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मंगलवार, 24 मार्च 2009
ऐसे समय में शब्द संसद
हम ऐसे समय मे हैं जब शब्दों के लिए परंपरागत माध्यम माने जाने वाले समाचार माध्यम छोटे पड़ रहे हैं शब्दों का स्थान शोर ने ले लिया है। शब्दों की सबसे बड़ी संसद कहे जाने वाले समाचार माध्यमों में बाजार का शोर है तो लोकतंत्र का मक्का कहे जाने वाली संसद में शोर सबसे बड़ा तर्क है। शोर का सबसे बड़ा तर्क यही होता है कि वह हर अर्थवान आवाज पर भारी होती है। अब आप मुझसे शब्द संसद में यहां मुलाकात कर सकेंगे ताकि अर्थवान आवाजों को निगलने को आतुर शोर की सत्ता का हम अपनी तरह से परतिकार कर सकें। सन्नाटे का प्रतिवाद, शोर का प्रतिकार और बेजुबान का हथियार यही शब्द संसद का मतलब और मकसद है, यदि इसे हासिल कर पाए तो मैं समझूंगा कि यह प्रयास बेकार नहीं हुआ।
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जिस प्रयास में आपकी कलम चलेगी वो प्रयास बेकार कैसे जा सकता है भाई साहब, दर्द, ज़ुल्म, पीड़ा,अन्याय,शोषण,आन्दोलन, आदि-आदि कई मुद्दों को महससूस तो कई करते हैं लेकिन उन्हें अभिव्यक्त करते का हुनर आप जैसे कुछ ही लोगों को होता है क्योंकि संवेदनशील होना हर व्यक्ति के बस की बात कहाँ।
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