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शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

युद्ध है या गृहयुद्ध ?

दंतेवाड़ा में मारे गए सीआरपीएफ के जवानों के परिजनों का विलाप किसी भी आदमी के लिए एक विचलित करने वाला अनुभव है । कोई भी मौत हर उस आदमी की संवेदनशीलता को झकझोरती है जो मानता है कि हर परिजन को अपनों का न रहना एक ही तरह से दुख देता है। आदमी बुरा हो सकता है, उसके मकसद हमसे जुदा हो सकते हैं लेकिन उसके परिजनों के दुख उतने ही असली और विचलित करने वाले हो सकते हैं जितने कि उनके जिनके पक्ष में हम होते हैं । इसीलिए महान सैनिक और युद्धों के नायक अपने खिलाफ बहादुरी से लड़ने वालों को सलाम करते हैं।इसी भावना से मृत दुश्मन से गरिमापूर्ण व्यवहार करने की युद्ध आचार संहिता भी निकली है । उत्तराखंड से लेकर असम तक माओवादियों के हमले में मारे गए सीआरपीएफ के जवानों के परिजनों के विलाप के दुख और शोक में डूबे दृश्यों ने पूरे देश को हिलाया है । इन जवान मौतों ने लाखों लोगों को विचलित किया है । टीवी चैनलों में देशभक्ति के ज्वार के बीच जिन दृश्यों को दिखाया गया है उससे केंद्र और राज्य सरकारों को आपरेशन ग्रीन हंट के लिए जो जनमत की जो हरी झंडी चाहिए थी वह मिल गई लगती है । इन दृश्यों से पैदा हुआ जनमत दोनों सरकारों को यह अधिकार देता है कि वे भी माओवादियों को उसी तरह मार डालें जिस तरह उन्होने सीआरपीएफ के जवानों को मारा है । टीवी चैनलों को इस बात का श्रेय दिया ही जाना चाहिए कि वे इस देश को ऐसी भीड़ में बदलने की कूव्वत रखते हैं जो खून के बदले खून मांगती हो। आदिवासी इलाकों को तबाही की कगार पर पहुंचाने वाले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह और केंद्रीय गृहमंत्री चिदंबरम को ऐसी ही भीड़ पसंद है और उन्हे ऐसी भीड़ की सर्वाधिक जरुरत भी है। आने वाले समय में हम राज्य और केंद्र के सुरक्षा बलों को माओवादियों का इसी तरह संहार करते हुए भी देखेंगे । हममें से जो भी इन मुठभेड़ों पर सवाल उठायेगा वह देशद्रोही करार दे दिया जाएगा । यानी न अदालत, न मुकदमा सीधे ऑन द स्पॉट सफाया !! लेकिन तब कोई न्यूज चैनल मुठभेड़ में मारे गए माओवादियों के बिलखते परिजनों के विचलित करने वाले विजुअल्स इसलिए नहीं दिखाएगा कि कहीं इससे उनके प्रति सहानुभूति पैदा न हो जाय । किसी चैनल ने यह खबर दिखाने का कष्ट नहीं किया कि दंतेवाड़ा कांड से पहले किस तरह से निर्दोष आदिवासियों को पकड़कर बुरी तरह पीटा गया और उनकी स्त्रियों को सरेआम अपमानित किया गया । पूछा जा सकता है कि खबरनवीस खबेसों की यह कैसी संवेदनशीलता है जो सिर्फ सरकारी पक्ष के लिए आरक्षित है ? इस रवैये के संदर्भ में जॉर्ज बुश का वह बहुचर्चित बयान याद करना उचित होगा जो उसने 9/11 के हमले के बाद दिया था । जबरदस्त गुस्से और गम से विचलित अमेरिकी समाज से वादा करते हुये तब बुश ने कहा था कि 9/11 के हमले के दोषियों चाहे वे कहीं भी क्यों न हों ,को न्याय की चौखट पर लाया जाएगा । गौर करें कि बुश ने यह नहीं कहा कि अमेरिकी फौजें दोषियों का सफाया कर देंगी । लोकतांत्रिक होने का अर्थ सिर्फ चुनाव जीतना नहीं होता बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की पवित्रता बनाए रखना भी होता है । दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहे जाने वाले देश का दुर्भाग्य यह है कि उसका गृहमंत्री कभी माओवादियों को न्याय की चौखट पर लाने का नहीं बल्कि हर तीसरे दिन उनका सफाया करने की धमकी देता है। जिस लोकतंत्र का गृहमंत्री ही कानून के राज और न्यायपालिका में यकीन न रखता हो वह लोकतंत्र भयभीत करता है। वह जनमत इसे और भी खतरनाक बना रहा है जिसे इस देश के न्यूज चैनल रोज तैयार कर रहे हैं । वे ‘‘खून के बदले खून’’ और ‘‘जान के बदले जान’’ का उन्मादी जनमत बनाने में जुटे हैं।जाने अनजाने में वे लोकतंत्र के भीतर एक जुनूनी फासीवाद के लिए रास्ता साफ कर रहे हैं।मानवाधिकारों की रक्षा के मामले में दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में फिसड्डी देश के शासकों को ऐसे ही उन्मादी जनमत की जरुरत है जो मानवाधिकारों से छूट देकर उन्हे आदिवासी इलाकों में मुठभेड़ों के निर्द्वंद अधिकार को वैधता प्रदान करता हो। कानून के दायरे बाहर जाकर सफाया करने के चिदंबरम के माओवादी विरोधी सिद्धांत और मोदी के मुस्लिम विरोधी सिद्धांत में कोई बुनियादी फर्क नहीं है । क्योंकि दोनों ही अपने विरोधी समूह के सफाये में यकीन रखते हैं । इस पूरे वाकये को जिस तरह से माओवादी बनाम देश की लड़ाई के रुप में पेश किया जा रहा है वह क्या सच है या सरकारी लड़ाई को देश की लड़ाई बनाने का खेल खेला जा रहा है ? क्या वाकई यह देश की लड़ाई है?उत्तराखंड आंदोलन के दौरान मसूरी गोलीकांड में एक पुलिस अफसर मारा गया था और कई आंदोलनकारी भी मारे गए थे । सरकार के लिए उसका अफसर शहीद था पर आम लोगों के लिए उत्तराखंड के लिए मर मिटने वाले लोग शहीद थे ।आज इन्हे उत्तराखंड की सरकार भी शहीद मानती है । तब सरकार की ओर से गोलीबारी कराने वाले बुआ सिंह और ए0पी0 सिंह आज भी उत्तराखंड की जनता के बीच सबसे बड़े खलनायक हैं । ऐसा अनेक आंदोलनों में होता है जब जनता के नायक सरकार के लिए अपराधी होते हैं लेकिन इतिहास में जिंदा तो जनता के नायक ही रहते हैं सरकार के नायक नहीं । देश के भीतर जब भी संघर्ष होंगे तब शहादतों पर भी राय बंटी रहेगी । जाहिर है कि बाहरी दुश्मनों का हमला और देश के भीतर सरकारी नीतियों के खिलाफ होने वाले संघर्ष अलग - अलग घटनायें हैं । जिसे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री देश की लड़ाई का नाम दे रहे हैं वह दरअसल दो अलग-अलग व्यवस्थाओं में यकीन रखने वाले समूहों के बीच का गृहयुद्ध है। क्योंकि माओवादी सरकार के खिलाफ हैं न कि देश की अखंडता के । अलबत्ता इतना जरुर कहा जा सकता है कि वे मौजूदा तंत्र का तख्तापलट कर अपनी विचारधारा पर आधारित तंत्र कायम करना चाहते हैं। इस लड़ाई की त्रासदी यह है कि इसमें दोनों ओर से साधारण लोगों के बेटे ही मारे जा रहे हैं । इस युद्ध का ऐलान करने वाले नेताओं और अफसरों को खरोंच तक नहीं आ रही है।देश के मात्र आदिवासी हिस्सों तक सिमटे माओवादियों से वास्तविक खतरा कितना असली है यह तो पता नहीं पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि देश की 85 से 90 फीसदी जनता इसकी चपेट में नहीं है।फिर इतना हल्ला और युद्ध का शोर मचाये जाने पर शक होता है कि कहीं इसके पीछे और कारण तो नहीं हैं? वह भी तब जब इस आदिवासी बहुल इलाके की खनिज संपदा के दोहन के लिए 200 से ज्यादा एमओयू साइन किए जा चुके हैं। इससे सवाल उठता है कि कहीं केंद्रीय और राज्यों के सुरक्षा बलों को पास्को सहित बहुराष्ट्रीय कंपनियों और मित्तलों और जिंदलों के लिए रास्ता साफ करने के लिए तो युद्ध में नहीं झोंका जा रहा है ? जिसे देश की लड़ाई बताया जा रहा है वह कहीं इन खरबपतियों की लड़ाई तो नहीं है ? देश की राजनीति और राजनेताओं का जो चरित्र है उसे देखते हुए यह आशंका निराधार नहीं है । वर्ना सरकार आदिवासी इलाकों में किए गए खनन के एमओयू रद्द कर राजनीतिक हल की कोशिश कर सकती थी । छत्तीसगढ़ की राज्य सरकार और केंद्र सरकार दोनों ही नहीं चाहती कि इस इलाके में कोई लोकतांत्रिक आंदोलन जिंदा रहे इसलिए उसने सभी आंदोलनों और संस्थाओं को माओवादियों के साथ सहानुभूति रखने वाला करार देकर वहां लोकतांत्रिक प्रतिरोध का स्पेस खत्म कर दिया गया।हिंसक आंदोलनों से निपटने में पुलिस और सरकारों को दमन का लाइसेंस मिल जाता है इसलिए एक रणनीति के तहत यह सब किया गया । यह रणनीति माओवादियों को भी रास आती है । इससे आम तौर पर हिंसा से दूर रहने वाले लोगों के पास भी हथियार उठाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता । इस तरह की सीधी लड़ाई से माओवादियों को नया कैडर मिल जाता है । हिंसक संघर्ष दोनों ही पक्षों की जरुरत है न कि देश की । एक ओर प्रधानमंत्री और गृहमंत्री माओवादियों को सरकार का सबसे बड़ा खतरा बता रहे हैं तो दूसरी ओर भाजपा नेता अरुण जेटली भी उनके सुर में सुर मिलाकर इसे संसदीय लोकतंत्र के लिए घातक करार दे रहे हैं । अचरज यह है कि देश को बाजार अर्थव्यवस्था के अंधेरे कुयें में धकेलने वाले मनमोहन,चिदंबरम की जोड़ी गरीबी, बेरोजगारी और महंगाई को देश के लिए खतरा नहीं मानती उनकी तरफदारी कर रहे जेटली को लोकसभा में मौजूद तीन सौ करोड़पति सांसदों और कई हजार करोड़ के चुनाव खर्चे से संसदीय लोकतंत्र को कोई खतरा नजर नहीं आता । जिस देश में 76 फीसदी लोग 20 रु0 रोज पर गुजारा कर रहे हों वहां यदि कुछ लोग हथियार उठाकर बदलाव करना चाहते हैं तो किसका दोष है? सरकार का या भूखे लोगों का ? वह भी तब जब महंगाई जैसे ज्वलंत सवाल पर देश के राजनीतिक दल आंदोलन की औपचारिकता निभा रहे हों ।भाजपा से लेकर सीपीएम तक इस देश के नेता होने का दावा करने वालों से पूछा जाना चाहिए कि उनमें गरीबी,बेरोजगारी और महंगाई के !सवाल पर देश की जेलें भर देने का साहस क्यों नहीं है ? इतिहास गवाह है कि जब -जब समाज से लोकतांत्रिक संघर्ष गायब हुए हैं तब -तब आम लोग हिंसक संघर्षों की ओर आकृष्ट हुए हैं । मौजूदा दौर भी उसी ओर जा रहा है । समाज में राजनेताओं की साख बनाए रखने व लोकतांत्रिक संघर्षों के लिए स्पेस बचाए रखने का काम पुलिस और फौज नहीं कर सकती । राजनीतिक नालायकी और निकम्मेपन से उपजे जन असंतोष का फौजी हल संभव नहीं है ।

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

जगह अब भी मौजूद है

‘‘लोग सेलेब्रेटीज और पेज थ्री की हस्तियों की रंगीनियों और उनके भव्य जीवन के बारे में पढ़ना चाहते हैं ’’ इस ऐलान के साथ जब नवभारत टाईम्स ने अपना चोला बदला था तब हिंदी अखबारों में ऐसे मालिकों और संपादकों की कमी नहीं थी जिन्होने इस पर नाक - भौंे सिकोड़ी थी । एक दषक पहले अंग्रेजी अखबारों की तरह वह उदारीकरण और ग्लोबलाइजेषन के नषे में चूर था । पिछले दस वर्षों में अंतर इतना ही हुआ है कि नवभारत टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया के उसी रास्ते को भारतीय और खास तौर पर हिंदी पत्रकारिता का मुक्तिमार्ग मान लिया गया है । ‘‘महाजनो गतो येन सः पंथा ’’ के सूत्र वाक्य का पालन करते हुए पत्रकारिता उसी रास्ते पर चल पड़ी है । फर्क बस इतना है कि इस सूत्र वाक्य में वर्णित महाजन का अर्थ महान लोग हैं पर पत्रकारिता के मौजूदा पाणिनियों ने इस वाक्य का अर्थ सामंतकालीन महाजन का अनुसरण करना माना । बड़े जोर शोर से घोषणा कर दी गई कि गरीबी , बेरोजगारी ,भुखमरी जैसी खबरें लोगों के मुंह का जायका खराब करती हैं , इनसे खाते - पीते लोगों के आनंद में खलल पड़ता है , इसलिए ऐसी खबरों का कोई भविष्य नहीं है । खबरें ऐसी हों कि समाज के मोगेंबो खुष हो जांय । लेकिन हाल ही में आजादी के बाद के दौर की पत्रकारिता के एक नामचीन पत्रकार की जन्म शताब्दी के मौके पर बड़ी तादाद में जुटे लोगों ने बताया कि जनपक्ष में लिखी जाने वाली खबरों का बाजार भी है , भूख भी है और कद्रदान भी हैं ।आचार्य गोपेष्वर कोठियाल हिंदी की मुख्यभूमि के पत्रकार नहीं थे । वे उस हाषिये के पत्रकार थे जो भूगोल के आधार पर निर्मित किए गए हैं । भूगोल के बीहड़ में पड़े पहाड़ जैसी पिछड़ी जगह के पत्रकार जिसके बारे में हिंदी का मेनलैंड उतना ही जानता है जितना औसत अमेरिकी भारत के बारे में । उत्तराखंड भारत में ऐसी जगह है जिसका नक्षा तब खोजा जाता है जब कोई बस दुर्घटना या भूस्खलन जैसी आपदा घटती है । उत्तराखंड का भी अपना हाषिया है जो किसी भूगोल ने नहीं बल्कि लगभग 132 साल पुरानी राजषाही ने टिहरी और उत्तरकाषी के रुप में तैयार किया है । इसी अंधेरे हिस्से के एक बाषिंदे थे गोपेष्वर कोठियाल । आजादी के दौर में जब वह पत्रकारिता को अपना भविष्य के रुप में चुन रहे थे तब पत्रकारिता एक ऐसा रुखा - सूखा पेषा था जो कबीर की ‘‘ जो घर फंूकनो आपनो चलो हमारे साथ ’’ जैसे फक्कड़पन की याद दिलाता था । वह दौर जुनूनी पत्रकारिता और मिषनरी भावुकता समय था । देष और समाज को रास्ता दिखाने की बेचैनी में बंधकर लोग पत्रकारिता में आते थे और ऐसे समाज और शक्तियों के बीच पत्रकारिता के लोकतांत्रिक हथियार का उपयोग करते थे जो मिजाज में सांमती था । 17 वीं सदी के संस्कारों और सीमाओं में बंधे समाजों में पत्रकारिता करना खतरनाक और उल्टी गंगा बहाने जैसा दुश्कर काम रहा होगा । ऐसे समय में जब टिहरी में राजषाही की अंतिम दौर में थी और अपनी आसन्न मौत से घबराई यह राजषाही हर रोज बर्बरता के नए हथियार आजमा रही थी तब आचार्य गोपेष्वर कोठियाल पत्रकारिता में आए और इस राजषाही के खिलाफ कलम को हथियार की तरह इस्तेमाल करने के इरादे के साथ आए । वह चाहते तो बेहतर जीवन और भविष्य चुन सकते थे । मास्टर हो जाते और प्राध्यापकी करते हुए किताबें लिखते व पढ़ते - पढ़ाते आराम से जीवन गुजार देते । उस जमाने में जब पांचवीं पास लोग भी चिराग लेकर खोजने से नहीं मिलते थ तब वह काषी हिंदू विष्वविद्यालय से संस्कृत में आचार्य की डिग्री लेकर पहाड़ लौटे थे । उन्ही गोपेष्वर कोठियाल को जन्म शती के मौके पर याद करने के लिए देहरादून में हाल ही में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था । देहरादून का जिक्र आते ही एक ऐसा शहर जेहन में घूमता है जो फिरंगी साहबों से विरासत में मिले चिकनी - चुपड़ी लकड़ी के छोटे से रुल को हाथ में लिए अफसरी ठसक के साथ घूमते रिटायर्ड अफसरों का स्वर्ग माना जाता था । ये अफसर बुढ़ापा बिताने मसूरी की तलहटी में बसे इस शहर में आते । शहर की आबोहवा में मसूरी की ठंडक और मैदान की गर्मी दोनों का ऐसा नायाब मिश्रण था कि देसी अफसर आजादी से पहले और उसके बाद इस शहर के दीवाने रहे । यह सेना और सिविल सर्विसेज के रिटायर्ड अफसरों के शहर के रुप में ही जाना जाता था । ये दोनों मिलकर इसे एक आधा ब्रिटिष और आधा इंडियन कस्बा बनाते थे । ठीक उस काले एंग्लो इंडियन जैसा जो भारतीय दिखने को तैयार नहीं था परंतु दुर्भाग्य से भारत में ही छूट गया था । इन साहबों का छोटा सा डंडा कुछ नहीं बोलता था लेकिन साहब और उनका रुल दोनों की देह की भाषा यह बता देतीे थी कि वे हिंदुस्तान पर ‘रुल’ करके निवृत हुए हैं । उनकी ठसक इस शहर को भले ही ब्रिटेन के करीब ले जाती हो पर देसी साहबों का मिजाज शहर को नफासत भी बख्शता था । इसे सुसंस्कृत बनाने में अ्रंग्रेजियत के वारिस रहे इन अफसरों का योगदान भी कम नहीं रहा । इसके मिजाज में वो साहबी अंदाज आखिर यूंही तो नहीं आया ।लेकिन ये साहब अकेले नहीं थे जिन्होने इसे देहरादून बनाया । कलाकारों , साहित्यकारों , पत्रकारों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की एक ऐसी आकाषगंगा भी इस अंग्रेजी मिजाज के शहर में चमकती रही जिसने इसे हिंदुस्तानियत का रंग बख्शा और उसे राजनीतिक चेतना से धड़कता शहर बनाया । इनके साथ वे आम लोग भी थे जो पहाड़ और मैदान के गांवों और कस्बों से आए थे जिन्होने ठेठ देसीपन का छौंक लगाकर इसे ज्यादा मानवीय शहर बनाया । राजधानी बनने के बाद शहर का मिजाज भी बदला और जीवन भी । इत्मीनान की जिंदगी गुजारने की लत की जगह भागदौड़ की आदत ले रही है । फुरसत के पल सिमट रहे हैंे और हड़बड़ी का आलम सड़कों पर पसर रहा है । लोग जल्दी में हैं इसलिए शहर में हर रोज कोई न कोई कुचल जाता है । कभी सड़क पर चलने वाले किसी बूढ़े या बच्चे वाले को कुचलकर मोटर साइकिल वाला फुर्र हो जाता है तो कभी मोटर साइकिल वाले कीे कुचलकर कोई कार या ट्रक फरार हो जाता है । यह ऐसा शहर में बदल रहा है जहां लोग मिलने के मौके के लिए ाादी - ब्याह का इंतजार करते हैं । सीएमआई या दून अस्पताल में भर्ती हुए बगैर मित्रों और परिचितों से मिलना मुमकिन नहीं हो पाता । दिल में लीची की मिठास और व्यवहार में बासमती की खुषबू लिए गरमजोषी के साथ मिलनेवाली प्रजाति लीचियों और बासमती की तरह दुर्लभ होती जा रही है । ऐसे शहर में बीते जमाने के प़त्रकार को जन्म के सौ साल बाद याद करने का आयोजन करना खतरे से खाली नहीं था । वह भी ऐसे समय में जब पत्रकारिता की साख नेताओं के चरित्र के सूचकांक की तरह हर रोज कुछ और नीचे गिर जाती हो । लेकिन इसके बावजूद आयोजन में लोग न केवल बड़ी तादाद में आयोजन में पहुंचे बल्कि पूरे समय तक कार्यक्रम में मौजूद भी रहे । भले ही तथाकथित बड़े अखबारों के स्वनामधन्य पत्रकारों को पत्रकारिता के इस पुरखे को याद करने की जरुरत महसूस न हुई हो परंतु इससे पत्रकारिता की विरासत और उसके प्रति कृतज्ञता जताने को लेकर उनकी अरुचि जरुर झलकती है । लेकिन मुख्यधारा की पत्रकारिता की कृतघ्नता से परे हटकर देखें तो यह साफ दिखा कि आम लोगों ने इस मौके पर आकर पत्रकारिता के उस पुरखे के प्रति अपनी कृतज्ञता जताने में कोई कंजूसी नहीं दिखाई वह भी तब जब शहर संवेदना के स्तर पर मरुस्थल में बदल रहा हो । लोगों का यह लगाव और जुड़ाव बताता है कि जनपक्षधर पत्रकारिता को बीते जमाने का शगल करार देने की तमाम कोषिषों के बावजूद जनता के पक्ष में खड़ी पत्रकारिता के कायल लोग हैं । वह भी तब जब कहा जा रहा हो कि मध्यवर्ग हल्की - फुल्की खबरें पढ़ना चाहता है । मध्यवर्ग से जुड़े लोगों की भीड़ और उनकी चिंताओं ने बताया कि जैसे - जैसे मुख्यधारा के अखबार सूचना पत्र में बदल रहे हैं वैसे - वैसे खबरों की भूख भी बढ़ रही है । इसका सीधा मतलब है कि मुख्य धारा के अखबार अलोकतांत्रिक तरीके से आम पाठकों पर अपनी पसंद का कंटेंट थोप रहे हैं ।अखबारों के दफ्तरों में लोकरुचि के नाम पर विचार और जनपक्षधरता की खबरों की हत्यायें किए जाने की घटनाओं के बीच यह सुकून से भर देने वाली घटना है जिसे रेखांकित किए जाने की जरुरत है ताकि आने वाले इतिहास में यह जरुर दर्ज किया जाय कि बड़े अखबार जब लोगों के पक्ष में खड़ी खबरों के कत्ल में जुटे थे तब लोग उनके साथ नहीं थे । यह वाकया उम्मीद जगाता है । यह एक मौका है उन लोगों के लिए जो पत्रकारिता को उसकी पेषागत ईमानदारी के साथ अंजाम देना चाहते हैं । यह चुनौती भी है । क्योंकि 21 वीं सदी की पत्रकारिता आठवें दषक की जनपक्षधरता वाले स्टाइल में नहीं चल सकती । उसे अपने लिए किसी ताजे मुहावरे, षिल्प और भाषा की तलाष करनी होगी । नवें दषक में जनसत्ता और नवभारत टाईम्स ने प्रभाष जोषी और राजेंद्र माथुर की अगुआई में पत्रकारिता की नई भाषा और षिल्प ईजाद कर उसे आजादी के दौर की जड़ता से मुक्त किया था । अब समय है कि 21 वीं सदी की पत्रकारिता अपने समय के साथ कदम ताल करते हुए पिछले दो दषकों से आई जड़ता को तोड़कर नई जमीन तलाषे । पत्रकारिता के सामने नए षिल्प और मुहावरे की तलाषने की चुनौती हर समय रहेगी क्योंकि संप्रेषण के माध्यम की तकनीक हर रोज बदल जारही है तो बाजारवाद लोगों की रुचियों को अपने हिसाब से तय करने पर आमादा है । ऐसे में जनपक्ष आउटडेटेड होने वाला नहीं है । एक हथियार के तौर पर उसकी जरुरत बढ़ती रहने वाली है । आचार्य गोपेष्वर कोठियाल की जन्म शती के मौके पर आई भीड़ यही कहना चाहती है ।

बुधवार, 6 जनवरी 2010

छोटे राज्यों के बड़े सवाल

लगभग समूचा देश अलग राज्यों की आग और बहस से गुजर रहा है । इसे भारतीय राष्ट्र राज्य की सीमा भी मान सकते हैं और बिडंबना भी कि आजादी के 62 वर्षों बाद भी हम विकास का ऐसा रास्ता नहीं खोज पाए हैं जो विकास के नक्शे से बाहर कर दिए गए क्षेत्रों और लोगों को पिछड़ेपन और उपेक्षित रह जाने के अहसास से मुक्ति दिला सकें । न हमने ऐसी राजनीति और राजनीतिक प्रक्रिया को ईजाद किया जो निर्णय लेने की परिधि से बाहर रह रहे लोगों की राजनीतिक भागीदारी तय कर सके । छोटे राज्यों की आग यदि बड़ी दिखाई दे रही है तो इसकी बुनियाद में भारतीय राष्ट्रराज्य की विफलताओं के शव हैं । ऐसी स्थिति में छोटे राज्यों की कामयाबी और नाकामी की बहस का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि यह भूगोल का नहीं बल्कि राजनीतिविज्ञान का सवाल है ।
हम एक बार फिर छठे और सातवें दशक की उस बहस में वापस लौट रहे हैं जो तब महाराष्ट्र से लेकर आंध्र प्रदेश तक गठन को लेकर चली थी । मजेदार बात यह है कि बीसवीं सदी के मध्य के उस दौर में भी देश की हवाओं राज्यों के विभाजन को लेकर वही भय और आशंकायें तैर रही थीं जो आज 21 वीं सदी के इस पूर्वार्द्ध में गूंज रही हैं । राज्यों के विभाजन के प्रेत से देश के बाल्कनीकरण का भस्मासुर पैदा होने की आशंका में दुबले होने वाले चिंतक और नेताओं की फौज तब भी थी और आज भी है । लेकिन देश की जनता ने साबित किया कि उसे राज्य की जरुरत और अलगाव के बीच मौजूद नियंत्रण रेखा की समझ हमारे नेताओं से कहीं ज्यादा है । इसीलिए देश के भीतर समय - समय पर चलने वाले अलगाववादी आंदोलन आए और कुछ घावों को छोड़कर विदा हो गए । छठे दशक की चिंताओं को छोड़कर ये राज्य आगे बढ़ गए । इनमें से कई तो विकसित राज्यों की पांत में भी षामिल हैं । सातवें और आठवें दशक की शुरुआत में बने छोटे राज्यों ने कामयाबी के झंडे गाड़े तो लगा कि लोगों की खुशहाली का रास्ता इसी माॅडल में निहित है । पंजाब, हरियाणा और हिमाचल की उपलब्धियों को तो जैसे विकास की बाइबिल मान लिया गया । मानव विकास मानकों , प्रति व्यक्ति आय ,विकास दर और सकल घरेलू उत्पाद के नजरिये से इन राज्यों की उपलब्धियां चमत्कृत करने वाली रही हैं । विकास अपने आप में एक संक्रामक प्रक्रिया है । इसलिए सदियों से दमित और उपेक्षित समाजों को लगा कि नियति बदलने का रास्ता छोटे राज्यों से होकर जाता है । इन राज्यों की उपलब्धियों ने पूरे देश में छोटे राज्यों के समर्थकों को तर्क और औचित्य के हथियार के साथ - साथ आंदोलन का ईंधन भी मुहैय्या कराया । इन राज्यों में हुए विकास के हवाले से उत्तराखंड , झारखंड जैसे पिछड़े इलाकों और उपेक्षित इलाकों में आम लोगों में बदलाव की उम्मीदें जगाए जाने लगीं । ये इलाके देश के ऐसे हिस्से थे जहां राष्ट्रीय राजनीतिक दल जनाकांक्षाओं की कसौटी पर नाकाम साबित हो चुकीं थी और उनकी जगह जो दल आए वे अपने - अपने जातीय घेरों के बंदी थे । ऐसे यूपी और बिहार के इन हिस्सों में अलगाव का अहसास बढ़ा । झारखंड और उत्तराखंड के आंदोलनों के गर्भ से तीन नये राज्यों का जन्म हो गया । संयोग से इन राज्यों की बहुसंख्या सांस्कृतिक और नृवंशीय नजरिये से अपने पूर्ववर्ती राज्यों से काफी अलग थे । इसलिए ये मूलतः सांस्कृतिक पहचान के आंदोलन थे जिन्हे पिछड़ेपन के आर्थिक कारणों और यूपी - बिहार की अधीनता के राजनीतिक कारणों ने हवा दी ।
जाहिर है कि अब छोटे राज्यों के दो माॅडल सामने हैं । एक ओर सत्तर के दशक में बने हरियाणा, पंजाब और हिमाचल हैं जिन्हे फलने - फूलने के लिए हरित क्रांति का दौर तो मिला ही साथ ही वह कालखंड भी मिला जब राजनीति और सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार न्यूनतम था । लेकिन विकास का यह माडल भी 20 वीं सदी के आखिरी दशक ठहराव की ओर है , या यूं कहें कि चरमरा रहा है तो गलत नहीं होगा । हिमाचल में सेब क्रांति चरम पर पहुंचने के बाद जमीन की कमी , अत्यधिक कीटनाशकों ,खादों के प्रयोग और ग्लोबल वार्मिंग के कारण झटके झेल रही है तो पंजाब और हरियाणा में भी जमीन की ताकत और भूजल दोनों ही चुकने जा रहे हैं ।विकास के इन स्वर्गों में मरुस्थल दिखने लगे हैं । दूसरी ओर उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ हैं जिन्हे बने नौ साल बीत चुके हैं । झारखंड एक ओर नक्सलवाद के उभार के लिए चर्चा में है नीम पर जा चढ़े करेले की तरह अब वह मधु कौड़ा के पराक्रम के बहाने राजनीतिक भ्रष्टाचार के लिए भी पूरे देश में जाना जा रहा है । छत्तीसगढ़ नक्सलवाद , सलवां जुड़म और कीमती खनिजों के लिए थोक के भाव से हो रहे एमओयू के लिए सुर्खियों में है । उसके आदिवासी बहुल जिलों के सकल घरेलू उत्पाद में बृद्धि नहीं हो रही है । उत्तराखंड में भी इन नौ सालों में ऐसा कोई उल्लेखनीय उपलब्धि नहीं है जो छोटे राज्यों के औचित्य को साबित करे उल्टे नौकरशाही का कार्यकुशलता का ग्राफ यूपी से बदतर हो गया है । भ्रश्टाचार और राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते सरकारी तंत्र चरमरा गया है । हालात यह हैं कि पहाड़ के स्कूलों में तैनात शिक्षकों को पढ़ाने के लिए स्कूल भेजने के लिए सरकार को अपने डीएम,एसडीएम से लेकर पटवारी तक मोर्चे पर तैनात करने पड़ रहे हैं । मैदानी जिलों को छोड़ दे ंतो पहाड़ी जिलों में सकल घरेलू उत्पाद गिर रहा है । राज्य की अर्थव्यवस्था कर्ज से ही नहीं चरमरा रही है बल्कि उसमें बुनियादी दोश आ गए हैं । सर्विस सेक्टर का योगदान 50 फीसदी तक जा पहुंचा है । कृषि सेक्टर का योगदान निरंतर उतार पर है ।
छोटे राज्यों की राजनीति की खासियत यह है कि सरकार के फैसलों को प्रभावित करने की जनता की ताकत बढ़ जाती है । मात्र एक हजार वोटों के इधर - उधर हो जाने से जब विधानसभा सीट के नतीजे बदल सकते हों तब लोगों के छोटे समूहों के जनमत भी महत्वपूर्ण होंगे ही । लेकिन हाल में बने राज्यों की बिडंबना यह है कि वहां सत्ता का विकेंद्रीकरण के जरिये निर्णय लेने की प्रक्रिया में जनता की भागीदारी तो बढ़ी नहीं उल्टे राजनीतिक और प्रशासनिक सत्ता का केंद्रीयकरण राज्य की राजधानी में हो गया । इसलिए नौ साल पहले बने राज्य हिमाचल, पंजाब और हरियाणा की तरह विकास के बजाय अपनी विफलताओं के लिए याद किए जा रहे हैं । इन हालातों में जब छोटे राज्यों को खुशहाली का रामवाण नुस्खा नहीं कहा जा सकता । किसी राज्य की कामयाबी भूगोल से नहीं बल्कि शासन चलाने की गुणवत्ता सत्ता के विकेंद्रीकरण और निर्णय लेने की प्रक्रिया में आम लोगों की भागीदारी से तय होगी ।
कामयाबी और नाकामी के इस शास्त्रीय बहस से बहस से निकलकर देखें तो लोकतंत्र लोगों को अपने भाग्य और भविष्य चुनने की आजादी देता है । यदि जनाकांक्षायें अलग राज्य मांगती हैं तो उसे लेकर क्यों किसी सरकार या राजनीतिक दल को अपने पूर्वाग्रह या राजहठ पर अड़़ा रहना चाहिए ? आखिर देश की संसद का काम भी तो जनाकांक्षाओं के अनुरुप ही देश का निर्माण करना ही तो है । इस नजरिये देखें तो आंध्र प्रदेश के बाकी हिस्सों में चल रहा अखंड आंध्र का आंदोलन अलोकतांत्रिक और अपने मिजाज में तानाशाही पूर्ण है । क्षेत्र विशेष की आबादी अपनी इच्छा को किसी और पर थोपने की जिद कैसे कर सकती है ? क्षेत्रीय पहचानों का जो विस्फोट हम देख रहे हैं वह दरअसल 62 साल की हमारी राजनीति की विफलता से उपजी निराशा है । इस देश की राजनीति और कर्णधार चकरा देने करने वाली विविधताओं से भरे इस देश के समाजों को संबोधित तक नहीं कर पाए हैं । विकास से लेकर न्याय तक फैली राज्य की ममतापूर्ण भुजायें उन समाजों तक नहीं पहुंची अलबत्ता शोषण और दमन से लैस सहस्त्रबाहु राज्य जरुर उन तक पहुंच गया । नए राज्यों की जरुरत यहीं से पैदा हुई है । एक अर्थ में यह भारतीय राष्ट्र और समाज के संघीय चरित्र की वापसी भी है जिसे हमने कृत्रिम तरीके से बड़े राज्यों में कैद कर दिया था । जिस देश में इतने सारे समाज पहचान के संकट से दो चार हों और इतनी सारी जनांकाक्षायें आर्थिक सामाजिक न्याय की तलाश कर रही हों उस देश को अपनी पूरी राजनीतिक यात्रा पर चिंता और चिंतन करना चाहिए कि उसकी सत्ता की परिधि के बाहर बेचैन समाजों की तादाद क्यों बढ़ रही है । इसमें कोई शक नहीं कि नए राज्य बनें लेकिन वे अपने पूर्ववर्ती राज्यों के छोटे भौगोलिक संस्करण न बनकर जनाकांक्षाओं के साथ न्याय करें इसके लिए कोई मैकेनिज्म होना चाहिए । साथ किसी राज्य का निर्माण सामान्य जनइच्छा है या कुछ महत्वाकांक्षी नेताओं का खेल है, इसे जांचने के लिए जनमतसंग्रह के लोकतांत्रिक औजार को आजमाने में कोई बुराई नहीे होनी चाहिए । इस बात को ध्यान में रखना होगा कि कोई राज्य एक अदद मुख्यमंत्री, कुछेक मंत्रियों और कुछ सैकड़ा अफसरों का वनविहार न बन जाय ।

मंगलवार, 24 नवंबर 2009

उत्तराखंडः लूट और झूठ के नौ साल


आंदोलन के डेढ़ दशक और राज्य बनने के 9 साल के राजनीतिक सफरनामे की उलटबांसी यह है कि उत्तराखंड की राजनीति के खेवनहार वही दल बने हैं जिन्हे आंदोलन ने खारिज कर दिया था ,जिनके नेता लोगों के डर से भाग खड़े हुए थे ।एक राज्य के रुप में उत्तराखंड जब10वें वर्श में दाखिल हो रहा है तब हालात 1994 से ज्यादा बदतर हो चुके हैं । पहाड़ी राज्य का सपना चकनाचूर हो चुका है ।उत्तराखंड आंदोलन के मकसदों को दफनाया जा चुका है । सतह के नीचे असंतोष का लावा फिर जमा हो रहा है । उत्तराखंड एक और आंदोलन के मुहाने की ओर है । पता नहीं कब, कौन सी चिंगारी पूरे पहाड़ को सुलगा दे । उत्तराखंड सदियों से इतिहास की अंधेरी गुफा में बंद रहा है । प्राकृतिक आपदाओं और मानव निर्मित विपदाओं के जिन दौरों से यह समाज गुजरा है उनसे दुनिया के बहुत कम समाज गुजरे होंगे । इतिहास के इस अंधेरे हिस्से में वे अनगिनत काली रातें भी हैं जब 1803 के भीशण भूकंप से तबाह हुए समाज को इतिहास का सबसे बर्बर हमला गोरखा आक्रमण के रुप में झेलना पड़ा था । लगभग तीन लाख लोगों को जानवरों की तरह जंजीरों में जकड़कर गोरखा आक्रमणकारियों ने हरिद्वार और रुद्रपुर की मानव मंडियों में दास बनाकर बेच दिया गया । ऐसी अनेक हृदय विदारक त्रासदियों के साक्षी रहे हिमालय के इस समाज तक आजादी भी आधी - अधूरी ही पहुंची । उत्तराखंड में जनअसंतोष विभिन्न आंदोलनों की भाशा में बोलता रहा लेकिन 1994 का उत्तराखंड बाकी कारणों के साथ पहाड़ियों की पहचान का आंदोलन था । क्षेत्रीयता का यही पुट इसका मुख्य स्वर था । अपनी तमाम तेजस्विता और अनूठेपन के बावजूद उत्तराखंड आंदोलन 1996 के बाद दम तोड़ चुका था ।आंदोलन का ज्वार उतर चुका था । उत्तराखंड आंदोलन की ताकतें तो 1997 से ही चुकने लगीं थी । राज्य बनते - बनते ये ताकतें कुछ खुद के पराक्रम और कुछ जनता की अनदेखी से हाषिये पर चली गईं । 1994 के जनसैलाब के डर से भूमिगत हुए दल और उनके नेता 1995 में ही अपनी राजनीति और इरादों के साथ फिर से प्रगट होने लगे थे ।1996 के लोकसभा चुनाव में लोगों ने चुनाव बहिष्कार के अस्त्र के जरिये उनका प्रतिकार किया पर उसके बाद राजनीति फिर पुराने ढ़र्रे पर लौट आई। 1994 के आंदोलन में सपा,बसपा और कांग्रेस के खिलाफ उमड़ी जनभावनाओं को भुनाने में भाजपा कामयाब रहीं उसके पास आरएसएस और उसके संगठनों का जमीनी नेटवर्क तो था ही साथ राजनीति के दांवपेंचों में माहिर घाघ नेताओं की पूरी फौज थी । उत्तराखंड आंदोलन की फसल भले ही आंदोलनकारियों ने उगाई हो लेकिन जब काटने और संभालने की बारी आई तब उनके पास न तो फसल काटने में कुशल लोग थे और न ही संभालने के लिए अक्ल और कुठार ही थे । लिहाजा आंदोलन से पकी जनमत की फसल भगवा ब्रिगेडें ले उड़ीं । खारिज किए गए नेता ताल ठोंकने लगे थे । उत्तराखंड आंदोलन हार चुका था । इस हार ने उत्तराखंड को हताषा के हिमयुग में धकेल दिया । हताशा के इसी हिमयुग में जब 9 नवंबर 2000 की आधी रात को राज्य बना तब उत्तराखंड के अधिकांश गांव सो रहे थे । अहंकार से भरी केंद्र की एनडीए सरकार ने उत्तराखंड मांग रहे लोगों को उत्तरांचल राज्य दिया । यह जानते हुए भी कि उत्तराखंड में आरएसएस,भाजपा के सिवा ‘उत्तरांचल’ का कोई माई बाप नहीं है पर राजहठ में डूबी सरकार जनता की इच्छा पर अपना नाम थोपने से ही गौरवान्वित थी । बिन मांगे समूचा हरिद्वार जिला उत्तराखंड की झोली में डाल दिया गया , पर आम लोगों ने इसे केंद्र की कृपा मानने के बजाय पहाड़ के मूल निवासियों की आबादी को संतुलित करने वाले क्षेत्रवाद के रुप में देखा । भाजपा को कोई पहाड़ी मुख्यमंत्री तक न मिला और पहला ही मुख्यमंत्री हरियाणवी मूल का बना दिया गया । राजधानी पहाड़ में घोषित करने के बजाय वह भी मैदान में बना दी गई । राज्य पहाड़ी और मुख्यमंत्री से लेकर राजधानी तक सब कुछ मैदान का , ऐसा सलूक शायद ही किसी और समाज के साथ हुआ होगा ! इन सारे कदमों और राज्य पुनर्गठन अधिनियम की व्यवस्थाओं में क्षेत्रवाद का डंक छिपा हुआ था । राज्य तो बन गया लेकिन उत्तराखंड में संदेश यह गया कि केंद्र ने राज्य नहीं दिया बल्कि उन्हे आंदोलन के लिए दंडित किया है । भाजपा को इसका दंड भी भुगतना पड़ा । राज्य निर्माण करने के राजसी अभिमान पर इतरा रही भाजपा को उत्तराखंड की जनता ने वनवास का दंड देकर बताया कि प्रछन्न क्षेत्रवादी एजेंडे को वह भी समझती है । असली खेल तो राज्य बनने के बाद शुरु हुआ । जो मंत्री बने वे पहाड़ के सादेपन के प्रतिनिधि बनने के बजाय यूपी की राजनीतिक कल्चर के इतने उत्साही वारिस साबित हुए कि यूपी के नेता भी उनकी ठसक के आगे पानी भरने लगे । शांत पहाड़ों में रातोंरात गनर वाली प्रजाति के नेता प्रगट हो गए । राजनीति की ये अधभरी गगरियां भौंडेपन के साथ सरेआम छलकने लगीं तो लोगों को लगा कि यह तो यूपी से भी गया- गुजरा प्रदेश बन रहा है । राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के विस्फोट का सिलसिला शुरु हो गया । कारों और टैक्सियों पर नेमप्लेटधारी नेताओं की फौज सड़कों पर उतर आईं । उन्हे सरकारी योजनाओं में अपना हिस्सा चाहिए था । यह नए राज्य में कमीशन के खेल को नए सत्ताधारियों का ग्रीन सिग्नल था । । नए राज्य की जमीन एकाएक नेताओं के लिए उपजाऊ हो गई । इस छोटे राज्य में पैदावार के मामले में नेताओं ने कुकरमुत्तों को पछाड़ दिया । पहले ही विधान सभा चुनाव में उम्मीदवारों की भीड़ नामांकन के लिए उमड़ पड़ी ।
आंदोलन से जनमे राज्य की इससे बड़ी बिडंबना क्या होगी कि सरकार का पहला ही शासनादेश मूल निवासियों के हितों को दूरगामी नुकसान पहुंचाने के इरादे से जारी किया गया । बाद में यह नियुक्तियों में उत्तराखंड के मूल निवासियों के खिलाफ सबसे बड़ा अस्त्र साबित हुआ । जब गैर मूल निवासी को मुख्यमंत्री बनाने पर भाजपा में भी बबाल हुआ तो आलाकमान ने कमान कोश्यारी को सौंप दी । लोगों को हिंदू राष्ट्र की घुट्टी पिलाने वाले व संघ के प्रचारक रहे कोश्यारी भाजपा में ठाकुरवाद की सोशल इंजीनियरिंग के प्रणेता बनकर उभरे । राज्य सरकार की खुफिया एजेंसी एलआईयू के जरिये विधानसभा क्षेत्रवार जातीय गणना कर इस विचार को आंकड़ों के जरिये सिद्धांत का जामा पहना दिया गया । पहले ही साल में नए राज्य में भ्रष्ट और विघटनकारी राजनीति का उदय हो चुका था । इस मैदानी क्षेत्रवाद और जातिवाद की इस राजनीति को जनता ने पूरी तरह खारिज कर दिया । प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री समेत भाजपा के अधिकांश बड़े नेता खेत रहे । भाजपा और कोश्यारी की सोशल इंजीनियरिंग बुरी तरह पिट गई ।भाजपा के खिलाफ उठी लहर से कांग्रेस 1989 के बाद उत्तराखंड में जिंदा हुई । यह वक्त की बिडंबना ही है कि कभी ‘‘ मेरी लाश पर उत्तराखंड बनेगा ’’ जैसा कठोर जुमला कहने वाले नारायण दत्त तिवारी उसी राज्य के मुख्यमंत्री बन गए पर वह बुढ़ापा बिताने पहाड़ आए थे । उनके पास मैदान का विजन था ,जिससे नौएडा तो बन सकता था पर हिमाचल नहीं । वह खांटी पहाड़ी वाईएस परमार या वीरभद्र सिंह नहीं थे । वह छोटे राज्य के बड़े राजा थे । उन्होने 16 वीं सदी के राजा की तरह दोनों हाथों से राजकोश लुटाया । उनका शासनकाल ऐसा दुर्लभ समय था जब मीडिया से लेकर विपक्ष तक सब चारणकाल में पहुंच चुके थे । विधानसभा से लेकर अखबार के पन्नों तक राग दरबारी की धुन बज रही थी । ऐसा करिश्मा बस तिवारी ही कर सकते थे ।चार्वाक का ‘‘कर्ज लो और घी पियो’’दर्शन सरकार का सूत्रवाक्य बन चुका था । लीडर तब डीलर बन चुके थे । रोज कहीं न कहीं घोटाला हो रहा था । देहरादून के ढ़ाबे वाले हों या पंचतारा होटल वाले उन दिनों को याद कर उसे स्वर्णयुग बताते नहीं थकते । बावजूद इसके कांग्रेस सरकार नहीं बच पाई । भ्रष्टाचार की तोहमत उसे ले डूबी । मिस्टर आनेस्ट जनरल बीसी खंडूड़ी के हाथ सत्ता आई तो पहाड़ के लोगों को लगा कि अब राज्य में खांटी पहाड़ी राज स्थापित होगा और 6 सालों में पनपे दलाल राज का खात्मा इसी रिटायर्ड जनरल के हाथों होगा । उनकी तनी हुई झबरीली मूंछें, सख्त चेहरा और फौजी पृष्ठभूमि मिलकर जो छवि बनाते थे उससे लोगों में इस यकीन ने जड़ें भी जमाईं । जनरल सत्ता के घेरे में ऐसे कैद हुए कि वह कैंट रोड के अपने काले लौह दरवाजों के उस पार जनता के लिए ईश्वर की तरह अगम्य बन गए । सिर्फ इतना ही पता चल पाया कि वह सारंगी कुलनाम के किसी मायावी आईएएस के मोहपाश में हैं । मात्र डेढ़ साल में जनरल का करिश्मा और केंद्रीय सड़क मंत्री के रुप में बटोरा पुण्य चुक गया । लोकसभा चुनाव में अपमानजनक हार के रुप में जनता ने उनकी बर्खास्तगी के पत्र पर दस्तखत कर दिए । इसे राज्य स्तर पर कांग्रेस और भाजपा की राजनीतिक कंगाली भी कह सकते हैं कि उनके पास न तो दूर तक देखने वाली दृष्टि है , न ऐसे नेता हैं और न ही वह साहस जो एक नए राज्य की बुनियाद के लिए जरुरी है । यही कारण है कि उत्तराखंड नए राज्यों में अकेला राज्य है जिसके पास अपनी स्थायी राजधानी तक नहीं है । उसके नेताओं में न तो इतनी हिम्मत है कि देहरादून को ही राजधानी घोषित कर दें और न इतना साहस कि गैरसैंण को राजधानी बना दें । ऐसा ही हाल परिसीमन का भी है । परिसीमन का रस्मी विरोध करने के अलावा कोई गंभीर सवाल नहीं उठाया गया । जबकि एक राज्य के रुप में यह उत्तराखंड के जीवन और मरण का सवाल है ।सन् 2012 के विधानसभा चुनाव में पहाड़ की आधा दर्जन सीटें कम हो चुकी हैं । उत्तराखंड विधानसभा का संतुलन अब मैदान की ओर झुक गया है । उत्तराखंड आंदोलन को पराजित करने की जो साजिश राज्य के गठन के समय की गई थी , परिसीमन से वह अब ज्यादा स्पष्ट हो गई है । सन् 2032 में होने वाले परिसीमन के बाद पहाड़ी राज्य का भ्रम पूरी तरह टूट जाएगा और विधानसभा में 51 सीटें मैदानी क्षेत्रों की होंगी और पहाड़ी क्षेत्रों की सीटें घटकर मात्र 19 रह जायेंगी । पहाड़ी राज्य की पूरी अवधारणा को नेस्तनाबूद करने वाला परिसीमन का यह खतरा हो या राजधानी और पलायन के ज्वलंत सवाल उत्तराखंड के नेताओं के पास राजनीतिक चिंता और चिंतन दोनों नहीं हैं अलबत्ता रातों - रात नोटों के ढे़र पर बैठने के हुनर में वे किसी भी मधु कौड़ा या सुखराम का मुकाबला करने की प्रतिभा रखते हैं । प्रदेश में 50 करोड़ से 400 करोड़ रुपए की हैसियत रखने वाले नेताओं की तादाद एक दर्जन से कम नहीं है और करोड़पति नेताओं की तादाद तो सैकड़ों में है । करोड़पति अफसरों की तादाद 1000 से ज्यादा है । राजनीति और सरकारी क्षेत्र में समृद्धि का यह विस्फोट राज्य बनने के बाद हुआ है । बेहतरीन मानव संसाधन और प्राकृतिक संसाधनों का खजाना होने के बावजूद उत्तराखंड नौ वर्ष के अपने सफर में विकास के बुनियादी मानकों पर भी खरा नहीं उतरा । जलवायु में हो रहे बदलावों के कारण राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था बेहाल है । पहाड़ में आय और जीवन निर्वाह के परंपरागत साधन ढ़ह रहे हैं , नए साधन हैं नहीं । राज्य बनने के बाद पलायन रुका नहीं बल्कि बढ़ गया । तेजी से बियाबान होते जा रहे गांव बता रहे हैं कि आने वाले दशक इतिहास के सबसे बड़े विस्थापन की गवाही देंगे । बेरोजगारी खतरनाक स्तर को छू रही है । केंद्र द्वारा घोषित औद्योगिक पैकेज राज्य की कीमती भूमि की लूट, करों की चोरी का जरिया और श्रम कानूनों की कब्रगाह बनकर रह गया है । अरबों रुपए की जमीनें कौड़ियों में लुटाकर राज्य सरकार कुछ हजार रोजगार जुटा पाई । इसमें में भी मूल निवासियों के हिस्से मजदूरी या सुपरवाइजरी स्तर तक नौकरी ही आ पाई तो अधिकांश नदियां, गाड ,गधेरे सरकार बेच चुकी है ,पर पनबिजली प्रोजेक्टों में भी बड़े पदों पर पहाड़ के लोगों को नियुक्त करने पर अघोषित पाबंदी हैं । आयकर विभाग के आंकड़े गवाह हैं कि राज्य बनने के बाद सर्वाधिक समृद्धि मैदानी जिलों में ही आई ।यदि प्रतिव्यक्ति कार व दुपहिया वाहन और प्रतिव्यक्ति इलेक्ट्रानिक गुड्स के आंकड़े देखे जांय तो मैदान और पहाड़ के जीवन स्तर और उपभोग स्तर की विषमता साफ- साफ नजर आ जाती है । जबकि शिमला में ये दोनों ही सूचकांक पूरे देश में सबसे बेहतर हैं । जाहिर है कि इन नौ सालों में जैसा उत्तराखंड राजनेताओं ने बनाया है वह दिल, दिमाग ,आचार और व्यवहार से तो पहाड़ी कतई नहीं है । इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि उसकी विधानसभा पहाड़ की मेधा,भावना,सामान्य बुद्धिमत्ता और सरोकारों का प्रतिनिधित्व तक नहीं करती । यह बिडंबना ही है कि आज का उत्तराखंड पहाड़ और उसके लोगों के तात्कालिक और दीर्घकालिक हितों के खिलाफ है । एक पहाड़ी राज्य के रुप में उत्तराखंड नाकाम हो चुका है । राज्य के पहाड़ विरोधी रंगढंग देखते हुए ही उत्तराखंड जनमंच जैसे आंदोलन में हिस्सा लेने वाले संगठन उत्तराखंड राज्य को विसर्जित करने की मांग उठाने लगे हैं ।

गुरुवार, 12 नवंबर 2009

क्षेत्रीयताओं का द्वंद समझने का समय



मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मध्यप्रदेश की फैक्टरियों में बिहारियों के बजाय मध्यप्रदेश के लोगों को नौकरियां दिये जाने का बयान क्या दिया कि एक बार फिर तूफान खड़ा कर दिया गया । माहौल ऐसा बनाया जा रहा है कि जैसे कोई आसमान टूट पड़ा हो ।शीला दीक्षित से लेकर राज ठाकरे तक न जाने कितने बयानों को लेकर ऐसा माहौल बनाया गया कि जैसे देश खतरे में पड़ गया हो ।अंधाधुंध बिहारी आब्रजन के खिलाफ बोलना कुफ्र मान लिया गया है । बिहारी वर्चस्व वाला हिंदी मीडिया और बिहार के भ्रष्ट और अकर्मण्य नेता अक्सर इन घटनाओं पर आक्रामक प्रतिक्रिया और शोर मचाकर इसे राष्ट्रीय संकट में बदलते रहे हैं । यह उनकी रणनीति है कि कभी राज ठाकरे तो कभी शिवराज के रुप में वे बिहार के लिए एक अदद खलनायक का इंतजाम करते रहते हैं ताकि बिहार के असली खलनायक बिहारी क्षेत्रवाद की ढ़ाल के पीछे नायक बने रहें ।आखिर बिहार के बुनियादी सवालों के बजाय राज ठाकरे और शीला दीक्षित या शिवराज सिंह को गलियाने से बिहार में वोट मिल सकते हैं तो इसमें हर्ज क्या है ।
दरअसल हिंदी मीडिया खासतौर पर इलेक्ट्रानिक मीडिया खुद क्षेत्रवाद के कीचड़ में इतना धंस चुका है कि उसमें आब्जेक्टेविटी गायब हो चुकी है । यदि ऐसा नहीं होता तो वह पंजाब , असम महाराष्ट्र और अब मध्य प्रदेश से आ रही बिहारी विरोधी आवाजों को राष्ट्र विरोधी करार देने पहले यह जरुर विश्लेषित करता कि विभिन्न भारतीय समाजों से एक ही समुदाय के खिलाफ क्यों ऐसी प्रतिक्रिया आ रही है ? क्यों इन समाजों का धैर्य चुक रहा है ? मीडिया के हमले और बिहारी नेताओं की हमलावर रणनीति से भले ही शीला दीक्षित या शिवराज को बचाव पर उतरना पड़ा हो पर सच्चाई यह है कि जिस बिहारीवाद विरोधी जिस वर्ग को ये नेता संदेश देना चाहते थे उसे उन्होने संबोधित कर लिया । बिहारियों के खिलाफ इन समाजों में प्रतिक्रिया तो पहले से ही मौजूद है , नेताओं ने तो उसे सिर्फ वाणी देकर मुद्दा बनाया ।यह बात आईने की तरह साफ है कि अनियंत्रित और अनियोजित बिहारी आब्रजन के खिलाफ विभिन्न समाजों में सतह के तले प्रतिक्रिया हो रही है और राजनीति तो उन भावनाओं पर सवारी गांठना चाहती है । पंजाब में यह प्रतिक्रिया पर्चे - पोस्टर चिपकाने के बाद चुनाव में लुधियाना जैसे शहरों में स्थानीय लोगों की पकड़ कम होने से आई तो महाराष्ट्र के चुनावों ने साबित कर दिया कि वहां बिहारी आब्रजक बड़े राजनीतिक सवाल बन चुके हैं ।दिल्ली में भी यही होने जारहा है तो असम में हिंसा के साथ प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा है । मध्यप्रदेश में यह टकराव का रुप लेने की ओर है । इसमें जो नए प्रदेश भविष्य में जुड़ने वाले हैं उनमें राजस्थान और उत्तराखंड जैसे शांत राज्य भी शामिल हैं ।
जो लोग अंधाधुंध आब्रजन का समर्थन कर रहे हैं वे भारत और उसके समाजों को कितना जानते हैं , यह तो पता नहीं पर ये लोग न तो बिहारियों के हित में है और न देश के हित में है ।भारत एक संघीय गणराज्य है । इस देश को संघीय गणराज्य कोई संविधान ने नहीं बनाया ।भारत स्वभाव और संरचना से ही एक संघीय राष्ट्र है । सदियों के सफर के अनुभवों और जरुरतों ने विभिन्न रीति रिवाजों और मिजाजों के समाजों को अपनी विशिष्ट पहचान के साथ राष्ट्र की एक राजनीतिक ईकाई में पिरोया । भारतीय समाज में यह सामाजिक, सांस्कृृतिक विविधता सदियों से चली आ रही है । रंगों की इसी छटा से भारत बनता है । एक राष्ट्र के रुप में भारत के अस्तित्व की गारंटी भी यही विविधता देती है । क्योंकि यह हर समाज को अपने इलाकों में अपनी परंपराओं, मान्यताओं, रीति-रिवाजों के अनुरुप जीवन बसर करने की आजादी देती है ।अनेक राष्ट्रीयताओं , उपराष्ट्रीयताओं के संगम ने ही भारत जैसे बहुधर्मी ,बहुभाषी, बहुसांस्कृृतिक और विविधवर्णी राष्ट्रराज्य का निर्माण किया है । यह उसकी ताकत भी है और एक राज्य के रुप में उसकी सीमा भी । वह कोई एक ही गोत्र में जन्मे लोगों की मोनोकल्चर प्रजाति जैसी सरल सामाजिक संरचना नहीं है ।अपने क्षेत्र के आर्थिक और प्राकृतिक संसाधनों पर उस अंचल के मूल निवासियों का पहला अधिकार है ।यह अधिकार भारतीय संविधान भले ही न देता हो परंतु यह उनका जन्मजात और प्राकृृतिक अधिकार है और यह सदियों से चला आ रहा है । यह अधिकार अनुल्लंघनीय है और भारत की एकता की गारंटी भी ।
जो लोग संविधान के तहत दी गई कहीं भी बसने और रोजगार पाने के अधिकार के दैवी अधिकार की तरह प्रचारित कर बिहार से हो रहे भारी पलायन को औचित्य प्रदान करने की कोशिश कर रहे हैं उनसे निवेदन है कि संविधान अपने अस्तित्व के लिए जनता की इच्छा पर आश्रित है । जनादेश के बल और वैधता के बिना संविधान एक रद्दी के ढ़ेर में पड़ी किताब है । वह तभी तक प्रभावी है जब तक जनमत उसके साथ है । संविधान यदि देश और समाज की आकांक्षाओं से तालमेल नहीं बिठा पाएगा तो लोग उसे ही बदल देंगे ।लोगों की इच्छा के खिलाफ किसी कानून या संविधान का पालन सिर्फ दमन से संभव है ।क्या यह उचित होगा कि भारतीय राष्ट्र बिहार से बड़े पैमाने पर हो रहे पलायन के कारणों का इलाज करने के बजाय उन समाजों का लाठी - गोली से इलाज करे जो अल्पसंख्यक होने और अपने संसाधनों पर औरों का कब्जा होने के डर से प्रतिक्रिया कर रहे हैं ?
किसी बाहरी तत्व के घुसने पर मानव शरीर भी स्वाभाविक प्रतिक्रिया करता है और एंटीबाॅडी बनाना शुरु कर देता है । शरीर का तापमान बढ़ जाता है और मेडिकल की भाषा में यह बुखार है । ऐसा सिर्फ शरीर के साथ ही नहीं होता बल्कि समाज और यहां तक कि प्रोफेशनल कहे जाने वाले व्यावसायिक और वाणज्यिक संस्थान भी इसी तरह से फारेन बाडीज का प्रतिकार करते हैं । इसलिए महाराष्ट्र ,असम या मध्यप्रदेश से आने वाली बिहारी विरोधी प्रतिक्रियाओं को राष्ट्रविरोधी कहकर प्रचारित कर रहे हैं उन्हे जानना चाहिए कि ये समाज आर्थिक ,राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक बुखार से तप रहे हैं ।इन समाजों को सहानुभूति और केयर की जरुरत है ।उनके भयों और चिंताओं को संबोधित करना होगा । हिंदी मीडिया और बिहार के नेताओं की दुत्कार से यह रोग गंभीर होगा और एक दिन लाइलाज होकर भारतीय राष्ट्रराज्य के लिए खतरा बन जाएगा ।दुख की बात यह है कि हिंदी हार्ट लैंड से समझदारी के स्वर गायब हैं और वे बिहारियों को रोकने वाले मराठियों , मध्यप्रदेशियों, असमियों का सर मांग रहे हैं ।
परंतु अब समय आ गया है कि पलायन को प्रोत्साहित करने वाली राजनीति के मंतव्य समझे जांय और उसे हतोत्साहित किया जाय ।वैज्ञानिक रुप से हर राज्य और शहर की मानव भार वहन करने की क्षमता तय की जाय और उसी के अनुरुप राज्यों या शहरों में आबादी के प्रवाह को नियंत्रित किया जाय । यदि ऐसा नहीं हुआ तो हिंदुस्तान के शहर नरक में बदल जायेंगे और उनके नागरिक जीवन को संचालित करना असंभव हो जाएगा ।दरअसल आब्रजन को लेकर जितना भी शोर उठा है वह बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश से अस्सी के दशक से बड़े पैमाने पर शुरु हुए पलायन की प्रतिक्रिया है ।आर्थिक उदारीकरण ने लोगों के जीवन को ज्यादा संकटपूर्ण बनाया है और उन्हे जानलेवा प्रतिस्पर्धा में झोंक दिया है । इसने नए सामाजिक - आर्थिक तनावों को जन्म दिया है । आज का हर समाज 1980 के मुकाबले ज्यादा चिड़चिड़ा और तुनुक मिजाज हुआ है ।आर्थिक रुप से उपयोगी प्राकृतिक संसाधनों और रोजगार के अवसरों को लेकर जंग तीखी और हिंसक होती जा रही है । बड़े समाजों की आक्रामकता के खिलाफ छोटे समाज लामबंद हो रहे हैं ।भारत कृत्रिम एकात्मकता से संघीय चरित्र और बहुलतावाद की ओर प्रस्थान कर रहा है ।
जब दुनिया के हर राष्ट्र को आब्रजकों की तादाद तय करने का अधिकार है तो हर राज्य को अपनी आबादी के अनुपात और जरुरत के हिसाब से यह तय करने का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए कि उसे कितनी संख्या और किस श्रेणी का मानव संसाधन चाहिए ।
उत्तराखंड,बिहार और पूर्वी यूपी समेत भारत में पलायन के जो भी मुख्यालय रहे हैं वहां रहन-सहन की स्थितियां बेहद खराब, रोजगार के साधनों का अभाव और गरीबी का साम्राज्य रहा है ।यह स्थितियां इन राज्यों के राजनीतिक नेतृत्व के भ्रष्टाचार, निकम्मेपन और स्वार्थी राजनीति के कारण पैदा हुई हैं । इन राज्यों का नेतृत्व अपने नागरिकों को गरिमामय जीवन और जीने की बेहतर परिस्थितियां देने में पूरी तरह विफल हुआ है ।अब सवाल उठता है कि पूर्वी यूपी या बिहार के नेताओं और सरकार की विफलता दंड महाराष्ट्र या मध्य प्रदेश , असम या किसी और राज्य के लोग क्यों भुगतें ? वे अपने रोजगार और अन्य साधनों पर हमले क्यों सहें ? अक्सर यह देखने में आता है कि जैसे ही राज ठाकरे या कोई और बाहरी लोगों के खिलाफ बयान देता है तो बिहार और पूर्वी यूपी के नेता आसमान सर पर उठा देते हैं ।पंजाब से लेकर राजस्थान तक कोई प्रतिक्रिया नहीं होती । साफ है कि इन दो इलाकों के नेता पलायन को जारी रखना चाहते हैं ताकि वे अपनी जनता को सुशासन और बेहतर जीवन देने के झंझट से बचे रहें ।सच यह है कि यदि बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश में जमीन का न्यायसंगत पुनर्वितरण हो जाय तो सारा पलायन रुक जाय ।क्योंकि पलायन करने वालों में अधिकांश गरीब हैं जो सामाजिक- आर्थिक कारणों से बाहर जा रहे हैं ।यदि इन इलाकों में हरित क्रांति के प्रयास युद्धस्तर पर किए जांय तो वहां भी पंजाब की तरह समृद्धि की कथा लिखी जा सकती है ।जाहिर है कि ये कठिन काम हैं जबकि राज ठाकरे को गाली देना आसान है । इससे बिहारी व पूरबिया क्षेत्रवाद भी भड़कता है और उससे वोट भी मिलता है । इस काम में इन नेताओं की मदद के लिये सवर्ण प्रभुत्व वाला हिंदी मीडिया भी जुट जाता है ।बिहार और पूर्वी यूपी की कृषि के सामंती ढ़ांचे के बने रहने में मीडिया के भी अपने स्वार्थ हैं ।
यह आश्चर्यजनक और अफसोसनाक है कि हिंदी मीडिया और बिहार व पूरब के नेता इस अंधाधुंध पलायन पर उंगुली उठाने या उसे रोकने वाली हर कोशिश को आनन फानन में देशद्रोह घोषित कर देते हैं ।पूछा जा सकता है कि क्या देश का मतलब सिर्फ बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश है ? यदि यही देश हैं तो ऐसे देश से भारत को खतरा है ।जो लोग अंधाधुंध आब्रजन का समर्थन कर रहे हैं वे भी क्षेत्रवादी आग्रहों के कारण ही ऐसा कर रहे हैं ।हद तो यह है कि ये क्षेत्र नेता भी निर्यात कर रहे हैं फिर बाकी समाजों के नेता क्यों नहीं विरोध करेंगे ? यदि गणेश उत्सव की प्रतिक्रिया में छठ उत्सव का राजनीतिकरण किया जाएगा तो प्रतिक्रिया क्यों नहीं होगी ? यदि बिहारी या पूर्वी यूपी के प्रवासी मराठी विरोध या अपनी अलग क्षेत्रीय राजनीतिक पहचान के लिए किसी अबु आजमी या कृपाशंकर को चुनेंगें तो सामान्य सोच का मराठी उनसे खतरा क्यों नहीं महसूस करेगा ? वह अपनी जमीन पर किसी और का राजनीतिक प्रभुत्व क्यों स्वीकार करेगा ? उसने महाराष्ट्र के निर्माण की लड़ाई कोई बिहार और पूर्वी यूपी के नेताओं के लिए थोड़े ही लड़ी है ।यह कैसे हो सकता है कि मीडिया और बिहार के नेता क्षेत्रवाद की राजनीति करते रहें और बाकी समाज देशहित में चुपचाप बैठे रहें ? यह स्वाभाविक है कि जैसी राजनीति आप करेंगे वैसा ही जवाब आपको मिलेगा ।
हमें इस सच को स्वीकार करना होगा कि कोई भी समाज अपने संसाधनों व रोजगार पर हमला बर्दाश्त नहीं करेगा और न ही अपनी भूमि पर अल्पसंख्यक होने की नियति स्वीकार करने को तैयार होगा ।आधुनिक लोकतंत्र के मक्का कहे जाने वाले पश्चिमी देशों तक में हिंसक प्रतिक्रियायें होने लगी हैं । यह इस बात का द्योतक है कि हर समाज एक निश्चित सीमा में ही बाहरी लोगों को बर्दाश्त कर सकता है । तिब्बत और पूर्वी तुर्किस्तान के मूल निवासियों को अल्पसंख्यक बनाने की चीनी नीति यदि गलत है तो ऐसी कोशिशें भारत में सही कैसे हो सकती है ? त्रिपुरा का उदाहरण सामने है जहां मूल निवासी अल्पसंख्यक हो गए और वे त्रिपुरा उपजाति समिति के तहत हिंसक आंदोलन करते रहे हैं । वहां माकपा का आधार माक्र्सवाद नहीं बल्कि बंगाली क्षेत्रवाद है । अन्य राज्यों में मूल निवासी अल्पसंख्यक हुए तो वे भी क्या हिंसक प्रतिरोध की ओर नहीं जायेंगे ? यह दुखद है कि हिंदी मीडिया भी इसे हवा दे रहा है । उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने एक ट्रेन मे महाराष्ट्र के निवासियों को खोज-खोज कर बेल्टों से पीटा । महाराष्ट्र में ऐसी ही घटना पर ‘‘राज के गुंडे’’ जैसे आक्रामक जुमले इस्तेमाल करने के लिए कुख्यात किसी हिंदी चैनल ने इसे गुंडागर्दी करार देना तो दूर ढंग से रिपोर्ट तक नहीं किया । राजठाकरे के खिलाफ अपने संपादकीयों में जहर उगलने वाले हिंदी अखबारों ने एक भी संपादकीय सपा की करतूत पर नहीं लिखा ।यह हिंदी मीडिया का अघोषित क्षेत्रवाद नहीं है तो क्या है ? यह अजीब रस्म है कि एक समुदाय क्षेत्रवाद चलाए तो सही और बाकी आत्मरक्षा में क्षेत्रवाद करें तो गलत ।वो कत्ल भी करें.....
मीडिया का यह क्षेत्रवाद हाल में अबु आजमी प्रकरण से भी नंगा हुआ है ।आजमी पर मनसे के विधायकों के हमले की रिपोर्टिंग पूरी तरह से विषाक्त और एकपक्षीय रही । न्यूज चैनलों में तो सदा की तरह इस पर भी हाहाकार मचा रहा । उनके यहां तो यह मुद्दा पाकिस्तान के हमले जैसा राष्ट्रीय संकट बना रहा । अखबारों ने भी पत्रकारिता की मर्यादाओं को लांघ दिया । उत्तर भारत के एक प्रमुख दैनिक ने शीर्षक दिया,‘ हिंदी पर हमला ’ दूसरे ने भी कुछ ऐसी ही भड़काऊ हैडिंग लगाई । इन हैडिंगों को देखकर अयोध्या में कारसेवकों पर हुए गोलीकांड के दौरान की गई सांप्रदायिक रिपोर्टिंग याद आ गई ।अबु आजमी हिंदी मीडिया के नए हीरो हैं क्योंकि वह अंग्रेजी के नहीं बल्कि मराठी के विरोधी हैं । हिंदी को भारतीय भाषाओं के खिलाफ खड़ा करने की इन साजिशों के कामयाब होने से हिंदी को ही घाटा होगा ।मराठी के विरुद्व हिंदी के लिए शोर मचाने वाला हिंदी मीडिया उन फिल्मी सितारों के आगे तो बिछा रहता जो नमक तो हिंदी का खाते हैं और मीडिया से बात अंग्रेजी में करते हैं ।किसी हिंदी अखबार या हिंदी चैनल ने हिंदी के साथ नमकहरामी करने वाले इन सितारों को छापने या टेलिकास्ट करने से इंकार नहीं किया ।
हिंदी के नाम पर हिंदी मीडिया के उन्माद के कोरस में सुधीश पचौरी का शामिल होना चकित करता है । उन्होने तो आजमी को मराठी के विरुद्ध हिंदी के धर्मयुद्ध का योद्धा तक घोषित कर दिया ।गनीमत है कि उन्होने आजमी को आज का लोहिया नहीं बताया । । राजनीति की वैतरणी पार करने के लिए हिंदी की पूंछ पकड़ने वाले आजमी किस किस्म के नेता हैं यह कौन नहीं जानता ।हिंदी को महाराष्ट्र में जिंदा रहने के लिए आजमी या किसी नेता की जरुरत पड़े ईश्वर करे ऐसा दिन हिंदी के इतिहास में कभी न आए ।हिंदी महाराष्ट्र में आजमी के लिए नहीं बल्कि अपने समृद्ध साहित्य व भाषायी सौंदर्य के लिए जानी जाय , पढ़ी जाय और उससे आम मराठी इसलिए नफरत न करें कि वह आजमी जैसे नफरत की राजनीति करने वाले नेताओं की भी भाषा है , काश! ऐसा हो ।पत्रकारिता की बुनियादी सिद्धांतों को ताक पर रखने वाले हाहाकारी हिंदी मीडिया को 10 नवंबर 09 के मराठी अखबार जरुर पढ़ने चाहिए जिनमें हिंदी को लेकर बबाल मचाने पर मनसे की लानत- मलामत की गई है ।पत्रकारिता का धर्म अखबार बेचने के लिए उन्माद पैदा करना नहीं है ।जो ऐसा कर रहे हैं वे अपने बाजारु स्वार्थ के लिए देश की एकता तोड़ रहे हैं और देशद्रोह इसी को कहते हैं ।इस सारी बहस का मतलब यही है कि क्षेत्रीयता और छोटे समाजों के मनोविज्ञान को समझा जाय और उनके द्वंदों को संबोधित करते हुए पलायन और आब्रजन पर कोई राष्ट्रीय नीति बने ।

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2009

कठिन वक्त में भाजपा

दो दशकों की सबसे भीषण मंहगाई और दो बार सत्तारुढ़ रहने से उपजा सत्ताविरोधी रुझान फिर भी भाजपा को महाराष्ट्र में मुंह की खानी पड़ी । लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के हाथों मात खा चुकी भाजपा के लिए यह कोई मामूली झटका नहीं है बल्कि इसका संदेश दूरगामी है । हरियाणा से लेकर अरुणाचल और महाराष्ट्र तक कहीं से भी उसके लिए दिल बहलाने के लिए भी कोई खबर नहीं है ।देश में सवाल पूछा जाने लगा है कि क्या भाजपा के दिन लद चुके हैं ? क्या भारतीय राजनीति में वह अप्रांसगिक हो चुकी है ? निश्चित तौर पर भाजपा के लिए यह कठिन समय है । बिडंबना यह है कि ऐसे वक्त में उसके पास न तो वाजपेयी जैसा नेता है जो अपनी छवि के बूते उदार हिंदुओं को मोह सके और न बाबरी मस्जिद जैसी कोई निर्जीव और कमजोर खलनायक जो उसकी झोली वोटों से भर दे ।
एक दल के रुप में भाजपा के सामर्थ्य और सीमाओं पर बात करने से पहले महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव नतीजों का विश्लेषण किया जाना जरुरी है । महाराष्ट्र में दस सालों से कांग्रेस की सरकार है और घोर कांग्रेसी भी यह मानेगा कि महाराष्ट्र में सरकार के खाते में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसके बूते उसे तीसरी बार सत्ता में बैठने का नैतिक अधिकार दिया जा सके । न तो उसके पास शीला दीक्षित की तरह विकास की जादुई छड़ी थी और न बेहतर कानून व्यवस्था और साफ-सुथरा प्रशासन कायम करने का यश । जनता के पास ऐसा कोई कारण नहीं था कि वह कांग्रेस को वोट दे ।इन सबसे ऊपर पिछले दो दशकों की ऐसी भीषण महंगाई है जिससे सिर्फ देश का गरीब तबका ही नहीं बल्कि मध्यवर्ग और उच्च मध्यवर्ग भी त्राहिमाम कर रहा है । लोगों की रोजी और रोटी दोनों खतरे में डाल दी गई हों , उनके भोजन की बुनियादी जरुरत दाल को रातों रात गायब कर दिया गया हो तब भी देश का सबसे मुखर और बड़बोला विपक्ष हार जाय ! महाराष्ट्र में भाजपा की हार को इसीलिए मामूली घटना मानकर हवा में नहीं उड़ाया जा सकता । क्योंकि यह प्रतिपक्ष के रुप में उसकी राजनीति और रणनीति के साथ नेतृत्व की भी हार है । भाजपा के नेतृत्व को राजनीतिक हालातों की कितनी समझ है इसका अंदाजा हरियाणा में अकेले चुनाव लड़ने के उसके फैसले से लगाया जा सकता है । यदि भाजपा इनेलो के साथ वहां चुनाव लड़ती तो हरियाणा से कांग्रेस का बिस्तर बंध गया होता । पार्टी ने यह फैसला तब भी वापस नहीं लिया जब हुड्डा ने विपक्ष में बिखराव देखते हुए समय से पहले चुनावों का ऐलान कर दिया । भाजपा के नेतृत्व ने संकीर्ण दलीय हितों के बजाय अपने दूरगामी हित सोचे होते तो उसे हरियाणा में मुंह छिपाने की जगह मिल गई होती ।दरअसल वस्तुगत परिस्थितियां विपक्ष के साथ होने के बावजूद यदि वह हार गई तो उसे अपने गिरेबान में झांकना चाहिए ।एमएनएस को वोट बंटवारे का दोषी ठहराने की कवायद खंभा नोचने जैसा खिसयाया विश्लेषण है ।क्या भाजपा इतनी नादान पार्टी है कि उसे यह भी पता नहीं कि लोकतंत्र में कोई न कोई वोट बांटने वाला हर चुनाव में मौजूद रहेगा । उसके वोट न बंटे यह पुरुषार्थ तो उसे ही दिखाना है ।भाजपा या किसी भी विपक्षी दल को वोट देने के लिए जनता के पास कोई वैध कारण और तर्क होना चाहिए । जनता को यदि यह भरोसा है कि अमुक दल के सत्ता में आने से उसके हालात बदलेंगे तो वह परिवर्तन के लिए वोट देगा । मनुष्य का स्वभाव परिवर्तन की इच्छा और यथास्थिति बनाए रखने की चाह का घालमेल है । परिवर्तन की पक्षधर ताकतें लोगों में यदि बेहतर कल के सपने को संचरित करने में कामयाब रहती हैं तो आम लोग परिवर्तन के पक्ष में लामबंद हो जाते हैं अन्यथा लोग जड़ता में पड़ा रहना पसंद करते हैं । जड़त्व का नियम सिर्फ निर्जीव वस्तुओं पर लागू नही होता वह समाजों और लोगों पर भी लागू होता है ।वस्तुओं की तरह समाज भी तभी आगे या पीछे सरकते हैं जब उन्हे कोई हिलाता - डुलाता है ।
यदि सन् 2004 से लेकर 2009 तक भाजपा की राजनीतिक सक्रियता का विश्लेषण किया जाय तो यह आईने की तरह स्पष्ट है कि इन पांच सालों में भाजपा ने ऐसा कोई पुरुषार्थ नहीं दिखाया कि वह उत्तर भारत की जनता को अपने पक्ष में वोट करने को प्रेरित कर सके ।इसे यूं भी कहा जा सकता है कि उसने लोकतंत्र में प्रतिपक्ष का अपना धर्म नहीं निभाया । भाजपा को इस मुगालते में रहने का अधिकार है कि संसद में मात्र उसका संख्याबल ही उसे देश का मुख्य प्रतिपक्षी दल बना देता है , पर व्यवहार में ऐसा है नहीं ।यदि राजनीतिक दल जनता के लिए निरंतर संघर्ष कर राजनीतिक पूंजी नहीं बटोरते तो उनका पूर्व के संघर्षों का संचित पुण्य भी क्षरित होने लगता है और एक दिन ऐसा भी आता है कि वे अतीत की पार्टियां बन जाती हैं । क्या भाजपा के साथ भी यही दोहराया जाने वाला है ? भाजपा की मुश्किल यह है कि वह सत्ता में तो आना चाहती है लेकिन उसके लिए जमीन पर लड़ना नही चाहती । उसके नेता अब सत्ता में आने के लिए सत्ता विरोधी रुझान के भरोसे बैठे हैं । उन्हे लगता है कि यह असंतोष उन्हे प्रतिपक्ष से उठाकर सत्ता में बैठा देगा ।सत्ता की राजनीति ने एक जमाने की इस लड़ाकू दक्षिणपंथी पार्टी को आरामतलब और शाही विपक्ष में रुपांतरित कर डाला है ।विहिप और आरएसएस जरुर चुनावों के आसपास यात्रायें और आक्रामक अभियान चलाकर उसके लिए हिंदू वोटों का जुगाड़ करते हुए दिखाई देते हैं । बदले हुए समय में संघ परिवार के ये उपक्रम कट्टर हिंदुओं को तो उसकी झोली में बनाए रखते हैं पर नया कुछ जोड़ते नहीं ।
अटल बिहारी वाजपेयी के राजनीतिक परिदृश्य से हटने के बाद उसके पास मध्यवर्ग को भा जाने वाला नेता नहीं है और कट्टरपंथी राजनीति की सीमायें बाबरी मस्जिद कांड के बाद साफ हो चुकी हैं ।करिश्माई नेता के नाम पर उसके पास सिर्फ नरेंद्र मोदी है लेकिन वह उन्ही हिंदुओं के नायक हैं जो पहले ही भाजपा के साथ हैं । राजनीतिक संस्कृति और आर्थिक नीतियों के सवाल पर भाजपा कांग्रेस का विकल्प नहीं बल्कि पूरक है । महंगाई,कालाबाजारी,जमाखोरी , मिलावटबाजी और रोजगार असुरक्षा के मुद्दे पर दोनों दलों ने आपस में राष्ट्रीय सहमति कायम कर ली है ।यानी दोनों दलों में कोई भी सत्ता में आए ये समस्यायें ऐसी ही रहेंगी ।जब जनता को यह बुनियादी बात पता है कि भाजपा के सत्ता में आने पर भी उसे कोई राहत नहीं मिलनी है तब वह क्यों भाजपा के पक्ष में खड़ी हो ? रही बात उच्च वर्ग की , तो वह मनमोहन सिंह , चिदंबरम से खुश है ही , इसलिए मीडिया भी उन पर मुग्ध है ।सवाल यह है कि ऐसी स्थिति में भाजपा किस वर्ग की राजनीतिक जरुरत है जो उसे सत्ता में आता हुआ देखना चाहेगा ? इस सवाल का जवाब ही तय करेगा कि भाजपा का क्या होगा ।भाजपा के लिए यह समय अपनी पूरी राजनीति पर समग्रता से सोचने का है । उसे तय करना होगा कि 21वीं सदी के भारत को क्या वह जनसंघ के नजरिये से देखना चाहती है या फिर कोई नया प्रस्थान बिंदु खोजना चाहती है । उसे ही तय करना है कि वह स्वायत्त राजनीतिक दल बनेगा या आनुषांगिक संगठन की नियति स्वीकार करेगा ।







शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

चिदंबरम के भारत को चाहिए गुलाम आदिवासी



देश के न्यूज चैनलों में इन दिनों एक बच्चे का रुदन है और उसका गुस्सा भी है, जिसमें वह बड़ा होकर पुलिस बनने की शपथ ले रहा है। आज से लगभग 10 साल बाद वह बच्चा जब पुलिस में भर्ती होने लायक होगा तब तक पुलिस कांस्टेबल के पद पर भर्ती होने की घूस कितनी होगी, यह कड़वा सच वह बच्चा नहीं जानता पर चैनल वाले जानते हैं लेकिन बताते नहीं क्योंकि सच बताने से उनकी नक्सलवाद विरोधी मुहिम की पोल खुल सकती है ।
न्यूज चैनलों के खबरनवीस और मालिक लोग चूंकि चिदंबरम के भारत के गणमान्य नागरिक हैं इसलिए ऐसे समय में जब पूरा देश मंहगाई और आर्थिक असुरक्षा से त्राहिमाम कर रहा है तब वे नक्सलवाद से परेशान हैं । हम सबको याद है कि नक्सलवाद के खिलाफ चैनलों के दुलारे चिदंबरम दरअसल इस देश और पाश्चत्य दुनिया में उदारीकरण के पोस्टर ब्वाय रहे हैं । वह भारतीय भद्रलोक के सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली प्रतिनिधियों में से एक हैं । अपने लोकसभा क्षेत्र में चमत्कारिक ढंग से हारते - हारते बचे चिदंबरम के नक्सलवाद विरोधी अभियान के गहरे अर्थ हैं । एक तो यह है कि यूपीए सरकार महंगाई के मोर्चे पर बुरी तरह विफल हुई है । समूचा मध्यवर्ग मंहगाई की मार से त्राहिमाम कर रहा है और केंद्र सरकार और राज्य सरकारें जमाखोरों और मुनाफाखोरों के आगे नतमस्तक हैं । आम लोगों में नौकरियां जाने और मंहगाई की दोहरी मार से गुस्सा है । यह गुस्सा लोगों को नक्सलवाद की ओर धकेल सकता है इससे चिदंबरम और उनका प्रभुवर्ग डरा हुआ है । नक्सलवादियों को तालिबानी टाइप के आतंकवादी के रुप में प्रचारित करने से उनके प्रति आम लोगों के झुकाव को रोका जा सकता है । तीसरा कारण यह है कि मध्यवर्ग आम तौर पर भावुक किस्म का देशभक्त होता है जिसके लिए देशभक्ति सीमा पर लड़ने और आतंकवाद के खिलाफ झंडा बुलंद करने तक सीमित होती है । नक्सलवाद के प्रति मध्यवर्ग के एक छोटे से हिस्से की सहानुभूति रही है । इसमें गांधीवादी, समाजवादी और विभिन्न आदर्शवादी विचारों से जुड़े वे लोग शामिल हैं जो देश के वंचित तबकों के मौजूदा हालातों में बुनियादी बदलाव लाने का सपना देखते हैं । मध्यवर्ग का यही हिस्सा है जो आदिवासियों और गरीबों के साथ पुलिस-प्रशासन,सरकार की ज्यादतियों को एक्सपोज कर देता है। इसलिए भी चिदबंरम चाहते हैं कि मध्यवर्ग में नक्सलियों की छवि देशद्रोही के रुप में स्थापित की जाय। ताकि इस वर्ग में नक्सलियों से सहानुभूति रखने वाले सीमित रहें। यह इसलिए है कि भारत का भद्रलोक देश में विशाल मध्यवर्ग के उभार से चिंतित भी है। उसके लिए यह वर्ग तभी तक प्रिय है जब तक वह उसके उत्पादों को खरीदता रहता है लेकिन यह वर्ग जैसे ही विचारधारा और बुनियादी बदलाव की बात पर आता है तो भद्रलोक चौकन्ना हो जाता है । उसे अपनी रोजी-रोटी कि चक्कर में घनचक्कर बना विचारहीन मध्यवर्ग तो चाहिए लेकिन समाज के मौजूदा ढ़ांचे को सर के बल खड़ा करने वाला सरफिरे(!) विचार के साथ नहीं।
एक और कारण है जिसके चलते माओवादी चिदंबरम और उनके भारत को सबसे ज्यादा चुभ रहे हैं । भारत के झारखंड , छत्तीसगढ़ और उड़ीसा जैसे राज्यों के आदिवासी इलाके संयोग से खनिज संपदा के खजाने भी हैं । इन इलाकों पर सदियों से बाहरी लुटेरों की नजर रही है। इस दौड़ में मल्टीनेशनल कंपनियां भी शामिल हैं । इन इलाकों में माओवादियों के वर्चस्व के चलते सरकार चाहकर भी इन कंपनियों को जमीन से लेकर सुरक्षा तक जरुरी सुविधायें नहीं उपलब्ध करा पा रही है। हाल ही में स्टील किंग लक्ष्मी निवास मित्तल द्वारा फैक्टरी न लगाने की धमकी को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए । यदि आदिवासी इलाकों को मल्टीनेशनल की चारागाह के रुप में विकसित किया जाना है तब आदिवासी प्रतिरोध को जड़मूल नष्ट करना चिदंबरम के भारत की जरुरत है। यह भारत दरअसल कई खतरों से दो चार है। मजदूर आक्रामक हो रहे हैं और वे उद्योगों के आला अफसरों पर हमला कर रहे हैं । शहरी भारत गरीबी के महासागर से घिरा है । आर्थिक विषमता भयावह रुप से बढ़ रही है जिसके परिणामस्वरुप आम जीवन में हिंसा बढ़ रही है। मामूली विवाद भी हिंसक रुप ले रहे हैं । यह फुटकर और निजी किस्म हिंसा है जो कि सरकारी आर्थिक नीतियों की अप्रत्यक्ष हिंसा का काउंटर प्रोडक्ट है। यह सब उस भारत को संकटग्रस्त कर रहा है जो आर्थिक कुंठाओं की सुनामी के बीच एक टापू बनकर रह गया है ।
इसीलिए कारपोरेट न्यूज चैनलों से लेकर चिदंबरम तक इलीट भारत नक्सलवाद का ऐसा हौवा खड़ा कर रहा है जिससे भारत की एक फीसदी जनता भी प्रभावित नहीं है और जिससे भारत के दो प्रतिशत समृद्ध आबादी के अलावा किसी को खतरा नहीं है। जब जनता के नाम पर नक्सलियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो सकती है तो चिदंबरम और राज्यों की पुलिस कालाबाजारियों व जमाखोरों के खिलाफ उतना सख्त रुख क्यों नहीं अपनाती । जबकि ये लोग देशद्रोही और जनता के दुश्मन नं0 1 हैं । क्या हम ऐसे अभिजात्य लोकतंत्र में रह रहे हैं जिसमें देश के सर्वशक्तिमान दो प्रतिशत हिस्से के दुश्मनों के खिलाफ तो कार्रवाई होती है पर 98 फीसदी लोगों के शत्रुओं को जनद्रोह करने की आजादी है।
माओवादियों की हिंसा पर अनेक सवाल उठाए जा सकते हैं और उठाए जाते रहेंगे । शायद माओवादियों को भी भविष्य में इस सवाल से जूझना पड़े । जैसा विषम और अन्यायपूर्ण भारत मनमोहन, चिदंबरम और उनका प्रभुवर्ग बना रहा है उसमें हिंसक टकराव होते रहेंगे। सेना को नक्सलियों के मैदान में उतारने से सेना की छवि को तो नुकसान होगा ही साथ ही यह कदम आने वाले 25-30 सालों में गृहयुद्ध की पटकथा भी लिख देगा । चिदंबरम भारत को सीमित नागरिक आजादी वाला पुलिस राज्य बनाने की ओर चल पड़े हैं । पहला हमला आदिवासियों पर हो रहा है । यदि यह कामयाब रहा तो आदिवासी तीरकमान के साथ फिर कभी लड़ते नहीं दिखाई देंगे । चिदंबरम के भारत का आदिवासी उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के मंच पर तीर कमान थामे तो दिखेगा पर बस्तर से लेकर संथाल और अबूझमाड़ की अपनी धरती पर हक के लिए तीर कमान के साथ नहीं बल्कि मजदूर के रुप में मल्टीनेशनल कंपनियों के अफसरों के सामने घुटने टेके दिखेगा । यदि यह हमारे सपनों का भारत है तो पाश के शब्दों को दोहराते हुए कहना चाहूंगा कि इस देश से मेरा नाम काट दो ।