हाल ही में यूएनडीपी के आंकड़े आए हैं जिनसे पता चलता है कि भारत के ग्लोबल आर्थिक महाशक्ति बनने का जो तिलिस्म भारत सरकार, राजनेता और मीडिया बना रहा था वह सफेद झूठ के सिवा कुछ नहीं है। वह भी ऐसा झूठ जिसके पैर भारत की जमीन के बजाय अमेरिका में हैं। यूएनडीपी की रिपोर्ट हमें यह गर्व करने का दुर्लभ मौका देती है कि आजादी के 63 सालों में गरीबी और भुखमरी के मोर्चे पर हमसे आगे सिर्फ अफ्रीकी देश हैं। जितनी निष्ठा, लगन और समर्पण के साथ देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गृहमंत्री चिदंबरम और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह काम कर रहे हैं उससे यह भरोसा मजबूत होता है कि अगले चार सालों में हम गरीबी के मोर्चे पर होंडुरास, हैती,चाड जैसे पिद््््दी देशों को पछाड़ने में कामयाब हो जायेंगे।
पिछले दिनों कई खबरें चर्चा में रही जिनमें मिलावटखोरी से लेकर महंगाई तक कई मुद्दे थे। देश में मिलावटखोरों के हौसले की तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होने प्रधानमंत्री को भी नहीं बख्शा। मिलावटखोरों को लगा होगा कि पीएम यूपी आ रहे हैं तो वे प्रदेश के सबसे बड़े जायके से रुबरु हुए बगैर कैसे जा सकते हैं। मिलावटखोरों की इस लोकतांत्रिक भावना का भी सम्मान किया जाना चाहिए कि वे मिलावट के मामले में आम आदमी और प्रधानमंत्री में भेदभाव नहींे करते। अब हर रोज मिलावट के एक से एक मामले सामने आ रहे हैं। यूपी के सकल घरेलू उत्पाद में मिलावट का कितना योगदान है,इस पर अर्थशास्त्रियों को शोध करना चाहिए। मिलावटखोरों की सत्ता जिस निर्विघ्नता से फल-फूल रही है उससे लगता ही नहीं कि इस देश में कोई सरकार है। ऐसा लगता है कि सरकार बाजार को मिलावटखोरों के हवाले कर भाग गई है। उधर अपराधों के मामले सरकार को नदारद हुए एक अर्सा हो गया है। अपराधों को लेकर जो थोड़ा बहुत पुलिसिया हलचल दिखाई देती है वह भी इसलिए कि आम आदमी को लगता रहे कि देश में पुलिस है और सरकार भी। ताकि आम आदमी डरा रहे और पुलिस पर अरबों रुपए के खर्च जस्टिफिकेशन होता रहे। इधर महंगाई के मामले में भी सरकार सीन से गायब हो गई है। इस बार वह बिना बताए गायब नहीं हुई बल्कि उसने ढ़ोल पीटकर बताया कि महंगाई बाजार और लोगों के बीच का मामला है इसलिए इसमें सरकार का क्या काम ? पेट्रोल, डीजल में भी सरकार ने मोर्चा अब अंतराष्ट्रीय बाजार के हवाले कर दिया है। अनाज की उपलब्धता से लेकर कीमतों तक का सारा काम सरकार ने वायदा बाजार को सौंप दिया है।अब यह उसकी मर्जी है कि कौन सा अनाज कब बाजार से गायब होगा और कब,किस भाव से बाजार मे कब आएगा । सरकार इस झंझट में नहीं पड़ेगी। अतिक्रमण से लेकर पानी, बिजली, सफाई, स्वास्थ्य और टैªिफक जैसी जरुरी व्यवस्थाओं से सरकार ने 90 के दशक में ही विदाई ले ली थी। यूएनडीपी की रिपोर्ट बता रही है कि गरीबी के मामले में भारत का मुकाबला अब सिर्फ अफ्रीकी देशों से है। 55 फीसदी आबादी गरीब है। यह उस देश का हाल है जिसके बारे में कहा जा रहा है कि वह विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है।हालांकि देश के न्यूज चैनल अरबपतियों और करोड़पतियों की बढ़ती तादाद के आंकड़े पेश कर आम लोगों को इस पर छाती फुलाने के लिए उकसाते नजर आते हैं।गरीबों की इस बढ़ती तादाद से यह भ्रम भी दूर हो गया है कि इस देश में गरीबों की रक्षा के लिए सरकार की जरुरत है। गरीबी के महासागर में मनरेगा के छुटपुट टापुओं को छोड़ दें तो आम आदमी के लिए सरकार की उपयोगिता सिफर है। सरकार की आखिरी जरुरत जिस न्याय के लिए पड़ती है उसका हाल सब जानते हैं कि वह पैसे और प्रभुत्व वाले वर्ग के लिए आरक्षित है।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब सरकार न रोजी, न रोटी, न कपड़ा, न मकान, न दवा, न इलाज ,न सुरक्षा और न्याय दे पा रही हो और तो और वह अपने नागरिकों के जीवन जीने के नैसर्गिक अधिकार की रक्षा करने में भी असमर्थ हो तो फिर नागरिकों के लिए उसकी जरुरत क्या है? नेताओं, अफसरों और सरकारी अमले पर खर्च होने वाले अरबों-खरबों रुपए का बोझ लोग क्यों उठायें? सरकार को बेवजह ढ़ोने का क्या तुक है ?जब निजी क्षेत्र ही सारी बीमारियों का इलाज है तो सरकार को भी क्यों न उसी निजी क्षेत्र के हवाले कर दिया जाय?इससे देश को भ्रष्ट और अयोग्य नेताओं के उस झुंड से छुटकारा मिलेगा जो हर चुनाव में झूठ और हराम के पैसों के बल पर विधानसभाओं और संसद में काबिज हो जाता है। बोनस के तौर पर लोगों को उन अफसरों और सरकारी तंत्र से भी निजात मिलेगी जिनकी लालफीताशाही से सारा देश त्रस्त है। क्योंकि भारत में सरकार अब जनकल्याण के लिए नहीं बल्कि सरकारी अमले के भरण पोषण और भ्रष्टाचार के लिए चलाई जारही है।
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