चकराता। बर्फ से ढ़के पहाड़ और हरे भरे जंगलों के ऐसे दृष्य कि आप अपनी सुध बुध खो बैठें। जिन्हें स्वर्ग बहुत लुभाता है, वे इसे स्वर्ग से सुंदर कह दें तो भी इंद्र की शान में गुस्ताखी नहीं होगी और न मेनका और रंभा जैसी वे अप्सरायें नाराज होंगी जो स्वर्ग को उसकी दिव्यता के बीच मानवीय बनाती हैं। कभी-कभी लगता है कि मैदान की गर्मियों से त्रस्त होकर ईश्वर ने चकराता के सुंदर पहाड़ बनाये होंगे। जौनसार का समाज कई मायनों में अनूठा है। गढ़वाल के पहाड़ी समाज से अलग इसका अपना खास रंग है। यह समाज सदियों से बाहरियों को लुभाता रहा है, और कहावतें बनती रही कि जो जौनसार गया वह फिर कभी लौटा नहीं। बाहर से देखने वालों के लिए वह आश्चर्य में लिपटा रहस्यमय लोक बना रहा। किस्से और दंतकथाएं रहस्य की इन परतों को और भी गहरा करती रही। आजादी की आधी सदी गुजर चुकी है लेकिन चकराता अभी भी विकास का ककहरा पढ़ रहा है। अलबत्ता उसके नेता भ्रष्टाचार की विधा में पारंगत हो गए हैं। अपने आप सिमटा, सकुचाया रहने वाला जौनसारी समाज भी बदलाव की अंगड़ाई ले रहा है। उसके भीतर मौजूद आत्मविश्वास अब बोलने लगा है। दरअसल जब सपने बदलते हैं तो समाज भी बदलते हैं। यह किस्सा सपने बदल जाने का ही है।
चकराता के पास एक छोटा सा गांव है। आम पहाड़ी गांव की तरह। करीने से लगे देवदार के जंगल, पहाड़ी ढ़लान पर छोटे-छोटे पर हरे-भरे खेत और सामने दिव्य हिमालय। सदियों से मौसम की विभीषिकाओं, आपदाओं की त्रासदियों के बीच निरे आम लोगों ने इस गांव को एक सुंदर भू-दृश्य में बदला है। उन्हीं आम-अनाम लोगों के श्रम की गंध से इस गांव के खेत और मकान आज भी महकते हैं।
हर गांव की तरह गांव के पास परंपराओं की अपनी बेडियां हैं। परंतु परंपराओं की जकड़न के बीच हर नई पीढ़ी अपने लिए आकांक्षाओं के नए आकाश चुनती है। परंपराओं की बेडियां ढ़ीली पड़ती हैं और मानव सभ्यता थोड़ा आगे सरक जाती है। इसी गांव की एक लड़की है नीलम चौहान। खास बात यह थी कि नीलम को सपना देखना भी आता था और उसके पास वह जिद भी थी जो सपनों को धरती पर उतारने के जरूरी होती है। नीलम का परिवार संयुक्त परिवार है, इतना बड़ा परिवार कि दिल्ली-मुम्बई के लोगों को यह परिवार नहीं बल्कि बारात जैसा लगे। ६० लोगों का परिवार। चकराता के इर्द-गिर्द के इलाके में दूसरा सबसे बड़ा परिवार है। जितना बड़ा परिवार, रिश्तों के धागे में उतने ही गहरा गुंथा हुआ। इतने बड़े परिवार को यदि एक रखना है तो जाहिर है कि परंपराओं और अनुशासन की सख्त चाबुक भी चाहिए होगी। कई पुरूषों और उनकी हां में हां मिलाने वाली महिला सदस्यों के इस भरे-पूरे परिवार में एक किशोर लड़की शादी के सिवा दूसरा सपना देखे भी तो कैसे? पर नीलम ने यह गुस्ताखी कर ही डाली। नीलम ने यदि डाक्टर, इंजीनीयर या टीचर वगैरह बनने का सपना देखा होता तो घर में तूफान न मचा होता, लेकिन परंपराओं में जकड़े समाज ने फैशन को कैरियर बनाना तो किसी कुफ्र से कम न था। सबसे मुश्किल यह थी कि इस लड़ाई में उसके सामने कोई पराये नहीं थे। जिनके खिलाफ उसे अपनी आवाज बुलंद करनी थी, वे सारे के सारे अपने ही थे। वही ताऊजी जिनकी उंगली पकड़ कर उसने चलना सीखा तो वही चाचा-चाचियां जिनके दुलार से राजकुमारी की तरह इतराती थी। यह कठिन परीक्षा थी परंतु घर के इस विरोध में उसके पिता और मां उसके साथ खड़े रहे। एक दिन पूरे गांव ने आश्चर्य के साथ देखा कि बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध की परंपरा में रह रहे समाज की एक लड़की मॉडलिंग के वर्जित क्षेत्र में चली गई। पूरा गांव जैसे डोल गया।
किसी को लगा कि उनका समाज जैसे तहस-नहस हो जाएगा। गांव की बूढ़ी औरतों के लिए यह घोर कलयुग के आने का शंखनाद था। अनर्थ की इन बूढ़ी आशंकाओं के बीच नीलम मिस दून चुनी गई तो उसके सपनों को जैसे पंख लग गए। यह उस सपने की भी जीत थी जो लालटेन की रौशनी में ठेठ पहाड़ी गांव में देखा गया था। इसके बाद नीलम ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और अक्सर होने वाले फैशन शोज में वह सबसे पसंदीदा चेहरा बन गई। आज नीलम एक प्रतिष्ठित एयरलाइंस में एयर होस्टेस है। वह जब गांव लौटती है हमउम्र और किशोर लड़कियां उसे आश्चर्य मिश्रित कौतुहल के साथ देखती हैं कि वह उन्हीं में से एक है क्या! आज उसके संयुक्त परिवार को नीलम पर नाज है। नीलम को देखकर उसके गांव और आसपड़ोस के गांव की लड़कियों की आंखों में सपने जगमगाने लगे हैं। सपने संक्रामक रोग की तरह होते हैं। वे लोगों की शिराओं में दौड़ते हैं, उन्हें भीतर ही भीतर बदल डालते है। दुनिया की हर क्रांति से पहले भी सपने ही शिराओं में दौड़ते हैं। फर्क फकत इतना ही है कि क्रांतियां गर्जना करती हैं, लेकिन समाजों के भीतर बदलाव बहुत धीमे, बेहद आहिस्ता-आहिस्ता होते हैं। बसंत की तरह दबे बदलाव समाज की शिराओं में दाखिल होता है और किसी दिन पूरे समाज का रंग-ढ़ंग बदल देता है जैसे बसंत पूरे जंगल को बदल देता है।
नीलम को मुग्ध भाव से देखने वाली ग्रामीण लड़कियों के भीतर भी ग्लैमर की दुनिया में जाने हसरतें हिलोरे ले रही हैं, लेकिन उन इच्छाओं पर वर्जनाओं के पहरे भी हैं। इन सबके बीच नीलम सिर्फ लड़की भर नहीं है। वह उत्तराखंड की लड़कियों की इच्छाओं का चेहरा है, जिनके सपनों का रंग बदल रहा है। पिछले दशकों का वह दौर अब पीछे छुटता जा रहा है जब लड़कियां बीटीसी और बीएड कर सरकारी स्कूलों में टीचर हो जाना चाहती थी। स्कूल में स्वेटर बुनती अध्यापिकाओं के चित्र लड़कियों के दिमाग में दर्ज रहते थे। मध्यवर्गीय और निम्न मध्यवर्गीय परिवारों की लड़कियां अक्सर ऐसा ही कोई सपना देखा करती थी। यह उस समय का सपना था, जो आमतौर पर मध्यवर्ग और निम्न मध्य वर्गीय परिवारों की लड़कियां देखा करती थीं। हालांकि एक छोटी संख्या में लड़कियां डाक्टर, इंजीनियर बनने जैसा सपना तब भी देख रही थी, लेकिन यह आम सपना नहीं था। पिछले पांच-सात सालों में युवाओं और युवतियों में सपनों के स्तर पर बदलाव आए हैं। सिर्फ माता-पिता या परिवार वालों की इच्छा पर आंख मूंदकर बीए, बीएससी या बीकाम करने वाली पीढ़ी धीरे-धीरे कम होती जा रही है। आज के युवा और युवतियां अपनी पसंद के विषय चुनने के जिद भी कर सकते हैं और वे अपने तर्कों से परिजनों को अपनी पसंद मनवाने का माद्दा भी रखते हैं। परिवारों के भीतर पिता की सत्ता कमजोर हो रही है। परिवारों के भीतर लड़कियां भी हाशिये पर नहीं हैं। वे भी बराबरी की ओर बढ़ रही है। यह जो बदलाव है वह भी आज के युवा वर्ग की आकांक्षाओं के दबाव से ही पैदा हुए हैं। इस बदलाव को परिवार नाम की संस्था के ज्यादा लोकतांत्रिक होने का भी लक्षण माना जा सकता है।
हम अपने सामने जो पीढ़ी देख रहे हैं, वह बिल्कुल वैसी नहीं है, जो हमें बीसवीं सदी के नवें और आखिरी दशक के शुरूआती सालों में दिखाई देती है। उस पीढ़ी और मौजूदा पीढ़ी के सपनों का रंग काफी अलग है। दरअसल बीसवीं सदी के आखिरी सालों में जब आर्थिक उदारीकरण के नतीजे आने लगे तब से हम एक नई तरह की युवा पौध देख रहे हैं। यह पौध आत्मविश्वास में पिछली पीढ़ी से आगे है ही, लेकिन उससे कई गुना ज्यादा महत्वाकांक्षी भी है। उसमें आठवें और नवें दशक के युवा की तरह सरकारी नौकरी हासिल कर जीवन को आराम से गुजारने की ललक की जगह निजी क्षेत्र की नौकरियों का जोखिम उठाने का साहस है। लड़कियां मॉडलिंग, एयर होस्टेस से लेकर होटल मैनेजमेंट तक उन पाठ्यक्रमों में जाना पसंद कर रही है, जिनका जिक्र करते हुए भी आठवें व नौवें के दशक युवतियां घबरा जाती थी। यही बात आज के युवाओं पर भी लागू होती है। वे आगे बढ़ने के लिए जो जोखिम उठाने को तैयार हैं, उत्तराखंड के परंपरांगत समाज के नजरिये से देखें तो यह अहम बदलाव है। युवाओं की मनोदशा में आज यह बदलाव जब-तब सवर्णों के भीतर अंतर्जातीय विवाहों की शक्ल में भी सामने आ जाता है। धीरे-धीरे अंतर्जातीय विवाह भी बढ़ रहे हैं, और अब ऐसे विवाहों में परिवार की नाराजगी के बजाय भागीदारी बढ़ रही है।
हम अपने समय की ऐसी महत्वाकांक्षी पीढ़ी को देख रहे हैं, जो अपनी उपस्थिति भी जता रही है और अपने इरादों को लेकर मुखर भी है। लेकिन वे विशेषताएं मौजूद युवा पीढ़ी को खास बनाती है। यह भी नहीं भूला जाना चाहिए कि उन पर अपनी पूर्ववर्ती पीढियों से कहीं ज्यादा उम्मीदों का बोझ है।
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जी आपसे पूरी तरह से सहमत हूँ
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तख़लीक़-ए-नज़र । चाँद, बादल और शाम । गुलाबी कोंपलें । तकनीक दृष्टा
नीलम को प्रतीक बनाकर आपने बहुत तार्किक ढंग से बदलते समाज की तस्वीर रखी है। युवाओं के सपने तो हर दशक में बदले हैं लेकिन चकराता जैसी जगह में भी बयार चल निकली है; ये खुशी की बात है।
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