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शनिवार, 26 नवंबर 2011

इस थप्पड़ को यहां से देखो


शरद पवार पर थप्पड़ मारे जाने की घटना को मीडिया और कुछ राजनीतिक दलों ने महंगाई से जोड़ दिया। यह एक तरह से इस घटना का औचित्य साबित करने की कोशिश है। अन्ना हजारे भी इस पर अपनी प्रसन्नता व्यक्त करने से खुद को नहीं रोक पाए और बोले ,‘‘ बस!एक थप्पड!!’’ गोया उन्हे उम्मीद रही हो कि शरद पवार पर और थप्पड़ मारे जाने थे। टीम अन्ना ने भी राजनीतिक लाभ उठाने की नीयत से इसे नेताओं की साख की ओर मोड़ दिया। किरन बेदी और कुमार विश्वास की प्रसन्नतायें भी इसी कारण उनके ट्वीट से बाहर छलक रहीं थी। इस पूरे वाकये पर समझदारी और परिपक्वता की जो अपेक्षा मीडिया और राजनेताओं से थी वे पूरी नहीृ हुई। लेकिन गुस्से की इन व्यक्तिगत अभिव्यक्तियों को यदि इनके विस्तार और संक्रामक रुप में देखें तो समझ में आ जाएगा कि भविष्य में एक गैर जिम्मेदार और सनसनी प्रिय मीडिया, साख खोए नेता और अन्ना हजारे जैसे गैर जिम्मेदार आंदोलनकारी देश के लिए कितनी आफत खड़ी कर सकते हैं।
इस देश में बड़ी संख्या में लोग मीडिया से नाराज है।। क्या मीडिया पत्रकारों पर होने वाले हमलों का औचित्य इस आधार पर साबित करेगा कि मीडिया की रिपोर्टिंग सही नहीं हो रही है? क्या उन डाॅक्टरों,इंजीनियरों, वकीलों व्यापारियों और उद्योगपतियों पर थप्पड़ नहीं मारे जाने चाहिए जिन्होने आम लोगों का जीवन नर्क बना दिया है? क्या सरकारी अफसरों,एनजीओ के संचालकों को थप्पड़ नहीं मारे जाने चाहिए? अन्ना हजारे शरद पवार की पिटाई पर खुश हो रहे हैं तक प्रशांत भूषण और अन्ना समर्थकों की पिटाई करने का भी तो एक औचित्य भगत सिंह सेना के लोगों के पास है और उन्हे अपने औचित्य पर यकीन रखने का हक है।आप पीटे जांय तो लोकतंत्र को खतरा और दुश्मन पिटे तो लोगों का गुस्सा? यह कैसा कुतर्क है। यदि हरविदर के थप्पड़ का औचित्य है तो माओवादियों की हिंसा का औचित्य क्यों नहीं है? सरकारों ने करोड़ों लोगों का जीवन दूभर कर दिया है तो वे क्यों नहीं हथियार उठायें? एक विचारहीन थप्पड़ का औचित्य साबित करने में मीडिया के दिग्गजों से लेकर राजनीति और समाजशास्त्र,अर्थशास्त्र के सारे दिग्गज 12 घंटे तक न्यूज चैनलों पर जुटे रहे पर इसी दिन अपनी विचारधारा के कारण आदिवासियों के लिए हथियार उठाने वाले किशनजी की प्रतिहिंसा का औचित्य साबित करने के लिए एक भी आगे नहीं आया। क्या मीडिया और विपक्ष को विचारहीन अराजक हिंसा पसंद है और विचारधारा की हिंसा नापसंद है?किशनजी यदि मानते हैं कि क्रांतिकारी बदलाव के लिए हिंसा जरुरी है या राज्य की हिंसा का जवाब हिंसा ही है तो उसका भी औचित्य है। क्रांति का सपना देखने और उसे बंदूक के दम पर हासिल करने का सपना देखने का भी तो औचित्य है। क्या उनके औचित्य पर चर्चा करने से कारपोरेट मीडिया,संसदीय दल और टीम अन्ना इसलिए डरते हैं कि माओवादी उनकी राजनीति के लिए भी खतरनाक हैं? जबकि हरविंदर से शरद पवार के अलावा किसी को भी खतरा नहीं है। इसलिए सभी एक विचारहीन हिंसा का औचित्य साबित करने मंें जुटे हैं।
दरअसल टीम अन्ना और भारतीय मीडिया थप्पड़ को जिस तरह से महिमामंडित कर रही है और जिस चालाकी से उसे जनभावनाओं का प्रगटीकरण बता रही है वह एक खतरनाक खेल है। बाबरी ध्वंस को भी इसी तरह अटल विहारी वाजपेयी ने जनभावनाओं का प्रगटीकरण बताया था। इस देश में हर हिंसक घटना का एक औचित्य है। हर वो वर्ग जिसे साथ अन्याय हो रहा है उसे हिंसा के जरिये अपना गुस्सा अभिव्यक्त करने का औचित्य प्रदान करने का मतलब देश को एक अराजकता की ओर धकेलना हैं। ऐसे में तो मतदाता चुनावों में वोट के जरिये अपना गुस्सा व्यक्त करने के बजाय अपने विधायकों और सांसदों पर जूते फेंकेगा और थप्पड़ो उनकी पिटाई करेगा। भारत में एक भी ऐसा राजनेता नहीं है जिस पर लोगों को भरोसा हो,एक भी नेता ऐसा नहीं है जिस पर लोगों को यह यकीन हो कि वह उनकी नियति बदल सकता है। कांग्रेस-भाजपा से लेकर कम्युनिस्ट पार्टियों तक दलों का नेतृत्व कुलीन और कान्वेंटी नेताओं ने हाईजैक कर लिया है। तीन बड़ी राजनीतिक धाराओं में कोई मास लीडर ही नहीं है। भारतीय राजनीति जब इतनी दरिद्रता से गुजर रही है तब जनता में गुस्सा,मोहभंग और क्षोभ भी होगा।यह लगभग वैसे ही हालात हैं जैसे हिटलर के उदय के समय जर्मनी में थे। नाकारा नेताओं के खिलाफ फैली अराजकता के ज्वार पर ही चढ़कर हिटलर आया था। क्या मीडिया से लेकर टीम अन्ना तक नेताओं को गलियाने वाले सारे लोग हिटलर के लिए ही रास्ता तैयार नहीं कर रहे हैं? क्या यह याद नहीं रखा जाना चाहिए कि तानाशाह सिर्फ सैनिक विद्रोहों के चोर दरवाजों से ही नहीं आए हैं बल्कि वे लोकतंत्र के राजमार्ग से भी गाजे-बाजे और गले में फूलमालाओं के साथ भी दाखिल हुए हैं।चैरीचैरा की हिंसा के बाद सत्याग्रह वापस लेने वाले गांधी मूर्ख नहीं थे।वह जानते थे कि भारत जैसे विशाल देश में लोगों को अपनी मर्जी से हिंसक होने की आजादी देना का मतलब अंग्रेजों देश में सैनिक तानाशाही थोपने का अवसर देना होगा। क्या हम नहीं जानते कि हर असहमति यदि थप्पड़ मारने का यह सिलसिला चल पड़ा तो यह तमाचा किसी दिन पत्रकारों के गाल पर भी पड़ेगा तो किसी दिन अन्ना या किरन बेदी के गाल पर भी। इसे बदलाव और संगठित प्रतिरोध की सकारात्मक ऊर्जा में बदलने के बजाय एक अराजक और विचारहीनता की नकारात्मक ऊर्जा की वकालत करना खतरनाक औा सस्ती लोकप्रियता से प्रेरित प्रवृत्ति है। आज जब देश में किसी में इतना नैतिक बल नही है कि राज्य की हिंसा समेत हर हिंसा का विरोध कर सके तब हममें से हर एक को किसी न किसी के हाथ से तमाचा खाने को तैयार रहना होगा।
 ·  ·  ·  · 6 minutes ago

इस थप्पड़ को यहां से देखो


शरद पवार पर थप्पड़ मारे जाने की घटना को मीडिया और कुछ राजनीतिक दलों ने महंगाई से जोड़ दिया। यह एक तरह से इस घटना का औचित्य साबित करने की कोशिश है। अन्ना हजारे भी इस पर अपनी प्रसन्नता व्यक्त करने से खुद को नहीं रोक पाए और बोले ,‘‘ बस!एक थप्पड!!’’ गोया उन्हे उम्मीद रही हो कि शरद पवार पर और थप्पड़ मारे जाने थे। टीम अन्ना ने भी राजनीतिक लाभ उठाने की नीयत से इसे नेताओं की साख की ओर मोड़ दिया। किरन बेदी और कुमार विश्वास की प्रसन्नतायें भी इसी कारण उनके ट्वीट से बाहर छलक रहीं थी। इस पूरे वाकये पर समझदारी और परिपक्वता की जो अपेक्षा मीडिया और राजनेताओं से थी वे पूरी नहीृ हुई। लेकिन गुस्से की इन व्यक्तिगत अभिव्यक्तियों को यदि इनके विस्तार और संक्रामक रुप में देखें तो समझ में आ जाएगा कि भविष्य में एक गैर जिम्मेदार और सनसनी प्रिय मीडिया, साख खोए नेता और अन्ना हजारे जैसे गैर जिम्मेदार आंदोलनकारी देश के लिए कितनी आफत खड़ी कर सकते हैं।
इस देश में बड़ी संख्या में लोग मीडिया से नाराज है।। क्या मीडिया पत्रकारों पर होने वाले हमलों का औचित्य इस आधार पर साबित करेगा कि मीडिया की रिपोर्टिंग सही नहीं हो रही है? क्या उन डाॅक्टरों,इंजीनियरों, वकीलों व्यापारियों और उद्योगपतियों पर थप्पड़ नहीं मारे जाने चाहिए जिन्होने आम लोगों का जीवन नर्क बना दिया है? क्या सरकारी अफसरों,एनजीओ के संचालकों को थप्पड़ नहीं मारे जाने चाहिए? अन्ना हजारे शरद पवार की पिटाई पर खुश हो रहे हैं तक प्रशांत भूषण और अन्ना समर्थकों की पिटाई करने का भी तो एक औचित्य भगत सिंह सेना के लोगों के पास है और उन्हे अपने औचित्य पर यकीन रखने का हक है।आप पीटे जांय तो लोकतंत्र को खतरा और दुश्मन पिटे तो लोगों का गुस्सा? यह कैसा कुतर्क है। यदि हरविदर के थप्पड़ का औचित्य है तो माओवादियों की हिंसा का औचित्य क्यों नहीं है? सरकारों ने करोड़ों लोगों का जीवन दूभर कर दिया है तो वे क्यों नहीं हथियार उठायें? एक विचारहीन थप्पड़ का औचित्य साबित करने में मीडिया के दिग्गजों से लेकर राजनीति और समाजशास्त्र,अर्थशास्त्र के सारे दिग्गज 12 घंटे तक न्यूज चैनलों पर जुटे रहे पर इसी दिन अपनी विचारधारा के कारण आदिवासियों के लिए हथियार उठाने वाले किशनजी की प्रतिहिंसा का औचित्य साबित करने के लिए एक भी आगे नहीं आया। क्या मीडिया और विपक्ष को विचारहीन अराजक हिंसा पसंद है और विचारधारा की हिंसा नापसंद है?किशनजी यदि मानते हैं कि क्रांतिकारी बदलाव के लिए हिंसा जरुरी है या राज्य की हिंसा का जवाब हिंसा ही है तो उसका भी औचित्य है। क्रांति का सपना देखने और उसे बंदूक के दम पर हासिल करने का सपना देखने का भी तो औचित्य है। क्या उनके औचित्य पर चर्चा करने से कारपोरेट मीडिया,संसदीय दल और टीम अन्ना इसलिए डरते हैं कि माओवादी उनकी राजनीति के लिए भी खतरनाक हैं? जबकि हरविंदर से शरद पवार के अलावा किसी को भी खतरा नहीं है। इसलिए सभी एक विचारहीन हिंसा का औचित्य साबित करने मंें जुटे हैं।
दरअसल टीम अन्ना और भारतीय मीडिया थप्पड़ को जिस तरह से महिमामंडित कर रही है और जिस चालाकी से उसे जनभावनाओं का प्रगटीकरण बता रही है वह एक खतरनाक खेल है। बाबरी ध्वंस को भी इसी तरह अटल विहारी वाजपेयी ने जनभावनाओं का प्रगटीकरण बताया था। इस देश में हर हिंसक घटना का एक औचित्य है। हर वो वर्ग जिसे साथ अन्याय हो रहा है उसे हिंसा के जरिये अपना गुस्सा अभिव्यक्त करने का औचित्य प्रदान करने का मतलब देश को एक अराजकता की ओर धकेलना हैं। ऐसे में तो मतदाता चुनावों में वोट के जरिये अपना गुस्सा व्यक्त करने के बजाय अपने विधायकों और सांसदों पर जूते फेंकेगा और थप्पड़ो उनकी पिटाई करेगा। भारत में एक भी ऐसा राजनेता नहीं है जिस पर लोगों को भरोसा हो,एक भी नेता ऐसा नहीं है जिस पर लोगों को यह यकीन हो कि वह उनकी नियति बदल सकता है। कांग्रेस-भाजपा से लेकर कम्युनिस्ट पार्टियों तक दलों का नेतृत्व कुलीन और कान्वेंटी नेताओं ने हाईजैक कर लिया है। तीन बड़ी राजनीतिक धाराओं में कोई मास लीडर ही नहीं है। भारतीय राजनीति जब इतनी दरिद्रता से गुजर रही है तब जनता में गुस्सा,मोहभंग और क्षोभ भी होगा।यह लगभग वैसे ही हालात हैं जैसे हिटलर के उदय के समय जर्मनी में थे। नाकारा नेताओं के खिलाफ फैली अराजकता के ज्वार पर ही चढ़कर हिटलर आया था। क्या मीडिया से लेकर टीम अन्ना तक नेताओं को गलियाने वाले सारे लोग हिटलर के लिए ही रास्ता तैयार नहीं कर रहे हैं? क्या यह याद नहीं रखा जाना चाहिए कि तानाशाह सिर्फ सैनिक विद्रोहों के चोर दरवाजों से ही नहीं आए हैं बल्कि वे लोकतंत्र के राजमार्ग से भी गाजे-बाजे और गले में फूलमालाओं के साथ भी दाखिल हुए हैं।चैरीचैरा की हिंसा के बाद सत्याग्रह वापस लेने वाले गांधी मूर्ख नहीं थे।वह जानते थे कि भारत जैसे विशाल देश में लोगों को अपनी मर्जी से हिंसक होने की आजादी देना का मतलब अंग्रेजों देश में सैनिक तानाशाही थोपने का अवसर देना होगा। क्या हम नहीं जानते कि हर असहमति यदि थप्पड़ मारने का यह सिलसिला चल पड़ा तो यह तमाचा किसी दिन पत्रकारों के गाल पर भी पड़ेगा तो किसी दिन अन्ना या किरन बेदी के गाल पर भी। इसे बदलाव और संगठित प्रतिरोध की सकारात्मक ऊर्जा में बदलने के बजाय एक अराजक और विचारहीनता की नकारात्मक ऊर्जा की वकालत करना खतरनाक औा सस्ती लोकप्रियता से प्रेरित प्रवृत्ति है। आज जब देश में किसी में इतना नैतिक बल नही है कि राज्य की हिंसा समेत हर हिंसा का विरोध कर सके तब हममें से हर एक को किसी न किसी के हाथ से तमाचा खाने को तैयार रहना होगा।
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शुक्रवार, 17 जून 2011

जेपी, वीपी और अब रामादेव

राजेन टोडरिया
आडवाणी जब यह कह रहे थे कि रामदेव प्रकरण भारतीय राजनीति में टर्निंग प्वांइट हो सकता है तो वह यूंही नहीं कह रहे थे। संघ परिवार के ये भीष्म पितामह भले ही पिछले लोकसभा चुनाव के बाद कलियुगी और कांग्रेसी मनमोहन के कारण शरसैया पर लेटने को मजबूर हों लेकिन उनकी इस बात में इतिहास की अनुगूंजें भी हैं और अनुभव भी। आडवाणी आरएसएस की उस टीम के महत्वपूर्ण मेंबर रहे है जिसने 1974 के जेपी आंदोलन और 1989 के वीपी आंदोलन के लिए जमीन तैयार की। इसी टीम ने इन दोनों आंदोलनों के लिए जरुरी खाद-पानी और गोला बारुद जमा किया। इन दोनों आंदोलनों से सबसे ज्यादा लाभ भी संघ परिवार को हुआ क्योंकि उसके पास जनअसंतोष को भुनाने के लिए ग्रास रुट तक संगठन था जबकि इन आंदोलनों के नेताओं का अपना कोई सांगठनिक आधार नहीं था। 1974 और 1989 की वही राजनीतिक पटकथा इस समय भी मंचित की जा रही है। मंच पर दिखने वाले पात्र और नायक बदल गए हैं पर सूत्रधार संघ परिवार ही है।अब जरा 1974 और 1989 के कालखंड की यात्रा करने चलें। अतीत की यात्रायें इसलिए भी की जानी चाहिए कि वे हमें अपने समाजों को जानने का मौका तो देती ही हैं साथ ही वे भविष्य में झांकने का अवसर भी मुहैया कराती हैं। कहते हैं कि इतिहास खुद को दोहराता है लेकिन हिंदी फिल्मों या धारावाहिकों की तरह उबाऊ और नीरस तरीके से नहीं दोहराता। वह हर बार नएपन के साथ आता है ताकि उसका रहस्य और रोमांच बचा रहे। 1974 और 1989 भारतीय राजनीति के ऐसे कालखंड रहे हैं जब कांग्रेस अभूतपूर्व कामयाबी के साथ सत्ता में आई थी। सन् 1974। बैंकों के राष्ट्रीयकरण,बांग्लादेश विजय जैसी विराट उपलब्धियों और गरीबी हटाओं के करिश्माई नारे की पीठ पर सवार होकर 1971 में कांग्रेस को दैत्याकार कामयाबी मिली। लेकिन 1974 आते- आते सारा प्रभामंडल फीका हो गया।लेकिन अहंकार के मद में चूर कांग्रेस को लगा ही नहीं कि उसके पैरों के तले जमीन खिसक रही है। लोगों की जिंदगी के बुनियादी सवाल जस के तस थे और मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग असंतोष से लबालब था। 1989 का साल। इंदिरा गंाधी की हत्या की सहानुभूति और सिख आतंकवाद के खिलाफ हिंदू बैकलैश से 1984 की भयंकर जीत ने कांग्रेस को अजेय होने के अहंकार से फिर भर दिया था। लेकिन लोगों की समस्याओं का कोई समाधान सरकार के पास नहीं था। जनता अपने आर्थिक संकटों से परेशान थी। 1974 और 1989 दोनों ही जनआकांक्षाओं के ज्वार के बाद की हताशा से जनमे। जेपी और वीपी ने इस हताशा को संबोधित किया और वे मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग में एक उम्मीद की तरह उभरे और एक आंदोलन जड़़ पकड़ता दिखा। हिंदू मध्यवर्ग के एक हिस्से में पैठ रखने वाले अपने के जरिये आरएसएस को पता चल गया कि इन दोनों आंदोलनों के भीतर एक बड़े जनांदोलन की संभावना है। आरएसएस जानता था कि 1974 का जनसंघ और 1989 की भाजपा और उसके नेताओं के बूते देश भर में मध्यवर्ग का एक बड़ा आंदोलन नहीं चलाया जा सकता। इसलिए उसने अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी को पृष्ठभूमि में सरका दिया और एक ही जैसे हालात में एक बार जेपी को आगे किया और इस घटना के ठीक 15 साल बाद बीपी सिंह को आगे कर दिया। इन दोनों के पीछे लोग जरुर थे और वे मध्यवर्ग के लोकप्रिय चेहरा भी थे लेकिन दोनों का अपना कोई सांगठनिक आधार नहीं था। आरएसएस यह जानता था कि जमीनी नेटवर्क न होने से इस आंदोलन से पैदा होने वाली ताकत से उसे नया विस्तार मिलेगा। उसने 1974 और 1989 के आंदोलनों के लिए देश भर में भीड़ जुटाने के काम में अपना कैडर झोंक दिया। इन दोनों आंदोलनों में एक और समानता है। ये दोनों आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरु हुए। इन दोनों ने सरकारी भ्रष्टाचार और कांग्रेस की लीडरशिप को निशाना बनाया। इस प्रकार महंगाई,बेरोजगारी,भुखमरी और गरीबी से जनमे गुस्से को सरकारी भ्रष्टाचार के राजनीतिक एजेंडे में बदल दिया गया। दिलचस्प बात यह है कि भ्रष्टाचार की इस लड़ाई में मुनाफाखोरों,कालाबाजारियों और नाजायज दाम वसूलने वाले निजी क्षेत्र के भ्रष्टाचार पर कोई उंगली नहीं उठाई गई। कटु सच यह है कि इसी वर्ग के गैर कांग्रेसी हिस्से ने इन आंदोलनों के लिए फंड जुटाया और गोयनका के मीडिया हाउस ने इसके प्रचार का जिम्मा उठाया। इन आंदोलनों का एक विशेषता और थी कि इन्होने बेहद चालाकी से महंगाई,गरीबी जैसे बुनियादी सवालों को बहस से हटाकर पूरी लड़ाई भ्रष्टाचार पर केंद्रित कर दी ताकि देश में बुनियादी बदलाव के लिए कोई आंदोलन पैदा होने से रोका जाय और जन असंतोष को सरकारी भ्रष्टाचार तक सीमित रखा जाय। इन दोनों आंदोलनों का लक्ष्य उत्तर भारत का मध्यवर्ग था। इन आंदोलनों को व्यापक बदलाव का औजार नहीं बनने दिया गया। इन आंदोलनों का निशाना साफ था। उनका लक्ष्य जनता की बुनियादी समस्याओं के हल के बजाय कांग्रेस की जगह चुनावी राजनीति में पराजित और पस्त दलों और नेताओं को पिछले दरवाजे से लाकर मंच पर प्रतिष्ठित करना था। दोनो आंदोलन मानते थे कि कांग्रेस के सत्ता से हटने से जनता की सारी मुश्किलें हल हो जाएंगी। दोनों आंदोलनों का सबसे ज्यादा लाभ संघ परिवार की राजनीतिक भुजा जनसंघ और भाजपा को हुआ। जबकि दोनों आंदोलनों से पहले इन्हे अपमानजनक हार झेलनी पड़ी थी। इससे साफ है कि आंदोलनों का राजनीतिक लाभ उठाने की क्षमता और योग्यता आरएसएस में सर्वाधिक है। हालांकि बीपी सिंह शातिर राजनेता थे उन्होने मंडल का अमोघ अस्त्र चलाकर संघ परिवार के कट्टर हिंदूवाद के रास्ते में पिछड़ावाद का स्पीड ब्रेकर लगा दिया। बावजूद इसके 1991 से लेकर 1999 तक भाजपा के उत्कर्ष की कहानी प्रस्तावना तो बीपी सिंह के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने ही लिखी।आज के हालात का जायजा लें तो कहा जा सकता है कि एक बार फिर भारत का मध्यवर्ग बेचैन है। उदारीकरण के बाद जितनी तेजी से देश बदला है उसने गरीबों और मध्यवर्ग के सामने नए संकट पैदा किए हैं। आर्थिक असुरक्षा, महंगाई, बेरोजगारी, भुखमरी के चजते देश के भीतर एक असंतोष घुमड़ रहा है। जाहिर है कि लोगों में सरकार के खिलाफ गुस्सा है लेकिन केंद्र की कांग्रेस सरकार अपने जीत के अहंकार में भी है और उसने तय कर लिया है कि चार साल तक वह लोगों के असंतोष की अनदेखी करने का जोखिम ले सकती है। चूंकि लोगों की नाराजी को संबोधित करने के लिए सरकार तैयार नहीं है और संसदीय विपक्ष जनता के मूल सवालों पर जनांदोलन छेड़ने की स्थिति में इसलिए नहीं है क्योंकि उसकी साख ही नहीं बची है। उसका चरित्र कांग्रेस से भी गया बीता है। इसलिए लोगों के भीतर जो गुबार है उसे निकासी का रास्ता चाहिए। यह असंतोष कहीं भट्टा परसोल के किसान विद्रोह के रुप में सामने आ रहा है तो कहीं माओवादी संघर्ष के रुप में। इस असंतोष को बुनियादी बदलाव की लड़ाई में बदलने से रोकने के लिए व्यवस्था का प्रतिरक्षा तंत्र सक्रिय हो गया है और उसने एंटीबॉडी बनानी शुरु कर दी हैं। अन्ना हजारे या बाबा रामदेव और तथाकथित सिविल सोसाइटी के नेता दरअसल यही एंटीबॉडी हैं। उदारीकरण से जनमे गरीबी,भुखमरी,बेरोजगारी,आर्थिक असुरक्षा और महंगाई के बुनियादी सवालों को सिर्फ सरकारी भ्रष्टाचार तक सीमित करने का यह पूरा आंदोलन उदारीकरण के जनविरोधी चेहरे से ध्यान हटाने की सोची समझी रणनीति है ताकि लोगों को बुनियादी बदलाव के क्रांतिकारी रास्ते पर जाने से रोका जा सके। 1974 और 1989 की तरह जनता की पूरी ऊर्जा को सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ मोड़ने से लाभ यह है कि लोगों का यकीन मनमोहन सिंह आडवाणी में भले ही न रहे पर वह अन्ना हजारे और बाबा रामदेव में बना रहेगा। इससे यह साबित नहीं होगा कि भ्रष्टाचार का यह चरम दरअसल उस उदारीकरण की उपज है जिसके विश्वकर्मा मनमोहन,चिदंबरम,यशवंत सिन्हा रहे हैं। भारतीय कारपोरेट की नजर में मनमोहन सिंह की उपयोगिता खत्म हो चुकी है और अब उसे नया चेहरा चाहिए। इसलिए अन्ना हजारे,रामदेव भारतीय कारपोरेट के सबसे दुलारे चेहरे हैं। इसलिए भी कि ये दोनों ही उस भारतीय मध्यवर्ग के लोकप्रिय आइकॉन हैं जो आईपॉड,कंप्यूटर, ब्रांडेडजीन्स,जूते जैसे उत्पादों का उपभोक्ता भी है। यह वही वर्ग है जो मोबाइल पर बतियाता है, कार,मोटर साइकिल पर सवार है। उदारीकरण से पैदा हुए इस अंधाधुंध उपभोक्तावाद में अन्ना हजारे गांधीवाद का और रामदेव धर्म का तड़का भी लगा देते हैं। इससे पूरी उपभोक्तावादी मध्यवर्गीय क्रांति थोड़ी और टेस्टी हो जाती है। भाजपा और आरएसएस को यह जायका इसलिए खास पंसद है क्योंकि वह जानते हैं कि अन्न्ना और रामदेव जो खीर पका रहे हैं वह आखिरकार उसी की प्लेट में आनी है। आरएसएस को तो बस इतना ही चाहिए कि जेपी और बीपी की तरह इस बार कांग्रेस का बिस्तर तो अन्ना हजारे और बाबा रामदेव बांध दें। मध्यवर्ग की क्रांति भी हो जाएगी और भ्रष्टाचार को जनम देने वाली उदारीकरण की व्यवस्था भी बची रहेगी। इसीलिए उसने रामदेव के पीछे एस गुरुमूर्ति, गोविंदाचार्य और आईबी के पूर्व चीफ अजीत डोबाल को लगाया। अब बाबा और अन्ना से जनता यह पूछने से तो रही कि कांग्रेस के सांपनाथ की जगह आप भाजपा के नागनाथ को क्यों ले आए?यह उनकी जवाबदेही भी नहीं है। ठगी हुई जनता खुद को कोसती हुई एक-दो दशक इसी अफसोस में गुजार देगी। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव का प्रभामंडल बनाने में चौबीसों घंटे जुटे न्यूज चैनलों की जिद है कि वे अपने बूते देश के मध्यवर्ग को सड़क पर उतार कर रहेंगे। कारपोरेट हितों के पहरुआ टीवी चैनलों के हाथों में मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग को अपना खिलौना बनाने की ताकत का आ जाना लोकतंत्र के लिए ही खतरनाक नहीं है बल्कि बुनियादी बदलाव के संघर्षों के लिए यह बुरी खबर है। न्यूज चैनलों का पूरा ध्यान इसी वर्ग पर है क्योंकि यह उपभोक्ता भी है और आंदोलनकारी भी। यह वर्ग चूंकि उदारीकरण और कारपोरेट के खिलाफ भी नहीं है इसलिए इसे लड़ाई का अगुआ बनाने में कोई जोखिम भी नहीं है। बाबा रामदेव के योगा समेत बाकी उत्पादों को भी इसी वर्ग की जरुरत है और अन्ना हजारे को चंदा देने वाली हिंदुस्तान लीवर को भी यही मध्यवर्ग रास आता है।
कैमरे पर पकड़े गए निशंक

रामदेव और भाजपा की मिलीभगत के सबूत

By Rajen Todariya
देश और अपने भक्तों को बाबा रामदेव ने किस तरह से अंधेरे में रखा यह अब छुपा हुआ तथ्य नहीं रहा। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक का जो नवीनतम स्टिंग आपरेशन सामने आया है उससे यह साफ हो गया है कि बाबा के अनशन के ड्रामे की पटकथा दरअसल आरएसएस, भाजपा और रामदेव के बीच बनी आपसी सहमति के बाद लिखी गई। केंद्रीय खुफिया एजेंसी आईबी के करीबी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार अप्रैल माह में हरिद्वार मूें हुई एक गोपनीय बैठक में इस अनशन का पूरा तानाबाना बुना गया। इसमें आरएसएस के कुछ बड़े नेता भी मौजूद थे। इसकी पुष्टि बीते दिन निशंक का ताजा वीडियो मिलने से हो गई है। इस वीडियो में निशंक भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी को बाबा रामदेव के अनशन को तोड़ने के बारे में अपडेट कर रहे हैं। इसमें वह कह रहे हैं कि बाबा से उनकी बात बीती रात को हो गई है और वह आज सुबह तक अनशन तोड़ देंगे। साफ है कि जब देश भर का मीडिया अनशन पर खबर कर रहा था तब ही भाजपा के शीर्ष नेतृत्व, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और बाबा रामदेव ने अनशन तोड़ने के लिए पूरा खाका तैयार कर लिया था। इसी के तहत रविशंकर को बुलाया गया था। बताया जाता है कि रविशंकर के आर्ट ऑफ लिविंग को जमीन देकर निशंक अब रविशंकर के करीबियों की सूची में हैं। सूत्रों ने बताया कि मीडिया में अनशन को दिन भर की कवरेज दिलाने की नीयत से ही शनिवार की सुबह अनशन तोड़ने का निर्णय लिया गया। शुक्रवार की शाम को ही इसकी पूरी तैयारी कर दी गई थीं। खुफिया विभाग के सूत्रों ने अप्रैल माह में हीं आरएसएस और बाबा रामदेव के बीच पक रही खिचड़ी के बारे में केंद्र सरकार को आगाह कर दिया था।बाबा रामदेव और आरएसएस के बीच अन्ना हजारे को किनारे करने के लिए संघ के करीबी बाबा रामदेव को भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का अगुआ बनाने और इसे 1974 और 1989 के आंदोलनों की तर्ज पर चलाने को लेकर अभी तक जो भी बात कही जा रही थी वह आरएसएस की प्रतिनिधि सभा की बैठक में लिए गए फैसले और आईबी की रिपोर्ट के हवाले से की जा रही थी। लेकिन बीते दिन इस पूरी कथित साजिश का वीडियो रिकॉर्ड मिल गया है। यह वीडियो टेप दरअसल उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के स्टिंग ऑपरेशन से हासिल किया गया है। इस टेप में वह मोबाइल पर किसी बाबूजी से बात कर रहे हैं और उन्हे रामदेव के अनशन तोड़ने के कार्यक्रम की जानकारी दे रहे हैं।यह बातचीत पिछली 12 जून यानी शनिवार की सुबह रिकॉर्ड की गई है। इसमें वह बता रहे हैं कि बाबा रामदेव से सारी बातचीत हो चुकी है। चूंकि श्री रविशंकर को 12 बजे जाना है इसलिए अनशन तोड़ने का कार्यक्रम 11 बजे का रखा गया है। वह कह रहे है कि बाबा रामदेव के साथ वह बीती रात यानी शुक्रवार की शाम ही अनशन तोड़ने का पूरा प्रोग्राम तय किया जा चुका है। टेप की बातचीत में निशंक बता रहे हैं कि उन्होने इस बारे में पूरी जानकारी दीदी यानी सुषमा स्वराज को भी दे दी है। वह भाजपा के बाबूजी को यह भी बता रहे हैं कि मौसम खराब होने के कारण अनशन तोड़ते समय उपस्थित नहीं रह पायेंगे। पर दूसरी ओर से बात कर रहे बाबूजी उन पर अनशन तोड़ने के वक्त मौजूद रहने के लिए जोर डाल रहे हैं। भाजपा के सूत्रों के मुताबिक निशंक लालकृष्ण आडवाणी को बाबूजी कहकर बुलाते है।। दरअसल वह आडवाणी से बात कर रहे थे और उन्हे रामदेव से हो रही बातचीत से हर वक्त अवगत करा रहे थे। इस बातचीत से इतना साफ हो गया है कि अनशन के इस नाटक के एक अहम किरदार भाजपाई दिग्गज लालकृष्ण आडवाणी भी थे। काले धन को लेकर चुनाव में जो शोर आडवाणी ने मचाया उसके बुरी तरह से फ्लॉप हो जाने से निराश आडवाणी ने रामदेव के जरिये इस मुहिम को आगे खुफिया एजेंसी आईबी ने अर्पैल माह में ही इसकी जानकारी भारत सरकार को दे दी थी। आईबी के करीबी सूत्रों के अनुसार हरिद्वार में हुई बैठक में एनडीए के कार्यकाल में आईबी के एक पूर्व प्रमुख रहे एक कट्टर हिंदूवादी सीनियर आईपीएस अफसर, गोविंदाचार्य और संघ के कुछ वरिष्ठ रणनीतिकार इस बैठक में मौजूद थे। बताया जाता है कि इससे पहले आडवाणी से इस बारे में संघ के नेंताओं की पूरी बातचीत हो चुकी थी औा यह तय कर लिया गया था कि डीएमके द्वारा समर्थन वापस लेने की सूरत पैदा होने से पहले देश भर में एक बड़ा आंदोलन चलाया जाय ताकि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर यूपीए सरकार को गिराया जा सके ताकि सन् 2014 के बजाय 2012 में ही लोकसभा चुनाव हो सकें। इसके लिए रामदेव को चुना गया और उन्हे एक निश्चित योजना कें तहत अन्ना हजारे के आंदोलन में घुसाया गया। जब अन्ना का आंदोलन लोकप्रिय होने लगा तो उससे रामदेव को बाहर निकाल कर पूरे मुद्दे को कालेधन के उसी मुद्दे पर केंद्रित कर दिया गया जिस पर आडवाणी चुनाव में मात खा चुके थे। कालेधन के इस आंदोलन की चपेट में आने वाले अधिकांश उद्योगपति चूंकि कांग्रेस से जुडे़ हैं, यह सूचना तत्कालीन गृहमंत्री आडवाणी के पास थी इसलिए तय किया गया कि इस बहाने कांग्रेस की चुनावी मशीनरी की आर्थिक रुप से कमर तोड़ दी जाय। यूपीए सरकार ने के पास जो खुफिया जानकारी थी उसमें आशंका व्यक्त की गई थी कि रामदेव का आंदोलन अप्रिय मोड़ भी ले सकता है और यह गोधरा कांड या 1989 के वीपी सिंह आंदोलन की ओर मुड़ सकता है। इस पूरे आंदोलन का निशाना सोनिया गांधी और राहुल गांधी थे और मनमोहन पर कोई प्रहार नहीं किया जाना था। कांग्रेस ने इस रणनीति को विफल करने के लिए रामदेव को पटाने की कोशिश भी की। इसी रणनीति के तहत चार मंत्री उनकी अगवानी के लिए भेजे गए। जब रामदेव आनाकानी करने लगे तो सरकार ने उनके ट्रस्टों और कंपनियों से जुड़ी फाइलें उन्हे दिखाकर दबाव बनाने की कोशिश की । वह दबाव में आ भी गए होते यदि आरएसएस,बीजेपी उन पर दबाव नहीं डालती। रामदेव के अनशन से उठने से इंकार करते ही केंद्र सरकार ने रामलीला ग्राउंड पर हमला बोल दिया। चूंकि उसके पास खुफिया रिपोर्टें थी कि बाबा के समर्थक पुलिस से टकराव नहीं लेंगे और उन पर न्यूनतम बलप्रयोग में ही काबू किया जा सकता है। केवल विहिप,बजरंग दल और आरएसएस,बीजेपी से जुड़े लोगों द्वारा पुलिस प्रतिरोध की आंशका थी जिसके लिए पुलिस को आंसू गैस के गोले ,लाठीचार्ज समेत सख्त उपाय अपनाने के आदेश दिए गए थे पर सूत्रों का कहना है कि पुलिस को सख्ती से बता दिया गया था कि किसी भी सूरत में वे गोली न चलायें ताकि इस पर कोई वितंडा खड़ा न हो। कांग्रेस की रणनीति यह थी कि किसी तरह वह रामदेव के पीछे दुपे आरएसएस और भाजपा को सड़क पर लाने में कामयाब हो जाय ताकि यह सिद्ध किया जा सके कि रामदेव दरअसल आरएसएस की कठपुतली है। अपनी इस रणनीति में कांग्रेस कामयाब रही है और अब निशंक ने इसके सबूत के तौर पर अपना वीडियो टेप भी उसके हवाले कर दिया है।

बुधवार, 15 जून 2011

मकबूल फिदा हुसैन के बहाने नए भारत की खोज
By Rajen Todariya
मकबूल फिदा हुसैन की मौत पर देश भर में तीन तरह की प्रतिक्रियायें सामने आईं। पहली श्रेणी में वे लोग थे जिन्होने एक भारतीय की तरह उनके निधन पर शोक व्यक्त किया। दूसरी श्रेणी में वे लोग थे जिनके लिए हुसैन की मौत से ज्यादा दुखद यह था कि उनको हिंदू कट्टरपंथियों के दबाव में बुढ़ापे में देश छोड़कर जाना पड़ा । इस प्रतिक्रियाओं में कट्टरपंथ के खिलाफ गुस्सा भी था और चिंता भी कि कट्टरपंथ देश में कला,साहित्य के लिए भी उन्मादी हिंदू एजेंडा तय करने पर आमादा है।इन दोनों श्रेणियों के लोगों ने हुसैन के जीवित रहते हुए उनके साथ हुए सलुक पर कभी सड़क पर आने की जरुरत नहीं समझी। तीसरी श्रेणी में वे लोग हैं जो हुसैन की मौत पर खुश भी थे और उनके चित्रों के लिए उन्हे गलिया भी रहे थे। हिंदू उन्मादियों का यह तबका मरणोपरांत भी हुसैन को माफ करने के तैयार नहींे है। उन्हे 90 साल के एक अशक्त और निहत्थे बूढ़े कलाकार को परेशान कर उसे देश छोड़ने के लिए बाध्य करने के भगवा ब्रिगेडों के शौर्य और पराक्रम पर कोई पछतावा नहीं है उल्टे वे इस पर मुग्ध हैं।हम जिसे भारतीय लोकतंत्र कहते हैं वह इन्ही तीन ताकतों से मिलकर बनता है। क्योंकि बाकी लोग जो हुसैन को जानते और पहचानते नहीं। वे वोटर तो हैं पर भारतीय लोकतंत्र में उनकी कोई भूमिका नहीं है। उस हाशिए के भारत को छोड़ दंे तो यही तीन तबके वह भारत को बनाते हैं जो उदारीकरण के बाद तैयार हुआ है। यह नया भारत है जिसे बाबा रामदेव, अन्ना हजारे ,कारपोरेट कंपनियां और टीवी चैनल तक सारे खोज रहे हैं। हुसैन के बहाने इस भारत की खोज की जानी चाहिए । उदारीकरण के बाद जनमे इस भारत को समझना इसलिए भी जरुरी है क्योंकि भारतीय लोकतंत्र की दिशा भी यही भारत तय करता है। जिन लोगों ने हुसैन के निधन पर एक भारतीय के नाते दुख व्यक्त किया वे भारत की उस उदात्त परंपरा के प्रतिनिधि हैं जो विभिन्न धाराओं और प्रवाहों की स्वायतत्ता का सम्मान करती है। यह धारा मानती है कि भारतीय राष्ट इन्ही अनेकताओं और मतभिन्नताओं के सम्मान से बनता है। उनका भारत इकहरा भारत नहीं है बल्कि वह विभिन्न रंगों और परस्पर विरोधी स्वभाव और स्वार्थ वाले धागों की ऐसी जटिल बुनावट वाली संरचना है जो एक दूसरे से टकराती भी हैं और एक-दूसरे में गहरी गुंथी हुई भी है। इस तबके के लिए हुसैन भारत की उस मनीषी परंपरा के प्रतिनिधि हैं जो चार्वाक,कालिदास, बाणभट्ट से लेकर गालिब, रविंद्रनाथ टैगोर तक अनगिनत धाराओं से मिलकर बनती है। दूसरी श्रेणी में वह तबका आता है जो हिंदू कट्टरपंथियों द्वारा हुसैन के साथ किए गये दुर्व्यवहार और उसके चलते उनके द्वारा देश छोड़े जाने की घटना से आहत है। यह वर्ग जानता है कि कला-साहित्य पर दलीय या सांप्रदायिक एजेंडा लागू करने के खतरे क्या हैं? ये लोग उस उन्माद के कारण लोकतंत्र के ताने-बाने पर पड़ने वाले असर से भली भांति वाकिफ हैं। मोटे तौर इन दोनो तबकों में भारत की विविधता की अकादमिक समझ रखने वाले लोग भी हैं और सतही समझ रखने वाले लोग भी हैं। वे भारत को उतना ही जानते हैं जितना वह किताबों,फिल्मों,वृत्तचित्रों समेत जनसंचार के विभिन्न माध्यमों से दिखाई देता है। इनके भारत का छोटा सा हिस्सा ही उनके अनुभवों से बनता है। इन दोनों तबकों की खासियत यह है कि उनको भारत से हुसैन का निर्वासन नागवार तो बहुत गुजरा है लेकिन वे तब बिल्कुल निष्क्रिय रहे जब संघ परिवार उच्चस्तर पर तय की गई अपनी रणनीति के तहत एम।एफ के खिलाफ देश के विभिन्न कस्बों,शहरों में मुकदमे दर्ज करवा रहा था। वे तब भी चुप थे जब हुसैन की प्रदर्शनियों पर भगवा ब्रिगेडों की अर्द्धविक्षिप्त भीड़ हमला कर रही थी। टीवी बहसों के लोकप्रिय चेहरे, सेकुलरवाद के धुरंधर पहरुए और कैंडिल मार्चों के संभ्रांत योद्धा तब सड़कों पर नहीं उतरे। उन्होने हस्तक्षेप करने के बजाय कला का मैदान उपद्रव कला में माहिर भगवा ब्रिगेडों की वानर सेना के लिए खुला छोड़ दिया था। जाहिर है कि जुबानी विरोध और कागजी चिंताओं के बूते सांप्रदायिक फासीवाद को पराजित नहीं किया जा सकता। हुसैन का आत्मनिर्वासन भगवा ब्रिगेडों के इन्ही हमलों से उपजी एक असहाय बूढ़े आदमी की हताश प्रतिक्रिया थी।इन दोनों तबकों से बिल्कुल अलग वह तबका है जो मुखर है और आक्रामक भी। उदारीकरण के बाद शहरी भारत और ग्रामीण अभिजात्य के मेल से जो भारत बना है उसमें यह तबका सबसे ज्यादा प्रभावी है। इसके पास उच्च मध्यवर्गीय और उच्च वर्गीय आर्थिक आधार भी है तो इसके पास उपद्रवों के जरिये विध्वंस के लिए दीक्षित निम्नमध्यवर्गीय वानर सेना भी है। यानी इसका सामाजिक आधार दो तरह के वर्गों से तैयार होता है। जहां उसे सांप्रदायिक युद्धों के लिए मानव बल की आपूर्ति निम्नमध्यवर्ग से होती है वहीं उसे सांप्रदायिकता और कट्टरता को फाइनेंस करने का धनबल उच्च मध्यवर्ग और उच्चवर्ग से मिलता है। आर्थिक कारणों से पैदा हो रहे असंतोष को सांप्रदायिक आधार पर मुस्लिमों और ईसाईयों की ओर मोड़ने से उच्चवर्ग के हित सुरक्षित रहते हैं। दरअसल भगवा ब्रिगेडें आर्थिक आधार पर विभाजन रोकने के लिए सांप्रदायिक विभाजन का एक बफर जोन तैयार करती हैं ताकि उच्च वर्ग के सेठ लोग मध्यवर्ग के उस गुस्से से बचे रहें जो आर्थिक असुरक्षा,महंगाई और बेरोजगारी से जमा हो रहा है। उदारीकरण के बाद जो विशाल मध्यवर्ग तैयार हो रहा है वह लोकतंत्र में मौजूद सारे लोकतांत्रिक स्पेस को तेजी से झपटता जा रहा है। इसका बड़ा हिस्सा स्वभाव से आक्रामक, बेचैन, रातोंरात अमीर बनने को उतावला और अंधविश्वासी है। भगवा ब्रिगेडों का प्रचार तंत्र इसके दिमाग में अपनी सूचनायें भरने में कामयाब रहा है। इसी प्रचार का कमाल है कि वे इस देश की दुर्दशा के लिए या तो मुसलमानों को जिम्मेदार मानते हैं या फिर आरक्षण का लाभ लेने वाले दलितों और पिछड़ों को। ये दोनों तबके लालू,मुलायम,मायावती से उनके भ्रष्टाचार से ज्यादा उनकी जाति के कारण नफरत करते हैं। इनका भ्रष्टाचार उनकी जातीय श्रेष्ठता की अवधारणा को तर्क और औचित्य प्रदान करता है। ये वर्ग नीतिश कुमार की आड़ में अपने सवर्ण कैनाइन टीथ छुपाए रखने में माहिर भी हैं ताकि उन पर सवर्णवाद का ठप्पा न लग सके। उन्हे पिछड़ों और दलितों के वे नेता पसंद हैं जो सवर्णों के साथ मेलमिलाप कर चलने में यकीन रखे न िकवे जो आक्रामक जातीय गोलबंदी में यकीन रखते हैं। आक्रामक हिंदूवाद में यकीन रखने वाले ये इन लोगों में अधिकांश नियमित पूजा करने के कायल भी हैं तो रात की शराब पार्टियों के शौकीन भी हैं। राजनीतिक रुप से इनमें से अधिकांश कांग्रेस विरोधी हैं पर इनमें से कई अपने सांप्रदायिक कलर के साथ कांग्रेस समर्थक भी हैं। कांग्रेस की जो नरम हिंदू सांप्रदायिकता है वह इन्ही तत्वों के प्रभाव से पैदा होती है।दिलचस्प यह है कि उदारीकरण से समृद्ध हुए इन लोगों में से भारत की उदात्त परंपरा से कोई लेना देना नहीं है। वे मुसलमानों से इस कदर नाराज हैं कि चार्वाक या कालिदास को नहीं जानना चाहते। वे मतभिन्नता की आजादी की सदियों पुरानी भारतीय विचार परंपरा को भी नहीं जानना चाहते। संघ परिवार की तरह वे भी अहिंसा और मतभिन्नता की आजादी या धर्मनिरपेक्षता को हिंदुओं की कायरता मानते हैं।यह ऐसा भारत है जो देश की सारी समस्याओं के लिए बाबर, मुसलमानों, महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरु को जिम्मेदार मानता है। ये भगत सिंह और सुभाष बोस को उनकी समाजवादी विचारों के लिए नहीं पूजते बल्कि गांधी विरोध के लिए पूजते हैं। कम्युनिस्ट होने कारण वे चीन से नफरत भी करते हैं और ताकतवर होने के कारण उसके प्रशंसक भी हैं।उनका सबसे बड़ा और दिलचस्प अंतर्विरोध यह है कि वे इस्लाम से नफरत भी करते हैं और उसकी कट्टरता के कायल भी हैं। हिंदुओं का कोई राजनीतिक और धार्मिक सत्ता केंद्र न होने से वे परेशान हैं इसलिए वे इस्लाम और सिख धर्मो पर फिदा हैं। आक्रामक सांप्रदायिकता के कायल ये लोग इस्लाम और सिखिज्म की तरह हिंदुओं में भी एक अर्द्ध धार्मिक,अर्द्ध राजनीतिक सत्ताकेंद्र विकसित करना चाहते हैं ताकि साधु-संतों और संघ परिवार के मध्ययुगीन सामंती गिरोहों को हिंदुओं के लौकिक जीवन को भी नियंत्रित करने का अधिकार मिल सके। दरअसल उन्हे लोगों के लौकिक व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए फतवा देने का इस्लामी अधिकार चाहिए। हुसैन के खिलाफ फतवा देकर उन्होने बताया भी कि उनके पास अपने फतवों को लागू करने की ताकत भी है। इनमें से कई लोग अक्सर तर्क देते हुए मिल जायेंगे कि क्या एमएफ हुसैन मोहम्मद साहब के चित्र बना सकते थे? चूंकि इस्लाम हुसैन को यह आजादी नहीं देता इसलिए हिंदूधर्म को भी उन्हे यह आजादी नहीं देनी चाहिए। जाहिर है कि वे इस्लाम के इसी कट्टरपन के कायल हैं। यह भले ही अजीब लगे लेकिन सच्चाई यही है कि मुसलमान बिरादरी के बाहर इस्लामी कट्टरता का अनुसरण करने वाला यह सबसे बड़ा तबका है। इस मायने में वे अयातुल्ला खुमैनी और तालिबानी मुल्ला उमर के सबसे करीबी सहोदर हैं। ये भी उमर और खुमैनी की तरह अपने धर्म के उदारवादियों के खून के प्यासे हैं और सबसे पहले इन्हे ही कत्ल करने का हक हासिल करना चाहते हैं। यदि उनके धार्मिक और राजनीतिक डीएनए का परीक्षण किया जाय तो वे भारतीय मनीषी परंपरा के बजाय अरबी नस्ल के ज्यादा करीब हैं। अंतर बस इतना है कि यदि खुमैनी और मुल्ला उमर का ब्लड ग्रुप ‘ओ पॉजीटिव’ मान लिया जाय तो इनका ब्लड ग्रुप शर्तिया ‘ओ नेगेटिव’ ही निकलेगा। उनका हिंदू धर्म दरअसल इस्लाम का नेगेटिव संस्करण है। कोई भी नेगेटिव मौलिक नहीं होता बल्कि अपने पॉजिटिव का ही उल्टा होता है। यह तबका खुद तो लोकतंत्र के सारे लाभ लेना चाहता है पर जब बाकी लोग इनके खिलाफ अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोग करना चाहते हैं तब ये बिदक जाते हैं। इस्लाम के नक्शे कदम पर चलते हुए ये भी यही चाहते हैं कि हिंदू देवी-देवता, अवतारों के लौकिक व्यवहार पर कोई सवाल न उठे। सदियों से भगवान राम, कृष्ण समेत अन्य देवताओं पर उठाए जा रहे सवाल अब न उठाए जांय। शंबूक की हत्या से लेकर बालि वध और सीता को निकाले जाने तक जो सवाल हैं वे आज न पूछे जांय।जाहिर है कि वे एक तर्क पर आधारित समाज नहीं बल्कि अंधविश्वासी भेड़ों की जमात चाहते हैं ताकि धर्म के गडरिये भारतीय जनता को अपने हिसाब से हांकते रहें।वे चाहते हैं कि खरबों रुपए जमा करने वाले साधु-संतों,पंडे-पुजारियों के गिरोहों को गाय की तरह पवित्र, अवध्य और अलौकिक घोषित कर दिया जाय ताकि उनकी लूट जारी रहे।उदारीकरण ने भारतीय समाज के परंपरागत उदात्त स्वरुप को बुरी तरह से प्रभावित किया है। भारतीय समाज में उन्मादी और आलोचना बर्दाश्त न कर सकने वाली राजनीति का एक स्पेस विकसित हो चुका है। इसे एमएफ हुसैन के बहाने भी समझा जा सकता है और बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलनों से भी। क्योंकि लोकतांत्रिक अधिकार के नाम पर शुरु किए गए इन दोनों मध्यवर्गीय आंदोलनों के भीतर भी नेतृत्व पर सवाल उठाने का जनतांत्रिक स्पेस गायब है।

शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

छोटे अखबारों की बड़ी लड़ाई
एस0राजेन टोडरिया
आने वाला इतिहास जब कभी मौजूदा मुख्यमंत्री के राजनीतिक सफर को बयां करेगा वह यह भी दर्ज करेगा कि उन्होने अपनी राजनीति का ककहरा भले ही शिशु मंदिर के शिक्षक के रुप में सीखा हो पर राजनीति में उनकी उड़ान की शुरुआत टूटे अक्षरों की इबारत वाले एक चार पेजी अखबार से हुई थी। विडंबना यह है कि वही इतिहास उन्हे पूरी शक्ति,सामर्थ्य और जुनून के साथ छोटे अखबारों के गला घोंटने के लिए भी याद करेगा। भविष्य मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के व्यक्तित्व को इस विरोधाभास की रोशनी में पढ़ेगा और इस अजूबे से विस्मय में भी पड़ेगा। वह शायद इतिहास में अकेले ऐसे पत्रकार राजनेता होंगे जो मात्र कुछ सैकड़ा बंटने वाले छोटे-छोटे अखबारों में भी असहमति और आलोचना के स्वर बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं। यह इस बात का भी सबूत है कि सत्ता आदमी को किस हद तक दुर्बल,दयनीय और असहिष्णु बना देती है।उत्तराखंड में बड़े अखबारों और क्षेत्रीय चैनलों को मिलाकर मीडिया की कुल जमा जो तस्वीर बनती है वह चारण अखबारों और चमचा चैनलों की बनती है। काश! हमारे समय में भी कोई भारतेंदु हरिश्चंद्र होते तो मीडिया की इस दुर्दशा पर कोई नाटक जरुर लिखते। फिर भी मीडिया की इस दुर्दशा का पूरा श्रेय सिर्फ मौजूदा मुख्यमंत्री के पुरूषार्थ को देना ठीक नहीं होगा। एनडी तिवारी ने अपने राजनीतिक जीवन के पूरे अनुभव को झोंकते हुए करोड़ों रु0 की खनक के बूते मीडिया की इन कुलीन कुलवधुओं को नगरवधू बना दिया। तिवारी की ही परंपरा पर चलते हुए मौजूदा मुख्यमंत्री ने इन्हे हरम पहुंचा दिया है। विज्ञापन का बजट हर रोज छलांगें मार रहा है। अंतःपुर के कारिंदे रोज किसी न किसी को लाख-दो लाख से लेकर तीस-तीस लाख के पैकेजों की बख्शीशें दिला रहे है। राजा ने अपना खजाना खोल दिया है, ‘‘लूट सके तो लूट’’। प्रदेश में अभूतपूर्व आपदा है, पहाड़ के गांवों में लोग एक-एक पैसे और एक टाइम के खाने के लिए जूझ रहे हैं पर सरकार है कि चैनलों में प्राइम टाइम में दस साल का जश्न पर करोड़ों के विज्ञापन लुटा रही है। विधानसभा चुनाव से पहले की इस लूट में मीडिया मस्त है और पत्रकारिता पस्त है। यह सुनकर अजीब लगे पर सच यही है कि आपदा के दौरान भी उत्तराखंड के दैनिक अखबारों और क्षेत्रीय चैनलों के लिए विज्ञापन कम नहीं हुए उल्टे बढ़ गए । आपदा को लेकर दिए गए विज्ञापनों के आंकड़े इस उलटबांसी के गवाह हैं। अखबारों ने आपदा के नाम पर भी विज्ञापन कमाई के जरिये निकाल लिए।एक हिंदी अखबार ने राहत कार्यों पर सरकार की चमचागिरी का नया रिकार्ड कायम कर दिया। ऐसा घटियापन कि कल्पना करना मुश्किल है कि खरबों रु0 का मीडिया हाउस चलाने वाली कंपनी का एक अखबार मात्र 28 लाख रु0 के पैकेज के लिए इस हद तक गिर जाएगा!लेकिन यह कोई अपवाद नहीं है। ऐसे वाकये अक्सर होते रहते हैं सिर्फ अखबारों के नाम बदल जाते हैं। कुछ अखबार चमचागिरी में शऊार बरतते हैं तो कुछ नंग-धड़ंग होकर 17 वीं सदी के भांडों की तरह इसे अंजाम दे रहे हैं। उत्तराखंड में बड़े दैनिकों ने संपादक को ऐसे प्राणी में बदल दिया गया है जो सरकारी विज्ञापनों के लिए मुख्यमंत्री को रिझाने और पटाने के वे सारे गुण जानता हो जो एक समय गणिकाओं के लिए जरुरी माने जाते थे। माहौल ऐसा है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग सुबहो शाम समाचार माध्यमों में ‘तन डोले मेरा मन डोले’ की धुन ही सुनना चाहते हैं। मुख्यधारा के इस रवैये ने राज्य की पत्राकारिता को भांडगिरी में बदल दिया है। एक अखबार ने मुख्यमंत्री के पुतले जलाने की घटनाओं की खबरें छपने से रोकने के लिए संवाददाताओं को पुतलादहन की खबरें न भेजने का फरमान जारी कर दिया तो दूसरे ने राजनीतिक खबरें छोटी और बाजार से जुड़ी खबरें बड़ी छापने की आचार संहिता लागू कर दी है। अखबार और चैनलों के दफ्तरों में ऐसी खबरों का गर्भपात कर दिया जाता है जिनमें थोड़ा भी मुख्यमंत्री विरोध की गंध आती हो। मंत्रियों और अफसरों के खिलाफ छापिए पर उतना ही जितने में मुखिया की छवि पर असर न पड़े, यह अलिखित आचार संहिता अखबारों और चैनलों के ऑफिसों में लागू है। खबरें न छापना आज सबसे बड़ा कारोबार बन गया है। पत्रकारिता की पेशेवर ईमानदारी का हाल यह है कि पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी की खबरें अखबारों और चैनलों से सिर्फ इसलिए गायब कर दी गई हैं क्योंकि सत्ता के शिखर पुरूष को चैनलों और अखबारों में जनरल नाम तक देखना पंसद नहीं है। समाचार माध्यम इस संकीर्णता और अनुदारता के राजनीतिक एजेंडे के एजेंट बने हुए हैं। गौरतलब है कि ये वही अखबार और चैनल हैं कि जो जनरल के मुख्यमंत्रित्व काल में उनकी ईमानदारी के कसीदे पढ़ रहे थे। वह वक्त चला गया जब बड़े अखबार सरकारी दबाव झेलने के लिए ज्यादा बेहतर माने जाते थे और तमाम दबावों के बावजूद वे सत्ता की दौलत और ताकत के आगे तने दिखते थे। अब ऐसा समय है जब ये अखबार सरकारी विज्ञापनों के बिना जिंदा ही नहीं रह सकते हैं। पहले छोटे अखबार अपनी आर्थिक संसाधनों की सीमाओं के चलते ज्यादा नाजुक माने जाते थे। बाजार की महिमा देखिये कि उसने कई हजार करोड़ के बड़े-बड़े मीडिया हाउसों को छुईमुई बना दिया है। चारणों और चमचों की पांत में सबसे आगे वे ही हैं जो सबसे बड़े हैं।लेकिन क्षेत्रीय चैनलों और बड़े अखबारों के पतित होने से सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध की आवाजें दबी नहीं हैं। उत्तराखंड के स्थानीय और छोटे अखबारों के एक हिस्से ने सरकार के आगे घुटने टेकने से इंकार कर दिया है। यह एक सकारात्मक बदलाव है। इस हिस्से में लगातार घोटाले छप रहे हैं, मुख्यमंत्री के खिलाफ खबरें और विश्लेषण छप रहे हैं। इससे हैरान और परेशान मुख्यमंत्री ने पहले घोषणापत्र की आड़ में इन छोटे अखबारों को धमकाने की कोशिश की, सूचना विभाग के अफसर खबरों पर संपादकों के जबावतलब करने की हद तक चले गए। इस पर शर्मिंदा होने के बजाय एक छोटे अखबार के स्वामी,प्रकाशक और संपादक रहे राज्य के मुखिया की छाती गर्व से फूलती रही कि उन्होने छोटे अखबारों को उनकी औकात बता दी। उनके मुंहलगे अपफसर और कांरिंदे हर रोज विरोध में लिखने वाले अखबारों का आखेट करने के तौर तरीके खोजने में लगे हैं। इसी के तहत सचिवालय और विधानसभा में छोटे अखबारों के घुसने पर पाबंदी लगा दी है। जबकि बड़े अखबार वहां बांटे जा सकते हैं। सत्ता के इन शुतुरमुर्गों को यह समझ नहीं आ रहा है कि सरकार के कुछ अफसरों और कर्मचारियों के न पढ़ने से क्या मुख्यमंत्राी के खिलाफ आए दिन छपने वाली खबरों और घोटालों की मारक क्षमता कम हो जाएगी? जाहिर है कि आम लोगों तक तो वे पहुंचेंगी ही। ऐसे कदम एक सरकार की बदहवासी और डर को जाहिर करते हैं और उस पर कमजोर सरकार का बिल्ला भी चस्पा कर देती हैं। तानाशाही सनकों से भरे ऐसे फैसलों के बावजूद न छोटे अखबार डर रहे हैं और न मुख्यमंत्री के खिलाफ खबरें छापने से बाज आ रहे हैं। यह एक तरह से छोटे प्रेस की गुरिल्ला लड़ाई है जो सत्ता के महाबली शिखर पुरुष पर हमले कर उसे बेचैन किए हुए है। जिसने मुख्यधारा के मीडिया को लौह कपाट वाले अपने काले-कलूटे गेट पर चौकीदारी के लिए बांध दिया है, ऐसे शिखर पुरुष के खिलाफ छोटे अखबारों की यह लड़ाई महत्वपूर्ण भी है और सत्ताधारियों के लिए चेतावनी भी है कि वे समूचे प्रेस को दुम हिलाने वाला पालतू पशु में नहीं बदल सकते। कुछ लोग हर समय रहेंगे जो सत्ता के खिलाफ सच के साथ रहने का जोखिम उठायेंगे। यह सिलसिला चलता रहेगा। उल्लेखनीय यह है कि चारणकाल में सच कहने की जुर्रत करने वाले इन सारे छोटे अखबारों,पत्रिकाओं की कुल प्रसार संख्या मुश्किल से कुछ हजार ही है। जो लाखों छपने और बंटने वाले दैनिक अखबारों की दस फीसदी भी नहीं है लेकिन इतनी कम संख्या के बावजूद राज्य के मुखिया इनसे घबराये हुए हैं। लाखों पाठक और दर्शक संख्या वाले अखबार और चैनलों सुबह-शाम प्रशस्ति वाचन के कर्मकांड में लगे हुए हैं तब भी विरोध की इन तूतियों से राजा क्यों हैरान हैं? दरअसल इन अखबारों ने खबरों के असर के उस तिलिस्म को तोड़ दिया है जो बड़े अखबार प्रचारित करते रहे हैं। खबरों पर बड़े अखबारों का एकाधिकार ही नहीं टूटा है बल्कि उनकी सीमायें, दरिद्रता और दयनीयता भी उघड़ गई है। पत्रकारिता के इस समर में वे कागजी शेर साबित हो रहे हैं,उनकी कथित ताकत का मिथक टूट रहा है। जनमत को प्रभावित करने में उनकी भूमिका अब सिफर हो गई है। उनकी हर खबर पर उंगलियां उठती हैं और उसे सत्ता या स्थानीय ताकतवर लोगों के हाथों बिकी हुई खबर मान लिया जाता है। उन्हे खबरों का सौदागर करार दिया जा रहा है। उनके दफ्तरों में सच को कत्ल करने के लिए जो कसाईबाड़े बने हैं उनकी दुर्गंध अब जनता तक पहुंचने लगी है। राज्य के लोग समझ रहे हैं कि राजा नंगा है पर खबरों के ये दुकानदार उसके कपड़ों के डिजायन की तारीफ में पन्ने रंग रहे हैं। मुख्यधारा के समाचार माध्यमों की साख के इस तरह निम्नतम स्तर पर पहुंच जाने से ही आम लोग खोज-खोज कर सरकार विरोधी खबरें पढ़ रहे हैं। इससे इतना तो पता चल ही जाता है कि लोगों का रूझान बदल रहा है,जिस पाठक को मीडिया के महारथी ‘विचारविहीन उपभोक्ता’ प्राणी घोषित कर चुके हैं उसका मिजाज बदल रहा है। वह बदलाव के मोर्चे पर भले ही लड़ाई नहीं लड़ रहा हो पर वह सत्ताधरियों के काले सच को विचार के साथ जानना चाहता है। उत्तराखंड कभी भी वैचारिक रुप से गंजे लोगों की नासमझ भीड़ नहीं रहा है। उसके भीतर सच जानने को उत्सुक समाज है। लोकप्रियता में आये इस उछाल से छोटे अखबारों को भी मुगालते में नहीं रहना चाहिए। यह उनका नहीं उस सच का चमत्कार है जो वे छाप रहे हैं। छोटे अखबार यदि अपने हीनताबोध से उबर सकें तो वे साबित कर सकते हैं कि अखबार बड़े या छोटे नहीं होते, ये खबरें हैं जो अखबारों को बड़ा बनाती हैं तो उन्हे छोटा भी साबित कर देती हैं। खबरों की मारक सीमा और क्षमता हर साल जारी होने वाले प्रसार संख्या के निर्जीव और गढ़े गए आंकड़ों से तय नहीं होती। खबरों में सच और दम होता है तो वे एक मुख से दूसरे मुख तक होते हुए या फोटोस्टेट होकर भी कई गुना घातक हो जाती हैं। सच और अपने समाज की समझ मामूली माने जाने वाली खबरों को भी कालजयी बना देती है।उत्तराखंड के पत्रकारिता क्षितिज पर घट रही यह छोटी सी घटना बताती है कि देश के स्तर पर पत्रकारिता को समर्पित छोटे अखबारों,चैनलों और इंटरनेट अखबारांें के बीच यदि राष्ट्रीय स्तर पर तालमेल और संवाद स्थापित हो सके तो जनपक्षीय पत्रकारिता का एक बड़ा गठबंधन भविष्य में उभर सकता है। यह कठिन है पर इस दिशा में गंभीर प्रयास शुरू किए जाने चाहिए। मीडिया हाउसों के एकाधिकारवादी भस्मासुरों के खिलाफ यह पत्रकारिता के जनतंत्राीकरण और विकेंद्रीकरण की शुरूआत हो सकती है।

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

21000 करोड़ का झूठ

बरसात का कहर अभी थमा भी न था कि मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार से 21हजार करोड़ का राहत पैकेज मांगकर अपने अफसरों से लेकर भाजपा के बड़े नेताओं को हैरत में डाल दिया। विशेषज्ञ सशंकित थे कि नौकरशाही मुख्यमंत्री के भारी भरकम आंकड़े के बराबर की आपदा को फाइलों में कैसे डिजायन कर सकेगी। राजनीतिक दबाव में सरकारी अमले ने 21000 करोड़ रुपए की आपदा को फाइलों में पैदा कर दिखा दिया कि आंकड़ेबाजी की कला में वे देश के सबसे बेहतरीन सरकारी तंत्र हैं। केंद्र में कई जिम्मेदारियां निभा चुके एक रिटायर्ड आईएएस अफसर ने इस आंकड़े पर टिप्पणी करते हुए कहा,‘ अविश्वसनीय! विचित्र!! और बचकाना!!! उन्होने आगे कहा,‘ लगता है आपके मुख्यमंत्री पिस्तौल पाने के लिए तोप का लाइसेंस मांग रहे हैं।’ आपदा राहत के इतिहास के दस सबसे बड़े राहत पैकेजों में से एक के लिए इतना भारी भरकम आंकड़ा खोजकर खुद को कोलबंस मान रही सरकार को शायद पता भी न हो उसके आंकड़े ही इस फर्जीवाड़े की पोल खेल रहे है। इन आंकड़ों का विश्लेषण साबित कर देता है कि इसमें बुनियादी बातों का भी ध्यान नहीं रखा गया। सारे कामों की वीडियोग्रापफी कराने के केंक्त के अभूतपूर्व फैसले ने इन आंकड़ों की साख पर सवालिया निशान लगा दिया है। विडंबना यह है कि इस महाकाय राशि में में आपदा पीड़ितों के हिस्से बस एक फीसदी ही आएगा । उनमें से अधिकांश को 2,250 रु0 से ज्यादा नहीं मिलेंगे । राहत की मलाई सरकारी विभागों के लिए आरक्षित होगी।राज्य सरकार द्वारा केंद्र को भेजे गए 21000 करोड़ रुपए की राहत की डिमांड का विश्लेषण करने से पहले यह जानना उचित होगा कि यह आंकड़ा किस तरह से तैयार हुआ। दैवी आपदा के आकलन का ग्रास रूट पर पटवारी ही एकमात्र सरकारी कर्मचारी है। इस समय पहाड़ में 1,220 पटवारी हैं जिनमें से हरेक को औसतन सात गांव देखने पड़ते हैं। इन्ही पटवारियों से मिली सूचना के अनुसार सरकार से उन्हे 25 सितंबर को आपदा से हुए पूरे नुकसान की रिपोर्ट भेजने का आदेश मिला और अक्तूबर के पहले सप्ताह में उन्होने रिपोर्ट जिला प्रशासन को भेज दी। इन रिपोर्टों को संकलित करने में यदि दो दिन भी लगे हों तब भी यह रिपोर्ट दस अक्तूबर को ही राज्य मुख्यालय पहुंच पाई होगी। लेकिन मुख्यमंत्री ने 21000 करोड़ के नुकसान का बयान 22-23 सितंबर को हुए विधानसभा सत्र के दौरान ही दे दिया था। सचिव आपदा डा0राकेश कुमार के अनुसार नुकसान के इस आकलन को केंद्रीय राहत दल के आने से पहले 30 सितंबर को अंतिम रुप दे दिया गया था। क्या मात्रा एक सप्ताह में लगभग एक लाख 20 हजार लंबी सड़कों, नहरों और बिजली लाइनों, साढ़े सात लाख हेक्टेयर कृषि भूमि, दो लाख हेक्टेयर बगीचों,23 लाख मकानों और लगभग 22 हजार स्कूल भवनों का सर्वे किया जा सकता है? वह भी सिर्फ दो हजार कर्मचारियों द्वारा? 670 कृषि कर्मी एक सप्ताह में 7 लाख 16 हजार हैक्टेयर यानी एक कर्मचारी ने प्रतिदिन 4 गांवों की 7600 नाली जमीन पर खड़ी फसल का सर्वे किया। एक उद्यानकर्मी ने प्रतिदिन में 6 गांवों में जाकर 2300 नाली में स्थित बगीचों का सर्वे कर लिया। यदि ऐसा हुआ है तो यह चमत्कारिक है। आश्चर्यजनक यह भी है कि सार्वजनिक संपत्तियों और कृषि भूमि को हुई क्षति के आकलन के लिए सरकार ने ग्राम स्तर पर समितियों के गठन का शासनादेश 13 अक्तूबर को जारी किया। इस आदेश में सभी जिलों के डीएम को ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य, ग्राम विकास अधिकारी और स्थानीय प्राइमरी विद्यालय के शिक्षक की चार सदस्यीय समिति गठित करने का निर्देश दिया गया। समितियों को क्षतियों के विवरण भेजने के लिए एक सप्ताह का समय दिया गया। जाहिर है कि यह ब्यौरा 20 अक्तूबर तक जिलाधिकारियों तक पहंुचा होगा और जिलों से संकलित होकर 23 अक्तूबर तक यह सचिवालय आया होगा।अब सवाल यह उठता है कि जब 23 अक्तूबर तक अंतिम रिपोर्ट नहीं आई तब मुख्यमंत्री ने एक माह पहले, सचिवालय ने तीन सप्ताह पहले कैसे 21000 करोड़ रु0 के नुकसान का सटीक पूर्वानुमान लगा दिया और यही नहीं इस अनुमान को आंकड़ों में ढ़ालकर केंक्तीय दल और प्रधनमंत्राी को भी सौंप दिया। गजब यह कि ऐसा पटवारियों द्वारा भेजी गई पहली रिपोर्ट से भी पहले ही कर दिया गया। इसी संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि सरकार में आपदा के आकलन को लेकर खासा कन्फ्यूजन व्याप्त है। इसी कारण से नुकसान के आकलन को लेकर शासन में रिपोर्टों के प्रारूप बदलते रहे। 4 सितंबर को शासन ने सभी विभागों को पत्र भेजकर केंद्र के मानकों के आधार पर रिपोर्ट तलब की फिर 14 सितंबर को नया प्रारुप भेजकर आंकड़ों को नये सिरे से मंगाया गया। इस प्रारूप में मानक बदल दिए गए। सूत्रों का कहना है कि नुकसान के सूचकांक को 21000 करोड़ रु0तक पहुंचाने का ड्रीम प्रोजेक्ट इसी प्रारूप के साथ शुरू हुआ। अब एक बार फिर समितियां बनाकर नुकसान का जायजा लिया जा रहा है। इस प्रकार विभागों से तीन बार रिपोर्टें मंगाई गईं। यह कन्फ्यूजन आंकड़ों के पीछे चल रहे खेल को उजागर कर देता है।भूस्खलन से प्रभावित गांवों को लेकर केंद्र को भेजी गई रिपोर्ट से भी यही जाहिर होता है। सर्वे के लिए अभी भूविज्ञानियों के दल बाद में गठित किए गए और उनका सर्वे अभी तक पूरा नहीं हुआ पर सरकार सितंबर में ही इस नतीजे पर पहुंच गई कि 233 गांव अब लोगों के रहने के लिए खतरनाक हो चुके हैं और इनके पूर्ण विस्थापन के अलावा कोई विकल्प नहीं है। चंूकि मांगी गई राहत का 57 फीसदी इन गांवों के ही पुनर्वास पर खर्च किया जाना है इसलिए इस आंकड़े की विश्वसनियता मायने रखती है। इसका न केवल वैज्ञानिक आधार होना चाहिए बल्कि राज्य और केंद्र द्वारा प्रति परिवारके लिए निर्धरित पुनर्वास राशि के मानक पर इस आंकड़े को खरा उतरना चाहिए पर सच्चाई यह है कि सरकार के इस आंकड़े का कोई वैज्ञानिक आधार अभी तक स्थापित नहीं हो पाया है और यह केवल प्रथम दृष्ट्या सतही अनुमान मात्र है।अब जरा तथ्यों और तर्क पर सरकार के आंकड़ों को परखा जाय। राज्य सरकार के आंकड़े के हिसाब से 233 गांवों के 3049 परिवारों के पुनर्वास के लिए 12000 करोड़ रूपए उसे चाहिए। यानी वह पुनर्वास के लिए प्रति परिवार पर 4 करोड़ रुपए खर्च करेगी। यदि ऐसा है तो देश की सबसे बेहतरीन पुनर्वास नीति और मानक तय करने के लिए उसकी पीठ थपथपाई जानी चाहिए। क्या वह निजी और सरकारी क्षेत्र के बिजली प्रोजेक्टों के विस्थापितों को वह इसी दर से मुआवजा देगी? टिहरी बांध के नए विस्थापितों के लिए सरकार जमीन इत्यादि का इंतजाम करने के बजाय एकमुश्त 38 लाख रु0 देने पर विचार कर रही है जो कि केंद्र को भेजे गए प्रति परिवार पुनर्वास खर्च का मात्र दसवां हिस्सा है। सरकार यदि एक करोड़ रु0 भी प्रति परिवार एकमुश्त भुगतान करने को तैयार हो तो इन 233 गांवों के लोग अपने लिए खुद ही जमीन का इंतजाम कर लेंगे। सरकार को उन पर 12000 करोड़ के बजाय सिर्फ 3000 करोड़ ही खर्च करने हैं। जाहिर है कि पुनर्वास पर आने वाला खर्च अव्यवहारिक और बढ़ाचढा कर पेश किया गया है। इसके पीछे इन गांवों को बसाने की मंशा नहीं बल्कि केंद्र को इस प्रस्ताव को नामंजूर करने के लिए बाध्य करने की रणनीति है।नुकसान दूसरा सबसे बड़ा आंकड़ा पीडब्लूडी का है जिसकी 13,600 किमी सड़कें तबाह हुई बताई गई हैं। इसके लिए केंद्र से पांच हजार पांच सौ 17 करोड़ रु0 मांगे गए हैं। यह कुल राहत का लगभग एक चौथाई है। यह आंकड़ा इसलिए चकित करता है कि राज्य में सड़कों की कुल लंबाई 26000किमी के आसपास है। इस आंकड़े के हिसाब से राज्य की आधी सड़कें पूरी तरह से नष्ट हो गई हैं। दूसरी ओर लोनिवि का दावा है कि उसने 90 फीसदी सड़कों पर यातायात बहाल कर दिया है। इस आंकड़े में केंद्र से हर सड़क के लिए प्रति किमी 37 लाख रु0 मांगे गए हैं। लोनिवि के सूत्र बताते हैं कि बिलकुल नई सड़क बनाने के लिए भी खर्च 30-35 लाख रु0 आता है। यदि बिल्कुल चट्टान काटकर बनानी है तो यह खर्च अधिकतम 45 लाख रु0 आएगा। तो क्या लोनिवि ये 13600 किमी पहले बन चुकी सड़कें चट्टानें काटकर बनाने वाली है। जाहिर है कि आंकड़े इतने बड़े कर दिये गए हैं कि एस्टीमेट की साख गिरकर शून्य हो गई है।विभागीय सूत्रों का कहना है कि यदि इतने ही किमी सड़कें वाकई प्रभावित हुई हैं तो भी पहले बनी सड़कों को ठीक करने पर अल्पकालीन और दीर्घकालीन खर्च 1000 करोड़ रु0 से ज्यादा नहीं आएगा। यानी केंद्र को पांच गुना ज्यादा का आंकड़ा भेजा गया है। शहरी क्षेत्रों में एक किमी सड़क बनाने के लिए 39 लाख 14 हजार रु0 की दर से 327 किमी सड़कें पूरी तरह से नई बनाने के लिए 128 करोड़ रु0 की डिमांड की गई है। क्या शहरों में 470 किमी सड़कें बह गई हैं? क्या सरकार शहरी निकायों को 39 लाख रु0 की इसी दर पर रखरखाव का खर्च दे रही है? जबकि इतनी ही किमी सड़कों को फिर से ठीक-ठाक करने पर वास्तविक व्यय 22 करोड़ आएगा। इसी प्रकार सिंचाई विभाग में यदि 1813 किमी नहरें और 470किमी तटबंध यदि पूरी तरह बह भी गए हैं तब भी 18 लाख प्रति किमी की दर से नहर और 60 लाख प्रति किमी की दर से बाढ़ सुरक्षा ढ़ांचे को तैयार करने में भी 611 करोड़ रु0 का खर्च आएगा जबकि सरकार ने इसका तिगुना 1522 करोड़ रु0 का एस्टीमेट केंद्र को भेजा है। बिजली विभाग की क्षति सरकारी आकलन के अनुसार एक किमी बिजली की लाइन का खर्च 15 लाख रु0है। सरकार के हिसाब से 1369 किमी बिजली की लाइनें पोल सहित नष्ट हो गई हैं। यानी हर जिले में 100 किमी बिजली की लाइनें पूर्ण नष्ट हो चुकी हैं। उस पर तुर्रा यह कि यूपीसीएल भी दावा कर रहा है कि सभी शहरी इलाकों और अधिकांश ग्रामीण इलाकों में बिजली आपूर्ति सामान्य है। सरकार के आंकड़ों का यकीन करें तो राज्य की पांच हजार पेयजल योजनायें नष्ट हो चुकी हैं। इन पर प्रति योजना 20 लाख 60 हजार रु0 का एस्टीमेट केंद्र को भेजा गया है। प्रधनमंत्री को दिए गए पत्र में दिए क्षति के आंकड़ों के अनुसार राज्य के 2356 विद्यालय नष्ट हुए हैं। इसके लिए राज्य सरकार हर विद्यालय के लिए 15 लाख 28000रु0 मांगे हैं। जबकि विश्वबैंक परियोजना के तहत बनने वाले प्राथमिक विद्यालयों के लिए केंद्र सरकार के मानक 3 लाख रु0प्रति विद्यालय और राज्य सरकार के मानक दो लाख रु0 प्रति विद्यालय है। केंद्रीय मानकों के अनुसार 2,356 विद्यालयों को फिर से नया बनाने के लिए 70 करोड़ और राज्य के मानकों के हिसाब से 47 करोड़ रु0 चाहिए पर डिमांड पांच से आठ गुना ज्यादा 360 करोड़ रु0 की है। इस प्रकार राज्य सरकार द्वारा की गई इस 20,336 करोड़ रु0 की डिमांड की असलियत यह है कि उसके नुकसान के आंकड़ों में छेड़खानी किए बगैर उन सुविधाओं को पहले जैसा करने और 233 गांवों को शानदार ढंग से बसाने पर भी 5000 करोड़ रु0ही खर्च आएगा जबकि सरकारी आंकड़ों में यह चार गुना बढ़ा दी गई है।सवाल उठता है कि सरकार ने राहत के मानकों को जानते हुए भी ऐसे आंकड़े क्यों पेश किये जो मानकों से तो कई गुना ज्यादा थे ही पर वास्तविकता से भी परे थे। यह सही है कि देश की लगभग हर राज्य सरकार प्राकृतिक आपदाओं के लिए केंद्रीय मदद मांगती हैं तो वे नुकसान के आंकड़ों को कुछ हद तक बढ़ा चढाकर पेश करती हैं। यह सामान्य प्रवृत्ति है। लेकिन हर राज्य सरकार यह भी ध्यान रखती हैं कि उनके द्वारा दिये गये आकलन की विश्वसनियता बनी रहे। यह राज्य और सरकार दोनों की साख के लिए जरुरी होता है। यदि आंकड़ा बेसिरपैर का हो तो शर्मिंदगी सरकार को ही उठानी पड़ेगी। ऐसा हुआ भी है। केंद्र सरकार ने अभूतपूर्व फैसला लेते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह प्रत्येक निर्माण कार्य से पहले और बाद की स्थिति की वीडियोग्राफी कराये। पहली बार किसी राज्य सरकार के कामकाज पर केंद्र ने इस तरह का खुला संदेह व्यक्त किया है। जाहिर है कि राज्य सरकार की साख सवालों के घेरे में है।ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि राज्य सरकार ने ऐसा आंकड़ा क्यों प्रचारित किया जो पहली ही नजर में अविश्वसनीय लग रहा हो। जिससे और तो दूर खुद भाजपा ही नहीं पचा पा रही हो। दरअसल यह राजनीतिक आंकड़ा है जो सन् 2012 के विधानसभा चुनाव की जरुरत से पैदा हुआ है। मुख्यमंत्री और उनके रणनीतिक सलाहकार जानते हैं कि केंद्र कुछ भी कर ले पर 21000 करोड़ रु0 की राहत मंजूर नहीं करेगा। ऐसे में भाजपा यह प्रचार कर सकेगी कि कांग्रेस ने आपदा में भी लोगों की पर्याप्त मदद नहीं की और जरुरत से बहुत कम सहायता दी। मुख्यमंत्री चालाक राजनेता हैं और चुनावी शतरंज की बिसात पर अपना एक-एक मोहरा शातिर तरीके से चल रहे हैं। यही वजह है कि 500 करोड़ रुपये की केंद्रीय मदद के बावजूद कांग्रेस बचाव की मुद्रा में है और एक धेला खर्च किए बगैर राज्य सरकार हमलावर है। बारीकी से बुनी गई इस रणनीति के तहत ही ग्राम स्तर पर मौजूद सरकारी अमला आपदा पीड़ितो को समझा रहा है कि उन्हे पर्याप्त राहत इसलिए नहीं मिल सकती क्योंकि केंद्र सरकार के मानक यही हैं। लोगों का गुस्सा कांग्रेस की ओर मोड़ने के इस नायाब तरीके के लिए ही 21000 करोड़ की राहत का फार्मूला निकाला गया है। इसे राजनीतिक रुप से कैश करने का बाकी काम जिला स्तर पर बन रही भाजपा की राहत कमेटियां करेंगी जो सरकारी राहत से अपने वोटबैंक का भला भी करेंगी और नाकाफी राहत से पैदा होने वाले गुस्से को कांग्रेस की ओर भी मोड़ेंगी।इसका एक और कोण है जो कांग्रेस देख रही है। कांग्रेस उपाध्यक्ष सुबोध उनियाल का कहना है कि विभागों को मिलने वाली केंद्रीय मदद का इस्तेमाल सरकार चुनावी फंड एकत्र करने में करना चाहती है। राज्य के आपदा पीड़ित इलाकों में आजकल आम चर्चा है कि निर्माण और मरम्मत कार्यों से जुड़े हर विभाग को दस लाख रु0 प्रति डिवीजन के हिसाब से ऊपर पहुंचाने को कहा गया है। गांवों की चौपालों पर यह भी खबर उड़ाइ जा रही है कि राजस्व, कृषि, उद्यान जैसे विभागों को 6 प्रतिशत ऊपर देने को कहा गया है। इन चर्चाओं का आधार तो पता नहीं पर इतना जरुर है कि इनसे गांवों की राजनीति गूंज रही है।आपदा में भ्रष्टाचार को लेकर आने वाले समय में जबरदस्त बबंडर उठने वाला है। खुद सरकारी अफसरों का कहना है कि यदि सरकार को फर्जी कामों से बचना है तो हर सिंचाई,लोनिवि, लघु सिंचाई, प्राथमिक विद्यालयों, शहरी निकायों और बिजली विभागों से जुड़ी सभी क्षतियों की वीडियोग्राफी गैर सरकारी स्वयंसेवी संगठनों और निष्पक्ष एजेंसियों से कराई जाय और सभी निर्माण एजेंसियों के कामों का सोशल ऑडिट कराया जाय ताकि भ्रष्टाचार की संभावना को न्यूनतम किया जा सके। उधर कांग्रेस का कहना है कि किसी भी हालत में कुंभ को दोहराने का मौका नहीं देंगे। कांग्रेस नेता केंक्त से यह भी मांग कर सकते हैं कि केंद्रीय मदद पर नजर रखने के लिए उसी तरह के इंतजाम किए जांय जिस तरह कॉमनवेल्थ के निर्माणकार्यों की जांच के लिए किए गए हैं।

रविवार, 29 अगस्त 2010


टूट रहा है लाल दुर्ग का तिलिस्म


आखिरी मुगल बनने की ओर प्रकाश का प्रस्थान



माकपा जब पश्चिम बंगाल में चुनाव के जरिये सत्ता पर काबिज हुई तो इसे भारतीय राजनीति में एक अजूबा माना गया। देश में काफी लोग थे जिन्हे तब लगा कि जैसे भारतीय लोकतंत्र पर आफत आ गई हो। कईयों को बैलेट बॉक्स से निकला यह कम्युनिस्ट राज कौम नष्ट करने वाला लगा। आठवें दशक से लेकर बीसवीं सदी तक भारतीय मीडिया को बंगाल का यूं लाल होना अच्छा नहीं लगा और समय-समय पर वह इस पर लाल पीला होकर अपनी कम्युनिस्ट विरोधी ग्रंथि को उजागर भी करता रहा। माकपा की कामयाबी पर भारत के कम्युनिस्टों की संसदीय प्रजाति मुग्ध रही है। माकपा के लिए भले ही केरल को छोड़कर शेष भारत की राजनीति सहारा का मरुस्थल बनी रही हो पर बंगाल उनके लिए नखलिस्तान से कम नहीं रहा। अपने इस साम्राज्य पर देश भर के माकपा नेता और कार्यकर्ता छाती फुलाते रहे हैं। उन्हे बराबर लगता रहा है कि देश में सिर्फ वही हैं जो संसदीय राजनीति के खांचे में अजेय साम्राज्य स्थापित करने का हुनर जानते हैं। इस अहसास के अहंकार से लबालब होकर वे छलकते भी रहे हैं। बंगाल माकपाईयों का राजनीतिक मक्का बना हुआ है और वे मीटिंगों, बहसों और अपने लेखों में बंगाल सरकार की नीतियों का पाठ कुरान की आयतों की तरह करते रहे हैं। माकपा की धर्मपुस्तक में बंगाल सरकार के खिलाफ बोलना कुफ्र माना जाता रहा है। चार दशक से चला आ रहा यह दुर्ग अब मुगल साम्राज्य के आखिरी समय के दौर से गुजर रहा है। वामपंथ के इस किले की अजेयता का तिलिस्म टूट रहा है और किताबी मार्क्सवाद के पंडित प्रकाश करात आखिरी मुगल होने की त्रासदी की ओर प्रस्थान कर चुके हैंं।पहले केरल और आठवें दशक में पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों के चुनाव के जरिये सत्ता में आने से भारतीय राजनीति संसदीय कम्युनिज्म का उदय हुआ। नंबूदरिपाद और ज्योति बसु समेत भाकपा और माकपा के कम्युनिस्ट नेता इसके शिल्पकार रहे हैं। ज्योति बसु का दर्जा माकपा की राजनीति में कुछ वैसा ही माना जा सकता है जिस तरह मुगलों में अकबर को हासिल था। उन्होने पश्चिम बंगाल में वामपंथी सरकार चलाने का अपना व्याकरण गढ़ा और संसदीय कम्युनिस्ट राजनीति को उस ऊंचाई तक पहुंुचाया जहां आकर वह खुद को अजेय मानने के स्वर्ग में विचर सकती थी। बसु एक करिश्माई नेता थे उसी तरह जैसे कांग्रेस में जवाहर लाल नेहरू और दक्षिणपंथी राजनीति में अटल बिहारी वाजपेयी थे। उनकी माकपा संसदीय कम्युनिज्म की बंगाली कलम थी। जो बंगाल की आबोहवा के मुताबिक विकसित की गई थी। यह बारीकी से बुना गया ऐसा राजनीतिक मिक्सचर था जिसमें बांग्ला उपराष्ट्रªªवाद और अभिजात्यवाद के रेशे भी मौजूद थे तो मार्क्सवाद के धागे भी। ऑपरेशन बर्गा ने अधिकांश ग्रामीण इलाकों में माकपा को लगभग अजेय बना दिया।लगातार जीतों से माकपा की कतारें खुद को अजेय मानने लगीं। ज्योति बसु बूढ़े हो चले थे और उनका बनाये राजनीतिक फॉर्मूले का असर अब कम हो रहा था। माकपा के अकबर ज्योति बसु आखिरकार रिटायर हो गए। उनकी जगह चुने गए बुद्धदेव भट्टाचार्य और उनके राजनीतिक कद के बीच जमीन और आसमान का फर्क था। बंगाल की राजनीति में एकाएक खालीपन आ गया। बुद्धदेव जननेता नहीं थे। वह न तो जनता की नब्ज के राजनीतिक वैद्य थे और न उनके पास ऐसा आला था जिससे वह लोगों दिल की धड़कन को महसूस कर सकते थे। वह ऐसे साहसी और प्रतिभा संपन्न नेता भी नहीं थे जो संसदीय राजनीति और मार्क्सवाद के इस घालमेल को सिंकारा जैसे टॉनिक में बदल पाते। ऊपर से निर्द्वंद सत्ता ने पार्टी का शाररिक और मानसिक तंत्र इतना बीमार कर दिया कि वह सत्ता के सन्निपात में अराजक हो गया। जनता और नेतृत्व के बीच का पुल टूट चुका था। ऐसे में ईश्वर ही उसे बचा सकता था। चूंकि मार्क्सवादी ईश्वर पर भरोसा नहीं करते इसलिए हो सकता है कि उसने भी उन्हे सद्बुद्धि देने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई हो। माकपा में कांग्रेस के जीन का रोपण तो बसु के जमाने में ही शुरू हो चुका था और बीसवीं सदी की शुरुआत से उसे लाल कांग्रेस के उपनाम से जाना जाने लगा था। उसका डीएनए कांग्रेस से मैच करने लगा था और लाल रंग वाले गुणसूत्रों को छोड़कर उसमें और कांग्रेस में फक करना मुष्किल था। बसु के बाद तो माकपा विचारधारा की ढ़लान पर जैसे लुढ़कने लगी। माकपा के बुद्ध ने मान लिया था कि उनका कोई विकल्प नहीं है। माकपा ने बंगाल में पूंजीपतियों के लिए सेज की सेज सजानी शुरू कर दी। लेकिन पहले नंदीग्राम और फिर सिंगूर में जनता ने बताया कि निर्विकल्प कुछ भी नहीं है। यह जनता का ही कमाल है कि उसने राजनीति की राख में से ममता बनर्जी को निकाला और उसे फीनिक्स में बदल दिया। अजेय माकपा को सड़क से लेकर पंचायतों और नगर निकायों तक पराजयों के सिलसिले से गुजरना पड़ा है। मार्क्सवाद को कंठस्थ रखने वाले कम्युनिस्ट ब्यूरोक्रेट प्रकाश करात आखिरी मुगल की तरह साम्राज्य को ध्वस्त होते देख रहे हैं। वह भी नेतृत्व की उन पांतों शामिल रहे हैं जिन्होने माकपा के पतन की गति को तेज किया है। दरअसल माकपा के नेतृत्व पर सालों से ऐसे लोगों का कब्जा चल रहा है जिसने उसे जनता की पार्टी बनाने के बजाय उसमें नौकरशाह दल में बदल दिया है। पूरे देश में संगठन के महत्वपूर्ण पदों पर अधिकांश वे नेता काबिज हैं जो किसी आंदोलन में जेल नहीं गए। उनकी योग्यता बस इतनी है कि वे किताबी मार्क्सवाद के पंडे हैं। माओवादी नेता आजाद की पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने पर माकपा ने जिस तरह से सवाल उठाए हैं उससे यह गलत फहमी भी दूर हो गई है कि उसमें कम्युनिस्ट होने का कोई लक्षण बाकी है। माओवादियों को लेकर भाजपा और माकपा एक साथ खड़ी है तो इस श्रेय के हकदार भी करात ही हैं। प्रकाश करात, सीताराम येचुरी, अरुण जेटली, चिदंबरम संसदीय लोकतंत्रा के सबसे बड़े वकील के रुप में उभरे हैं। संयोग ये सभी भारतीय कुलीन वर्ग के प्रतिनिधि हैं। माओवादियों के दमन पर भाजपा के सबसे करीब इस समय माकपा है।यह राजनीतिक विडंबना ही है कि माकपा का विकल्प ममता के रुप में सामने आया है। ममता बनर्जी जिस तरह से अविवेकपूर्ण लोकप्रियतावादी राजनीति कर रही हैं उससे उनसे कोई उम्मीद नहीं बंधती। उनकी राजनीति की सीमायें भी स्पष्ट हैं और उनके रंगढ़ंग ऐसे ही रहे तो पतन भी पटकथा भी दीवार पर लिख दी गई है। लोगों में उम्मीद के पहाड़ खड़े करना आसान भले ही हो पर यह शेर की सवारी है जिसमें शिकार होना तय है। ममता में जननेता के काफी गुण हैं पर दूरदर्शी नेता उम्मीदों के ऐसे पहाड़ खड़े नहीं करते जिनके नीचे दबकर वे मारे जायें।

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

महंगाई पर नीति में नहीं नीयत में खोट

महंगाई पर संसद में जबरदस्त बहस और केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के बयान के बावजूद मंहगाई की इस अंधी सुरंग से निकलने का कोई रास्ता निकलता नहीं दिख रहा। राजनीति की भूलभूलैया में यह मुद्दा बस बहस में ही समाप्त होकर रह गया। इस पूरी बहस से इतना तो पता चल ही गया कि महंगाई के मुद्दे पर राजनीतिक दलों की नीयत साफ नहीं है। सोनिया गांधी की गरीब फ्रैंडली मुद्रा के बावजूद इस समस्या की जड़ें प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की उस कुलीन आर्थिक राजनीतिक अवधारणा में है जो गरीब विरोधी और देश के सामाजिक आर्थिक ढ़ांचे को तहस नहस कर देने वाली है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ईमानदार और बेदाग प्रधानमंत्री के खिताब से नवाजे जाते रहे हैं। उनकी इस ईमानदारी के बावजूद कांग्रेस संसदीय चुनावों के लिए कई हजार करोड़ जुटाने में कामयाब रही। जाहिर है कि यह पैसा उस आम आदमी ने नहीं दिया जिसके साथ कांग्रेस हाथ होने की बात कही जा रही थी। यह पैसा उन लोगों ने दिया है जो इस देश को बाजार अर्थव्यवस्था के हिसाब से चलाने की आजादी चाहते हैं ताकि उनका मुनाफा कुलांचे भरता रहे। कहीं महंगाई का यह दौर उसी वर्ग के चुनावी कर्ज उतारने से तो नहीं पैदा हुआ। कांग्रेस के लोग इससे असहमत हो सकते हैं पर मंहगाई पर केंद्र जिस तरह से हाथ पर हाथ धरे हुए बैठा है उससे क्या इस आरोप का औचित्य साबित नहीं होता। इस पूरे प्रकरण से उन लोगों की आंखे खुल जानी चाहिए जो प्रधानमंत्री की ईमानदारी के कसीदे पढ़कर इसे कांग्रेस को वोट देने का सबसे बड़ा कारण बता रहे थे। साफ है कि व्यक्तिगत ईमानदारी का सवाल राजनीति में बहुत मायने नहीं रखता। भ्रष्टाचार के तंत्र को फलने-फूलने की आजादी देने वाला एक ईमानदार आदमी भी भ्रष्ट व्यवस्था के शिखर पर जमे रह सकता है। एक जनविरोध्ी तंत्र को भी अपनी साख बनाए रखने के लिए कुछ साफ सुथरा चेहरों की जरुरत होती है। उदारीकरण और भूमंडलीकरण के जिस आदमखोर पशु से हमारा पाला पड़ा है उसके सिद्धांतकारों में मनमोहन सिंह समेत कई ईमानदार और समर्पित हस्तियां हैं। लोकसभा में सुषमा स्वराज और राज्यसभा में अरुण जेटली ने इशारों- इशारों में इसे कहा भी। महंगाई के गणित के सूत्र मनमोहन के आर्थिक विकास दर वाले अर्थशास्त्र से भी निकलते हैं। लेकिन बीमारी सिपर्फ इतनी ही नहीं है बल्कि इससे ज्यादा गंभीर और चिंता में डालने वाली है। विदेशी स्वामियों को खुश करने के लिए भारत सरकार ने उदारीकरण और भूमंडलीकरण के रास्ते को चुनने में वे मूलभूत सावधानियां भी नहीं बरतीं जो अमेरिका समेत सभी विकसित देशों ने बरती। यह ऐसा देश है जिसके पास बाजार का नियमन करने के लिए न कड़े उपभोक्ता कानून हैं और न ही कोई नियामक संस्था। लाइसेंस राज तो खत्म हो गया लेकिन बाजार का अंधेर राज कायम कर दिया गया। आज एक आम आदमी के पास अनुचित मूल्य या घटिया सामग्री का प्रतिकार करने के लिए कोई प्रभावी तंत्र नहीं है। आम उपभोक्ता बाजार में असहाय और दयनीय आदमी है जिसके पास व्यापारी की बात मानने और जेब से दाम चुकाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। उसके पास यह जानने का न साधन है और न अधिकार कि वह जो खरीद रहा है उसका लागत मूल्य कितना है। वह समझ पाने में असमर्थ है कि एक ब्रांड की मुहर लगने मात्रा से किसी वस्तु का दाम कैसे 500 से 700 गुना तक बढ़ जाता है। उसके पास नकली सामान, प्रदूषित और खतरनाक खाद्य पदार्थों से बचने का कोई रास्ता नहीं है। उसका सामना हर रोज ऐसे सर्वशक्तिमान और स्वेच्छाचारी बाजार से होता है जो देश के कानूनों से ऊपर एक संविधानेतर और संप्रभु सत्ता है। स्पष्ट है कि भारत की सरकार और भारतीय राज्य की सहमति के बिना देश में ऐसी असंवैधानिक सत्ता नहीं चल सकती। भारतीय बाजार का कोई तर्कशास्त्र नहीं है। वहां जंगल राज है।उसमें एक ओर बिना मांग के ही दामों को कई गुना बढ़ाने वाला सट्टा बाजार है तो दूसरी ओर मुनाफाखोरी में माहिर देशी रुप से विकसित ऐसा आढ़त बाजार है जिसमें भाव अकारण ही कई गुना बढ़ा दिए जाते हैं। आम लोगों तक कभी यह जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती कि खाद्यान्न वायदा कारोबारियों ने सिर्फ सट्टबाजी कर साल भर में कितने हजार करोड़ रुपए बना लिए या आढ़तियों के तंत्र ने सिर्फ दामों की हेराफेरी कर साल भर में कितना मुनाफा कमाया। जाहिर है कि सरकार नहीं चाहती कि लोग कभी यह जान पायें कि अनाज का एक दाना पैदा किए बिना ही कुछ बिचौलिए हजारों करोड़ कैसे कमा रहे हैं। पंजाब कृषि विवि के एक अध्ययन के अनुसार पंजाब के आढ़तियों ने बिना कुछ किए धरे 1990 से 2007 के बीच लगभग 8000 करोड़ रुपए कमाए। यह है बिचौलियों का तंत्र! सरकार में अहम पदों पर बैठे लोग भी स्वीकार करते हैं कि खाद्य पदार्थों के दाम उपभोक्ता तक पहुंचते-पहुंचते 700 गुना तक बढ़ जाते हैं लेकिन इस नपुंसक आत्मस्वीकृति से लोगों को राहत नहीं मिल सकती। आखिर लागत और विक्रय मूल्य के बीच कोई लॉजिकल सम्बंध क्यों नहीं होना चाहिए? यह इसलिए नहीं होता चूंकि देश के राजनीतिक दलों, नगर से लेकर विधानसभाओं और संसद तक मौजूद उनके कारिंदों को इस काली कमाई का एक बड़ा हिस्सा जाता है। चुनावों और महंगाई के बीच के अवैध संबंध जब तब जाहिर होते रहते हैं। इसलिए यह कहना कि सरकार के पास महंगाई से निपटने की कोई नीति नहीं है, एक अर्द्धसत्य है। केंद्र सरकार के पास ऐसे दिमागों की कमी नहीं है जो इसका हल चुटकियों में निकाल सकते हैं पर वे ऐसा चाहते नहीं हैं। इसके पीछे मनमोहनोमिक्स तो है ही साथ में ऐसी सरकार भी है जिसने अपनी अंतरात्मा और ईमान बाजार के हाथों गिरवी रख दिया है। यही कारण है कि सरकार के गोदामों में गेहूं चावल सड़ रहा है और देश का दरिद्रनारायण भूखों मर रहा है। क्योंकि सरकार जानती है कि यदि वह गोदामों के गेहूं और चावल को रियायती दरों पर बाजार में लाई तो खाद्यान्न के दाम गिर जायेंगे और उसके खेवनहार बिचौलिए और वायदा कारोबारी कंगाल हो जायेंगे। इसलिए लाखों टन अनाज सड़ता रहता है। वरना सरकार चाहती तो इन 63 सालों में पनपे बिचौलियों को एक ही झटके में खत्म कर देती तथा हर वस्तु पर लागत और विक्रय मूल्य दर्ज करना जरुरी कर देती। पूंजीवाद के तमाम दुर्गणों को अपनाने वाली सरकारों ने ही वायदा कारोबार के राक्षस को पैदा किया है। महंगाई से लेकर मिलावट तक फैले जनविरोधी तंत्र पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने न तो आवश्यक वस्तु अधिनियम को कड़ा बनाया और न मिलावट रोकने के लिए कोई सख्त कानून बनाने की कोशिश की। यही नहीं एनडीए ने जनवितरण प्रणाली को ध्वस्त करने का जो सिलसिला शुरु किया था उसे यूपीए वन और टू ने जारी रखकर साबित कर दिया कि वे एनडीए की सच्ची वारिस हैं। क्योंकि एक जनमुखी जनवितरण प्रणाली बाजार की अराजकता और स्वेच्छाचारिता पर लगाम लगाने का सबसे बड़ा साधन है। इसे नष्ट किए बिना बाजार अंधाधुंध मुनाफा नहीं कमा सकता। इसीलिए इससे पहले एपीएल के नाम पर निम्न मध्यवर्ग को अलग किया गया और अब इसे लुंजपुंज बनाकर गरीबों के लिए भी इसे निरर्थक बना दिया गया है। ये सारी बातें इसी सत्य को उजागर करती हैं कि खोट सरकार की नीयत में है। मनरेगा जैसे सांकेतिक उपाय कर वह इस पाप से पीछा नहीं छुड़ा सकती। पहले गरीबों की तादाद बढ़ाने जैसी महामारी पैदा करना और फिर मनरेगा का मानवीय चेहरा सामने लाने से बात नहीं बनेगी। सरकार में यदि थोड़ी भी लोकलाज बची है तो उसे गरीबी और भुखमरी पैदा करने वाले सामूहिक विनाश के अस्त्रों की अपनी फैक्टरियों को बंद करना होगा।

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

विकीलीक्स ने तोड़ा सूचना पर सरकारी एकाधिकार

दुनिया की सबसे चर्चित वेबसाइट विकीलीक्स के खुलासों ने अमेरिका और पाकिस्तान को हिला दिया है। पेंटागन के रहस्यलोक में दुनिया की सबसे कड़ी चौकसी में रखे गए एक लाख से ज्यादा सर्वाधिक संवेदनशील खुफिया फौजी दस्तावेजों को इंटरनेट पर जारी कर विकीलीक्स ने दुनिया भर में तहलका मचा दिया है। पहली बार व्हाइट हाउस और पेंटागन में सूचना की ताकत से हड़कंप मचा हुआ है। इन रहस्योद्घाटनों से साफ हो गया है कि आतंकवाद निर्यात करने वाले देशों में पाकिस्तान अभी भी टॉप पर है और यह सब वह अमेरिका की जानकारी में कर रहा है। इसी के साथ आंतकवाद के खिलाफ अमेरिकी जंग के पाखंड का भी पर्दाफाश हो गया है। ये दस्तावेज बताते हैं कि काबुल में भारतीय दूतावास से लेकर भारतीय संस्थानों पर तालिबानी हमले आईएसआई द्वारा प्रायोजित होने की जानकारी अमेरिका को थी। जाहिर है कि भारत के साथ उसकी दोस्ती सिर्फ कूटनीतिक धोखाधड़ी से ज्यादा कुछ नहीं है। इससे अमेरिका के प्रति भारत सरकार के झुकाव पर भी सवालिया निशान लग गया है और पाक के साथ उसकी बातचीत भी अमेरिकी हितों के लिए की गई कवायद ही प्रतीत होती है। इंटरनेट की दुनिया के इस सबसे बड़े खुलासे से दुनिया की सारी सरकारों के माथे पर बल पड़ गए हैं क्योंकि जनता से छुपाकर रखे गए उनके खुफिया राज कभी लीक हो सकते हैं। सूचना की आजादी के नजरिये से यह बड़ी घटना है। अभी तक सूचनाओं की राजनीति के जरिये कभी चीन तो कभी ईरान तो कभी रुस को काबू में करने में लगे अमेरिका के लिए विकीलीक्स दुस्वप्न बनकर आया है। पिछले महीनों गूगल और चीन के विवाद में चीन को इंटरनेट पर सूचनाओं की आजादी का पाठ पढ़ाने वाले अमेरिका को अब खुद इसका मजा चखना पड़ रहा है। अपने प्रतिद्वंदी देशों के असंतुष्टों और विद्रोहियों के प्रचार को मदद देने के लिए अमेरिका सूचना की आजादी का सबसे बड़ा समर्थक रहा है। दुनिया में समाचार और सूचनाओं के अधिकांश माध्यमों में सूचनाओं का प्रवाह एकपक्षीय रहा है। ईरान,इराक से लेकर क्यूबा तक पाश्चात्य दुनिया के सारे माध्यमों में सूचनाओं का समूचा प्रवाह अमेरिका की ओर रहा। अपने दुश्मनों से निपटने के लिए उसने सूचनाओं को हथियार के रुप में इस्तेमाल किया। इससे सूचना की आजादी अमेरिकी हितों की पर्याय हो गई। लेकिन विकीलीक्स ने सूचनाओं के इस खेल का पासा पलट दिया है। इंटरनेट पर अब तक के सबसे बड़े खुलासे को अंजाम देते हुए उसने अमेरिका को सांसत में डाल दिया है। आईएसआई और पाक फौज से उसके रिश्तों के चलते आतंकवाद के खिलाफ उसकी बहुप्रचारित लड़ाई की पोल खुल गई है। यह भी जग जाहिर हो गया है कि उसे हामिद करजई और भारत के खिलाफ किए जाने वाले हमलों की जानकारी थी। उसके लिए सबसे असुविधाजनक यह है कि उसे अमेरिकी जनता को जबाब देना होगा कि वह खरबों डालर उन संस्थाओं पर क्यों खर्च कर रहा है जो ग्लोबल आतंकवाद के सबसे बड़े निर्यातक हैं। दुनिया की हर सरकार गोपनीयता और राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सूचनाओं को आम लोगों तक नहीं पहुंचने देती। यहां तक दुनिया में लोकतंत्र के सबसे बड़े पहरेदार होने का दावा करने वाले देश भी इसके अपवाद नहीं हैं। विकीलीक्स ने सूचनाओं की दुनिया पर सरकारों के एकाधिकार को खत्म कर दिया है। सरकार के कड़े पहरों के बीच उसने चोर दरवाजे खोज लिए हैं। यह सही मायनो में सूचना की आजादी और उसके निर्बाध संचरण की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। इससे साबित हो गया हैै कि इंटरनेट की तरंगों पर अब अमेरिकी लगाम के दिन भी लद गए है। भविष्य में हर देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं होगी जो सरकारों की गोपनीयता के परखच्चे उड़ाने के लिए विकीलीक्स को खुफिया दस्तावेज मुहैया करायेंगे। इसे सरकारों के कामकाज में साफगोई और पारदर्शिता की शुरुआत माना जाना चाहिए। सूचनाओं के तंत्र पर सरकारी एकाधिकार टूटने से उम्मीद की जाने चाहिए कि इसके बाद किसी न किसी दिन नागरिकों के खिलाफ इस्तेमाल होने वाली अंधाधुंध हिंसा पर राज्य का एकाध्किार भी टूटेगा। दिन ब दिन हिंसक,गैर जबाबदेह और गैर जिम्मेदार होते जा रहे आधुनिक राज्यों पर जनशक्ति का अंकुश लग सकेगा।

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

सरकार को निजी हाथों में सौंपो

हाल ही में यूएनडीपी के आंकड़े आए हैं जिनसे पता चलता है कि भारत के ग्लोबल आर्थिक महाशक्ति बनने का जो तिलिस्म भारत सरकार, राजनेता और मीडिया बना रहा था वह सफेद झूठ के सिवा कुछ नहीं है। वह भी ऐसा झूठ जिसके पैर भारत की जमीन के बजाय अमेरिका में हैं। यूएनडीपी की रिपोर्ट हमें यह गर्व करने का दुर्लभ मौका देती है कि आजादी के 63 सालों में गरीबी और भुखमरी के मोर्चे पर हमसे आगे सिर्फ अफ्रीकी देश हैं। जितनी निष्ठा, लगन और समर्पण के साथ देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गृहमंत्री चिदंबरम और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह काम कर रहे हैं उससे यह भरोसा मजबूत होता है कि अगले चार सालों में हम गरीबी के मोर्चे पर होंडुरास, हैती,चाड जैसे पिद््््दी देशों को पछाड़ने में कामयाब हो जायेंगे।
पिछले दिनों कई खबरें चर्चा में रही जिनमें मिलावटखोरी से लेकर महंगाई तक कई मुद्दे थे। देश में मिलावटखोरों के हौसले की तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होने प्रधानमंत्री को भी नहीं बख्शा। मिलावटखोरों को लगा होगा कि पीएम यूपी आ रहे हैं तो वे प्रदेश के सबसे बड़े जायके से रुबरु हुए बगैर कैसे जा सकते हैं। मिलावटखोरों की इस लोकतांत्रिक भावना का भी सम्मान किया जाना चाहिए कि वे मिलावट के मामले में आम आदमी और प्रधानमंत्री में भेदभाव नहींे करते। अब हर रोज मिलावट के एक से एक मामले सामने आ रहे हैं। यूपी के सकल घरेलू उत्पाद में मिलावट का कितना योगदान है,इस पर अर्थशास्त्रियों को शोध करना चाहिए। मिलावटखोरों की सत्ता जिस निर्विघ्नता से फल-फूल रही है उससे लगता ही नहीं कि इस देश में कोई सरकार है। ऐसा लगता है कि सरकार बाजार को मिलावटखोरों के हवाले कर भाग गई है। उधर अपराधों के मामले सरकार को नदारद हुए एक अर्सा हो गया है। अपराधों को लेकर जो थोड़ा बहुत पुलिसिया हलचल दिखाई देती है वह भी इसलिए कि आम आदमी को लगता रहे कि देश में पुलिस है और सरकार भी। ताकि आम आदमी डरा रहे और पुलिस पर अरबों रुपए के खर्च जस्टिफिकेशन होता रहे। इधर महंगाई के मामले में भी सरकार सीन से गायब हो गई है। इस बार वह बिना बताए गायब नहीं हुई बल्कि उसने ढ़ोल पीटकर बताया कि महंगाई बाजार और लोगों के बीच का मामला है इसलिए इसमें सरकार का क्या काम ? पेट्रोल, डीजल में भी सरकार ने मोर्चा अब अंतराष्ट्रीय बाजार के हवाले कर दिया है। अनाज की उपलब्धता से लेकर कीमतों तक का सारा काम सरकार ने वायदा बाजार को सौंप दिया है।अब यह उसकी मर्जी है कि कौन सा अनाज कब बाजार से गायब होगा और कब,किस भाव से बाजार मे कब आएगा । सरकार इस झंझट में नहीं पड़ेगी। अतिक्रमण से लेकर पानी, बिजली, सफाई, स्वास्थ्य और टैªिफक जैसी जरुरी व्यवस्थाओं से सरकार ने 90 के दशक में ही विदाई ले ली थी। यूएनडीपी की रिपोर्ट बता रही है कि गरीबी के मामले में भारत का मुकाबला अब सिर्फ अफ्रीकी देशों से है। 55 फीसदी आबादी गरीब है। यह उस देश का हाल है जिसके बारे में कहा जा रहा है कि वह विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है।हालांकि देश के न्यूज चैनल अरबपतियों और करोड़पतियों की बढ़ती तादाद के आंकड़े पेश कर आम लोगों को इस पर छाती फुलाने के लिए उकसाते नजर आते हैं।गरीबों की इस बढ़ती तादाद से यह भ्रम भी दूर हो गया है कि इस देश में गरीबों की रक्षा के लिए सरकार की जरुरत है। गरीबी के महासागर में मनरेगा के छुटपुट टापुओं को छोड़ दें तो आम आदमी के लिए सरकार की उपयोगिता सिफर है। सरकार की आखिरी जरुरत जिस न्याय के लिए पड़ती है उसका हाल सब जानते हैं कि वह पैसे और प्रभुत्व वाले वर्ग के लिए आरक्षित है।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब सरकार न रोजी, न रोटी, न कपड़ा, न मकान, न दवा, न इलाज ,न सुरक्षा और न्याय दे पा रही हो और तो और वह अपने नागरिकों के जीवन जीने के नैसर्गिक अधिकार की रक्षा करने में भी असमर्थ हो तो फिर नागरिकों के लिए उसकी जरुरत क्या है? नेताओं, अफसरों और सरकारी अमले पर खर्च होने वाले अरबों-खरबों रुपए का बोझ लोग क्यों उठायें? सरकार को बेवजह ढ़ोने का क्या तुक है ?जब निजी क्षेत्र ही सारी बीमारियों का इलाज है तो सरकार को भी क्यों न उसी निजी क्षेत्र के हवाले कर दिया जाय?इससे देश को भ्रष्ट और अयोग्य नेताओं के उस झुंड से छुटकारा मिलेगा जो हर चुनाव में झूठ और हराम के पैसों के बल पर विधानसभाओं और संसद में काबिज हो जाता है। बोनस के तौर पर लोगों को उन अफसरों और सरकारी तंत्र से भी निजात मिलेगी जिनकी लालफीताशाही से सारा देश त्रस्त है। क्योंकि भारत में सरकार अब जनकल्याण के लिए नहीं बल्कि सरकारी अमले के भरण पोषण और भ्रष्टाचार के लिए चलाई जारही है।

शनिवार, 19 जून 2010

बर्बर! अमानुषिक !! और पाशविक!!!

जिन लोगों को भारतीय राज्य में मानवीयता के अंश होने का भ्रम हो वे जरा लालगढ़ में मुठभेड़ में मारे गए माओवादियों की मृत देहों से भारतीय सुरक्षाबलों द्वारा किए गए सलूक के फोटो देख लें तो निश्चित तौर पर उनका यह भ्रम जाता रहेगा। डंडों से बंधी मृत पुरुष और महिलाओं की देहें सांमतकाल के दौर के शिकारियों की याद दिलाती हैं।जब शिकार पर गए राजा और सामंत इसी तरह से गर्व के साथ डंडों पर बांधकर मारे गए जंगली जानवरों को लेकर लौटते थे। ये फोटोग्राफ्स और वीडियो फुटेज बताते हैं कि भारतीय राज्य ऐसे आदमखोर दैत्य में बदल चुका है जो अपने ही नागरिकों का आखेट बर्बर, अमानुषिक और पाशविक तरीकों से करने में यकीन रखता है। लालगढ़ में सुरक्षा बलों के हमले का एक साल पूरा होने का उत्सव माओवादियों को मुठभेड़ में मारकर मनाया गया। यह सिर्फ संयोग नहीं है कि निकाय चुनावों में हार के बाद पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार माओवादियों के खिलाफ ज्यादा आक्रामक नजर आ रही है। यह उसकी खिसियाहट भी हो सकती है और विधानसभा चुनाव से पहले माओवादियों से सहानुभूति रखने वाले जनसंगठनों के सफाये की रणनीति भी। सीपीएम भली भांति जानती है कि अकेले ममता उसे नही हरा सकती। लेकिन ममता और अति वामपंथियों का गठजोड़ उसके लिए मारक साबित हो सकता है। क्योंकि अति वामपंथियों की उपस्थति के चलते उसके प्रगतिशील मुखौटे के पीछे छिपा गरीब विरोधी हिंस्त्र चेहरा दिखाई देता है और कम्युनिस्ट होने का जो तिलिस्म उसने इतने सालों से तैयार किया है वह बिखरने लगता है।इसलिए माकपा यदि माओवादियों और उनसे सहानुभूति रखने वालों को निपटाने की हड़बड़ी में दिखाई दे रही है तो यह उसकी चुनावी मजबूरी भी है और आत्मरक्षा की आखिरी कोशिश भी।मगर लालगढ़ की जो तस्वीरें अखबारों में दिखी हैं वे बर्बरता की हद हैं। लकड़ी के डंडे पर हाथ-पैर बांधकर मरे हुए पशुओं की तरह मुठभेड़ में मारे गए माओवादियों को ढ़ोये जाने की इस घटना से जाहिर है कि भारतीय सुरक्षा बल माओवादियों के मृत देहों से भी प्रतिशोध ले रहे हैं।मृत शरीरों कंे साथ इस तरह के दुर्व्यवहार के जरिये पश्चिम बंगाल और केंद्रीय सुरक्षा बल यदि यह संदेश देंना चाहते हैं कि माओवादी और उनसे सहानुभूति रखने वालों की लाशों की भी दुर्गति की जाएगी, तो यह दुर्भाग्यपूर्ण से ज्यादा एक पाशविक कृत्य है और जेनेवा कन्वेंशन के तहत युद्ध अपराध है। भारत ही नहीं पूरी दुनिया में परंपरा रही है कि मारे जाने के बाद शत्रु के शव के साथ गरिमा और सम्मानपूर्ण व्यवहार किया जाता है।सभ्य समाज सदियों से इस आचरण संहिता का पालन करते रहे हैं। यदि आदिम काल के बर्बर दौर को छोड़ दे तो इतिहास में मंगोलों समेत बहुत कम बर्बरतापूर्ण हमले ही मिलते हैं जब शत्रुओं के शवों के साथ बर्बर व्यवहार किया गया हो। मृत देहों को अपमानित करना विजयी शासकों और समाजों का सामान्य व्यवहार नहीं रहा। जाहिर है कि माओवादियों के शवों के साथ दुव्यवहार कर भारतीय राज्य ने इतना तो साबित कर ही दिया है कि माओवादियों के खिलाफ बदले की भावना से ग्रस्त होकर वह बर्बरता के मामले में मध्ययुग के मंगोल आक्रमणकारियों की याद दिला रहा है।आश्चर्य है कि एक लोकतांत्रिक देश के सुरक्षाबलों द्वारा शवों के साथ किए गए इस दुर्व्यवहार पर खबरिया चैनल धृतराष्ट्र बने हुए हैं।दंतेवाड़ा हमले पर माओवादियों के खिलाफ गला फाड़कर चिल्लाने वाले प्रतापी एंकर, विद्वान संपादक और उत्तेजना में कांपते रिपोर्टर सब खामोश हैं। कोई यह कहने कहने को तैयार नहीं है कि भारतीय राज्य और उसके सुरक्षा बलों का आचरण असभ्यता पूर्ण और बर्बर है। इनमें से कोई भी नहीं कहता कि यह युद्ध अपराध की तरह गंभीर अपराध है जिसके लिए जिम्मेदार लोगों को दंडित किया जाना चाहिए। कम से कम भारतीय राज्य से मध्ययुग के सभ्य राज्य की तरह बर्ताव करने की उम्मीद तो की जा सकती है।यदि वह अपने शत्रुओं के साथ तीसरी सदी के सिकंदर की तरह उदार बर्ताव नहीं कर सकता तो उनके शवों के साथ तो गरिमा के साथ पेश तो आ ही सकता है। हम भारतीय राज्य से नागरिक अधिकारों और मानवाधिकारों की रक्षा का सवाल नहीं उठा रहे हैं क्योंकि भारतीय राज्य और उसके समांतर खड़े माओवादियों के बीच चल रहे इस युद्ध में नागरिक अधिकार भले ही स्थगित कर दिए गए हों।इसलिए मुठभेड़ों के औचित्य पर कोई सवाल न उठाते हुए बस इतनी अपील तो की जा सकती है कि भारतीय राज्य बर्बर समाजों की तरह माओवादियों के शवों के साथ पेश न आए।

बुधवार, 9 जून 2010

भोपाल के बूचड़खाने में सब नंगे हैं

कहते हैं कि ईश्वर के घर में देर है पर अंधेर नहीं। पर भारतीय अदालतों के बारे में ऐसा कतई नहीं कहा जा सकता। देर और अंधेर उनकी बुनियादी और इनबिल्ट विशेषतायें हैं या कह सकते हैं कि मैैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट हैं। वे फैसले करने में अन्याय की हद तक देर लगाती हैं और उस पर तुर्रा यह कि उनके अधिकांश फैसले से अंधेर जैसे निराश कर देने वाले लगते हैं। बाजार की सेल्स प्रमोशन स्कीमों की तरह न्याय चाहने वाले लोगो को एक आफत के साथ दूसरी आफत मुफ्त में मिलती है। हालांकि साख बचाए रखने लायक अपवाद वहां भी होते हैं । हर व्यवस्था की तरह यह उसकी जरुरत भी है या कहें कि मजबूरी भी। भोपाल गैस त्रासदी पर जब अदालत का फैसला आया तो मीडिया में मची चीख पुकार के बावजूद अदालत ने वही किया जो उसकी बड़ी बहनें अब तक करती आई हैं। वर्ना इतने बड़ी तादाद में हुए नरसंहार और लाखों लोगों को यातनाओं के नरक में धकेलने वाले इस कारपोरेट अपराध पर 25 साल बाद फैसला सुनाना तो मूल अपराध से भी बड़ा अपराध है।इससे पहले 1989 और 1996 में सुप्रीम कोर्ट भी गैस पीड़ितों के खिलाफ अपना फैसला सुना चुका है। इसलिए इस फैसले को ‘‘देर और अंधेर’’ के रुप में याद रखा जाना चाहिए। भोपाल गैस कांड भारतीयों को गिरमिटियों के रुप में बेचे जाने के बाद पहला मौका था जब विश्व बाजार में भारतीयों को इतनी कम कीमत पर बेचा गया।यदि मृतकों की जान की औसत कीमत और विकलांग हुए जिंदा लोगों के न्यूनतम गुजर बसर की लागत,जिसमें दवाईयों पर होने वाला न्यूनतम खर्च भी शामिल है, को मुआवजे का आधार माना जाय, इस कंजूस आकलन पर भी गैस पीड़ितों को 1737 अरब रुपए बतौर मुआवजा मिलना चाहिए था। मुआवजे के इस आकलन में पीड़ितों का औसत जीवन काल 25 साल माना गया है। यदि हर्जाने के तौर पर इसका आकलन किया जाय तो मुआवजे की राशि कई सौ खरब में पहुंच जाएगी।यदि भारतीयों की औसत उम्र पर हर्जाने की गणना की जाय तो यह कई गुना अधिक होगी। यदि अमेरिका या पश्चिमी देशों में ऐसा नरसंहार हुआ होता तो दोषियों को सजा के साथ इतना हर्जाना देना पड़ता कि उससे यूनियन कार्बाइड दिवालिया हो गई होती। मगर भारतीय न्यायपालिका ने ऐसा न पहली बार किया है और न आखिरी बार।इसे दुर्लभतमों में से दुर्लभ खराब फैसला भी नहीं कहा जा सकता। भारतीय राज्य और कारपोरेट घरानों के पक्ष और आम लोगों के विपक्ष में ऐसे फैसले आते रहते हैं। सिर्फ इतना हुआ है कि उदारीकरण के बाद न्यायपालिका ने उस लबादे को भी उतार फेंका है जो उसकी मिथकीय निष्पक्षता का आभामंडल बनाता था।उदारीकरण के बाद आए अनगिनत फैसलों के जरिये न्यायपालिका ने पहले ही यह साफ कर दिया है कि उसका भी अपना एक खास वर्ग और पक्ष है जो अक्सर पीड़ितों के खिलाफ दिखाई देता है।अलबत्ता अदालतें कभी-कभार ऐसे फैसले भी करती हैं जो लोगों को ढ़ाढ़स बंधाते दिखते हैं। ऐसे फैसलों से लगता है कि देश की न्यायव्यवस्था का सूरज आखिरी तौर पर अभी डूबा नहीं है।चमत्कृत कर देने वाले ग्रीक, रोमन उद्धरणों, अंग्रेजी के खूबसूरत शब्दों में गंुथे प्रभावोत्पादक भाषा वाले ये फैसले जजों की विद्वता पर भरोसा बंधाते हैं। न्यायिक इतिहास में रुचि रखने वाले लोग इन्हे नक्काशीदार फ्रेमों में जड़कर रख सकते हैं। ऐसे फैसले सूक्तियों की तरह याद रखे जाते हैं। देर और अंधेर के अंधेरों के बीच पेंसिल टॉर्च की तरह टिमटिमाने इन फैसलों की रोशनी आम लोगों को निराश नहीं होने देती।पर बावजूद इसके ये फैसले लोगों की रोजमर्रा के जीवन में राज्य और प्रभावशाली लोगों के द्वारा किए जा रहे अन्याय को कम नहीं कर पाते और न ही वे अन्याय और दमन की मशीनरी को भयभीत कर पाने में समर्थ होते हैं। नवें दशक तक जनांदोलन और न्यायपालिका मिलकर जन असंतोष के दबाव को कम करने के लिए सेफ्टी वाल्व का काम करते थे। दोनो मिलकर लोकतंत्र में लोगों का भरोसा कायम रखते थे। बीसवीं सदी के आखिरी दशक में जब उदारीकरण का दौर आया तो अदालतें पूरी तरह से उदारीकरण की चपेट में आ गईं। देश के हाईकोर्टों और सुप्रीम कोर्ट के द्वारा 1991 और उसके बाद किए गए फसलों की समीक्षा करें तो यह साफ नजर आ जाता है कि इस दौर में अदालतों के अधिकांश दूरगामी फैसले मजदूरों, किसानों, विस्थापितों, कर्मचारियों जैसे सामान्य वर्ग के लोगों के खिलाफ गए हैं। इसी दौर में न्यायपालिका ने हड़तालों,जुलूसों और सभाओं पर पाबंदी लगाने जैसे फैसले किए जो दरअसल अराजनीतिक उच्च वर्ग और उच्च मध्यवर्ग को खुश करने के लिए गए जैसे महसूस किए गए। हजारों लाखों लोगों की भागीदारी वाले टिहरी बांध से लेकर नर्मदा बांध विरोधी आंदोलनों को अदालती फैसलों ने एक झटके में ही धूल चटा दी।इन अहिंसक आंदोलनो को सजा ए मौत का फैसला अदालतों ने ही सुनाया। इसी दौर में सबसे ज्यादा फैसले भी कारपोरेट कंपनियों के पक्ष में हुए। चाहे वे हड़तालों और सेवा संबधी मामलों के रहे हों या फिर कारपोरेट घरानों से जुड़े अन्य हितों के। कारपोरेटी समूहगान में विधायिका, कार्यपालिका के साथ न्यायपालिका के भी खड़े होने का ही परिणाम था कि उदारीकरण के बाद देश में औद्योगिक मजदूरों की हालत बद से बदतर हो गई। आउट सोर्सिंग के चोर दरवाजे के चलते निजी क्षेत्र में बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में मजदूर आंदोलनों से हासिल हुई अधिकांश सुविधायंे खत्म कर दी गई हैं। उदारीकरण के दौर में एक ओर जहां लोगों के संकट बढ़ते रहे वहीं न्यायपालिका सामान्य लोगों के बुनियादी सवालों के प्रति अनुदार होती गई।हालांकि राजनेताओं और कुछ हाई प्रोफाइल लोगों के खिलाफ फैसले सुनाकर उसने मीडिया से तालियां भी बटोरी और यह आभास कराने की कोशिश भी की कि सरकारी तंत्र के लिए उसके पास काटने वाले दांत भी हैं।पर यह सब वाहवाही लूटने से आगे का खेल नहीं था।ऐसा उदाहरण खोजना मुश्किल है जब कोई कोर्ट हस्तक्षेप कर किसी जनाधिकारों के पक्ष में आगे आया हो।छत्तीसगढ़ से लेकर उड़ीसा तक अहिंसक आंदोलन सरकारों के दमन के आगे असहाय और पराजित होते रहे पर अदालतें लोगों के जीने के अधिकार की गारंटी नहीं कर पाईं। आदिवासियों को खदेड़ने पर तुले कारपोरेट राक्षसों पर देश की अदालतें चुप हैं। जाहिरा तौर पर यह जनअसंतोष को सुरक्षित रास्ता देने की पुरानी लोकतांत्रिक रणनीति में बदलाव का संकेत है। भारतीय शासन व्यवस्था में आंदोलनों और जनअसंतोष के प्रति बढ़ रही इस अनुदारता की काली छाया न्यायपालिका पर भी दिख रही है। उदारीकरण के आगमन के बाद से यदि भारतीय जनजीवन में हिंसा बढ़ी है तो इसका कारण भी यही है कि लोकतंत्र के चारों पाए अब घोषित रुप से कारपोट लोकतंत्र के पक्ष में हैं।न्यायपालिका पर अनास्था रखने वाले समूह बढ़ रहे हैं। यह आखिरी किला था जो भारतीय लोकतंत्र की वर्गीय पक्षधरता को संतुलित करता था। इसकी वर्गीय पक्षधरता भी उजागर होने के बाद किस मुंह से भारतीय राज्य खुद के लोकतंत्र होने का दावा कर सकेगा? भोपाल गैस कांड यह सवाल भी देश के लोकतंत्र से पूछ रहा है।पांच लाख से ज्यादा लोगों से उनके स्वाभाविक रुप से जीने का प्राकृतिक और संवैधानिक अधिकार छीनने के दोषी लोगों में से एक के खिलाफ भी कोई कार्रवाई न हो ऐसा अंधेर तो इसी देश में संभव है। भोपाल के इस कारपोरेट बूचड़खाने में भारतीय कारपोरेट कंपनियां, कार्यपालिका,विधायिका और न्यायपालिका सब के सब नंगे खड़े हैं। एंेसे में भोपाल गैस कांड के पीड़ितों को न्याय के लिए शायद अगले जन्म का इंतजार करना होगा। क्या इस न्यायिक अंधेर पर किसी को कभी शर्म आएगी?

मंगलवार, 25 मई 2010

कुंभ के बहाने संतों का सच


कुंभ के बहाने संतों का सच कुंभ और उसके बाद यह सवाल लगातार उठ रहा है कि जिन्हे भारतीय समाज सन्यासी,साधु और संत जैसे सम्मानपूर्ण पदवियों से नवाजता रहा है वे लोग क्या वाकई इन विशेषणों के योग्य हैं भी कि नहीं ।कहीं वे गृहस्थ जीवन की कठिनाईयों या दुखों से भागने वाले कुंठित और अतृप्त लोग तो नहीं हैं ? भारतीय जीवन दर्शन में सन्यासी होने का तात्पर्य गृहस्थ जीवन के भगोड़ों से नहीं है।जिंदगी की मुश्किलों से डरे, घबराए और भागे हुए लोग वीतरागी नहीं हो सकते। असफल गृहस्थ सन्यासी नहीं हो सकता क्योंकि सन्यास पलायन नहीं है बल्कि जीवन की निस्सारता से एक व्यक्ति का व्यक्तिगत साक्षात्कार है। वैराग्य के इस दर्शन से असहमति या सहमति हो सकती है पर सन्यास अहंकारी, अतृप्त, असंतुष्ट और कुंठित लोगों का सम्प्रदाय तो कतई नहीं है । यह अपने प्रियजनों से नाराज या घर से भागे हुए लोगों की छुपने की जगह भी नहीं है । यह परजीवियों के धार्मिक दुर्ग या मठ भी नहीं है। यह धर्म की सतह के नीचे बदबू मार रहे ऐयाशी के अंधेरे तहखाने नहीं है। सिद्धार्थ का बुद्ध हो जाना ही सन्यास है।लेकिन सन्यासी बुद्ध ने न आश्रम बनाया, मठ भी नहीं बनाया। स्वामी विवेकानंद ने सन्यासी जीवन को ‘ करतल भिक्षा,तरुतल वास’ में देखा । अपरिग्रह यानी कि कुछ भी संचित न करना सन्यास की पहली शर्त है। सत्कर्म के अलावा कुछ भी संचय करना सन्यासी के लिए वर्जित है। सांसारिक सुखों का निषेध उसकी आचार संहिता का सबसे जरुरी हिस्सा है । सूरदास ने कहा ,‘संत का सीकरी से क्या लेना-देना ?’ जो सत्ता से दूर अपनी फक्कड़ी में मस्त है वही सन्यासी है। इसीलिए कबीर कहते हैं,‘ माया महाठगिनी हम जानी।’ आज सन्यासियों की नई प्रजाति से हमारा सामना हो रहा है। यह एक तरह से परजीवियों की जमात है जो लोगों को भोगविलास से दूर रहने की नसीहत देती है और खुद भोगों में मस्त है। ऐसे बिरले ही मठ और आश्रम होंगे जिन्होने सरकारी या समाज की जमीन पर अतिक्रमण न किया हो। अधिकांश मठों और आश्रमों के खिलाफ पुलिस में मामले दर्ज हैं। कईयों पर तो हिस्ट्रीशीटरों की तरह दर्जनों मुकदमे चल रहे हैं। जिस धर्म को ऐसे लोग संचालित कर रहे हों उसे दुश्मन की जरुरत ही क्या है? कुंभ के दौरान खुद को संत घोषित करने वाले ये लोग सरकार को तिगनी का नाच नचाते रहे। मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाने वाली भाजपा की सरकार रोज अखाड़ों के साधु - सन्यासी के सामने घुटने टेकती रही। हर सप्ताह कोई न कोई अखाड़ा सरकार को घुड़कियां देता रहा। कुंभ पर स्नान जिस तरह से अखाड़ों और शंकराचार्यों ने अपना विशेषाधिकार बना लिया है उससे यह सवाल उठ खड़ा है कि क्या कुंभ अखाड़ों और शंकराचार्यों के लिए आयोजित किए जाने वाला जमावड़ा है या फिर यह भारत के आम लोगों का मेला है ? कुंभ यदि इतना बड़ा सांस्कृतिक समागम बन सका है तो इसके पीछे सदियों से उस गरीब और साधनहीन भारतीय की आस्था रही है पर मठों और महंतों के संगठित व ताकतवर तंत्र ने कुंभ को हथिया लिया है। इतिहास गवाह है कि मध्यकाल से पहले कुंभ स्नान में सन्यासियों को वरीयता दिये जाने की कोई व्यवस्था नहीं थी। तब यह आम लोगों का मेला था। महान चीनी यात्री ह्वेन सांग और फाहियान के यात्रा विवरणों में साधुओं या सन्यासियों को कुंभ में प्राथमिकता दिए जाने का कहीं भी उल्लेख नहीं है। मध्यकाल में कुंभ स्नान को लेकर अखाड़ों के अहंकार आपस में टकराने लगे थे। सन्यासियों के इस दंभ और अहंकारों के चलते कई बार कुंभ की पवित्र धरती खून से लाल हुई । हजारों लोग इन अहंकारी साधुओं के टकराव में मारे गए। अखाड़ों के महंतों और महामंडलेश्वरों के अहं की तुष्टि और हिंसक टकरावों को टालने के लिए अंग्रेजों ने शाही स्नान की परंपरा डाली। आजाद भारत में ऐसी परंपरा कोई स्थान नहीं होना चाहिए। सन्यासियों को आम आदमी की तरह आम लोगों के साथ क्यों नहीं नहाना चाहिए? जिनके भीतर इतना अहंकार, द्वेष, क्रोध, और आडंबर है क्या वे साधु हैं? कुंभ यदि आज हिंदुओं की आस्था का प्रतीक है तो इसके पीछे उस आम किंतु गरीब हिंदू की धार्मिकता है जो रेलों, बसों में धक्के खाते हुए गंगा स्नान करने आता है । गांधी का यह दरिद्रनारायण कभी -कभी तो कर्ज लेकर भी कुंभ आता है। वे करोड़ों लोग जो अपने जीवन की मुश्किलों के बावजूद गंगास्नान करने चले आते हैं वे सन्यासियों के अखाड़ों और शंकराचार्यों के लिए नहीं आते। इस कुंभ में कई बार लगा कि जैसे सरकार को अखाड़े, विश्व हिंदू परिषद और शंकराचार्य ही चला रहे हों। सन्यासियों के ये समूह सरकार को अपनी शर्तें डिक्टेट करते रहे परंतु वे करोड़ों लोग, जिनके लिए धर्म न धंधा है और न आजीविका का साधन, उनकी असुविधाओं के बारे में सरकार ने शायद ही चिंता की हो। इन सच्चे तीर्थयात्रियों को मुफ्त में न सही पर कम कीमत पर हरिद्वार में रहने की जगह या सस्ता खाना मिल सके, इस पर सरकार, साधु और धर्म के ठेकेदार चुप रहे। धर्मशालाओं के किराये होटलों को मात करने लगे। दिल्ली के पत्रकार मित्र ने बताया कि हर की पैड़ी में एक नामी मंहत के आश्रम के एक कमरे का किराया पंचतारा होटल के बराबर था। इन आश्रमों और धर्मशालाओं की ऑन लाइन बुकिंग एक होटल की वेबसाइट के जरिये हो रही थी। इनके लिए लोकल स्तर पर ग्राहक भी होटल वाले ही भेज रहे थे।कुंभ आते ही हरिद्वार में धर्मशालाओं और होटलों के किराये दस गुने से ज्यादा बढ़ गए। होटलों को सरकार ने लूट का ग्रीन सिग्नल दे दिया था। देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाली धर्मपरायण जनता के लिए किसी का दिल नहीं पसीजा, न साधुओं का, न हिंदू धर्म के महामंडलेश्वरों का, न शंकराचार्यों का और न विहिप का। उत्तराखंड सरकार की यह कैसी आतिथ्य परंपरा है जो अतिथियों की जेब पर डाका डालने की छूट देती है। यह किस तरह का धर्म है जो आश्रमों और धर्मशालाओं को होटलों में बदल देता है। हद तो यह है कि एक अखाड़े ने हरिद्वार में कुंभ का लाभ उठाते हुए सरकारी जमीन पर ही कई मंदिर बना दिए और धर्म के नाम पर लोकल प्रशासन को ही आंखे दिखानी शुरु कर दी। कुंभ का यह सच उनका है धर्म के नाम पर समाज से सिर्फ लेना जानते हैं। एक सच सरकारी तंत्र का भी है जिसने 700 करोड़ रुपए की दीवाली मनाई और अब मूंछों पर ताव देते हुए अपनी पीठ खुद ही ठोंक रहा है पर उसकी कारगुजारियों खुलासा फिर कभी।

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

युद्ध है या गृहयुद्ध ?

दंतेवाड़ा में मारे गए सीआरपीएफ के जवानों के परिजनों का विलाप किसी भी आदमी के लिए एक विचलित करने वाला अनुभव है । कोई भी मौत हर उस आदमी की संवेदनशीलता को झकझोरती है जो मानता है कि हर परिजन को अपनों का न रहना एक ही तरह से दुख देता है। आदमी बुरा हो सकता है, उसके मकसद हमसे जुदा हो सकते हैं लेकिन उसके परिजनों के दुख उतने ही असली और विचलित करने वाले हो सकते हैं जितने कि उनके जिनके पक्ष में हम होते हैं । इसीलिए महान सैनिक और युद्धों के नायक अपने खिलाफ बहादुरी से लड़ने वालों को सलाम करते हैं।इसी भावना से मृत दुश्मन से गरिमापूर्ण व्यवहार करने की युद्ध आचार संहिता भी निकली है । उत्तराखंड से लेकर असम तक माओवादियों के हमले में मारे गए सीआरपीएफ के जवानों के परिजनों के विलाप के दुख और शोक में डूबे दृश्यों ने पूरे देश को हिलाया है । इन जवान मौतों ने लाखों लोगों को विचलित किया है । टीवी चैनलों में देशभक्ति के ज्वार के बीच जिन दृश्यों को दिखाया गया है उससे केंद्र और राज्य सरकारों को आपरेशन ग्रीन हंट के लिए जो जनमत की जो हरी झंडी चाहिए थी वह मिल गई लगती है । इन दृश्यों से पैदा हुआ जनमत दोनों सरकारों को यह अधिकार देता है कि वे भी माओवादियों को उसी तरह मार डालें जिस तरह उन्होने सीआरपीएफ के जवानों को मारा है । टीवी चैनलों को इस बात का श्रेय दिया ही जाना चाहिए कि वे इस देश को ऐसी भीड़ में बदलने की कूव्वत रखते हैं जो खून के बदले खून मांगती हो। आदिवासी इलाकों को तबाही की कगार पर पहुंचाने वाले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह और केंद्रीय गृहमंत्री चिदंबरम को ऐसी ही भीड़ पसंद है और उन्हे ऐसी भीड़ की सर्वाधिक जरुरत भी है। आने वाले समय में हम राज्य और केंद्र के सुरक्षा बलों को माओवादियों का इसी तरह संहार करते हुए भी देखेंगे । हममें से जो भी इन मुठभेड़ों पर सवाल उठायेगा वह देशद्रोही करार दे दिया जाएगा । यानी न अदालत, न मुकदमा सीधे ऑन द स्पॉट सफाया !! लेकिन तब कोई न्यूज चैनल मुठभेड़ में मारे गए माओवादियों के बिलखते परिजनों के विचलित करने वाले विजुअल्स इसलिए नहीं दिखाएगा कि कहीं इससे उनके प्रति सहानुभूति पैदा न हो जाय । किसी चैनल ने यह खबर दिखाने का कष्ट नहीं किया कि दंतेवाड़ा कांड से पहले किस तरह से निर्दोष आदिवासियों को पकड़कर बुरी तरह पीटा गया और उनकी स्त्रियों को सरेआम अपमानित किया गया । पूछा जा सकता है कि खबरनवीस खबेसों की यह कैसी संवेदनशीलता है जो सिर्फ सरकारी पक्ष के लिए आरक्षित है ? इस रवैये के संदर्भ में जॉर्ज बुश का वह बहुचर्चित बयान याद करना उचित होगा जो उसने 9/11 के हमले के बाद दिया था । जबरदस्त गुस्से और गम से विचलित अमेरिकी समाज से वादा करते हुये तब बुश ने कहा था कि 9/11 के हमले के दोषियों चाहे वे कहीं भी क्यों न हों ,को न्याय की चौखट पर लाया जाएगा । गौर करें कि बुश ने यह नहीं कहा कि अमेरिकी फौजें दोषियों का सफाया कर देंगी । लोकतांत्रिक होने का अर्थ सिर्फ चुनाव जीतना नहीं होता बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की पवित्रता बनाए रखना भी होता है । दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहे जाने वाले देश का दुर्भाग्य यह है कि उसका गृहमंत्री कभी माओवादियों को न्याय की चौखट पर लाने का नहीं बल्कि हर तीसरे दिन उनका सफाया करने की धमकी देता है। जिस लोकतंत्र का गृहमंत्री ही कानून के राज और न्यायपालिका में यकीन न रखता हो वह लोकतंत्र भयभीत करता है। वह जनमत इसे और भी खतरनाक बना रहा है जिसे इस देश के न्यूज चैनल रोज तैयार कर रहे हैं । वे ‘‘खून के बदले खून’’ और ‘‘जान के बदले जान’’ का उन्मादी जनमत बनाने में जुटे हैं।जाने अनजाने में वे लोकतंत्र के भीतर एक जुनूनी फासीवाद के लिए रास्ता साफ कर रहे हैं।मानवाधिकारों की रक्षा के मामले में दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में फिसड्डी देश के शासकों को ऐसे ही उन्मादी जनमत की जरुरत है जो मानवाधिकारों से छूट देकर उन्हे आदिवासी इलाकों में मुठभेड़ों के निर्द्वंद अधिकार को वैधता प्रदान करता हो। कानून के दायरे बाहर जाकर सफाया करने के चिदंबरम के माओवादी विरोधी सिद्धांत और मोदी के मुस्लिम विरोधी सिद्धांत में कोई बुनियादी फर्क नहीं है । क्योंकि दोनों ही अपने विरोधी समूह के सफाये में यकीन रखते हैं । इस पूरे वाकये को जिस तरह से माओवादी बनाम देश की लड़ाई के रुप में पेश किया जा रहा है वह क्या सच है या सरकारी लड़ाई को देश की लड़ाई बनाने का खेल खेला जा रहा है ? क्या वाकई यह देश की लड़ाई है?उत्तराखंड आंदोलन के दौरान मसूरी गोलीकांड में एक पुलिस अफसर मारा गया था और कई आंदोलनकारी भी मारे गए थे । सरकार के लिए उसका अफसर शहीद था पर आम लोगों के लिए उत्तराखंड के लिए मर मिटने वाले लोग शहीद थे ।आज इन्हे उत्तराखंड की सरकार भी शहीद मानती है । तब सरकार की ओर से गोलीबारी कराने वाले बुआ सिंह और ए0पी0 सिंह आज भी उत्तराखंड की जनता के बीच सबसे बड़े खलनायक हैं । ऐसा अनेक आंदोलनों में होता है जब जनता के नायक सरकार के लिए अपराधी होते हैं लेकिन इतिहास में जिंदा तो जनता के नायक ही रहते हैं सरकार के नायक नहीं । देश के भीतर जब भी संघर्ष होंगे तब शहादतों पर भी राय बंटी रहेगी । जाहिर है कि बाहरी दुश्मनों का हमला और देश के भीतर सरकारी नीतियों के खिलाफ होने वाले संघर्ष अलग - अलग घटनायें हैं । जिसे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री देश की लड़ाई का नाम दे रहे हैं वह दरअसल दो अलग-अलग व्यवस्थाओं में यकीन रखने वाले समूहों के बीच का गृहयुद्ध है। क्योंकि माओवादी सरकार के खिलाफ हैं न कि देश की अखंडता के । अलबत्ता इतना जरुर कहा जा सकता है कि वे मौजूदा तंत्र का तख्तापलट कर अपनी विचारधारा पर आधारित तंत्र कायम करना चाहते हैं। इस लड़ाई की त्रासदी यह है कि इसमें दोनों ओर से साधारण लोगों के बेटे ही मारे जा रहे हैं । इस युद्ध का ऐलान करने वाले नेताओं और अफसरों को खरोंच तक नहीं आ रही है।देश के मात्र आदिवासी हिस्सों तक सिमटे माओवादियों से वास्तविक खतरा कितना असली है यह तो पता नहीं पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि देश की 85 से 90 फीसदी जनता इसकी चपेट में नहीं है।फिर इतना हल्ला और युद्ध का शोर मचाये जाने पर शक होता है कि कहीं इसके पीछे और कारण तो नहीं हैं? वह भी तब जब इस आदिवासी बहुल इलाके की खनिज संपदा के दोहन के लिए 200 से ज्यादा एमओयू साइन किए जा चुके हैं। इससे सवाल उठता है कि कहीं केंद्रीय और राज्यों के सुरक्षा बलों को पास्को सहित बहुराष्ट्रीय कंपनियों और मित्तलों और जिंदलों के लिए रास्ता साफ करने के लिए तो युद्ध में नहीं झोंका जा रहा है ? जिसे देश की लड़ाई बताया जा रहा है वह कहीं इन खरबपतियों की लड़ाई तो नहीं है ? देश की राजनीति और राजनेताओं का जो चरित्र है उसे देखते हुए यह आशंका निराधार नहीं है । वर्ना सरकार आदिवासी इलाकों में किए गए खनन के एमओयू रद्द कर राजनीतिक हल की कोशिश कर सकती थी । छत्तीसगढ़ की राज्य सरकार और केंद्र सरकार दोनों ही नहीं चाहती कि इस इलाके में कोई लोकतांत्रिक आंदोलन जिंदा रहे इसलिए उसने सभी आंदोलनों और संस्थाओं को माओवादियों के साथ सहानुभूति रखने वाला करार देकर वहां लोकतांत्रिक प्रतिरोध का स्पेस खत्म कर दिया गया।हिंसक आंदोलनों से निपटने में पुलिस और सरकारों को दमन का लाइसेंस मिल जाता है इसलिए एक रणनीति के तहत यह सब किया गया । यह रणनीति माओवादियों को भी रास आती है । इससे आम तौर पर हिंसा से दूर रहने वाले लोगों के पास भी हथियार उठाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता । इस तरह की सीधी लड़ाई से माओवादियों को नया कैडर मिल जाता है । हिंसक संघर्ष दोनों ही पक्षों की जरुरत है न कि देश की । एक ओर प्रधानमंत्री और गृहमंत्री माओवादियों को सरकार का सबसे बड़ा खतरा बता रहे हैं तो दूसरी ओर भाजपा नेता अरुण जेटली भी उनके सुर में सुर मिलाकर इसे संसदीय लोकतंत्र के लिए घातक करार दे रहे हैं । अचरज यह है कि देश को बाजार अर्थव्यवस्था के अंधेरे कुयें में धकेलने वाले मनमोहन,चिदंबरम की जोड़ी गरीबी, बेरोजगारी और महंगाई को देश के लिए खतरा नहीं मानती उनकी तरफदारी कर रहे जेटली को लोकसभा में मौजूद तीन सौ करोड़पति सांसदों और कई हजार करोड़ के चुनाव खर्चे से संसदीय लोकतंत्र को कोई खतरा नजर नहीं आता । जिस देश में 76 फीसदी लोग 20 रु0 रोज पर गुजारा कर रहे हों वहां यदि कुछ लोग हथियार उठाकर बदलाव करना चाहते हैं तो किसका दोष है? सरकार का या भूखे लोगों का ? वह भी तब जब महंगाई जैसे ज्वलंत सवाल पर देश के राजनीतिक दल आंदोलन की औपचारिकता निभा रहे हों ।भाजपा से लेकर सीपीएम तक इस देश के नेता होने का दावा करने वालों से पूछा जाना चाहिए कि उनमें गरीबी,बेरोजगारी और महंगाई के !सवाल पर देश की जेलें भर देने का साहस क्यों नहीं है ? इतिहास गवाह है कि जब -जब समाज से लोकतांत्रिक संघर्ष गायब हुए हैं तब -तब आम लोग हिंसक संघर्षों की ओर आकृष्ट हुए हैं । मौजूदा दौर भी उसी ओर जा रहा है । समाज में राजनेताओं की साख बनाए रखने व लोकतांत्रिक संघर्षों के लिए स्पेस बचाए रखने का काम पुलिस और फौज नहीं कर सकती । राजनीतिक नालायकी और निकम्मेपन से उपजे जन असंतोष का फौजी हल संभव नहीं है ।