्रचार असर भी दिखा रहा है। छोटे दलों की यह विफलता देश को दो दलीय राजनीति की ओर ले जाएगी जिसके नतीजे देश के लिए खतरनाक होंगे । क्योंकि आर्थिक नीतियों से लेकर भ्रष्टाचार सत्ता के चरित्र तक ये दोनों दल एक दूसरे के क्लोन हैं। अंतर इतना ही है कि भाजपा में भगवा रंग वाला डीएनए थोड़ा गाढे रंग और कांग्रेस में यह डीएनए हल्के भगवे रंग का है।
दुर्भाग्य से यदि राजनीति कांग्रेस और भाजपा तक सीमित हुई तो ये दोनों दल सड़क से लेकर संसद तक फ्रेंडली मैच खेलेंगे और हर पांच वर्ष दल तो बदलेंगे लेकिन हालात वही रहेंगे। देश को यदि बड़े दलों की आपदा से बचना है तो उसे सही मायनों में क्षेत्रीय या आंचलिक सवालों पर राजनीति करने वाले दलों की जरूरत है। तब जाकर ही भारतीय संसद और राजनीति का चरित्र सही मायनों में संघीय हो सकेगा।
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