<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-2819485710590251716</id><updated>2011-12-12T04:05:56.243-08:00</updated><category term='मेरी बात'/><category term='ब्‍लागिंग'/><category term='दस्‍तक'/><title type='text'>शब्‍द संसद</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://shabdsansad.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Shabd Sansad</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02242133088252450931</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='23' src='http://3.bp.blogspot.com/--JtNUUx-yvg/TsqTmToFzzI/AAAAAAAAALc/4vkSErAt6fE/s220/center%2Bpage%2B4%2Bth%2B%2BIssue%2B01.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>29</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2819485710590251716.post-4161697620289545414</id><published>2011-11-26T09:40:00.001-08:00</published><updated>2011-11-26T09:40:33.772-08:00</updated><title type='text'>इस थप्पड़ को यहां से देखो</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;h6 class="uiStreamMessage" data-ft="{&amp;quot;type&amp;quot;:1}" style="background-color: white; color: #333333; font-family: 'lucida grande', tahoma, verdana, arial, sans-serif; font-weight: normal; margin-bottom: 5px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px; word-wrap: break-word;"&gt;&lt;span class="messageBody" data-ft="{&amp;quot;type&amp;quot;:3}"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: x-small;"&gt;शरद पवार पर थप्पड़ मारे जाने की घटना को मीडिया और कुछ राजनीतिक दलों ने महंगाई से जोड़ दिया। यह एक तरह से इस घटना का औचित्य साबित करने की कोशिश है। अन्ना हजारे भी इस पर अपनी प्रसन्नता व्यक्त करने से खुद को नहीं रोक पाए और बोले ,‘‘ बस!एक थप्पड!!’’ गोया उन्हे उम्मीद रही हो कि शरद पवार पर और थप्पड़ मारे जाने थे। टीम अन्ना ने भी राजनीतिक लाभ उठाने की नीयत से इसे नेताओं की साख की ओर मोड़ दिया। किरन बेदी और कुमार विश्वास की प्रसन्नतायें भी इसी कारण उनके ट्वीट से बाहर छलक रहीं थी। इस पूरे वाकये पर समझदारी और परिपक्वता की जो अपेक्षा मीडिया और राजनेताओं से थी वे पूरी नहीृ हुई। लेकिन गुस्से की इन व्यक्तिगत अभिव्यक्तियों को यदि इनके विस्तार और संक्रामक रुप में देखें तो समझ में आ जाएगा कि भविष्य में एक गैर जिम्मेदार और सनसनी प्रिय मीडिया, साख खोए नेता और अन्ना हजारे जैसे गैर जिम्मेदार आंदोलनकारी देश के लिए कितनी आफत खड़ी कर सकते हैं।&lt;br /&gt;इस देश में बड़ी संख्या में लोग मीडिया से नाराज है।। क्या मीडिया पत्रकारों पर होने वाले हमलों का औचित्य इस आधार पर साबित करेगा कि मीडिया की रिपोर्टिंग सही नहीं हो रही है? क्या उन डाॅक्टरों,इंजीनियरों, वकीलों व्यापारियों और उद्योगपतियों पर थप्पड़ नहीं मारे जाने चाहिए जिन्होने आम लोगों का जीवन नर्क बना दिया है? क्या सरकारी अफसरों,एनजीओ के संचालकों को थप्पड़ नहीं मारे जाने चाहिए? अन्ना हजारे शरद पवार की पिटाई पर खुश हो रहे हैं तक प्रशांत भूषण और अन्ना समर्थकों की पिटाई करने का भी तो एक औचित्य भगत सिंह सेना के लोगों के पास है और उन्हे अपने औचित्य पर यकीन रखने का हक है।आप पीटे जांय तो लोकतंत्र को खतरा और दुश्मन पिटे तो लोगों का गुस्सा? यह कैसा कुतर्क है। यदि हरविदर के थप्पड़ का औचित्य है तो माओवादियों की हिंसा का औचित्य क्यों नहीं है? सरकारों ने करोड़ों लोगों का जीवन दूभर कर दिया है तो वे क्यों नहीं हथियार उठायें? एक विचारहीन थप्पड़ का औचित्य साबित करने में मीडिया के दिग्गजों से लेकर राजनीति और समाजशास्त्र,अर्थशास्त्र के सारे दिग्गज 12 घंटे तक न्यूज चैनलों पर जुटे रहे पर इसी दिन अपनी विचारधारा के कारण आदिवासियों के लिए हथियार उठाने वाले किशनजी की प्रतिहिंसा का औचित्य साबित करने के लिए एक भी आगे नहीं आया। क्या मीडिया और विपक्ष को विचारहीन अराजक हिंसा पसंद है और विचारधारा की हिंसा नापसंद है?किशनजी यदि मानते हैं कि क्रांतिकारी बदलाव के लिए हिंसा जरुरी है या राज्य की हिंसा का जवाब हिंसा ही है तो उसका भी औचित्य है। क्रांति का सपना देखने और उसे बंदूक के दम पर हासिल करने का सपना देखने का भी तो औचित्य है। क्या उनके औचित्य पर चर्चा करने से कारपोरेट मीडिया,संसदीय दल और टीम अन्ना इसलिए डरते हैं कि माओवादी उनकी राजनीति के लिए भी खतरनाक हैं? जबकि हरविंदर से शरद पवार के अलावा किसी को भी खतरा नहीं है। इसलिए सभी एक विचारहीन हिंसा का औचित्य साबित करने मंें जुटे हैं।&lt;br /&gt;दरअसल टीम अन्ना और भारतीय मीडिया थप्पड़ को जिस तरह से महिमामंडित कर रही है और जिस चालाकी से उसे जनभावनाओं का प्रगटीकरण बता रही है वह एक खतरनाक खेल है। बाबरी ध्वंस को भी इसी तरह अटल विहारी वाजपेयी ने जनभावनाओं का प्रगटीकरण बताया था। इस देश में हर हिंसक घटना का एक औचित्य है। हर वो वर्ग जिसे साथ अन्याय हो रहा है उसे हिंसा के जरिये अपना गुस्सा अभिव्यक्त करने का औचित्य प्रदान करने का मतलब देश को एक अराजकता की ओर धकेलना हैं। ऐसे में तो मतदाता चुनावों में वोट के जरिये अपना गुस्सा व्यक्त करने के बजाय अपने विधायकों और सांसदों पर जूते फेंकेगा और थप्पड़ो उनकी पिटाई करेगा। भारत में एक भी ऐसा राजनेता नहीं है जिस पर लोगों को भरोसा हो,एक भी नेता ऐसा नहीं है जिस पर लोगों को यह यकीन हो कि वह उनकी नियति बदल सकता है। कांग्रेस-भाजपा से लेकर कम्युनिस्ट पार्टियों तक दलों का नेतृत्व कुलीन और कान्वेंटी नेताओं ने हाईजैक कर लिया है। तीन बड़ी राजनीतिक धाराओं में कोई मास लीडर ही नहीं है। भारतीय राजनीति जब इतनी दरिद्रता से गुजर रही है तब जनता में गुस्सा,मोहभंग और क्षोभ भी होगा।यह लगभग वैसे ही हालात हैं जैसे हिटलर के उदय के समय जर्मनी में थे। नाकारा नेताओं के खिलाफ फैली अराजकता के ज्वार पर ही चढ़कर हिटलर आया था। क्या मीडिया से लेकर टीम अन्ना तक नेताओं को गलियाने वाले सारे लोग हिटलर के लिए ही रास्ता तैयार नहीं कर रहे हैं? क्या यह याद नहीं रखा जाना चाहिए कि तानाशाह सिर्फ सैनिक विद्रोहों के चोर दरवाजों से ही नहीं आए हैं बल्कि वे लोकतंत्र के राजमार्ग से भी गाजे-बाजे और गले में फूलमालाओं के साथ भी दाखिल हुए हैं।चैरीचैरा की हिंसा के बाद सत्याग्रह वापस लेने वाले गांधी मूर्ख नहीं थे।वह जानते थे कि भारत जैसे विशाल देश में लोगों को अपनी मर्जी से हिंसक होने की आजादी देना का मतलब अंग्रेजों देश में सैनिक तानाशाही थोपने का अवसर देना होगा। क्या हम नहीं जानते कि हर असहमति यदि थप्पड़ मारने का यह सिलसिला चल पड़ा तो यह तमाचा किसी दिन पत्रकारों के गाल पर भी पड़ेगा तो किसी दिन अन्ना या किरन बेदी के गाल पर भी। इसे बदलाव और संगठित प्रतिरोध की सकारात्मक ऊर्जा में बदलने के बजाय एक अराजक और विचारहीनता की नकारात्मक ऊर्जा की वकालत करना खतरनाक औा सस्ती लोकप्रियता से प्रेरित प्रवृत्ति है। आज जब देश में किसी में इतना नैतिक बल नही है कि राज्य की हिंसा समेत हर हिंसा का विरोध कर सके तब हममें से हर एक को किसी न किसी के हाथ से तमाचा खाने को तैयार रहना होगा।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/h6&gt;&lt;form action="https://www.facebook.com/ajax/ufi/modify.php" class="live_290319771008830_131325686911214 commentable_item autoexpand_mode" data-live="{&amp;quot;seq&amp;quot;:3921241}" method="post" rel="async" style="background-color: white; color: #333333; font-family: 'lucida grande', tahoma, verdana, arial, sans-serif; font-size: 11px; line-height: 14px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;&lt;span class="uiStreamFooter" style="color: #999999;"&gt;&lt;span class="UIActionLinks UIActionLinks_bottom" data-ft="{&amp;quot;type&amp;quot;:&amp;quot;20&amp;quot;}"&gt;&lt;button class="like_link stat_elem as_link" data-ft="{&amp;quot;type&amp;quot;:22}" name="like" 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वाकये पर समझदारी और परिपक्वता की जो अपेक्षा मीडिया और राजनेताओं से थी वे पूरी नहीृ हुई। लेकिन गुस्से की इन व्यक्तिगत अभिव्यक्तियों को यदि इनके विस्तार और संक्रामक रुप में देखें तो समझ में आ जाएगा कि भविष्य में एक गैर जिम्मेदार और सनसनी प्रिय मीडिया, साख खोए नेता और अन्ना हजारे जैसे गैर जिम्मेदार आंदोलनकारी देश के लिए कितनी आफत खड़ी कर सकते हैं।&lt;br /&gt;इस देश में बड़ी संख्या में लोग मीडिया से नाराज है।। क्या मीडिया पत्रकारों पर होने वाले हमलों का औचित्य इस आधार पर साबित करेगा कि मीडिया की रिपोर्टिंग सही नहीं हो रही है? क्या उन डाॅक्टरों,इंजीनियरों, वकीलों व्यापारियों और उद्योगपतियों पर थप्पड़ नहीं मारे जाने चाहिए जिन्होने आम लोगों का जीवन नर्क बना दिया है? क्या सरकारी अफसरों,एनजीओ के संचालकों को थप्पड़ नहीं मारे जाने चाहिए? अन्ना हजारे शरद पवार की पिटाई पर खुश हो रहे हैं तक प्रशांत भूषण और अन्ना समर्थकों की पिटाई करने का भी तो एक औचित्य भगत सिंह सेना के लोगों के पास है और उन्हे अपने औचित्य पर यकीन रखने का हक है।आप पीटे जांय तो लोकतंत्र को खतरा और दुश्मन पिटे तो लोगों का गुस्सा? यह कैसा कुतर्क है। यदि हरविदर के थप्पड़ का औचित्य है तो माओवादियों की हिंसा का औचित्य क्यों नहीं है? सरकारों ने करोड़ों लोगों का जीवन दूभर कर दिया है तो वे क्यों नहीं हथियार उठायें? एक विचारहीन थप्पड़ का औचित्य साबित करने में मीडिया के दिग्गजों से लेकर राजनीति और समाजशास्त्र,अर्थशास्त्र के सारे दिग्गज 12 घंटे तक न्यूज चैनलों पर जुटे रहे पर इसी दिन अपनी विचारधारा के कारण आदिवासियों के लिए हथियार उठाने वाले किशनजी की प्रतिहिंसा का औचित्य साबित करने के लिए एक भी आगे नहीं आया। क्या मीडिया और विपक्ष को विचारहीन अराजक हिंसा पसंद है और विचारधारा की हिंसा नापसंद है?किशनजी यदि मानते हैं कि क्रांतिकारी बदलाव के लिए हिंसा जरुरी है या राज्य की हिंसा का जवाब हिंसा ही है तो उसका भी औचित्य है। क्रांति का सपना देखने और उसे बंदूक के दम पर हासिल करने का सपना देखने का भी तो औचित्य है। क्या उनके औचित्य पर चर्चा करने से कारपोरेट मीडिया,संसदीय दल और टीम अन्ना इसलिए डरते हैं कि माओवादी उनकी राजनीति के लिए भी खतरनाक हैं? जबकि हरविंदर से शरद पवार के अलावा किसी को भी खतरा नहीं है। इसलिए सभी एक विचारहीन हिंसा का 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type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/8355049711719822034'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='इस थप्पड़ को यहां से देखो'/><author><name>Shabd Sansad</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02242133088252450931</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='23' src='http://3.bp.blogspot.com/--JtNUUx-yvg/TsqTmToFzzI/AAAAAAAAALc/4vkSErAt6fE/s220/center%2Bpage%2B4%2Bth%2B%2BIssue%2B01.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2819485710590251716.post-6192438648015925303</id><published>2011-06-17T08:23:00.001-07:00</published><updated>2011-06-17T08:45:26.529-07:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;जेपी, वीपी और अब रामादेव&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#3333ff;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;राजेन टोडरिया&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;आडवाणी जब यह कह रहे थे कि रामदेव प्रकरण भारतीय राजनीति में टर्निंग प्वांइट हो सकता है तो वह यूंही नहीं कह रहे थे। संघ परिवार के ये भीष्म पितामह भले ही पिछले लोकसभा चुनाव के बाद कलियुगी और कांग्रेसी मनमोहन के कारण शरसैया पर लेटने को मजबूर हों लेकिन उनकी इस बात में इतिहास की अनुगूंजें भी हैं और अनुभव भी। आडवाणी आरएसएस की उस टीम के महत्वपूर्ण मेंबर रहे है जिसने 1974 के जेपी आंदोलन और 1989 के वीपी आंदोलन के लिए जमीन तैयार की। इसी टीम ने इन दोनों आंदोलनों के लिए जरुरी खाद-पानी और गोला बारुद जमा किया। इन दोनों आंदोलनों से सबसे ज्यादा लाभ भी संघ परिवार को हुआ क्योंकि उसके पास जनअसंतोष को भुनाने के लिए ग्रास रुट तक संगठन था जबकि इन आंदोलनों के नेताओं का अपना कोई सांगठनिक आधार नहीं था। 1974 और 1989 की वही राजनीतिक पटकथा इस समय भी मंचित की जा रही है। मंच पर दिखने वाले पात्र और नायक बदल गए हैं पर सूत्रधार संघ परिवार ही है।अब जरा 1974 और 1989 के कालखंड की यात्रा करने चलें। अतीत की यात्रायें इसलिए भी की जानी चाहिए कि वे हमें अपने समाजों को जानने का मौका तो देती ही हैं साथ ही वे भविष्य में झांकने का अवसर भी मुहैया कराती हैं। कहते हैं कि इतिहास खुद को दोहराता है लेकिन हिंदी फिल्मों या धारावाहिकों की तरह उबाऊ और नीरस तरीके से नहीं दोहराता। वह हर बार नएपन के साथ आता है ताकि उसका रहस्य और रोमांच बचा रहे। 1974 और 1989 भारतीय राजनीति के ऐसे कालखंड रहे हैं जब कांग्रेस अभूतपूर्व कामयाबी के साथ सत्ता में आई थी। सन् 1974। बैंकों के राष्ट्रीयकरण,बांग्लादेश विजय जैसी विराट उपलब्धियों और गरीबी हटाओं के करिश्माई नारे की पीठ पर सवार होकर 1971 में कांग्रेस को दैत्याकार कामयाबी मिली। लेकिन 1974 आते- आते सारा प्रभामंडल फीका हो गया।लेकिन अहंकार के मद में चूर कांग्रेस को लगा ही नहीं कि उसके पैरों के तले जमीन खिसक रही है। लोगों की जिंदगी के बुनियादी सवाल जस के तस थे और मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग असंतोष से लबालब था। 1989 का साल। इंदिरा गंाधी की हत्या की सहानुभूति और सिख आतंकवाद के खिलाफ हिंदू बैकलैश से 1984 की भयंकर जीत ने कांग्रेस को अजेय होने के अहंकार से फिर भर दिया था। लेकिन लोगों की समस्याओं का कोई समाधान सरकार के पास नहीं था। जनता अपने आर्थिक संकटों से परेशान थी। 1974 और 1989 दोनों ही जनआकांक्षाओं के ज्वार के बाद की हताशा से जनमे। जेपी और वीपी ने इस हताशा को संबोधित किया और वे मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग में एक उम्मीद की तरह उभरे और एक आंदोलन जड़़ पकड़ता दिखा। हिंदू मध्यवर्ग के एक हिस्से में पैठ रखने वाले अपने के जरिये आरएसएस को पता चल गया कि इन दोनों आंदोलनों के भीतर एक बड़े जनांदोलन की संभावना है। आरएसएस जानता था कि 1974 का जनसंघ और 1989 की भाजपा और उसके नेताओं के बूते देश भर में मध्यवर्ग का एक बड़ा आंदोलन नहीं चलाया जा सकता। इसलिए उसने अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी को पृष्ठभूमि में सरका दिया और एक ही जैसे हालात में एक बार जेपी को आगे किया और इस घटना के ठीक 15 साल बाद बीपी सिंह को आगे कर दिया। इन दोनों के पीछे लोग जरुर थे और वे मध्यवर्ग के लोकप्रिय चेहरा भी थे लेकिन दोनों का अपना कोई सांगठनिक आधार नहीं था। आरएसएस यह जानता था कि जमीनी नेटवर्क न होने से इस आंदोलन से पैदा होने वाली ताकत से उसे नया विस्तार मिलेगा। उसने 1974 और 1989 के आंदोलनों के लिए देश भर में भीड़ जुटाने के काम में अपना कैडर झोंक दिया। इन दोनों आंदोलनों में एक और समानता है। ये दोनों आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरु हुए। इन दोनों ने सरकारी भ्रष्टाचार और कांग्रेस की लीडरशिप को निशाना बनाया। इस प्रकार महंगाई,बेरोजगारी,भुखमरी और गरीबी से जनमे गुस्से को सरकारी भ्रष्टाचार के राजनीतिक एजेंडे में बदल दिया गया। दिलचस्प बात यह है कि भ्रष्टाचार की इस लड़ाई में मुनाफाखोरों,कालाबाजारियों और नाजायज दाम वसूलने वाले निजी क्षेत्र के भ्रष्टाचार पर कोई उंगली नहीं उठाई गई। कटु सच यह है कि इसी वर्ग के गैर कांग्रेसी हिस्से ने इन आंदोलनों के लिए फंड जुटाया और गोयनका के मीडिया हाउस ने इसके प्रचार का जिम्मा उठाया। इन आंदोलनों का एक विशेषता और थी कि इन्होने बेहद चालाकी से महंगाई,गरीबी जैसे बुनियादी सवालों को बहस से हटाकर पूरी लड़ाई भ्रष्टाचार पर केंद्रित कर दी ताकि देश में बुनियादी बदलाव के लिए कोई आंदोलन पैदा होने से रोका जाय और जन असंतोष को सरकारी भ्रष्टाचार तक सीमित रखा जाय। इन दोनों आंदोलनों का लक्ष्य उत्तर भारत का मध्यवर्ग था। इन आंदोलनों को व्यापक बदलाव का औजार नहीं बनने दिया गया। इन आंदोलनों का निशाना साफ था। उनका लक्ष्य जनता की बुनियादी समस्याओं के हल के बजाय कांग्रेस की जगह चुनावी राजनीति में पराजित और पस्त दलों और नेताओं को पिछले दरवाजे से लाकर मंच पर प्रतिष्ठित करना था। दोनो आंदोलन मानते थे कि कांग्रेस के सत्ता से हटने से जनता की सारी मुश्किलें हल हो जाएंगी। दोनों आंदोलनों का सबसे ज्यादा लाभ संघ परिवार की राजनीतिक भुजा जनसंघ और भाजपा को हुआ। जबकि दोनों आंदोलनों से पहले इन्हे अपमानजनक हार झेलनी पड़ी थी। इससे साफ है कि आंदोलनों का राजनीतिक लाभ उठाने की क्षमता और योग्यता आरएसएस में सर्वाधिक है। हालांकि बीपी सिंह शातिर राजनेता थे उन्होने मंडल का अमोघ अस्त्र चलाकर संघ परिवार के कट्टर हिंदूवाद के रास्ते में पिछड़ावाद का स्पीड ब्रेकर लगा दिया। बावजूद इसके 1991 से लेकर 1999 तक भाजपा के उत्कर्ष की कहानी प्रस्तावना तो बीपी सिंह के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने ही लिखी।आज के हालात का जायजा लें तो कहा जा सकता है कि एक बार फिर भारत का मध्यवर्ग बेचैन है। उदारीकरण के बाद जितनी तेजी से देश बदला है उसने गरीबों और मध्यवर्ग के सामने नए संकट पैदा किए हैं। आर्थिक असुरक्षा, महंगाई, बेरोजगारी, भुखमरी के चजते देश के भीतर एक असंतोष घुमड़ रहा है। जाहिर है कि लोगों में सरकार के खिलाफ गुस्सा है लेकिन केंद्र की कांग्रेस सरकार अपने जीत के अहंकार में भी है और उसने तय कर लिया है कि चार साल तक वह लोगों के असंतोष की अनदेखी करने का जोखिम ले सकती है। चूंकि लोगों की नाराजी को संबोधित करने के लिए सरकार तैयार नहीं है और संसदीय विपक्ष जनता के मूल सवालों पर जनांदोलन छेड़ने की स्थिति में इसलिए नहीं है क्योंकि उसकी साख ही नहीं बची है। उसका चरित्र कांग्रेस से भी गया बीता है। इसलिए लोगों के भीतर जो गुबार है उसे निकासी का रास्ता चाहिए। यह असंतोष कहीं भट्टा परसोल के किसान विद्रोह के रुप में सामने आ रहा है तो कहीं माओवादी संघर्ष के रुप में। इस असंतोष को बुनियादी बदलाव की लड़ाई में बदलने से रोकने के लिए व्यवस्था का प्रतिरक्षा तंत्र सक्रिय हो गया है और उसने एंटीबॉडी बनानी शुरु कर दी हैं। अन्ना हजारे या बाबा रामदेव और तथाकथित सिविल सोसाइटी के नेता दरअसल यही एंटीबॉडी हैं। उदारीकरण से जनमे गरीबी,भुखमरी,बेरोजगारी,आर्थिक असुरक्षा और महंगाई के बुनियादी सवालों को सिर्फ सरकारी भ्रष्टाचार तक सीमित करने का यह पूरा आंदोलन उदारीकरण के जनविरोधी चेहरे से ध्यान हटाने की सोची समझी रणनीति है ताकि लोगों को बुनियादी बदलाव के क्रांतिकारी रास्ते पर जाने से रोका जा सके। 1974 और 1989 की तरह जनता की पूरी ऊर्जा को सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ मोड़ने से लाभ यह है कि लोगों का यकीन मनमोहन सिंह आडवाणी में भले ही न रहे पर वह अन्ना हजारे और बाबा रामदेव में बना रहेगा। इससे यह साबित नहीं होगा कि भ्रष्टाचार का यह चरम दरअसल उस उदारीकरण की उपज है जिसके विश्वकर्मा मनमोहन,चिदंबरम,यशवंत सिन्हा रहे हैं। भारतीय कारपोरेट की नजर में मनमोहन सिंह की उपयोगिता खत्म हो चुकी है और अब उसे नया चेहरा चाहिए। इसलिए अन्ना हजारे,रामदेव भारतीय कारपोरेट के सबसे दुलारे चेहरे हैं। इसलिए भी कि ये दोनों ही उस भारतीय मध्यवर्ग के लोकप्रिय आइकॉन हैं जो आईपॉड,कंप्यूटर, ब्रांडेडजीन्स,जूते जैसे उत्पादों का उपभोक्ता भी है। यह वही वर्ग है जो मोबाइल पर बतियाता है, कार,मोटर साइकिल पर सवार है। उदारीकरण से पैदा हुए इस अंधाधुंध उपभोक्तावाद में अन्ना हजारे गांधीवाद का और रामदेव धर्म का तड़का भी लगा देते हैं। इससे पूरी उपभोक्तावादी मध्यवर्गीय क्रांति थोड़ी और टेस्टी हो जाती है। भाजपा और आरएसएस को यह जायका इसलिए खास पंसद है क्योंकि वह जानते हैं कि अन्न्ना और रामदेव जो खीर पका रहे हैं वह आखिरकार उसी की प्लेट में आनी है। आरएसएस को तो बस इतना ही चाहिए कि जेपी और बीपी की तरह इस बार कांग्रेस का बिस्तर तो अन्ना हजारे और बाबा रामदेव बांध दें। मध्यवर्ग की क्रांति भी हो जाएगी और भ्रष्टाचार को जनम देने वाली उदारीकरण की व्यवस्था भी बची रहेगी। इसीलिए उसने रामदेव के पीछे एस गुरुमूर्ति, गोविंदाचार्य और आईबी के पूर्व चीफ अजीत डोबाल को लगाया। अब बाबा और अन्ना से जनता यह पूछने से तो रही कि कांग्रेस के सांपनाथ की जगह आप भाजपा के नागनाथ को क्यों ले आए?यह उनकी जवाबदेही भी नहीं है। ठगी हुई जनता खुद को कोसती हुई एक-दो दशक इसी अफसोस में गुजार देगी। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव का प्रभामंडल बनाने में चौबीसों घंटे जुटे न्यूज चैनलों की जिद है कि वे अपने बूते देश के मध्यवर्ग को सड़क पर उतार कर रहेंगे। कारपोरेट हितों के पहरुआ टीवी चैनलों के हाथों में मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग को अपना खिलौना बनाने की ताकत का आ जाना लोकतंत्र के लिए ही खतरनाक नहीं है बल्कि बुनियादी बदलाव के संघर्षों के लिए यह बुरी खबर है। न्यूज चैनलों का पूरा ध्यान इसी वर्ग पर है क्योंकि यह उपभोक्ता भी है और आंदोलनकारी भी। यह वर्ग चूंकि उदारीकरण और कारपोरेट के खिलाफ भी नहीं है इसलिए इसे लड़ाई का अगुआ बनाने में कोई जोखिम भी नहीं है। बाबा रामदेव के योगा समेत बाकी उत्पादों को भी इसी वर्ग की जरुरत है और अन्ना हजारे को चंदा देने वाली हिंदुस्तान लीवर को भी यही मध्यवर्ग रास आता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2819485710590251716-6192438648015925303?l=shabdsansad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsansad.blogspot.com/feeds/6192438648015925303/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2011/06/1974-1989-1974-1989-1974-1989-1974-1989.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/6192438648015925303'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/6192438648015925303'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2011/06/1974-1989-1974-1989-1974-1989-1974-1989.html' title=''/><author><name>Shabd Sansad</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02242133088252450931</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='23' 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में रखा यह अब छुपा हुआ तथ्य नहीं रहा। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक का जो नवीनतम स्टिंग आपरेशन सामने आया है उससे यह साफ हो गया है कि बाबा के अनशन के ड्रामे की पटकथा दरअसल आरएसएस, भाजपा और रामदेव के बीच बनी आपसी सहमति के बाद लिखी गई। केंद्रीय खुफिया एजेंसी आईबी के करीबी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार अप्रैल माह में हरिद्वार मूें हुई एक गोपनीय बैठक में इस अनशन का पूरा तानाबाना बुना गया। इसमें आरएसएस के कुछ बड़े नेता भी मौजूद थे। इसकी पुष्टि बीते दिन निशंक का ताजा वीडियो मिलने से हो गई है। इस वीडियो में निशंक भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी को बाबा रामदेव के अनशन को तोड़ने के बारे में अपडेट कर रहे हैं। इसमें वह कह रहे हैं कि बाबा से उनकी बात बीती रात को हो गई है और वह आज सुबह तक अनशन तोड़ देंगे। साफ है कि जब देश भर का मीडिया अनशन पर खबर कर रहा था तब ही भाजपा के शीर्ष नेतृत्व, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और बाबा रामदेव ने अनशन तोड़ने के लिए पूरा खाका तैयार कर लिया था। इसी के तहत रविशंकर को बुलाया गया था। बताया जाता है कि रविशंकर के आर्ट ऑफ लिविंग को जमीन देकर निशंक अब रविशंकर के करीबियों की सूची में हैं। सूत्रों ने बताया कि मीडिया में अनशन को दिन भर की कवरेज दिलाने की नीयत से ही शनिवार की सुबह अनशन तोड़ने का निर्णय लिया गया। शुक्रवार की शाम को ही इसकी पूरी तैयारी कर दी गई थीं। खुफिया विभाग के सूत्रों ने अप्रैल माह में हीं आरएसएस और बाबा रामदेव के बीच पक रही खिचड़ी के बारे में केंद्र सरकार को आगाह कर दिया था।बाबा रामदेव और आरएसएस के बीच अन्ना हजारे को किनारे करने के लिए संघ के करीबी बाबा रामदेव को भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का अगुआ बनाने और इसे 1974 और 1989 के आंदोलनों की तर्ज पर चलाने को लेकर अभी तक जो भी बात कही जा रही थी वह आरएसएस की प्रतिनिधि सभा की बैठक में लिए गए फैसले और आईबी की रिपोर्ट के हवाले से की जा रही थी। लेकिन बीते दिन इस पूरी कथित साजिश का वीडियो रिकॉर्ड मिल गया है। यह वीडियो टेप दरअसल उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के स्टिंग ऑपरेशन से हासिल किया गया है। इस टेप में वह मोबाइल पर किसी बाबूजी से बात कर रहे हैं और उन्हे रामदेव के अनशन तोड़ने के कार्यक्रम की जानकारी दे रहे हैं।यह बातचीत पिछली 12 जून यानी शनिवार की सुबह रिकॉर्ड की गई है। इसमें वह बता रहे हैं कि बाबा रामदेव से सारी बातचीत हो चुकी है। चूंकि श्री रविशंकर को 12 बजे जाना है इसलिए अनशन तोड़ने का कार्यक्रम 11 बजे का रखा गया है। वह कह रहे है कि बाबा रामदेव के साथ वह बीती रात यानी शुक्रवार की शाम ही अनशन तोड़ने का पूरा प्रोग्राम तय किया जा चुका है। टेप की बातचीत में निशंक बता रहे हैं कि उन्होने इस बारे में पूरी जानकारी दीदी यानी सुषमा स्वराज को भी दे दी है। वह भाजपा के बाबूजी को यह भी बता रहे हैं कि मौसम खराब होने के कारण अनशन तोड़ते समय उपस्थित नहीं रह पायेंगे। पर दूसरी ओर से बात कर रहे बाबूजी उन पर अनशन तोड़ने के वक्त मौजूद रहने के लिए जोर डाल रहे हैं। भाजपा के सूत्रों के मुताबिक निशंक लालकृष्ण आडवाणी को बाबूजी कहकर बुलाते है।। दरअसल वह आडवाणी से बात कर रहे थे और उन्हे रामदेव से हो रही बातचीत से हर वक्त अवगत करा रहे थे। इस बातचीत से इतना साफ हो गया है कि अनशन के इस नाटक के एक अहम किरदार भाजपाई दिग्गज लालकृष्ण आडवाणी भी थे। काले धन को लेकर चुनाव में जो शोर आडवाणी ने मचाया उसके बुरी तरह से फ्लॉप हो जाने से निराश आडवाणी ने रामदेव के जरिये इस मुहिम को आगे खुफिया एजेंसी आईबी ने अर्पैल माह में ही इसकी जानकारी भारत सरकार को दे दी थी। आईबी के करीबी सूत्रों के अनुसार हरिद्वार में हुई बैठक में एनडीए के कार्यकाल में आईबी के एक पूर्व प्रमुख रहे एक कट्टर हिंदूवादी सीनियर आईपीएस अफसर, गोविंदाचार्य और संघ के कुछ वरिष्ठ रणनीतिकार इस बैठक में मौजूद थे। बताया जाता है कि इससे पहले आडवाणी से इस बारे में संघ के नेंताओं की पूरी बातचीत हो चुकी थी औा यह तय कर लिया गया था कि डीएमके द्वारा समर्थन वापस लेने की सूरत पैदा होने से पहले देश भर में एक बड़ा आंदोलन चलाया जाय ताकि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर यूपीए सरकार को गिराया जा सके ताकि सन् 2014 के बजाय 2012 में ही लोकसभा चुनाव हो सकें। इसके लिए रामदेव को चुना गया और उन्हे एक निश्चित योजना कें तहत अन्ना हजारे के आंदोलन में घुसाया गया। जब अन्ना का आंदोलन लोकप्रिय होने लगा तो उससे रामदेव को बाहर निकाल कर पूरे मुद्दे को कालेधन के उसी मुद्दे पर केंद्रित कर दिया गया जिस पर आडवाणी चुनाव में मात खा चुके थे। कालेधन के इस आंदोलन की चपेट में आने वाले अधिकांश उद्योगपति चूंकि कांग्रेस से जुडे़ हैं, यह सूचना तत्कालीन गृहमंत्री आडवाणी के पास थी इसलिए तय किया गया कि इस बहाने कांग्रेस की चुनावी मशीनरी की आर्थिक रुप से कमर तोड़ दी जाय। यूपीए सरकार ने के पास जो खुफिया जानकारी थी उसमें आशंका व्यक्त की गई थी कि रामदेव का आंदोलन अप्रिय मोड़ भी ले सकता है और यह गोधरा कांड या 1989 के वीपी सिंह आंदोलन की ओर मुड़ सकता है। इस पूरे आंदोलन का निशाना सोनिया गांधी और राहुल गांधी थे और मनमोहन पर कोई प्रहार नहीं किया जाना था। कांग्रेस ने इस रणनीति को विफल करने के लिए रामदेव को पटाने की कोशिश भी की। इसी रणनीति के तहत चार मंत्री उनकी अगवानी के लिए भेजे गए। जब रामदेव आनाकानी करने लगे तो सरकार ने उनके ट्रस्टों और कंपनियों से जुड़ी फाइलें उन्हे दिखाकर दबाव बनाने की कोशिश की । वह दबाव में आ भी गए होते यदि आरएसएस,बीजेपी उन पर दबाव नहीं डालती। रामदेव के अनशन से उठने से इंकार करते ही केंद्र सरकार ने रामलीला ग्राउंड पर हमला बोल दिया। चूंकि उसके पास खुफिया रिपोर्टें थी कि बाबा के समर्थक पुलिस से टकराव नहीं लेंगे और उन पर न्यूनतम बलप्रयोग में ही काबू किया जा सकता है। केवल विहिप,बजरंग दल और आरएसएस,बीजेपी से जुड़े लोगों द्वारा पुलिस प्रतिरोध की आंशका थी जिसके लिए पुलिस को आंसू गैस के गोले ,लाठीचार्ज समेत सख्त उपाय अपनाने के आदेश दिए गए थे पर सूत्रों का कहना है कि पुलिस को सख्ती से बता दिया गया था कि किसी भी सूरत में वे गोली न चलायें ताकि इस पर कोई वितंडा खड़ा न हो। कांग्रेस की रणनीति यह थी कि किसी तरह वह रामदेव के पीछे दुपे आरएसएस और भाजपा को सड़क पर लाने में कामयाब हो जाय ताकि यह सिद्ध किया जा सके कि रामदेव दरअसल आरएसएस की कठपुतली है। अपनी इस रणनीति में कांग्रेस कामयाब रही है और अब निशंक ने इसके सबूत के तौर पर अपना वीडियो टेप भी उसके हवाले कर दिया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2819485710590251716-4457247860850732589?l=shabdsansad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsansad.blogspot.com/feeds/4457247860850732589/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2011/06/by-rajen-todariya-1974-1989-12-12-11.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/4457247860850732589'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/4457247860850732589'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2011/06/by-rajen-todariya-1974-1989-12-12-11.html' title=''/><author><name>Shabd Sansad</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02242133088252450931</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='23' 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हुसैन के जीवित रहते हुए उनके साथ हुए सलुक पर कभी सड़क पर आने की जरुरत नहीं समझी। तीसरी श्रेणी में वे लोग हैं जो हुसैन की मौत पर खुश भी थे और उनके चित्रों के लिए उन्हे गलिया भी रहे थे। हिंदू उन्मादियों का यह तबका मरणोपरांत भी हुसैन को माफ करने के तैयार नहींे है। उन्हे 90 साल के एक अशक्त और निहत्थे बूढ़े कलाकार को परेशान कर उसे देश छोड़ने के लिए बाध्य करने के भगवा ब्रिगेडों के शौर्य और पराक्रम पर कोई पछतावा नहीं है उल्टे वे इस पर मुग्ध हैं।हम जिसे भारतीय लोकतंत्र कहते हैं वह इन्ही तीन ताकतों से मिलकर बनता है। क्योंकि बाकी लोग जो हुसैन को जानते और पहचानते नहीं। वे वोटर तो हैं पर भारतीय लोकतंत्र में उनकी कोई भूमिका नहीं है। उस हाशिए के भारत को छोड़ दंे तो यही तीन तबके वह भारत को बनाते हैं जो उदारीकरण के बाद तैयार हुआ है। यह नया भारत है जिसे बाबा रामदेव, अन्ना हजारे ,कारपोरेट कंपनियां और टीवी चैनल तक सारे खोज रहे हैं। हुसैन के बहाने इस भारत की खोज की जानी चाहिए । उदारीकरण के बाद जनमे इस भारत को समझना इसलिए भी जरुरी है क्योंकि भारतीय लोकतंत्र की दिशा भी यही भारत तय करता है। जिन लोगों ने हुसैन के निधन पर एक भारतीय के नाते दुख व्यक्त किया वे भारत की उस उदात्त परंपरा के प्रतिनिधि हैं जो विभिन्न धाराओं और प्रवाहों की स्वायतत्ता का सम्मान करती है। यह धारा मानती है कि भारतीय राष्ट इन्ही अनेकताओं और मतभिन्नताओं के सम्मान से बनता है। उनका भारत इकहरा भारत नहीं है बल्कि वह विभिन्न रंगों और परस्पर विरोधी स्वभाव और स्वार्थ वाले धागों की ऐसी जटिल बुनावट वाली संरचना है जो एक दूसरे से टकराती भी हैं और एक-दूसरे में गहरी गुंथी हुई भी है। इस तबके के लिए हुसैन भारत की उस मनीषी परंपरा के प्रतिनिधि हैं जो चार्वाक,कालिदास, बाणभट्ट से लेकर गालिब, रविंद्रनाथ टैगोर तक अनगिनत धाराओं से मिलकर बनती है। दूसरी श्रेणी में वह तबका आता है जो हिंदू कट्टरपंथियों द्वारा हुसैन के साथ किए गये दुर्व्यवहार और उसके चलते उनके द्वारा देश छोड़े जाने की घटना से आहत है। यह वर्ग जानता है कि कला-साहित्य पर दलीय या सांप्रदायिक एजेंडा लागू करने के खतरे क्या हैं? ये लोग उस उन्माद के कारण लोकतंत्र के ताने-बाने पर पड़ने वाले असर से भली भांति वाकिफ हैं। मोटे तौर इन दोनो तबकों में भारत की विविधता की अकादमिक समझ रखने वाले लोग भी हैं और सतही समझ रखने वाले लोग भी हैं। वे भारत को उतना ही जानते हैं जितना वह किताबों,फिल्मों,वृत्तचित्रों समेत जनसंचार के विभिन्न माध्यमों से दिखाई देता है। इनके भारत का छोटा सा हिस्सा ही उनके अनुभवों से बनता है। इन दोनों तबकों की खासियत यह है कि उनको भारत से हुसैन का निर्वासन नागवार तो बहुत गुजरा है लेकिन वे तब बिल्कुल निष्क्रिय रहे जब संघ परिवार उच्चस्तर पर तय की गई अपनी रणनीति के तहत एम।एफ के खिलाफ देश के विभिन्न कस्बों,शहरों में मुकदमे दर्ज करवा रहा था। वे तब भी चुप थे जब हुसैन की प्रदर्शनियों पर भगवा ब्रिगेडों की अर्द्धविक्षिप्त भीड़ हमला कर रही थी। टीवी बहसों के लोकप्रिय चेहरे, सेकुलरवाद के धुरंधर पहरुए और कैंडिल मार्चों के संभ्रांत योद्धा तब सड़कों पर नहीं उतरे। उन्होने हस्तक्षेप करने के बजाय कला का मैदान उपद्रव कला में माहिर भगवा ब्रिगेडों की वानर सेना के लिए खुला छोड़ दिया था। जाहिर है कि जुबानी विरोध और कागजी चिंताओं के बूते सांप्रदायिक फासीवाद को पराजित नहीं किया जा सकता। हुसैन का आत्मनिर्वासन भगवा ब्रिगेडों के इन्ही हमलों से उपजी एक असहाय बूढ़े आदमी की हताश प्रतिक्रिया थी।इन दोनों तबकों से बिल्कुल अलग वह तबका है जो मुखर है और आक्रामक भी। उदारीकरण के बाद शहरी भारत और ग्रामीण अभिजात्य के मेल से जो भारत बना है उसमें यह तबका सबसे ज्यादा प्रभावी है। इसके पास उच्च मध्यवर्गीय और उच्च वर्गीय आर्थिक आधार भी है तो इसके पास उपद्रवों के जरिये विध्वंस के लिए दीक्षित निम्नमध्यवर्गीय वानर सेना भी है। यानी इसका सामाजिक आधार दो तरह के वर्गों से तैयार होता है। जहां उसे सांप्रदायिक युद्धों के लिए मानव बल की आपूर्ति निम्नमध्यवर्ग से होती है वहीं उसे सांप्रदायिकता और कट्टरता को फाइनेंस करने का धनबल उच्च मध्यवर्ग और उच्चवर्ग से मिलता है। आर्थिक कारणों से पैदा हो रहे असंतोष को सांप्रदायिक आधार पर मुस्लिमों और ईसाईयों की ओर मोड़ने से उच्चवर्ग के हित सुरक्षित रहते हैं। दरअसल भगवा ब्रिगेडें आर्थिक आधार पर विभाजन रोकने के लिए सांप्रदायिक विभाजन का एक बफर जोन तैयार करती हैं ताकि उच्च वर्ग के सेठ लोग मध्यवर्ग के उस गुस्से से बचे रहें जो आर्थिक असुरक्षा,महंगाई और बेरोजगारी से जमा हो रहा है। उदारीकरण के बाद जो विशाल मध्यवर्ग तैयार हो रहा है वह लोकतंत्र में मौजूद सारे लोकतांत्रिक स्पेस को तेजी से झपटता जा रहा है। इसका बड़ा हिस्सा स्वभाव से आक्रामक, बेचैन, रातोंरात अमीर बनने को उतावला और अंधविश्वासी है। भगवा ब्रिगेडों का प्रचार तंत्र इसके दिमाग में अपनी सूचनायें भरने में कामयाब रहा है। इसी प्रचार का कमाल है कि वे इस देश की दुर्दशा के लिए या तो मुसलमानों को जिम्मेदार मानते हैं या फिर आरक्षण का लाभ लेने वाले दलितों और पिछड़ों को। ये दोनों तबके लालू,मुलायम,मायावती से उनके भ्रष्टाचार से ज्यादा उनकी जाति के कारण नफरत करते हैं। इनका भ्रष्टाचार उनकी जातीय श्रेष्ठता की अवधारणा को तर्क और औचित्य प्रदान करता है। ये वर्ग नीतिश कुमार की आड़ में अपने सवर्ण कैनाइन टीथ छुपाए रखने में माहिर भी हैं ताकि उन पर सवर्णवाद का ठप्पा न लग सके। उन्हे पिछड़ों और दलितों के वे नेता पसंद हैं जो सवर्णों के साथ मेलमिलाप कर चलने में यकीन रखे न िकवे जो आक्रामक जातीय गोलबंदी में यकीन रखते हैं। आक्रामक हिंदूवाद में यकीन रखने वाले ये इन लोगों में अधिकांश नियमित पूजा करने के कायल भी हैं तो रात की शराब पार्टियों के शौकीन भी हैं। राजनीतिक रुप से इनमें से अधिकांश कांग्रेस विरोधी हैं पर इनमें से कई अपने सांप्रदायिक कलर के साथ कांग्रेस समर्थक भी हैं। कांग्रेस की जो नरम हिंदू सांप्रदायिकता है वह इन्ही तत्वों के प्रभाव से पैदा होती है।दिलचस्प यह है कि उदारीकरण से समृद्ध हुए इन लोगों में से भारत की उदात्त परंपरा से कोई लेना देना नहीं है। वे मुसलमानों से इस कदर नाराज हैं कि चार्वाक या कालिदास को नहीं जानना चाहते। वे मतभिन्नता की आजादी की सदियों पुरानी भारतीय विचार परंपरा को भी नहीं जानना चाहते। संघ परिवार की तरह वे भी अहिंसा और मतभिन्नता की आजादी या धर्मनिरपेक्षता को हिंदुओं की कायरता मानते हैं।यह ऐसा भारत है जो देश की सारी समस्याओं के लिए बाबर, मुसलमानों, महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरु को जिम्मेदार मानता है। ये भगत सिंह और सुभाष बोस को उनकी समाजवादी विचारों के लिए नहीं पूजते बल्कि गांधी विरोध के लिए पूजते हैं। कम्युनिस्ट होने कारण वे चीन से नफरत भी करते हैं और ताकतवर होने के कारण उसके प्रशंसक भी हैं।उनका सबसे बड़ा और दिलचस्प अंतर्विरोध यह है कि वे इस्लाम से नफरत भी करते हैं और उसकी कट्टरता के कायल भी हैं। हिंदुओं का कोई राजनीतिक और धार्मिक सत्ता केंद्र न होने से वे परेशान हैं इसलिए वे इस्लाम और सिख धर्मो पर फिदा हैं। आक्रामक सांप्रदायिकता के कायल ये लोग इस्लाम और सिखिज्म की तरह हिंदुओं में भी एक अर्द्ध धार्मिक,अर्द्ध राजनीतिक सत्ताकेंद्र विकसित करना चाहते हैं ताकि साधु-संतों और संघ परिवार के मध्ययुगीन सामंती गिरोहों को हिंदुओं के लौकिक जीवन को भी नियंत्रित करने का अधिकार मिल सके। दरअसल उन्हे लोगों के लौकिक व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए फतवा देने का इस्लामी अधिकार चाहिए। हुसैन के खिलाफ फतवा देकर उन्होने बताया भी कि उनके पास अपने फतवों को लागू करने की ताकत भी है। इनमें से कई लोग अक्सर तर्क देते हुए मिल जायेंगे कि क्या एमएफ हुसैन मोहम्मद साहब के चित्र बना सकते थे? चूंकि इस्लाम हुसैन को यह आजादी नहीं देता इसलिए हिंदूधर्म को भी उन्हे यह आजादी नहीं देनी चाहिए। जाहिर है कि वे इस्लाम के इसी कट्टरपन के कायल हैं। यह भले ही अजीब लगे लेकिन सच्चाई यही है कि मुसलमान बिरादरी के बाहर इस्लामी कट्टरता का अनुसरण करने वाला यह सबसे बड़ा तबका है। इस मायने में वे अयातुल्ला खुमैनी और तालिबानी मुल्ला उमर के सबसे करीबी सहोदर हैं। ये भी उमर और खुमैनी की तरह अपने धर्म के उदारवादियों के खून के प्यासे हैं और सबसे पहले इन्हे ही कत्ल करने का हक हासिल करना चाहते हैं। यदि उनके धार्मिक और राजनीतिक डीएनए का परीक्षण किया जाय तो वे भारतीय मनीषी परंपरा के बजाय अरबी नस्ल के ज्यादा करीब हैं। अंतर बस इतना है कि यदि खुमैनी और मुल्ला उमर का ब्लड ग्रुप ‘ओ पॉजीटिव’ मान लिया जाय तो इनका ब्लड ग्रुप शर्तिया ‘ओ नेगेटिव’ ही निकलेगा। उनका हिंदू धर्म दरअसल इस्लाम का नेगेटिव संस्करण है। कोई भी नेगेटिव मौलिक नहीं होता बल्कि अपने पॉजिटिव का ही उल्टा होता है। यह तबका खुद तो लोकतंत्र के सारे लाभ लेना चाहता है पर जब बाकी लोग इनके खिलाफ अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोग करना चाहते हैं तब ये बिदक जाते हैं। इस्लाम के नक्शे कदम पर चलते हुए ये भी यही चाहते हैं कि हिंदू देवी-देवता, अवतारों के लौकिक व्यवहार पर कोई सवाल न उठे। सदियों से भगवान राम, कृष्ण समेत अन्य देवताओं पर उठाए जा रहे सवाल अब न उठाए जांय। शंबूक की हत्या से लेकर बालि वध और सीता को निकाले जाने तक जो सवाल हैं वे आज न पूछे जांय।जाहिर है कि वे एक तर्क पर आधारित समाज नहीं बल्कि अंधविश्वासी भेड़ों की जमात चाहते हैं ताकि धर्म के गडरिये भारतीय जनता को अपने हिसाब से हांकते रहें।वे चाहते हैं कि खरबों रुपए जमा करने वाले साधु-संतों,पंडे-पुजारियों के गिरोहों को गाय की तरह पवित्र, अवध्य और अलौकिक घोषित कर दिया जाय ताकि उनकी लूट जारी रहे।उदारीकरण ने भारतीय समाज के परंपरागत उदात्त स्वरुप को बुरी तरह से प्रभावित किया है। भारतीय समाज में उन्मादी और आलोचना बर्दाश्त न कर सकने वाली राजनीति का एक स्पेस विकसित हो चुका है। इसे एमएफ हुसैन के बहाने भी समझा जा सकता है और बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलनों से भी। क्योंकि लोकतांत्रिक अधिकार के नाम पर शुरु किए गए इन दोनों मध्यवर्गीय आंदोलनों के भीतर भी नेतृत्व पर सवाल उठाने का जनतांत्रिक स्पेस गायब है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2819485710590251716-8333560697598615156?l=shabdsansad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsansad.blogspot.com/feeds/8333560697598615156/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2011/06/by-rajen-todariya-90.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/8333560697598615156'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/8333560697598615156'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2011/06/by-rajen-todariya-90.html' title=''/><author><name>Shabd Sansad</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02242133088252450931</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='23' 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पूरी शक्ति,सामर्थ्य और जुनून के साथ छोटे अखबारों के गला घोंटने के लिए भी याद करेगा। भविष्य मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के व्यक्तित्व को इस विरोधाभास की रोशनी में पढ़ेगा और इस अजूबे से विस्मय में भी पड़ेगा। वह शायद इतिहास में अकेले ऐसे पत्रकार राजनेता होंगे जो मात्र कुछ सैकड़ा बंटने वाले छोटे-छोटे अखबारों में भी असहमति और आलोचना के स्वर बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं। यह इस बात का भी सबूत है कि सत्ता आदमी को किस हद तक दुर्बल,दयनीय और असहिष्णु बना देती है।उत्तराखंड में बड़े अखबारों और क्षेत्रीय चैनलों को मिलाकर मीडिया की कुल जमा जो तस्वीर बनती है वह चारण अखबारों और चमचा चैनलों की बनती है। काश! हमारे समय में भी कोई भारतेंदु हरिश्चंद्र होते तो मीडिया की इस दुर्दशा पर कोई नाटक जरुर लिखते। फिर भी मीडिया की इस दुर्दशा का पूरा श्रेय सिर्फ मौजूदा मुख्यमंत्री के पुरूषार्थ को देना ठीक नहीं होगा। एनडी तिवारी ने अपने राजनीतिक जीवन के पूरे अनुभव को झोंकते हुए करोड़ों रु0 की खनक के बूते मीडिया की इन कुलीन कुलवधुओं को नगरवधू बना दिया। तिवारी की ही परंपरा पर चलते हुए मौजूदा मुख्यमंत्री ने इन्हे हरम पहुंचा दिया है। विज्ञापन का बजट हर रोज छलांगें मार रहा है। अंतःपुर के कारिंदे रोज किसी न किसी को लाख-दो लाख से लेकर तीस-तीस लाख के पैकेजों की बख्शीशें दिला रहे है। राजा ने अपना खजाना खोल दिया है, ‘‘लूट सके तो लूट’’। प्रदेश में अभूतपूर्व आपदा है, पहाड़ के गांवों में लोग एक-एक पैसे और एक टाइम के खाने के लिए जूझ रहे हैं पर सरकार है कि चैनलों में प्राइम टाइम में दस साल का जश्न पर करोड़ों के विज्ञापन लुटा रही है। विधानसभा चुनाव से पहले की इस लूट में मीडिया मस्त है और पत्रकारिता पस्त है। यह सुनकर अजीब लगे पर सच यही है कि आपदा के दौरान भी उत्तराखंड के दैनिक अखबारों और क्षेत्रीय चैनलों के लिए विज्ञापन कम नहीं हुए उल्टे बढ़ गए । आपदा को लेकर दिए गए विज्ञापनों के आंकड़े इस उलटबांसी के गवाह हैं। अखबारों ने आपदा के नाम पर भी विज्ञापन कमाई के जरिये निकाल लिए।एक हिंदी अखबार ने राहत कार्यों पर सरकार की चमचागिरी का नया रिकार्ड कायम कर दिया। ऐसा घटियापन कि कल्पना करना मुश्किल है कि खरबों रु0 का मीडिया हाउस चलाने वाली कंपनी का एक अखबार मात्र 28 लाख रु0 के पैकेज के लिए इस हद तक गिर जाएगा!लेकिन यह कोई अपवाद नहीं है। ऐसे वाकये अक्सर होते रहते हैं सिर्फ अखबारों के नाम बदल जाते हैं। कुछ अखबार चमचागिरी में शऊार बरतते हैं तो कुछ नंग-धड़ंग होकर 17 वीं सदी के भांडों की तरह इसे अंजाम दे रहे हैं। उत्तराखंड में बड़े दैनिकों ने संपादक को ऐसे प्राणी में बदल दिया गया है जो सरकारी विज्ञापनों के लिए मुख्यमंत्री को रिझाने और पटाने के वे सारे गुण जानता हो जो एक समय गणिकाओं के लिए जरुरी माने जाते थे। माहौल ऐसा है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग सुबहो शाम समाचार माध्यमों में ‘तन डोले मेरा मन डोले’ की धुन ही सुनना चाहते हैं। मुख्यधारा के इस रवैये ने राज्य की पत्राकारिता को भांडगिरी में बदल दिया है। एक अखबार ने मुख्यमंत्री के पुतले जलाने की घटनाओं की खबरें छपने से रोकने के लिए संवाददाताओं को पुतलादहन की खबरें न भेजने का फरमान जारी कर दिया तो दूसरे ने राजनीतिक खबरें छोटी और बाजार से जुड़ी खबरें बड़ी छापने की आचार संहिता लागू कर दी है। अखबार और चैनलों के दफ्तरों में ऐसी खबरों का गर्भपात कर दिया जाता है जिनमें थोड़ा भी मुख्यमंत्री विरोध की गंध आती हो। मंत्रियों और अफसरों के खिलाफ छापिए पर उतना ही जितने में मुखिया की छवि पर असर न पड़े, यह अलिखित आचार संहिता अखबारों और चैनलों के ऑफिसों में लागू है। खबरें न छापना आज सबसे बड़ा कारोबार बन गया है। पत्रकारिता की पेशेवर ईमानदारी का हाल यह है कि पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी की खबरें अखबारों और चैनलों से सिर्फ इसलिए गायब कर दी गई हैं क्योंकि सत्ता के शिखर पुरूष को चैनलों और अखबारों में जनरल नाम तक देखना पंसद नहीं है। समाचार माध्यम इस संकीर्णता और अनुदारता के राजनीतिक एजेंडे के एजेंट बने हुए हैं। गौरतलब है कि ये वही अखबार और चैनल हैं कि जो जनरल के मुख्यमंत्रित्व काल में उनकी ईमानदारी के कसीदे पढ़ रहे थे। वह वक्त चला गया जब बड़े अखबार सरकारी दबाव झेलने के लिए ज्यादा बेहतर माने जाते थे और तमाम दबावों के बावजूद वे सत्ता की दौलत और ताकत के आगे तने दिखते थे। अब ऐसा समय है जब ये अखबार सरकारी विज्ञापनों के बिना जिंदा ही नहीं रह सकते हैं। पहले छोटे अखबार अपनी आर्थिक संसाधनों की सीमाओं के चलते ज्यादा नाजुक माने जाते थे। बाजार की महिमा देखिये कि उसने कई हजार करोड़ के बड़े-बड़े मीडिया हाउसों को छुईमुई बना दिया है। चारणों और चमचों की पांत में सबसे आगे वे ही हैं जो सबसे बड़े हैं।लेकिन क्षेत्रीय चैनलों और बड़े अखबारों के पतित होने से सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध की आवाजें दबी नहीं हैं। उत्तराखंड के स्थानीय और छोटे अखबारों के एक हिस्से ने सरकार के आगे घुटने टेकने से इंकार कर दिया है। यह एक सकारात्मक बदलाव है। इस हिस्से में लगातार घोटाले छप रहे हैं, मुख्यमंत्री के खिलाफ खबरें और विश्लेषण छप रहे हैं। इससे हैरान और परेशान मुख्यमंत्री ने पहले घोषणापत्र की आड़ में इन छोटे अखबारों को धमकाने की कोशिश की, सूचना विभाग के अफसर खबरों पर संपादकों के जबावतलब करने की हद तक चले गए। इस पर शर्मिंदा होने के बजाय एक छोटे अखबार के स्वामी,प्रकाशक और संपादक रहे राज्य के मुखिया की छाती गर्व से फूलती रही कि उन्होने छोटे अखबारों को उनकी औकात बता दी। उनके मुंहलगे अपफसर और कांरिंदे हर रोज विरोध में लिखने वाले अखबारों का आखेट करने के तौर तरीके खोजने में लगे हैं। इसी के तहत सचिवालय और विधानसभा में छोटे अखबारों के घुसने पर पाबंदी लगा दी है। जबकि बड़े अखबार वहां बांटे जा सकते हैं। सत्ता के इन शुतुरमुर्गों को यह समझ नहीं आ रहा है कि सरकार के कुछ अफसरों और कर्मचारियों के न पढ़ने से क्या मुख्यमंत्राी के खिलाफ आए दिन छपने वाली खबरों और घोटालों की मारक क्षमता कम हो जाएगी? जाहिर है कि आम लोगों तक तो वे पहुंचेंगी ही। ऐसे कदम एक सरकार की बदहवासी और डर को जाहिर करते हैं और उस पर कमजोर सरकार का बिल्ला भी चस्पा कर देती हैं। तानाशाही सनकों से भरे ऐसे फैसलों  के बावजूद न छोटे अखबार डर रहे हैं और न मुख्यमंत्री के खिलाफ खबरें छापने से बाज आ रहे हैं। यह एक तरह से छोटे प्रेस की गुरिल्ला लड़ाई है जो सत्ता के महाबली शिखर पुरुष पर हमले कर उसे बेचैन किए हुए है। जिसने मुख्यधारा के मीडिया को लौह कपाट वाले अपने काले-कलूटे गेट पर चौकीदारी के लिए बांध दिया है, ऐसे शिखर पुरुष के खिलाफ छोटे अखबारों की यह लड़ाई महत्वपूर्ण भी है और सत्ताधारियों के लिए चेतावनी भी है कि वे समूचे प्रेस को दुम हिलाने वाला पालतू पशु में नहीं बदल सकते। कुछ लोग हर समय रहेंगे जो सत्ता के खिलाफ सच के साथ रहने का जोखिम उठायेंगे। यह सिलसिला चलता रहेगा। उल्लेखनीय यह है कि चारणकाल में सच कहने की जुर्रत करने वाले इन सारे छोटे अखबारों,पत्रिकाओं की कुल प्रसार संख्या मुश्किल से कुछ हजार ही है। जो लाखों छपने और बंटने वाले दैनिक अखबारों की दस फीसदी भी नहीं है लेकिन इतनी कम संख्या के बावजूद राज्य के मुखिया इनसे घबराये हुए हैं। लाखों पाठक और दर्शक संख्या वाले अखबार और चैनलों सुबह-शाम प्रशस्ति वाचन के कर्मकांड में लगे हुए हैं तब भी विरोध की इन तूतियों से राजा क्यों हैरान हैं? दरअसल इन अखबारों ने खबरों के असर के उस तिलिस्म को तोड़ दिया है जो बड़े अखबार प्रचारित करते रहे हैं। खबरों पर बड़े अखबारों का एकाधिकार ही नहीं टूटा है बल्कि उनकी सीमायें, दरिद्रता और दयनीयता भी उघड़ गई है।  पत्रकारिता के इस समर में वे कागजी शेर साबित हो रहे हैं,उनकी कथित ताकत का मिथक टूट रहा है। जनमत को प्रभावित करने में उनकी भूमिका अब सिफर हो गई है। उनकी हर खबर पर उंगलियां उठती हैं और उसे सत्ता या स्थानीय ताकतवर लोगों के हाथों बिकी हुई खबर मान लिया जाता है। उन्हे खबरों का सौदागर करार दिया जा रहा है। उनके दफ्तरों में सच को कत्ल करने के लिए जो कसाईबाड़े बने हैं उनकी दुर्गंध अब जनता तक पहुंचने लगी है। राज्य के लोग समझ रहे हैं कि राजा नंगा है पर खबरों के ये दुकानदार उसके कपड़ों के डिजायन की तारीफ में पन्ने रंग रहे हैं। मुख्यधारा के समाचार माध्यमों की साख के इस तरह निम्नतम स्तर पर पहुंच जाने से ही आम लोग खोज-खोज कर सरकार विरोधी खबरें पढ़ रहे हैं। इससे इतना तो पता चल ही जाता है कि लोगों का रूझान बदल रहा है,जिस पाठक को मीडिया के महारथी ‘विचारविहीन उपभोक्ता’ प्राणी घोषित कर चुके हैं उसका मिजाज बदल रहा है। वह बदलाव के मोर्चे पर भले ही लड़ाई नहीं लड़ रहा हो पर वह सत्ताधरियों के काले सच को विचार के साथ जानना चाहता है। उत्तराखंड कभी भी वैचारिक रुप से गंजे लोगों की नासमझ भीड़ नहीं रहा है। उसके भीतर सच जानने को उत्सुक समाज है। लोकप्रियता में आये इस उछाल से छोटे अखबारों को भी मुगालते में नहीं रहना चाहिए। यह उनका नहीं उस सच का चमत्कार है जो वे छाप रहे हैं। छोटे अखबार यदि अपने हीनताबोध से उबर सकें तो वे साबित कर सकते हैं कि अखबार बड़े या छोटे नहीं होते, ये खबरें हैं जो अखबारों को बड़ा बनाती हैं तो उन्हे छोटा भी साबित कर देती हैं। खबरों की मारक सीमा और क्षमता हर साल जारी होने वाले प्रसार संख्या के निर्जीव और गढ़े गए आंकड़ों से तय नहीं होती। खबरों में सच और दम होता है तो वे एक मुख से दूसरे मुख तक होते हुए या फोटोस्टेट होकर भी कई गुना घातक हो जाती हैं। सच और अपने समाज की समझ मामूली माने जाने वाली खबरों को भी कालजयी बना देती है।उत्तराखंड के पत्रकारिता क्षितिज पर घट रही यह छोटी सी घटना बताती है कि देश के स्तर पर पत्रकारिता को समर्पित छोटे अखबारों,चैनलों और इंटरनेट अखबारांें के बीच यदि राष्ट्रीय स्तर पर तालमेल और संवाद स्थापित हो सके तो जनपक्षीय पत्रकारिता का एक बड़ा गठबंधन भविष्य में उभर सकता है। यह कठिन है पर इस दिशा में गंभीर प्रयास शुरू किए जाने चाहिए। मीडिया हाउसों के एकाधिकारवादी भस्मासुरों के खिलाफ यह पत्रकारिता के जनतंत्राीकरण और विकेंद्रीकरण की शुरूआत हो सकती है।&lt;br /&gt; &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2819485710590251716-4386606731371951894?l=shabdsansad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsansad.blogspot.com/feeds/4386606731371951894/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' 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देश के सबसे बेहतरीन सरकारी तंत्र हैं। केंद्र में कई जिम्मेदारियां निभा चुके एक रिटायर्ड आईएएस अफसर ने इस आंकड़े पर टिप्पणी करते हुए कहा,‘ अविश्वसनीय! विचित्र!! और बचकाना!!! उन्होने आगे कहा,‘ लगता है आपके मुख्यमंत्री पिस्तौल पाने के लिए तोप का लाइसेंस मांग रहे हैं।’ आपदा राहत के इतिहास के दस सबसे बड़े राहत पैकेजों में से एक के लिए इतना भारी भरकम आंकड़ा खोजकर खुद को कोलबंस मान रही सरकार को शायद पता भी न हो उसके आंकड़े ही इस फर्जीवाड़े की पोल खेल रहे है। इन आंकड़ों का विश्लेषण साबित कर देता है कि इसमें बुनियादी बातों का भी ध्यान नहीं रखा गया। सारे कामों की वीडियोग्रापफी कराने के केंक्त के अभूतपूर्व फैसले ने इन आंकड़ों की साख पर सवालिया निशान लगा दिया है। विडंबना यह है कि इस महाकाय राशि में में आपदा पीड़ितों के हिस्से बस एक फीसदी ही आएगा । उनमें से अधिकांश को 2,250 रु0 से ज्यादा नहीं मिलेंगे । राहत की मलाई सरकारी विभागों के लिए आरक्षित होगी।राज्य सरकार द्वारा केंद्र को भेजे गए 21000 करोड़ रुपए की राहत की डिमांड का विश्लेषण करने से पहले यह जानना उचित होगा कि यह आंकड़ा किस तरह से तैयार हुआ। दैवी आपदा के आकलन का ग्रास रूट पर पटवारी ही एकमात्र सरकारी कर्मचारी है। इस समय पहाड़ में 1,220 पटवारी हैं जिनमें से हरेक को औसतन सात गांव देखने पड़ते हैं। इन्ही पटवारियों से मिली सूचना के अनुसार सरकार से उन्हे 25 सितंबर को आपदा से हुए पूरे नुकसान की रिपोर्ट भेजने का आदेश मिला और अक्तूबर के पहले सप्ताह में उन्होने रिपोर्ट जिला प्रशासन को भेज दी। इन रिपोर्टों को संकलित करने में यदि दो दिन भी लगे हों तब भी यह रिपोर्ट दस अक्तूबर को ही राज्य मुख्यालय पहुंच पाई होगी। लेकिन मुख्यमंत्री ने 21000 करोड़ के नुकसान का बयान 22-23 सितंबर को हुए विधानसभा सत्र के दौरान ही दे दिया था। सचिव आपदा डा0राकेश कुमार के अनुसार नुकसान के इस आकलन को केंद्रीय राहत दल के आने से पहले 30 सितंबर को अंतिम रुप दे दिया गया था। क्या मात्रा एक सप्ताह में लगभग एक लाख 20 हजार लंबी सड़कों, नहरों और बिजली लाइनों, साढ़े सात लाख हेक्टेयर कृषि भूमि, दो लाख हेक्टेयर बगीचों,23 लाख मकानों और लगभग 22 हजार स्कूल भवनों का सर्वे किया जा सकता है? वह भी सिर्फ दो हजार कर्मचारियों द्वारा? 670 कृषि कर्मी एक सप्ताह में 7 लाख 16 हजार हैक्टेयर यानी एक कर्मचारी ने प्रतिदिन 4 गांवों की 7600 नाली जमीन पर खड़ी फसल का सर्वे किया। एक उद्यानकर्मी ने प्रतिदिन में 6 गांवों में जाकर 2300 नाली में स्थित बगीचों का सर्वे कर लिया। यदि ऐसा हुआ है तो यह चमत्कारिक है। आश्चर्यजनक यह भी है कि सार्वजनिक संपत्तियों और कृषि भूमि को हुई क्षति के आकलन के लिए सरकार ने ग्राम स्तर पर समितियों के गठन का शासनादेश 13 अक्तूबर को जारी किया। इस आदेश में सभी जिलों के डीएम को ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य, ग्राम विकास अधिकारी और स्थानीय प्राइमरी विद्यालय के शिक्षक की चार सदस्यीय समिति गठित करने का निर्देश दिया गया। समितियों को क्षतियों के विवरण भेजने के लिए एक सप्ताह का समय दिया गया। जाहिर है कि यह ब्यौरा 20 अक्तूबर तक जिलाधिकारियों तक पहंुचा होगा और जिलों से संकलित होकर 23 अक्तूबर तक यह सचिवालय आया होगा।अब सवाल यह उठता है कि जब 23 अक्तूबर तक अंतिम रिपोर्ट नहीं आई तब मुख्यमंत्री ने एक माह पहले, सचिवालय ने तीन सप्ताह पहले कैसे 21000 करोड़ रु0 के नुकसान का सटीक पूर्वानुमान लगा दिया और यही नहीं इस अनुमान को आंकड़ों में ढ़ालकर केंक्तीय दल और प्रधनमंत्राी को भी सौंप दिया। गजब यह कि ऐसा पटवारियों द्वारा भेजी गई पहली रिपोर्ट से भी पहले ही कर दिया गया। इसी संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि सरकार में आपदा के आकलन को लेकर खासा कन्फ्यूजन व्याप्त है। इसी कारण से नुकसान के आकलन को लेकर शासन में रिपोर्टों के प्रारूप बदलते रहे। 4 सितंबर को शासन ने सभी विभागों को पत्र भेजकर केंद्र के मानकों के आधार पर रिपोर्ट तलब की फिर 14 सितंबर को नया प्रारुप भेजकर आंकड़ों को नये सिरे से मंगाया गया। इस प्रारूप में मानक बदल दिए गए। सूत्रों का कहना है कि नुकसान के सूचकांक को 21000 करोड़ रु0तक पहुंचाने का ड्रीम प्रोजेक्ट इसी प्रारूप के साथ शुरू हुआ। अब एक बार फिर समितियां बनाकर नुकसान का जायजा लिया जा रहा है। इस प्रकार विभागों से तीन बार रिपोर्टें मंगाई गईं। यह कन्फ्यूजन आंकड़ों के पीछे चल रहे खेल को उजागर कर देता है।भूस्खलन से प्रभावित गांवों को लेकर केंद्र को भेजी गई रिपोर्ट से भी यही जाहिर होता है। सर्वे के लिए अभी भूविज्ञानियों के दल बाद में गठित किए गए और उनका सर्वे अभी तक पूरा नहीं हुआ पर सरकार सितंबर में ही इस नतीजे पर पहुंच गई कि 233 गांव अब लोगों के रहने के लिए खतरनाक हो चुके हैं और इनके पूर्ण विस्थापन के अलावा कोई विकल्प नहीं है। चंूकि मांगी गई राहत का 57 फीसदी इन गांवों के ही पुनर्वास पर खर्च किया जाना है इसलिए इस आंकड़े की विश्वसनियता मायने रखती है। इसका न केवल वैज्ञानिक आधार होना चाहिए बल्कि राज्य और केंद्र द्वारा प्रति परिवारके लिए निर्धरित पुनर्वास राशि के मानक पर इस आंकड़े को खरा उतरना चाहिए पर सच्चाई यह है कि सरकार के इस आंकड़े का कोई वैज्ञानिक आधार अभी तक स्थापित नहीं हो पाया है और यह केवल प्रथम दृष्ट्या सतही अनुमान मात्र है।अब जरा तथ्यों और तर्क पर सरकार के आंकड़ों को परखा जाय। राज्य सरकार के आंकड़े के हिसाब से 233 गांवों के 3049 परिवारों के पुनर्वास के लिए 12000 करोड़ रूपए उसे चाहिए। यानी वह पुनर्वास के लिए प्रति परिवार पर 4 करोड़ रुपए खर्च करेगी। यदि ऐसा है तो देश की सबसे बेहतरीन पुनर्वास नीति और मानक तय करने के लिए उसकी पीठ थपथपाई जानी चाहिए। क्या वह निजी और सरकारी क्षेत्र के बिजली प्रोजेक्टों के विस्थापितों को वह इसी दर से मुआवजा देगी? टिहरी बांध के नए विस्थापितों के लिए सरकार जमीन इत्यादि का इंतजाम करने के बजाय एकमुश्त 38 लाख रु0 देने पर विचार कर रही है जो कि केंद्र को भेजे गए प्रति परिवार पुनर्वास खर्च का मात्र दसवां हिस्सा है। सरकार यदि एक करोड़ रु0 भी प्रति परिवार एकमुश्त भुगतान करने को तैयार हो तो इन 233 गांवों के लोग अपने लिए खुद ही जमीन का इंतजाम कर लेंगे। सरकार को उन पर 12000 करोड़ के बजाय सिर्फ 3000 करोड़ ही खर्च करने हैं। जाहिर है कि पुनर्वास पर आने वाला खर्च अव्यवहारिक और बढ़ाचढा कर पेश किया गया है। इसके पीछे इन गांवों को बसाने की मंशा नहीं बल्कि केंद्र को इस प्रस्ताव को नामंजूर करने के लिए बाध्य करने की रणनीति है।नुकसान दूसरा सबसे बड़ा आंकड़ा पीडब्लूडी का है जिसकी 13,600 किमी सड़कें तबाह हुई बताई गई हैं। इसके लिए केंद्र से पांच हजार पांच सौ 17 करोड़ रु0 मांगे गए हैं। यह कुल राहत का लगभग एक चौथाई है। यह आंकड़ा इसलिए चकित करता है कि राज्य में सड़कों की कुल लंबाई 26000किमी के आसपास है। इस आंकड़े के हिसाब से राज्य की आधी सड़कें पूरी तरह से नष्ट हो गई हैं। दूसरी ओर लोनिवि का दावा है कि उसने 90 फीसदी सड़कों पर यातायात बहाल कर दिया है। इस आंकड़े में केंद्र से हर सड़क के लिए प्रति किमी 37 लाख रु0 मांगे गए हैं। लोनिवि के सूत्र बताते हैं कि बिलकुल नई सड़क बनाने के लिए भी खर्च 30-35 लाख रु0 आता है। यदि बिल्कुल चट्टान काटकर बनानी है तो यह खर्च अधिकतम 45 लाख रु0 आएगा। तो क्या लोनिवि ये 13600 किमी पहले बन चुकी सड़कें चट्टानें काटकर बनाने वाली है। जाहिर है कि आंकड़े इतने बड़े कर दिये गए हैं कि एस्टीमेट की साख गिरकर शून्य हो गई है।विभागीय सूत्रों का कहना है कि यदि इतने ही किमी सड़कें वाकई प्रभावित हुई हैं तो भी पहले बनी सड़कों को ठीक करने पर अल्पकालीन और दीर्घकालीन खर्च 1000 करोड़ रु0 से ज्यादा नहीं आएगा। यानी केंद्र को पांच गुना ज्यादा का आंकड़ा भेजा गया है। शहरी क्षेत्रों में एक किमी सड़क बनाने के लिए 39 लाख 14 हजार रु0 की दर से 327 किमी सड़कें पूरी तरह से नई बनाने के लिए 128 करोड़ रु0 की डिमांड की गई है। क्या शहरों में 470 किमी सड़कें बह गई हैं? क्या सरकार शहरी निकायों को 39 लाख रु0 की इसी दर पर रखरखाव का खर्च दे रही है? जबकि इतनी ही किमी सड़कों को फिर से ठीक-ठाक करने पर वास्तविक व्यय 22 करोड़ आएगा। इसी प्रकार सिंचाई विभाग में यदि 1813 किमी नहरें और 470किमी तटबंध यदि पूरी तरह बह भी गए हैं तब भी 18 लाख प्रति किमी की दर से नहर और 60 लाख प्रति किमी की दर से बाढ़ सुरक्षा ढ़ांचे को तैयार करने में भी 611 करोड़ रु0 का खर्च आएगा जबकि सरकार ने इसका तिगुना 1522 करोड़ रु0 का एस्टीमेट केंद्र को भेजा है। बिजली विभाग की क्षति सरकारी आकलन के अनुसार एक किमी बिजली की लाइन का खर्च 15 लाख रु0है। सरकार के हिसाब से 1369 किमी बिजली की लाइनें पोल सहित नष्ट हो गई हैं। यानी हर जिले में 100 किमी बिजली की लाइनें पूर्ण नष्ट हो चुकी हैं। उस पर तुर्रा यह कि यूपीसीएल भी दावा कर रहा है कि सभी शहरी इलाकों और अधिकांश ग्रामीण इलाकों में बिजली आपूर्ति सामान्य है। सरकार के आंकड़ों का यकीन करें तो राज्य की पांच हजार पेयजल योजनायें नष्ट हो चुकी हैं। इन पर प्रति योजना 20 लाख 60 हजार रु0 का एस्टीमेट केंद्र को भेजा गया है। प्रधनमंत्री को दिए गए पत्र में दिए क्षति के आंकड़ों के अनुसार राज्य के 2356 विद्यालय नष्ट हुए हैं। इसके लिए राज्य सरकार हर विद्यालय के लिए 15 लाख 28000रु0 मांगे हैं। जबकि विश्वबैंक परियोजना के तहत बनने वाले प्राथमिक विद्यालयों के लिए केंद्र सरकार के मानक 3 लाख रु0प्रति विद्यालय और राज्य सरकार के मानक दो लाख रु0 प्रति विद्यालय है। केंद्रीय मानकों के अनुसार 2,356 विद्यालयों को फिर से नया बनाने के लिए 70 करोड़ और राज्य के मानकों के हिसाब से 47 करोड़ रु0 चाहिए पर डिमांड पांच से आठ गुना ज्यादा 360 करोड़ रु0 की है। इस प्रकार राज्य सरकार द्वारा की गई इस 20,336 करोड़ रु0 की डिमांड की असलियत यह है कि उसके नुकसान के आंकड़ों में छेड़खानी किए बगैर उन सुविधाओं को पहले जैसा करने और 233 गांवों को शानदार ढंग से बसाने पर भी 5000 करोड़ रु0ही खर्च आएगा जबकि सरकारी आंकड़ों में यह चार गुना बढ़ा दी गई है।सवाल उठता है कि सरकार ने राहत के मानकों को जानते हुए भी ऐसे आंकड़े क्यों पेश किये जो मानकों से तो कई गुना ज्यादा थे ही पर वास्तविकता से भी परे थे। यह सही है कि देश की लगभग हर राज्य सरकार प्राकृतिक आपदाओं के लिए केंद्रीय मदद मांगती हैं तो वे नुकसान के आंकड़ों को कुछ हद तक बढ़ा चढाकर पेश करती हैं। यह सामान्य प्रवृत्ति है। लेकिन हर राज्य सरकार यह भी ध्यान रखती हैं कि उनके द्वारा दिये गये आकलन की विश्वसनियता बनी रहे। यह राज्य और सरकार दोनों की साख के लिए जरुरी होता है। यदि आंकड़ा बेसिरपैर का हो तो शर्मिंदगी सरकार को ही उठानी पड़ेगी। ऐसा हुआ भी है। केंद्र सरकार ने अभूतपूर्व फैसला लेते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह प्रत्येक निर्माण कार्य से पहले और बाद की स्थिति की वीडियोग्राफी कराये। पहली बार किसी राज्य सरकार के कामकाज पर केंद्र ने इस तरह का खुला संदेह व्यक्त किया है। जाहिर है कि राज्य सरकार की साख सवालों के घेरे में है।ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि राज्य सरकार ने ऐसा आंकड़ा क्यों प्रचारित किया जो पहली ही नजर में अविश्वसनीय लग रहा हो। जिससे और तो दूर खुद भाजपा ही नहीं पचा पा रही हो। दरअसल यह राजनीतिक आंकड़ा है जो सन् 2012 के विधानसभा चुनाव की जरुरत से पैदा हुआ है। मुख्यमंत्री और उनके रणनीतिक सलाहकार जानते हैं कि केंद्र कुछ भी कर ले पर 21000 करोड़ रु0 की राहत मंजूर नहीं करेगा। ऐसे में भाजपा यह प्रचार कर सकेगी कि कांग्रेस ने आपदा में भी लोगों की पर्याप्त मदद नहीं की और जरुरत से बहुत कम सहायता दी। मुख्यमंत्री चालाक राजनेता हैं और चुनावी शतरंज की बिसात पर अपना एक-एक मोहरा शातिर तरीके से चल रहे हैं। यही वजह है कि 500 करोड़ रुपये की केंद्रीय मदद के बावजूद कांग्रेस बचाव की मुद्रा में है और एक धेला खर्च किए बगैर राज्य सरकार हमलावर है। बारीकी से बुनी गई इस रणनीति के तहत ही ग्राम स्तर पर मौजूद सरकारी अमला आपदा पीड़ितो को समझा रहा है कि उन्हे पर्याप्त राहत इसलिए नहीं मिल सकती क्योंकि केंद्र सरकार के मानक यही हैं। लोगों का गुस्सा कांग्रेस की ओर मोड़ने के इस नायाब तरीके के लिए ही 21000 करोड़ की राहत का फार्मूला निकाला गया है। इसे राजनीतिक रुप से कैश करने का बाकी काम जिला स्तर पर बन रही भाजपा की राहत कमेटियां करेंगी जो सरकारी राहत से अपने वोटबैंक का भला भी करेंगी और नाकाफी राहत से पैदा होने वाले गुस्से को कांग्रेस की ओर भी मोड़ेंगी।इसका एक और कोण है जो कांग्रेस देख रही है। कांग्रेस उपाध्यक्ष सुबोध उनियाल का कहना है कि विभागों को मिलने वाली केंद्रीय मदद का इस्तेमाल सरकार चुनावी फंड एकत्र करने में करना चाहती है। राज्य के आपदा पीड़ित इलाकों में आजकल आम चर्चा है कि निर्माण और मरम्मत कार्यों से जुड़े हर विभाग को दस लाख रु0 प्रति डिवीजन के हिसाब से ऊपर पहुंचाने को कहा गया है। गांवों की चौपालों पर यह भी खबर उड़ाइ जा रही है कि राजस्व, कृषि, उद्यान जैसे विभागों को 6 प्रतिशत ऊपर देने को कहा गया है। इन चर्चाओं का आधार तो पता नहीं पर इतना जरुर है कि इनसे गांवों की राजनीति गूंज रही है।आपदा में भ्रष्टाचार को लेकर आने वाले समय में जबरदस्त बबंडर उठने वाला है। खुद सरकारी अफसरों का कहना है कि यदि सरकार को फर्जी कामों से बचना है तो हर सिंचाई,लोनिवि, लघु सिंचाई, प्राथमिक विद्यालयों, शहरी निकायों और बिजली विभागों से जुड़ी सभी क्षतियों की वीडियोग्राफी गैर सरकारी स्वयंसेवी संगठनों और निष्पक्ष एजेंसियों से कराई जाय और सभी निर्माण एजेंसियों के कामों का सोशल ऑडिट कराया जाय ताकि भ्रष्टाचार की संभावना को न्यूनतम किया जा सके। उधर कांग्रेस का कहना है कि किसी भी हालत में कुंभ को दोहराने का मौका नहीं देंगे। कांग्रेस नेता केंक्त से यह भी मांग कर सकते हैं कि केंद्रीय  मदद पर नजर रखने के लिए उसी तरह के इंतजाम किए जांय जिस तरह कॉमनवेल्थ के निर्माणकार्यों की जांच के लिए किए गए हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2819485710590251716-3055262982191673452?l=shabdsansad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsansad.blogspot.com/feeds/3055262982191673452/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2010/11/21000-21-21000-2250-0-21000-1220-25.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/3055262982191673452'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/3055262982191673452'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2010/11/21000-21-21000-2250-0-21000-1220-25.html' title=''/><author><name>Shabd Sansad</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02242133088252450931</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='23' 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style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#3333ff;"&gt;आखिरी मुगल बनने की ओर प्रकाश का प्रस्थान &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#3333ff;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;माकपा जब पश्चिम बंगाल में चुनाव के जरिये सत्ता पर काबिज हुई तो इसे भारतीय राजनीति में एक अजूबा माना गया। देश में काफी लोग थे जिन्हे तब लगा कि जैसे भारतीय लोकतंत्र पर आफत आ गई हो। कईयों को बैलेट बॉक्स से निकला यह कम्युनिस्ट राज कौम नष्ट करने वाला लगा। आठवें दशक से लेकर बीसवीं सदी तक भारतीय मीडिया को बंगाल का यूं लाल होना अच्छा नहीं लगा और समय-समय पर वह इस पर लाल पीला होकर अपनी कम्युनिस्ट विरोधी ग्रंथि को उजागर भी करता रहा। माकपा की कामयाबी पर भारत के कम्युनिस्टों की संसदीय प्रजाति मुग्ध रही है। माकपा के लिए भले ही केरल को छोड़कर शेष भारत की राजनीति सहारा का मरुस्थल बनी रही हो पर बंगाल उनके लिए नखलिस्तान से कम नहीं रहा। अपने इस साम्राज्य पर देश भर के माकपा नेता और कार्यकर्ता छाती फुलाते रहे हैं। उन्हे बराबर लगता रहा है कि देश में सिर्फ वही हैं जो संसदीय राजनीति के खांचे में अजेय साम्राज्य स्थापित करने का हुनर जानते हैं। इस अहसास के अहंकार से लबालब होकर वे छलकते भी रहे हैं। बंगाल माकपाईयों का राजनीतिक मक्का बना हुआ है और वे मीटिंगों, बहसों और अपने लेखों में बंगाल सरकार की नीतियों का पाठ कुरान की आयतों की तरह करते रहे हैं। माकपा की धर्मपुस्तक में बंगाल सरकार के खिलाफ बोलना कुफ्र माना जाता रहा है। चार दशक से चला आ रहा यह दुर्ग अब मुगल साम्राज्य के आखिरी समय के दौर से गुजर रहा है। वामपंथ के इस किले की अजेयता का तिलिस्म टूट रहा है और किताबी मार्क्सवाद के पंडित प्रकाश करात आखिरी मुगल होने की त्रासदी की ओर प्रस्थान कर चुके हैंं।पहले केरल और आठवें दशक में पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों के चुनाव के जरिये सत्ता में आने से भारतीय राजनीति संसदीय कम्युनिज्म का उदय हुआ। नंबूदरिपाद और ज्योति बसु समेत भाकपा और माकपा के कम्युनिस्ट नेता इसके शिल्पकार रहे हैं। ज्योति बसु का दर्जा माकपा की राजनीति में कुछ वैसा ही माना जा सकता है जिस तरह मुगलों में अकबर को हासिल था। उन्होने पश्चिम बंगाल में वामपंथी सरकार चलाने का अपना व्याकरण गढ़ा और संसदीय कम्युनिस्ट राजनीति को उस ऊंचाई तक पहुंुचाया जहां आकर वह खुद को अजेय मानने के स्वर्ग में विचर सकती थी। बसु एक करिश्माई नेता थे उसी तरह जैसे कांग्रेस में जवाहर लाल नेहरू और दक्षिणपंथी राजनीति में अटल बिहारी वाजपेयी थे। उनकी माकपा संसदीय कम्युनिज्म की बंगाली कलम थी। जो बंगाल की आबोहवा के मुताबिक विकसित की गई थी। यह बारीकी से बुना गया ऐसा राजनीतिक मिक्सचर था जिसमें बांग्ला उपराष्ट्रªªवाद और अभिजात्यवाद के रेशे भी मौजूद थे तो मार्क्सवाद के धागे भी। ऑपरेशन बर्गा ने अधिकांश ग्रामीण इलाकों में माकपा को लगभग अजेय बना दिया।लगातार जीतों से माकपा की कतारें खुद को अजेय मानने लगीं। ज्योति बसु बूढ़े हो चले थे और उनका बनाये राजनीतिक फॉर्मूले का असर अब कम हो रहा था। माकपा के अकबर ज्योति बसु आखिरकार रिटायर हो गए। उनकी जगह चुने गए बुद्धदेव भट्टाचार्य और उनके राजनीतिक कद के बीच जमीन और आसमान का फर्क था। बंगाल की राजनीति में एकाएक खालीपन आ गया। बुद्धदेव जननेता नहीं थे। वह न तो जनता की नब्ज के राजनीतिक वैद्य थे और न उनके पास ऐसा आला था जिससे वह लोगों दिल की धड़कन को महसूस कर सकते थे। वह ऐसे साहसी और प्रतिभा संपन्न नेता भी नहीं थे जो संसदीय राजनीति और मार्क्सवाद के इस घालमेल को सिंकारा जैसे टॉनिक में बदल पाते। ऊपर से निर्द्वंद सत्ता ने पार्टी का शाररिक और मानसिक तंत्र इतना बीमार कर दिया कि वह सत्ता के सन्निपात में अराजक हो गया। जनता और नेतृत्व के बीच का पुल टूट चुका था। ऐसे में ईश्वर ही उसे बचा सकता था। चूंकि मार्क्सवादी ईश्वर पर भरोसा नहीं करते इसलिए हो सकता है कि उसने भी उन्हे सद्बुद्धि देने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई हो। माकपा में कांग्रेस के जीन का रोपण तो बसु के जमाने में ही शुरू हो चुका था और बीसवीं सदी की शुरुआत से उसे लाल कांग्रेस के उपनाम से जाना जाने लगा था। उसका डीएनए कांग्रेस से मैच करने लगा था और लाल रंग वाले गुणसूत्रों को छोड़कर उसमें और कांग्रेस में फक करना मुष्किल था। बसु के बाद तो माकपा विचारधारा की ढ़लान पर जैसे लुढ़कने लगी। माकपा के बुद्ध ने मान लिया था कि उनका कोई विकल्प नहीं है। माकपा ने बंगाल में पूंजीपतियों के लिए सेज की सेज सजानी शुरू कर दी। लेकिन पहले नंदीग्राम और फिर सिंगूर में जनता ने बताया कि निर्विकल्प कुछ भी नहीं है। यह जनता का ही कमाल है कि उसने राजनीति की राख में से ममता बनर्जी को निकाला और उसे फीनिक्स में बदल दिया। अजेय माकपा को सड़क से लेकर पंचायतों और नगर निकायों तक पराजयों के सिलसिले से गुजरना पड़ा है। मार्क्सवाद को कंठस्थ रखने वाले कम्युनिस्ट ब्यूरोक्रेट प्रकाश करात आखिरी मुगल की तरह साम्राज्य को ध्वस्त होते देख रहे हैं। वह भी नेतृत्व की उन पांतों शामिल रहे हैं जिन्होने माकपा के पतन की गति को तेज किया है। दरअसल माकपा के नेतृत्व पर सालों से ऐसे लोगों का कब्जा चल रहा है जिसने उसे जनता की पार्टी बनाने के बजाय उसमें नौकरशाह दल में बदल दिया है। पूरे देश में संगठन के महत्वपूर्ण पदों पर अधिकांश वे नेता काबिज हैं जो किसी आंदोलन में जेल नहीं गए। उनकी योग्यता बस इतनी है कि वे किताबी मार्क्सवाद के पंडे हैं। माओवादी नेता आजाद की पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने पर माकपा ने जिस तरह से सवाल उठाए हैं उससे यह गलत फहमी भी दूर हो गई है कि उसमें कम्युनिस्ट होने का कोई लक्षण बाकी है। माओवादियों को लेकर भाजपा और माकपा एक साथ खड़ी है तो इस श्रेय के हकदार भी करात ही हैं। प्रकाश करात, सीताराम येचुरी, अरुण जेटली, चिदंबरम संसदीय लोकतंत्रा के सबसे बड़े वकील के रुप में उभरे हैं। संयोग ये सभी भारतीय कुलीन वर्ग के प्रतिनिधि हैं। माओवादियों के दमन पर भाजपा के सबसे करीब इस समय माकपा है।यह राजनीतिक विडंबना ही है कि माकपा का विकल्प ममता के रुप में सामने आया है। ममता बनर्जी जिस तरह से अविवेकपूर्ण लोकप्रियतावादी राजनीति कर रही हैं उससे उनसे कोई उम्मीद नहीं बंधती। उनकी राजनीति की सीमायें भी स्पष्ट हैं और उनके रंगढ़ंग ऐसे ही रहे तो पतन भी पटकथा भी दीवार पर लिख दी गई है। लोगों में उम्मीद के पहाड़ खड़े करना आसान भले ही हो पर यह शेर की सवारी है जिसमें शिकार होना तय है। ममता में जननेता के काफी गुण हैं पर दूरदर्शी नेता उम्मीदों के ऐसे पहाड़ खड़े नहीं करते जिनके नीचे दबकर वे मारे जायें। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2819485710590251716-8642198107246646651?l=shabdsansad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsansad.blogspot.com/feeds/8642198107246646651/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2010/08/blog-post_29.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/8642198107246646651'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/8642198107246646651'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2010/08/blog-post_29.html' title=''/><author><name>Shabd Sansad</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02242133088252450931</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='23' 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की नीयत साफ नहीं है। सोनिया गांधी की गरीब फ्रैंडली मुद्रा के बावजूद इस समस्या की जड़ें प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की उस कुलीन आर्थिक राजनीतिक अवधारणा में है जो गरीब विरोधी और देश के सामाजिक आर्थिक ढ़ांचे को तहस नहस कर देने वाली है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ईमानदार और बेदाग प्रधानमंत्री के खिताब से नवाजे जाते रहे हैं। उनकी इस ईमानदारी के बावजूद कांग्रेस संसदीय चुनावों के लिए कई हजार करोड़ जुटाने में कामयाब रही। जाहिर है कि यह पैसा उस आम आदमी ने नहीं दिया जिसके साथ कांग्रेस हाथ होने की बात कही जा रही थी। यह पैसा उन लोगों ने दिया है जो इस देश को बाजार अर्थव्यवस्था के हिसाब से चलाने की आजादी चाहते हैं ताकि उनका मुनाफा कुलांचे भरता रहे। कहीं महंगाई का यह दौर उसी वर्ग के चुनावी कर्ज उतारने से तो नहीं पैदा हुआ। कांग्रेस के लोग इससे असहमत हो सकते हैं पर मंहगाई पर केंद्र जिस तरह से हाथ पर हाथ धरे हुए बैठा है उससे क्या इस आरोप का औचित्य साबित नहीं होता। इस पूरे प्रकरण से उन लोगों की आंखे खुल जानी चाहिए जो प्रधानमंत्री की ईमानदारी के कसीदे पढ़कर इसे कांग्रेस को वोट देने का सबसे बड़ा कारण बता रहे थे। साफ है कि व्यक्तिगत ईमानदारी का सवाल राजनीति में बहुत मायने नहीं रखता। भ्रष्टाचार के तंत्र को फलने-फूलने की आजादी देने वाला एक ईमानदार आदमी भी भ्रष्ट व्यवस्था के शिखर पर जमे रह सकता है। एक जनविरोध्ी तंत्र को भी अपनी साख बनाए रखने के लिए कुछ साफ सुथरा चेहरों की जरुरत होती है। उदारीकरण और भूमंडलीकरण के जिस आदमखोर पशु से हमारा पाला पड़ा है उसके सिद्धांतकारों में मनमोहन सिंह समेत कई ईमानदार और समर्पित हस्तियां हैं। लोकसभा में सुषमा स्वराज और राज्यसभा में अरुण जेटली ने इशारों- इशारों में इसे कहा भी। महंगाई के गणित के सूत्र मनमोहन के आर्थिक विकास दर वाले अर्थशास्त्र से भी निकलते हैं। लेकिन बीमारी सिपर्फ इतनी ही नहीं है बल्कि इससे ज्यादा गंभीर और चिंता में डालने वाली है। विदेशी स्वामियों को खुश करने के लिए भारत सरकार ने उदारीकरण और भूमंडलीकरण के रास्ते को चुनने में वे मूलभूत सावधानियां भी नहीं बरतीं जो अमेरिका समेत सभी विकसित देशों ने बरती। यह ऐसा देश है जिसके पास बाजार का नियमन करने के लिए न कड़े उपभोक्ता कानून हैं और न ही कोई नियामक संस्था। लाइसेंस राज तो खत्म हो गया लेकिन बाजार का अंधेर राज कायम कर दिया गया। आज एक आम आदमी के पास अनुचित मूल्य या घटिया सामग्री का प्रतिकार करने के लिए कोई प्रभावी तंत्र नहीं है। आम उपभोक्ता बाजार में असहाय और दयनीय आदमी है जिसके पास व्यापारी की बात मानने और जेब से दाम चुकाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। उसके पास यह जानने का न साधन है और न अधिकार कि वह जो खरीद रहा है उसका लागत मूल्य कितना है। वह समझ पाने में असमर्थ है कि एक ब्रांड की मुहर लगने मात्रा से किसी वस्तु का दाम कैसे 500 से 700 गुना तक बढ़ जाता है। उसके पास नकली सामान, प्रदूषित और खतरनाक खाद्य पदार्थों से बचने का कोई रास्ता नहीं है। उसका सामना हर रोज ऐसे सर्वशक्तिमान और स्वेच्छाचारी बाजार से होता है जो देश के कानूनों से ऊपर एक संविधानेतर और संप्रभु सत्ता है। स्पष्ट है कि भारत की सरकार और भारतीय राज्य की सहमति के बिना देश में ऐसी असंवैधानिक सत्ता नहीं चल सकती। भारतीय बाजार का कोई तर्कशास्त्र नहीं है। वहां जंगल राज है।उसमें एक ओर बिना मांग के ही दामों को कई गुना बढ़ाने वाला सट्टा बाजार है तो दूसरी ओर मुनाफाखोरी में माहिर देशी रुप से विकसित ऐसा आढ़त बाजार है जिसमें भाव अकारण ही कई गुना बढ़ा दिए जाते हैं। आम लोगों तक कभी यह जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती कि खाद्यान्न वायदा कारोबारियों ने सिर्फ सट्टबाजी कर साल भर में कितने हजार करोड़ रुपए बना लिए या आढ़तियों के तंत्र ने सिर्फ दामों की हेराफेरी कर साल भर में कितना मुनाफा कमाया। जाहिर है कि सरकार नहीं चाहती कि लोग कभी यह जान पायें कि अनाज का एक दाना पैदा किए बिना ही कुछ बिचौलिए हजारों करोड़ कैसे कमा रहे हैं। पंजाब कृषि विवि के एक अध्ययन के अनुसार पंजाब के आढ़तियों ने बिना कुछ किए धरे 1990 से 2007 के बीच लगभग 8000 करोड़ रुपए कमाए। यह है बिचौलियों का तंत्र! सरकार में अहम पदों पर बैठे लोग भी स्वीकार करते हैं कि खाद्य पदार्थों के दाम उपभोक्ता तक पहुंचते-पहुंचते 700 गुना तक बढ़ जाते हैं लेकिन इस नपुंसक आत्मस्वीकृति से लोगों को राहत नहीं मिल सकती। आखिर लागत और विक्रय मूल्य के बीच कोई लॉजिकल सम्बंध क्यों नहीं होना चाहिए? यह इसलिए नहीं होता चूंकि देश के राजनीतिक दलों, नगर से लेकर विधानसभाओं और संसद तक मौजूद उनके कारिंदों को इस काली कमाई का एक बड़ा हिस्सा जाता है। चुनावों और महंगाई के बीच के अवैध संबंध जब तब जाहिर होते रहते हैं। इसलिए यह कहना कि सरकार के पास महंगाई से निपटने की कोई नीति नहीं है, एक अर्द्धसत्य है। केंद्र सरकार के पास ऐसे दिमागों की कमी नहीं है जो इसका हल चुटकियों में निकाल सकते हैं पर वे ऐसा चाहते नहीं हैं। इसके पीछे मनमोहनोमिक्स तो है ही साथ में ऐसी सरकार भी है जिसने अपनी अंतरात्मा और ईमान बाजार के हाथों गिरवी रख दिया है। यही कारण है कि सरकार के गोदामों में गेहूं चावल सड़ रहा है और देश का दरिद्रनारायण भूखों मर रहा है। क्योंकि सरकार जानती है कि यदि वह गोदामों के गेहूं और चावल को रियायती दरों पर बाजार में लाई तो खाद्यान्न के दाम गिर जायेंगे और उसके खेवनहार बिचौलिए और वायदा कारोबारी कंगाल हो जायेंगे। इसलिए लाखों टन अनाज सड़ता रहता है। वरना सरकार चाहती तो इन 63 सालों में पनपे बिचौलियों को एक ही झटके में खत्म कर देती तथा हर वस्तु पर लागत और विक्रय मूल्य दर्ज करना जरुरी कर देती। पूंजीवाद के तमाम दुर्गणों को अपनाने वाली सरकारों ने ही वायदा कारोबार के राक्षस को पैदा किया है। महंगाई से लेकर मिलावट तक फैले जनविरोधी तंत्र पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने न तो आवश्यक वस्तु अधिनियम को कड़ा बनाया और न मिलावट रोकने के लिए कोई सख्त कानून बनाने की कोशिश की। यही नहीं एनडीए ने जनवितरण प्रणाली को ध्वस्त करने का जो सिलसिला शुरु किया था उसे यूपीए वन और टू ने जारी रखकर साबित कर दिया कि वे एनडीए की सच्ची वारिस हैं। क्योंकि एक जनमुखी जनवितरण प्रणाली बाजार की अराजकता और स्वेच्छाचारिता पर लगाम लगाने का सबसे बड़ा साधन है। इसे नष्ट किए बिना बाजार अंधाधुंध मुनाफा नहीं कमा सकता। इसीलिए इससे पहले एपीएल के नाम पर निम्न मध्यवर्ग को अलग किया गया और अब इसे लुंजपुंज बनाकर गरीबों के लिए भी इसे निरर्थक बना दिया गया है। ये सारी बातें इसी सत्य को उजागर करती हैं कि खोट सरकार की नीयत में है। मनरेगा जैसे सांकेतिक उपाय कर वह इस पाप से पीछा नहीं छुड़ा सकती। पहले गरीबों की तादाद बढ़ाने जैसी महामारी पैदा करना और फिर मनरेगा का मानवीय चेहरा सामने लाने से बात नहीं बनेगी। सरकार में यदि थोड़ी भी लोकलाज बची है तो उसे गरीबी और भुखमरी पैदा करने वाले सामूहिक विनाश के अस्त्रों की अपनी फैक्टरियों को बंद करना होगा। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2819485710590251716-4271427628981035189?l=shabdsansad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsansad.blogspot.com/feeds/4271427628981035189/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2010/08/blog-post.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/4271427628981035189'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/4271427628981035189'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='महंगाई पर नीति में नहीं नीयत में खोट'/><author><name>Shabd Sansad</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02242133088252450931</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='23' src='http://3.bp.blogspot.com/--JtNUUx-yvg/TsqTmToFzzI/AAAAAAAAALc/4vkSErAt6fE/s220/center%2Bpage%2B4%2Bth%2B%2BIssue%2B01.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2819485710590251716.post-2279951201382597566</id><published>2010-07-30T04:13:00.000-07:00</published><updated>2010-07-30T04:15:21.523-07:00</updated><title type='text'>विकीलीक्स ने तोड़ा सूचना पर सरकारी एकाधिकार</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;color:#006600;"&gt;दुनिया की सबसे चर्चित वेबसाइट विकीलीक्स के खुलासों ने अमेरिका और पाकिस्तान को हिला दिया है। पेंटागन के रहस्यलोक में दुनिया की सबसे कड़ी चौकसी में रखे गए एक लाख से ज्यादा सर्वाधिक संवेदनशील खुफिया फौजी दस्तावेजों को इंटरनेट पर जारी कर विकीलीक्स ने दुनिया भर में तहलका मचा दिया है। पहली बार व्हाइट हाउस और पेंटागन में सूचना की ताकत से हड़कंप मचा हुआ है। इन रहस्योद्घाटनों से साफ हो गया है कि आतंकवाद निर्यात करने वाले देशों में पाकिस्तान अभी भी टॉप पर है और यह सब वह अमेरिका की जानकारी में कर रहा है। इसी के साथ आंतकवाद के खिलाफ अमेरिकी जंग के पाखंड का भी पर्दाफाश हो गया है। ये दस्तावेज बताते हैं कि काबुल में भारतीय दूतावास से लेकर भारतीय संस्थानों पर तालिबानी हमले आईएसआई द्वारा प्रायोजित होने की जानकारी अमेरिका को थी। जाहिर है कि भारत के साथ उसकी दोस्ती सिर्फ कूटनीतिक धोखाधड़ी से ज्यादा कुछ नहीं है। इससे अमेरिका के प्रति भारत सरकार के झुकाव पर भी सवालिया निशान लग गया है और पाक के साथ उसकी बातचीत भी अमेरिकी हितों के लिए की गई कवायद ही प्रतीत होती है। इंटरनेट की दुनिया के इस सबसे बड़े खुलासे से दुनिया की सारी सरकारों के माथे पर बल पड़ गए हैं क्योंकि जनता से छुपाकर रखे गए उनके खुफिया राज कभी लीक हो सकते हैं। सूचना की आजादी के नजरिये से यह बड़ी घटना है। अभी तक सूचनाओं की राजनीति के जरिये कभी चीन तो कभी ईरान तो कभी रुस को काबू में करने में लगे अमेरिका के लिए विकीलीक्स दुस्वप्न बनकर आया है। पिछले महीनों गूगल और चीन के विवाद में चीन को इंटरनेट पर सूचनाओं की आजादी का पाठ पढ़ाने वाले अमेरिका को अब खुद इसका मजा चखना पड़ रहा है। अपने प्रतिद्वंदी देशों के असंतुष्टों और विद्रोहियों के प्रचार को मदद देने के लिए अमेरिका सूचना की आजादी का सबसे बड़ा समर्थक रहा है। दुनिया में समाचार और सूचनाओं के अधिकांश माध्यमों में सूचनाओं का प्रवाह एकपक्षीय रहा है। ईरान,इराक से लेकर क्यूबा तक पाश्चात्य दुनिया के सारे माध्यमों में सूचनाओं का समूचा प्रवाह अमेरिका की ओर रहा। अपने दुश्मनों से निपटने के लिए उसने सूचनाओं को हथियार के रुप में इस्तेमाल किया। इससे सूचना की आजादी अमेरिकी हितों की पर्याय हो गई। लेकिन विकीलीक्स ने सूचनाओं के इस खेल का पासा पलट दिया है। इंटरनेट पर अब तक के सबसे बड़े खुलासे को अंजाम देते हुए उसने अमेरिका को सांसत में डाल दिया है। आईएसआई और पाक फौज से उसके रिश्तों के चलते आतंकवाद के खिलाफ उसकी बहुप्रचारित लड़ाई की पोल खुल गई है। यह भी जग जाहिर हो गया है कि उसे हामिद करजई और भारत के खिलाफ किए जाने वाले हमलों की जानकारी थी। उसके लिए सबसे असुविधाजनक यह है कि उसे अमेरिकी जनता को जबाब देना होगा कि वह खरबों डालर उन संस्थाओं पर क्यों खर्च कर रहा है जो ग्लोबल आतंकवाद के सबसे बड़े निर्यातक हैं। दुनिया की हर सरकार गोपनीयता और राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सूचनाओं को आम लोगों तक नहीं पहुंचने देती। यहां तक दुनिया में लोकतंत्र के सबसे बड़े पहरेदार होने का दावा करने वाले देश भी इसके अपवाद नहीं हैं। विकीलीक्स ने सूचनाओं की दुनिया पर सरकारों के एकाधिकार को खत्म कर दिया है। सरकार के कड़े पहरों के बीच उसने चोर दरवाजे खोज लिए हैं। यह सही मायनो में सूचना की आजादी और उसके निर्बाध संचरण की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। इससे साबित हो गया हैै कि इंटरनेट की तरंगों पर अब अमेरिकी लगाम के दिन भी लद गए है। भविष्य में हर देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं होगी जो सरकारों की गोपनीयता के परखच्चे उड़ाने के लिए विकीलीक्स को खुफिया दस्तावेज मुहैया करायेंगे। इसे सरकारों के कामकाज में साफगोई और पारदर्शिता की शुरुआत माना जाना चाहिए। सूचनाओं के तंत्र पर सरकारी एकाधिकार टूटने से उम्मीद की जाने चाहिए कि इसके बाद किसी न किसी दिन नागरिकों के खिलाफ इस्तेमाल होने वाली अंधाधुंध हिंसा पर राज्य का एकाध्किार भी टूटेगा। दिन ब दिन हिंसक,गैर जबाबदेह और गैर जिम्मेदार होते जा रहे आधुनिक राज्यों पर जनशक्ति का अंकुश लग सकेगा। &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2819485710590251716-2279951201382597566?l=shabdsansad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsansad.blogspot.com/feeds/2279951201382597566/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2010/07/blog-post_30.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/2279951201382597566'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/2279951201382597566'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2010/07/blog-post_30.html' title='विकीलीक्स ने तोड़ा सूचना पर सरकारी एकाधिकार'/><author><name>Shabd Sansad</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02242133088252450931</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='23' src='http://3.bp.blogspot.com/--JtNUUx-yvg/TsqTmToFzzI/AAAAAAAAALc/4vkSErAt6fE/s220/center%2Bpage%2B4%2Bth%2B%2BIssue%2B01.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2819485710590251716.post-4152714066578175400</id><published>2010-07-20T08:48:00.000-07:00</published><updated>2010-07-20T08:51:52.239-07:00</updated><title type='text'>सरकार को निजी हाथों में सौंपो</title><content type='html'>&lt;span style="color:#006600;"&gt;&lt;strong&gt;हाल &lt;/strong&gt;ही में यूएनडीपी के आंकड़े आए हैं जिनसे पता चलता है कि भारत के ग्लोबल आर्थिक महाशक्ति बनने का जो तिलिस्म भारत सरकार, राजनेता और मीडिया बना रहा था वह सफेद झूठ के सिवा कुछ नहीं है। वह भी ऐसा झूठ जिसके पैर भारत की जमीन के बजाय अमेरिका में हैं। यूएनडीपी की रिपोर्ट हमें यह गर्व करने का दुर्लभ मौका देती है कि आजादी के 63 सालों में गरीबी और भुखमरी के मोर्चे पर हमसे आगे सिर्फ अफ्रीकी देश हैं। जितनी निष्ठा, लगन और समर्पण के साथ देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गृहमंत्री चिदंबरम और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह काम कर रहे हैं उससे यह भरोसा मजबूत होता है कि अगले चार सालों में हम गरीबी के मोर्चे पर होंडुरास, हैती,चाड जैसे पिद््््दी देशों को पछाड़ने में कामयाब हो जायेंगे।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt; &lt;strong&gt;पिछले &lt;/strong&gt;दिनों कई खबरें चर्चा में रही जिनमें मिलावटखोरी से लेकर महंगाई तक कई मुद्दे थे। देश में मिलावटखोरों के हौसले की तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होने प्रधानमंत्री को भी नहीं बख्शा। मिलावटखोरों को लगा होगा कि पीएम यूपी आ रहे हैं तो वे प्रदेश के सबसे बड़े जायके से रुबरु हुए बगैर कैसे जा सकते हैं। मिलावटखोरों की इस लोकतांत्रिक भावना का भी सम्मान किया जाना चाहिए कि वे मिलावट के मामले में आम आदमी और प्रधानमंत्री में भेदभाव नहींे करते। अब हर रोज मिलावट के एक से एक मामले सामने आ रहे हैं। यूपी के सकल घरेलू उत्पाद में मिलावट का कितना योगदान है,इस पर अर्थशास्त्रियों को शोध करना चाहिए। मिलावटखोरों की सत्ता जिस निर्विघ्नता से फल-फूल रही है उससे लगता ही नहीं कि इस देश में कोई सरकार है। ऐसा लगता है कि सरकार बाजार को मिलावटखोरों के हवाले कर भाग गई है। उधर अपराधों के मामले सरकार को नदारद हुए एक अर्सा हो गया है। अपराधों को लेकर जो थोड़ा बहुत पुलिसिया हलचल दिखाई देती है वह भी इसलिए कि आम आदमी को लगता रहे कि देश में पुलिस है और सरकार भी। ताकि आम आदमी डरा रहे और पुलिस पर अरबों रुपए के खर्च जस्टिफिकेशन होता रहे। इधर महंगाई के मामले में भी सरकार सीन से गायब हो गई है। इस बार वह बिना बताए गायब नहीं हुई बल्कि उसने ढ़ोल पीटकर बताया कि महंगाई बाजार और लोगों के बीच का मामला है इसलिए इसमें सरकार का क्या काम ? पेट्रोल, डीजल में भी सरकार ने मोर्चा अब अंतराष्ट्रीय बाजार के हवाले कर दिया है। अनाज की उपलब्धता से लेकर कीमतों तक का सारा काम सरकार ने वायदा बाजार को सौंप दिया है।अब यह उसकी मर्जी है कि कौन सा अनाज कब बाजार से गायब होगा और कब,किस भाव से बाजार मे कब आएगा । सरकार इस झंझट में नहीं पड़ेगी। अतिक्रमण से लेकर पानी, बिजली, सफाई, स्वास्थ्य और टैªिफक जैसी जरुरी व्यवस्थाओं से सरकार ने 90 के दशक में ही विदाई ले ली थी। यूएनडीपी की रिपोर्ट बता रही है कि गरीबी के मामले में भारत का मुकाबला अब सिर्फ अफ्रीकी देशों से है। 55 फीसदी आबादी गरीब है। यह उस देश का हाल है जिसके बारे में कहा जा रहा है कि वह विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है।हालांकि देश के न्यूज चैनल अरबपतियों और करोड़पतियों की बढ़ती तादाद के आंकड़े पेश कर आम लोगों को इस पर छाती फुलाने के लिए उकसाते नजर आते हैं।गरीबों की इस बढ़ती तादाद से यह भ्रम भी दूर हो गया है कि इस देश में गरीबों की रक्षा के लिए सरकार की जरुरत है। गरीबी के महासागर में मनरेगा के छुटपुट टापुओं को छोड़ दें तो आम आदमी के लिए सरकार की उपयोगिता सिफर है। सरकार की आखिरी जरुरत जिस न्याय के लिए पड़ती है उसका हाल सब जानते हैं कि वह पैसे और प्रभुत्व वाले वर्ग के लिए आरक्षित है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt; &lt;strong&gt;ऐसे &lt;/strong&gt;में सवाल उठता है कि जब सरकार न रोजी, न रोटी, न कपड़ा, न मकान, न दवा, न इलाज ,न सुरक्षा और न्याय दे पा रही हो और तो और वह अपने नागरिकों के जीवन जीने के नैसर्गिक अधिकार की रक्षा करने में भी असमर्थ हो तो फिर नागरिकों के लिए उसकी जरुरत क्या है? नेताओं, अफसरों और सरकारी अमले पर खर्च होने वाले अरबों-खरबों रुपए का बोझ लोग क्यों उठायें? सरकार को बेवजह ढ़ोने का क्या तुक है ?जब निजी क्षेत्र ही सारी बीमारियों का इलाज है तो सरकार को भी क्यों न उसी निजी क्षेत्र के हवाले कर दिया जाय?इससे देश को भ्रष्ट और अयोग्य नेताओं के उस झुंड से छुटकारा मिलेगा जो हर चुनाव में झूठ और हराम के पैसों के बल पर विधानसभाओं और संसद में काबिज हो जाता है। बोनस के तौर पर लोगों को उन अफसरों और सरकारी तंत्र से भी निजात मिलेगी जिनकी लालफीताशाही से सारा देश त्रस्त है। क्योंकि भारत में सरकार अब जनकल्याण के लिए नहीं बल्कि सरकारी अमले के भरण पोषण और भ्रष्टाचार के लिए चलाई जारही है। &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2819485710590251716-4152714066578175400?l=shabdsansad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsansad.blogspot.com/feeds/4152714066578175400/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2010/07/blog-post_5326.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/4152714066578175400'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/4152714066578175400'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2010/07/blog-post_5326.html' title='सरकार को निजी हाथों में सौंपो'/><author><name>Shabd Sansad</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02242133088252450931</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='23' src='http://3.bp.blogspot.com/--JtNUUx-yvg/TsqTmToFzzI/AAAAAAAAALc/4vkSErAt6fE/s220/center%2Bpage%2B4%2Bth%2B%2BIssue%2B01.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2819485710590251716.post-2095723516636134073</id><published>2010-06-19T08:01:00.000-07:00</published><updated>2010-06-19T08:06:40.535-07:00</updated><title type='text'>बर्बर! अमानुषिक !! और पाशविक!!!</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;color:#006600;"&gt;जिन लोगों को भारतीय राज्य में मानवीयता के अंश होने का भ्रम हो वे जरा लालगढ़ में मुठभेड़ में मारे गए माओवादियों की मृत देहों से भारतीय सुरक्षाबलों द्वारा किए गए सलूक के फोटो देख लें तो निश्चित तौर पर उनका यह भ्रम जाता रहेगा। डंडों से बंधी मृत पुरुष और महिलाओं की देहें सांमतकाल के दौर के शिकारियों की याद दिलाती हैं।जब शिकार पर गए राजा और सामंत इसी तरह से गर्व के साथ डंडों पर बांधकर मारे गए जंगली जानवरों को लेकर लौटते थे। ये फोटोग्राफ्स और वीडियो फुटेज बताते हैं कि भारतीय राज्य ऐसे आदमखोर दैत्य में बदल चुका है जो अपने ही नागरिकों का आखेट बर्बर, अमानुषिक और पाशविक तरीकों से करने में यकीन रखता है। लालगढ़ में सुरक्षा बलों के हमले का एक साल पूरा होने का उत्सव माओवादियों को मुठभेड़ में मारकर मनाया गया। यह सिर्फ संयोग नहीं है कि निकाय चुनावों में हार के बाद पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार माओवादियों के खिलाफ ज्यादा आक्रामक नजर आ रही है। यह उसकी खिसियाहट भी हो सकती है और विधानसभा चुनाव से पहले माओवादियों से सहानुभूति रखने वाले जनसंगठनों के सफाये की रणनीति भी। सीपीएम भली भांति जानती है कि अकेले ममता उसे नही हरा सकती। लेकिन ममता और अति वामपंथियों का गठजोड़ उसके लिए मारक साबित हो सकता है। क्योंकि अति वामपंथियों की उपस्थति के चलते उसके प्रगतिशील मुखौटे के पीछे छिपा गरीब विरोधी हिंस्त्र चेहरा दिखाई देता है और कम्युनिस्ट होने का जो तिलिस्म उसने इतने सालों से तैयार किया है वह बिखरने लगता है।इसलिए माकपा यदि माओवादियों और उनसे सहानुभूति रखने वालों को निपटाने की हड़बड़ी में दिखाई दे रही है तो यह उसकी चुनावी मजबूरी भी है और आत्मरक्षा की आखिरी कोशिश भी।मगर लालगढ़ की जो तस्वीरें अखबारों में दिखी हैं वे बर्बरता की हद हैं। लकड़ी के डंडे पर हाथ-पैर बांधकर मरे हुए पशुओं की तरह मुठभेड़ में मारे गए माओवादियों को ढ़ोये जाने की इस घटना से जाहिर है कि भारतीय सुरक्षा बल माओवादियों के मृत देहों से भी प्रतिशोध ले रहे हैं।मृत शरीरों कंे साथ इस तरह के दुर्व्यवहार के जरिये पश्चिम बंगाल और केंद्रीय सुरक्षा बल यदि यह संदेश देंना चाहते हैं कि माओवादी और उनसे सहानुभूति रखने वालों की लाशों की भी दुर्गति की जाएगी, तो यह दुर्भाग्यपूर्ण से ज्यादा एक पाशविक कृत्य है और जेनेवा कन्वेंशन के तहत युद्ध अपराध है। भारत ही नहीं पूरी दुनिया में परंपरा रही है कि मारे जाने के बाद शत्रु के शव के साथ गरिमा और सम्मानपूर्ण व्यवहार किया जाता है।सभ्य समाज सदियों से इस आचरण संहिता का पालन करते रहे हैं। यदि आदिम काल के बर्बर दौर को छोड़ दे तो इतिहास में मंगोलों समेत बहुत कम बर्बरतापूर्ण हमले ही मिलते हैं जब शत्रुओं के शवों के साथ बर्बर व्यवहार किया गया हो। मृत देहों को अपमानित करना विजयी शासकों और समाजों का सामान्य व्यवहार नहीं रहा। जाहिर है कि माओवादियों के शवों के साथ दुव्यवहार कर भारतीय राज्य ने इतना तो साबित कर ही दिया है कि माओवादियों के खिलाफ बदले की भावना से ग्रस्त होकर वह बर्बरता के मामले में मध्ययुग के मंगोल आक्रमणकारियों की याद दिला रहा है।आश्चर्य है कि एक लोकतांत्रिक देश के सुरक्षाबलों द्वारा शवों के साथ किए गए इस दुर्व्यवहार पर खबरिया चैनल धृतराष्ट्र बने हुए हैं।दंतेवाड़ा हमले पर माओवादियों के खिलाफ गला फाड़कर चिल्लाने वाले प्रतापी एंकर, विद्वान संपादक और उत्तेजना में कांपते रिपोर्टर सब खामोश हैं। कोई यह कहने कहने को तैयार नहीं है कि भारतीय राज्य और उसके सुरक्षा बलों का आचरण असभ्यता पूर्ण और बर्बर है। इनमें से कोई भी नहीं कहता कि यह युद्ध अपराध की तरह गंभीर अपराध है जिसके लिए जिम्मेदार लोगों को दंडित किया जाना चाहिए। कम से कम भारतीय राज्य से मध्ययुग के सभ्य राज्य की तरह बर्ताव करने की उम्मीद तो की जा सकती है।यदि वह अपने शत्रुओं के साथ तीसरी सदी के सिकंदर की तरह उदार बर्ताव नहीं कर सकता तो उनके शवों के साथ तो गरिमा के साथ पेश तो आ ही सकता है। हम भारतीय राज्य से नागरिक अधिकारों और मानवाधिकारों की रक्षा का सवाल नहीं उठा रहे हैं क्योंकि भारतीय राज्य और उसके समांतर खड़े माओवादियों के बीच चल रहे इस युद्ध में नागरिक अधिकार भले ही स्थगित कर दिए गए हों।इसलिए मुठभेड़ों के औचित्य पर कोई सवाल न उठाते हुए बस इतनी अपील तो की जा सकती है कि भारतीय राज्य बर्बर समाजों की तरह माओवादियों के शवों के साथ पेश न आए।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2819485710590251716-2095723516636134073?l=shabdsansad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsansad.blogspot.com/feeds/2095723516636134073/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2010/06/blog-post_19.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/2095723516636134073'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/2095723516636134073'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2010/06/blog-post_19.html' title='बर्बर! अमानुषिक !! और पाशविक!!!'/><author><name>Shabd Sansad</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02242133088252450931</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='23' src='http://3.bp.blogspot.com/--JtNUUx-yvg/TsqTmToFzzI/AAAAAAAAALc/4vkSErAt6fE/s220/center%2Bpage%2B4%2Bth%2B%2BIssue%2B01.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2819485710590251716.post-3673130494135664160</id><published>2010-06-09T08:18:00.000-07:00</published><updated>2010-06-09T08:24:40.486-07:00</updated><title type='text'>भोपाल के बूचड़खाने में सब नंगे हैं</title><content type='html'>&lt;span style="color:#006600;"&gt;कहते हैं कि ईश्वर के घर में देर है पर अंधेर नहीं। पर भारतीय अदालतों के बारे में ऐसा कतई नहीं कहा जा सकता। देर और अंधेर उनकी बुनियादी और इनबिल्ट विशेषतायें हैं या कह सकते हैं कि मैैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट हैं। वे फैसले करने में अन्याय की हद तक देर लगाती हैं और उस पर तुर्रा यह कि उनके अधिकांश फैसले से अंधेर जैसे निराश कर देने वाले लगते हैं। बाजार की सेल्स प्रमोशन स्कीमों की तरह न्याय चाहने वाले लोगो को एक आफत के साथ दूसरी आफत मुफ्त में मिलती है। हालांकि साख बचाए रखने लायक अपवाद वहां भी होते हैं । हर व्यवस्था की तरह यह उसकी जरुरत भी है या कहें कि मजबूरी भी। भोपाल गैस त्रासदी पर जब अदालत का फैसला आया तो मीडिया में मची चीख पुकार के बावजूद अदालत ने वही किया जो उसकी बड़ी बहनें अब तक करती आई हैं। वर्ना इतने बड़ी तादाद में हुए नरसंहार और लाखों लोगों को यातनाओं के नरक में धकेलने वाले इस कारपोरेट अपराध पर 25 साल बाद फैसला सुनाना तो मूल अपराध से भी बड़ा अपराध है।इससे पहले 1989 और 1996 में सुप्रीम कोर्ट भी गैस पीड़ितों के खिलाफ अपना फैसला सुना चुका है। इसलिए इस फैसले को ‘‘देर और अंधेर’’ के रुप में याद रखा जाना चाहिए। भोपाल गैस कांड भारतीयों को गिरमिटियों के रुप में बेचे जाने के बाद पहला मौका था जब विश्व बाजार में भारतीयों को इतनी कम कीमत पर बेचा गया।यदि मृतकों की जान की औसत कीमत और विकलांग हुए जिंदा लोगों के न्यूनतम गुजर बसर की लागत,जिसमें दवाईयों पर होने वाला न्यूनतम खर्च भी शामिल है, को मुआवजे का आधार माना जाय, इस कंजूस आकलन पर भी गैस पीड़ितों को 1737 अरब रुपए बतौर मुआवजा मिलना चाहिए था। मुआवजे के इस आकलन में पीड़ितों का औसत जीवन काल 25 साल माना गया है। यदि हर्जाने के तौर पर इसका आकलन किया जाय तो मुआवजे की राशि कई सौ खरब में पहुंच जाएगी।यदि भारतीयों की औसत उम्र पर हर्जाने की गणना की जाय तो यह कई गुना अधिक होगी। यदि अमेरिका या पश्चिमी देशों में ऐसा नरसंहार हुआ होता तो दोषियों को सजा के साथ इतना हर्जाना देना पड़ता कि उससे यूनियन कार्बाइड दिवालिया हो गई होती। मगर भारतीय न्यायपालिका ने ऐसा न पहली बार किया है और न आखिरी बार।इसे दुर्लभतमों में से दुर्लभ खराब फैसला भी नहीं कहा जा सकता। भारतीय राज्य और कारपोरेट घरानों के पक्ष और आम लोगों के विपक्ष में ऐसे फैसले आते रहते हैं। सिर्फ इतना हुआ है कि उदारीकरण के बाद न्यायपालिका ने उस लबादे को भी उतार फेंका है जो उसकी मिथकीय निष्पक्षता का आभामंडल बनाता था।उदारीकरण के बाद आए अनगिनत फैसलों के जरिये न्यायपालिका ने पहले ही यह साफ कर दिया है कि उसका भी अपना एक खास वर्ग और पक्ष है जो अक्सर पीड़ितों के खिलाफ दिखाई देता है।अलबत्ता अदालतें कभी-कभार ऐसे फैसले भी करती हैं जो लोगों को ढ़ाढ़स बंधाते दिखते हैं। ऐसे फैसलों से लगता है कि देश की न्यायव्यवस्था का सूरज आखिरी तौर पर अभी डूबा नहीं है।चमत्कृत कर देने वाले ग्रीक, रोमन उद्धरणों, अंग्रेजी के खूबसूरत शब्दों में गंुथे प्रभावोत्पादक भाषा वाले ये फैसले जजों की विद्वता पर भरोसा बंधाते हैं। न्यायिक इतिहास में रुचि रखने वाले लोग इन्हे नक्काशीदार फ्रेमों में जड़कर रख सकते हैं। ऐसे फैसले सूक्तियों की तरह याद रखे जाते हैं। देर और अंधेर के अंधेरों के बीच पेंसिल टॉर्च की तरह टिमटिमाने इन फैसलों की रोशनी आम लोगों को निराश नहीं होने देती।पर बावजूद इसके ये फैसले लोगों की रोजमर्रा के जीवन में राज्य और प्रभावशाली लोगों के द्वारा किए जा रहे अन्याय को कम नहीं कर पाते और न ही वे अन्याय और दमन की मशीनरी को भयभीत कर पाने में समर्थ होते हैं। नवें दशक तक जनांदोलन और न्यायपालिका मिलकर जन असंतोष के दबाव को कम करने के लिए सेफ्टी वाल्व का काम करते थे। दोनो मिलकर लोकतंत्र में लोगों का भरोसा कायम रखते थे। बीसवीं सदी के आखिरी दशक में जब उदारीकरण का दौर आया तो अदालतें पूरी तरह से उदारीकरण की चपेट में आ गईं। देश के हाईकोर्टों और सुप्रीम कोर्ट के द्वारा 1991 और उसके बाद किए गए फसलों की समीक्षा करें तो यह साफ नजर आ जाता है कि इस दौर में अदालतों के अधिकांश दूरगामी फैसले मजदूरों, किसानों, विस्थापितों, कर्मचारियों जैसे सामान्य वर्ग के लोगों के खिलाफ गए हैं। इसी दौर में न्यायपालिका ने हड़तालों,जुलूसों और सभाओं पर पाबंदी लगाने जैसे फैसले किए जो दरअसल अराजनीतिक उच्च वर्ग और उच्च मध्यवर्ग को खुश करने के लिए गए जैसे महसूस किए गए। हजारों लाखों लोगों की भागीदारी वाले टिहरी बांध से लेकर नर्मदा बांध विरोधी आंदोलनों को अदालती फैसलों ने एक झटके में ही धूल चटा दी।इन अहिंसक आंदोलनो को सजा ए मौत का फैसला अदालतों ने ही सुनाया। इसी दौर में सबसे ज्यादा फैसले भी कारपोरेट कंपनियों के पक्ष में हुए। चाहे वे हड़तालों और सेवा संबधी मामलों के रहे हों या फिर कारपोरेट घरानों से जुड़े अन्य हितों के। कारपोरेटी समूहगान में विधायिका, कार्यपालिका के साथ न्यायपालिका के भी खड़े होने का ही परिणाम था कि उदारीकरण के बाद देश में औद्योगिक मजदूरों की हालत बद से बदतर हो गई। आउट सोर्सिंग के चोर दरवाजे के चलते निजी क्षेत्र में बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में मजदूर आंदोलनों से हासिल हुई अधिकांश सुविधायंे खत्म कर दी गई हैं। उदारीकरण के दौर में एक ओर जहां लोगों के संकट बढ़ते रहे वहीं न्यायपालिका सामान्य लोगों के बुनियादी सवालों के प्रति अनुदार होती गई।हालांकि राजनेताओं और कुछ हाई प्रोफाइल लोगों के खिलाफ फैसले सुनाकर उसने मीडिया से तालियां भी बटोरी और यह आभास कराने की कोशिश भी की कि सरकारी तंत्र के लिए उसके पास काटने वाले दांत भी हैं।पर यह सब वाहवाही लूटने से आगे का खेल नहीं था।ऐसा उदाहरण खोजना मुश्किल है जब कोई कोर्ट हस्तक्षेप कर किसी जनाधिकारों के पक्ष में आगे आया हो।छत्तीसगढ़ से लेकर उड़ीसा तक अहिंसक आंदोलन सरकारों के दमन के आगे असहाय और पराजित होते रहे पर अदालतें लोगों के जीने के अधिकार की गारंटी नहीं कर पाईं। आदिवासियों को खदेड़ने पर तुले कारपोरेट राक्षसों पर देश की अदालतें चुप हैं। जाहिरा तौर पर यह जनअसंतोष को सुरक्षित रास्ता देने की पुरानी लोकतांत्रिक रणनीति में बदलाव का संकेत है। भारतीय शासन व्यवस्था में आंदोलनों और जनअसंतोष के प्रति बढ़ रही इस अनुदारता की काली छाया न्यायपालिका पर भी दिख रही है। उदारीकरण के आगमन के बाद से यदि भारतीय जनजीवन में हिंसा बढ़ी है तो इसका कारण भी यही है कि लोकतंत्र के चारों पाए अब घोषित रुप से कारपोट लोकतंत्र के पक्ष में हैं।न्यायपालिका पर अनास्था रखने वाले समूह बढ़ रहे हैं। यह आखिरी किला था जो भारतीय लोकतंत्र की वर्गीय पक्षधरता को संतुलित करता था। इसकी वर्गीय पक्षधरता भी उजागर होने के बाद किस मुंह से भारतीय राज्य खुद के लोकतंत्र होने का दावा कर सकेगा? भोपाल गैस कांड यह सवाल भी देश के लोकतंत्र से पूछ रहा है।पांच लाख से ज्यादा लोगों से उनके स्वाभाविक रुप से जीने का प्राकृतिक और संवैधानिक अधिकार छीनने के दोषी लोगों में से एक के खिलाफ भी कोई कार्रवाई न हो ऐसा अंधेर तो इसी देश में संभव है। भोपाल के इस कारपोरेट बूचड़खाने में भारतीय कारपोरेट कंपनियां, कार्यपालिका,विधायिका और न्यायपालिका सब के सब नंगे खड़े हैं। एंेसे में भोपाल गैस कांड के पीड़ितों को न्याय के लिए शायद अगले जन्म का इंतजार करना होगा। क्या इस न्यायिक अंधेर पर किसी को कभी शर्म आएगी?&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2819485710590251716-3673130494135664160?l=shabdsansad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsansad.blogspot.com/feeds/3673130494135664160/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2010/06/blog-post.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/3673130494135664160'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/3673130494135664160'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='भोपाल के बूचड़खाने में सब नंगे हैं'/><author><name>Shabd Sansad</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02242133088252450931</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='23' src='http://3.bp.blogspot.com/--JtNUUx-yvg/TsqTmToFzzI/AAAAAAAAALc/4vkSErAt6fE/s220/center%2Bpage%2B4%2Bth%2B%2BIssue%2B01.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2819485710590251716.post-4939450588343495647</id><published>2010-05-25T07:59:00.000-07:00</published><updated>2010-05-25T08:08:11.936-07:00</updated><title type='text'>कुंभ के बहाने संतों का सच</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_GeAj9PhRn2Q/S_vnxqzVy2I/AAAAAAAAAD0/AYrD5Zcxkt0/s1600/kumbh-mela-2010shahi-snan.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5475224612488203106" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 300px" alt="" 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परजीवियों के धार्मिक दुर्ग या मठ भी नहीं है। यह धर्म की सतह के नीचे बदबू मार रहे ऐयाशी के अंधेरे तहखाने नहीं है। सिद्धार्थ का बुद्ध हो जाना ही सन्यास है।लेकिन सन्यासी बुद्ध ने न आश्रम बनाया, मठ भी नहीं बनाया। स्वामी विवेकानंद ने सन्यासी जीवन को ‘ करतल भिक्षा,तरुतल वास’ में देखा । अपरिग्रह यानी कि कुछ भी संचित न करना सन्यास की पहली शर्त है। सत्कर्म के अलावा कुछ भी संचय करना सन्यासी के लिए वर्जित है। सांसारिक सुखों का निषेध उसकी आचार संहिता का सबसे जरुरी हिस्सा है । सूरदास ने कहा ,‘संत का सीकरी से क्या लेना-देना ?’ जो सत्ता से दूर अपनी फक्कड़ी में मस्त है वही सन्यासी है। इसीलिए कबीर कहते हैं,‘ माया महाठगिनी हम जानी।’ आज सन्यासियों की नई प्रजाति से हमारा सामना हो रहा है। यह एक तरह से परजीवियों की जमात है जो लोगों को भोगविलास से दूर रहने की नसीहत देती है और खुद भोगों में मस्त है। ऐसे बिरले ही मठ और आश्रम होंगे जिन्होने सरकारी या समाज की जमीन पर अतिक्रमण न किया हो। अधिकांश मठों और आश्रमों के खिलाफ पुलिस में मामले दर्ज हैं। कईयों पर तो हिस्ट्रीशीटरों की तरह दर्जनों मुकदमे चल रहे हैं। जिस धर्म को ऐसे लोग संचालित कर रहे हों उसे दुश्मन की जरुरत ही क्या है? कुंभ के दौरान खुद को संत घोषित करने वाले ये लोग सरकार को तिगनी का नाच नचाते रहे। मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाने वाली भाजपा की सरकार रोज अखाड़ों के साधु - सन्यासी के सामने घुटने टेकती रही। हर सप्ताह कोई न कोई अखाड़ा सरकार को घुड़कियां देता रहा। कुंभ पर स्नान जिस तरह से अखाड़ों और शंकराचार्यों ने अपना विशेषाधिकार बना लिया है उससे यह सवाल उठ खड़ा है कि क्या कुंभ अखाड़ों और शंकराचार्यों के लिए आयोजित किए जाने वाला जमावड़ा है या फिर यह भारत के आम लोगों का मेला है ? कुंभ यदि इतना बड़ा सांस्कृतिक समागम बन सका है तो इसके पीछे सदियों से उस गरीब और साधनहीन भारतीय की आस्था रही है पर मठों और महंतों के संगठित व ताकतवर तंत्र ने कुंभ को हथिया लिया है। इतिहास गवाह है कि मध्यकाल से पहले कुंभ स्नान में सन्यासियों को वरीयता दिये जाने की कोई व्यवस्था नहीं थी। तब यह आम लोगों का मेला था। महान चीनी यात्री ह्वेन सांग और फाहियान के यात्रा विवरणों में साधुओं या सन्यासियों को कुंभ में प्राथमिकता दिए जाने का कहीं भी उल्लेख नहीं है। मध्यकाल में कुंभ स्नान को लेकर अखाड़ों के अहंकार आपस में टकराने लगे थे। सन्यासियों के इस दंभ और अहंकारों के चलते कई बार कुंभ की पवित्र धरती खून से लाल हुई । हजारों लोग इन अहंकारी साधुओं के टकराव में मारे गए। अखाड़ों के महंतों और महामंडलेश्वरों के अहं की तुष्टि और हिंसक टकरावों को टालने के लिए अंग्रेजों ने शाही स्नान की परंपरा डाली। आजाद भारत में ऐसी परंपरा कोई स्थान नहीं होना चाहिए। सन्यासियों को आम आदमी की तरह आम लोगों के साथ क्यों नहीं नहाना चाहिए? जिनके भीतर इतना अहंकार, द्वेष, क्रोध, और आडंबर है क्या वे साधु हैं? कुंभ यदि आज हिंदुओं की आस्था का प्रतीक है तो इसके पीछे उस आम किंतु गरीब हिंदू की धार्मिकता है जो रेलों, बसों में धक्के खाते हुए गंगा स्नान करने आता है । गांधी का यह दरिद्रनारायण कभी -कभी तो कर्ज लेकर भी कुंभ आता है। वे करोड़ों लोग जो अपने जीवन की मुश्किलों के बावजूद गंगास्नान करने चले आते हैं वे सन्यासियों के अखाड़ों और शंकराचार्यों के लिए नहीं आते। इस कुंभ में कई बार लगा कि जैसे सरकार को अखाड़े, विश्व हिंदू परिषद और शंकराचार्य ही चला रहे हों। सन्यासियों के ये समूह सरकार को अपनी शर्तें डिक्टेट करते रहे परंतु वे करोड़ों लोग, जिनके लिए धर्म न धंधा है और न आजीविका का साधन, उनकी असुविधाओं के बारे में सरकार ने शायद ही चिंता की हो। इन सच्चे तीर्थयात्रियों को मुफ्त में न सही पर कम कीमत पर हरिद्वार में रहने की जगह या सस्ता खाना मिल सके, इस पर सरकार, साधु और धर्म के ठेकेदार चुप रहे। धर्मशालाओं के किराये होटलों को मात करने लगे। दिल्ली के पत्रकार मित्र ने बताया कि हर की पैड़ी में एक नामी मंहत के आश्रम के एक कमरे का किराया पंचतारा होटल के बराबर था। इन आश्रमों और धर्मशालाओं की ऑन लाइन बुकिंग एक होटल की वेबसाइट के जरिये हो रही थी। इनके लिए लोकल स्तर पर ग्राहक भी होटल वाले ही भेज रहे थे।कुंभ आते ही हरिद्वार में धर्मशालाओं और होटलों के किराये दस गुने से ज्यादा बढ़ गए। होटलों को सरकार ने लूट का ग्रीन सिग्नल दे दिया था। देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाली धर्मपरायण जनता के लिए किसी का दिल नहीं पसीजा, न साधुओं का, न हिंदू धर्म के महामंडलेश्वरों का, न शंकराचार्यों का और न विहिप का। उत्तराखंड सरकार की यह कैसी आतिथ्य परंपरा है जो अतिथियों की जेब पर डाका डालने की छूट देती है। यह किस तरह का धर्म है जो आश्रमों और धर्मशालाओं को होटलों में बदल देता है। हद तो यह है कि एक अखाड़े ने हरिद्वार में कुंभ का लाभ उठाते हुए सरकारी जमीन पर ही कई मंदिर बना दिए और धर्म के नाम पर लोकल प्रशासन को ही आंखे दिखानी शुरु कर दी। कुंभ का यह सच उनका है धर्म के नाम पर समाज से सिर्फ लेना जानते हैं। एक सच सरकारी तंत्र का भी है जिसने 700 करोड़ रुपए की दीवाली मनाई और अब मूंछों पर ताव देते हुए अपनी पीठ खुद ही ठोंक रहा है पर उसकी कारगुजारियों खुलासा फिर कभी। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2819485710590251716-4939450588343495647?l=shabdsansad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsansad.blogspot.com/feeds/4939450588343495647/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2010/05/blog-post_25.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/4939450588343495647'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/4939450588343495647'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2010/05/blog-post_25.html' title='कुंभ के बहाने संतों का सच'/><author><name>Shabd Sansad</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02242133088252450931</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='23' src='http://3.bp.blogspot.com/--JtNUUx-yvg/TsqTmToFzzI/AAAAAAAAALc/4vkSErAt6fE/s220/center%2Bpage%2B4%2Bth%2B%2BIssue%2B01.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_GeAj9PhRn2Q/S_vnxqzVy2I/AAAAAAAAAD0/AYrD5Zcxkt0/s72-c/kumbh-mela-2010shahi-snan.jpg' height='72' 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ने पूरे देश को हिलाया है । इन जवान मौतों ने लाखों लोगों को विचलित किया है । टीवी चैनलों में देशभक्ति के ज्वार के बीच जिन दृश्यों को दिखाया गया है उससे केंद्र और राज्य सरकारों को आपरेशन ग्रीन हंट के लिए जो जनमत की जो हरी झंडी चाहिए थी वह मिल गई लगती है । इन दृश्यों से पैदा हुआ जनमत दोनों सरकारों को यह अधिकार देता है कि वे भी माओवादियों को उसी तरह मार डालें जिस तरह उन्होने सीआरपीएफ के जवानों को मारा है । टीवी चैनलों को इस बात का श्रेय दिया ही जाना चाहिए कि वे इस देश को ऐसी भीड़ में बदलने की कूव्वत रखते हैं जो खून के बदले खून मांगती हो। आदिवासी इलाकों को तबाही की कगार पर पहुंचाने वाले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह और केंद्रीय गृहमंत्री चिदंबरम को ऐसी ही भीड़ पसंद है और उन्हे ऐसी भीड़ की सर्वाधिक जरुरत भी है। आने वाले समय में हम राज्य और केंद्र के सुरक्षा बलों को माओवादियों का इसी तरह संहार करते हुए भी देखेंगे । हममें से जो भी इन मुठभेड़ों पर सवाल उठायेगा वह देशद्रोही करार दे दिया जाएगा । यानी न अदालत, न मुकदमा सीधे ऑन द स्पॉट सफाया !! लेकिन तब कोई न्यूज चैनल मुठभेड़ में मारे गए माओवादियों के बिलखते परिजनों के विचलित करने वाले विजुअल्स इसलिए नहीं दिखाएगा कि कहीं इससे उनके प्रति सहानुभूति पैदा न हो जाय । किसी चैनल ने यह खबर दिखाने का कष्ट नहीं किया कि दंतेवाड़ा कांड से पहले किस तरह से निर्दोष आदिवासियों को पकड़कर बुरी तरह पीटा गया और उनकी स्त्रियों को सरेआम अपमानित किया गया । पूछा जा सकता है कि खबरनवीस खबेसों की यह कैसी संवेदनशीलता है जो सिर्फ सरकारी पक्ष के लिए आरक्षित है ? इस रवैये के संदर्भ में जॉर्ज बुश का वह बहुचर्चित बयान याद करना उचित होगा जो उसने 9/11 के हमले के बाद दिया था । जबरदस्त गुस्से और गम से विचलित अमेरिकी समाज से वादा करते हुये तब बुश ने कहा था कि 9/11 के हमले के दोषियों चाहे वे कहीं भी क्यों न हों ,को न्याय की चौखट पर लाया जाएगा । गौर करें कि बुश ने यह नहीं कहा कि अमेरिकी फौजें दोषियों का सफाया कर देंगी । लोकतांत्रिक होने का अर्थ सिर्फ चुनाव जीतना नहीं होता बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की पवित्रता बनाए रखना भी होता है । दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहे जाने वाले देश का दुर्भाग्य यह है कि उसका गृहमंत्री कभी माओवादियों को न्याय की चौखट पर लाने का नहीं बल्कि हर तीसरे दिन उनका सफाया करने की धमकी देता है। जिस लोकतंत्र का गृहमंत्री ही कानून के राज और न्यायपालिका में यकीन न रखता हो वह लोकतंत्र भयभीत करता है। वह जनमत इसे और भी खतरनाक बना रहा है जिसे इस देश के न्यूज चैनल रोज तैयार कर रहे हैं । वे ‘‘खून के बदले खून’’ और ‘‘जान के बदले जान’’ का उन्मादी जनमत बनाने में जुटे हैं।जाने अनजाने में वे लोकतंत्र के भीतर एक जुनूनी फासीवाद के लिए रास्ता साफ कर रहे हैं।मानवाधिकारों की रक्षा के मामले में दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में फिसड्डी देश के शासकों को ऐसे ही उन्मादी जनमत की जरुरत है जो मानवाधिकारों से छूट देकर उन्हे आदिवासी इलाकों में मुठभेड़ों के निर्द्वंद अधिकार को वैधता प्रदान करता हो। कानून के दायरे बाहर जाकर सफाया करने के चिदंबरम के माओवादी विरोधी सिद्धांत और मोदी के मुस्लिम विरोधी सिद्धांत में कोई बुनियादी फर्क नहीं है । क्योंकि दोनों ही अपने विरोधी समूह के सफाये में यकीन रखते हैं । इस पूरे वाकये को जिस तरह से माओवादी बनाम देश की लड़ाई के रुप में पेश किया जा रहा है वह क्या सच है या सरकारी लड़ाई को देश की लड़ाई बनाने का खेल खेला जा रहा है ? क्या वाकई यह देश की लड़ाई है?उत्तराखंड आंदोलन के दौरान मसूरी गोलीकांड में एक पुलिस अफसर मारा गया था और कई आंदोलनकारी भी मारे गए थे । सरकार के लिए उसका अफसर शहीद था पर आम लोगों के लिए उत्तराखंड के लिए मर मिटने वाले लोग शहीद थे ।आज इन्हे उत्तराखंड की सरकार भी शहीद मानती है । तब सरकार की ओर से गोलीबारी कराने वाले बुआ सिंह और ए0पी0 सिंह आज भी उत्तराखंड की जनता के बीच सबसे बड़े खलनायक हैं । ऐसा अनेक आंदोलनों में होता है जब जनता के नायक सरकार के लिए अपराधी होते हैं लेकिन इतिहास में जिंदा तो जनता के नायक ही रहते हैं सरकार के नायक नहीं । देश के भीतर जब भी संघर्ष होंगे तब शहादतों पर भी राय बंटी रहेगी । जाहिर है कि बाहरी दुश्मनों का हमला और देश के भीतर सरकारी नीतियों के खिलाफ होने वाले संघर्ष अलग - अलग घटनायें हैं । जिसे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री देश की लड़ाई का नाम दे रहे हैं वह दरअसल दो अलग-अलग व्यवस्थाओं में यकीन रखने वाले समूहों के बीच का गृहयुद्ध है। क्योंकि माओवादी सरकार के खिलाफ हैं न कि देश की अखंडता के । अलबत्ता इतना जरुर कहा जा सकता है कि वे मौजूदा तंत्र का तख्तापलट कर अपनी विचारधारा पर आधारित तंत्र कायम करना चाहते हैं। इस लड़ाई की त्रासदी यह है कि इसमें दोनों ओर से साधारण लोगों के बेटे ही मारे जा रहे हैं । इस युद्ध का ऐलान करने वाले नेताओं और अफसरों को खरोंच तक नहीं आ रही है।देश के मात्र आदिवासी हिस्सों तक सिमटे माओवादियों से वास्तविक खतरा कितना असली है यह तो पता नहीं पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि देश की 85 से 90 फीसदी जनता इसकी चपेट में नहीं है।फिर इतना हल्ला और युद्ध का शोर मचाये जाने पर शक होता है कि कहीं इसके पीछे और कारण तो नहीं हैं? वह भी तब जब इस आदिवासी बहुल इलाके की खनिज संपदा के दोहन के लिए 200 से ज्यादा एमओयू साइन किए जा चुके हैं। इससे सवाल उठता है कि कहीं केंद्रीय और राज्यों के सुरक्षा बलों को पास्को सहित बहुराष्ट्रीय कंपनियों और मित्तलों और जिंदलों के लिए रास्ता साफ करने के लिए तो युद्ध में नहीं झोंका जा रहा है ? जिसे देश की लड़ाई बताया जा रहा है वह कहीं इन खरबपतियों की लड़ाई तो नहीं है ? देश की राजनीति और राजनेताओं का जो चरित्र है उसे देखते हुए यह आशंका निराधार नहीं है । वर्ना सरकार आदिवासी इलाकों में किए गए खनन के एमओयू रद्द कर राजनीतिक हल की कोशिश कर सकती थी । छत्तीसगढ़ की राज्य सरकार और केंद्र सरकार दोनों ही नहीं चाहती कि इस इलाके में कोई लोकतांत्रिक आंदोलन जिंदा रहे इसलिए उसने सभी आंदोलनों और संस्थाओं को माओवादियों के साथ सहानुभूति रखने वाला करार देकर वहां लोकतांत्रिक प्रतिरोध का स्पेस खत्म कर दिया गया।हिंसक आंदोलनों से निपटने में पुलिस और सरकारों को दमन का लाइसेंस मिल जाता है इसलिए एक रणनीति के तहत यह सब किया गया । यह रणनीति माओवादियों को भी रास आती है । इससे आम तौर पर हिंसा से दूर रहने वाले लोगों के पास भी हथियार उठाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता । इस तरह की सीधी लड़ाई से माओवादियों को नया कैडर मिल जाता है । हिंसक संघर्ष दोनों ही पक्षों की जरुरत है न कि देश की । एक ओर प्रधानमंत्री और गृहमंत्री माओवादियों को सरकार का सबसे बड़ा खतरा बता रहे हैं तो दूसरी ओर भाजपा नेता अरुण जेटली भी उनके सुर में सुर मिलाकर इसे संसदीय लोकतंत्र के लिए घातक करार दे रहे हैं । अचरज यह है कि देश को बाजार अर्थव्यवस्था के अंधेरे कुयें में धकेलने वाले मनमोहन,चिदंबरम की जोड़ी गरीबी, बेरोजगारी और महंगाई को देश के लिए खतरा नहीं मानती उनकी तरफदारी कर रहे जेटली को लोकसभा में मौजूद तीन सौ करोड़पति सांसदों और कई हजार करोड़ के चुनाव खर्चे से संसदीय लोकतंत्र को कोई खतरा नजर नहीं आता । जिस देश में 76 फीसदी लोग 20 रु0 रोज पर गुजारा कर रहे हों वहां यदि कुछ लोग हथियार उठाकर बदलाव करना चाहते हैं तो किसका दोष है? सरकार का या भूखे लोगों का ? वह भी तब जब महंगाई जैसे ज्वलंत सवाल पर देश के राजनीतिक दल आंदोलन की औपचारिकता निभा रहे हों ।भाजपा से लेकर सीपीएम तक इस देश के नेता होने का दावा करने वालों से पूछा जाना चाहिए कि उनमें गरीबी,बेरोजगारी और महंगाई के !सवाल पर देश की जेलें भर देने का साहस क्यों नहीं है ? इतिहास गवाह है कि जब -जब समाज से लोकतांत्रिक संघर्ष गायब हुए हैं तब -तब आम लोग हिंसक संघर्षों की ओर आकृष्ट हुए हैं । मौजूदा दौर भी उसी ओर जा रहा है । समाज में राजनेताओं की साख बनाए रखने व लोकतांत्रिक संघर्षों के लिए स्पेस बचाए रखने का काम पुलिस और फौज नहीं कर सकती । राजनीतिक नालायकी और निकम्मेपन से उपजे जन असंतोष का फौजी हल संभव नहीं है ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2819485710590251716-2534793050727621987?l=shabdsansad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsansad.blogspot.com/feeds/2534793050727621987/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2010/04/blog-post.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/2534793050727621987'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/2534793050727621987'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='युद्ध है या गृहयुद्ध ?'/><author><name>Shabd Sansad</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02242133088252450931</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='23' src='http://3.bp.blogspot.com/--JtNUUx-yvg/TsqTmToFzzI/AAAAAAAAALc/4vkSErAt6fE/s220/center%2Bpage%2B4%2Bth%2B%2BIssue%2B01.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2819485710590251716.post-4680462328519134369</id><published>2010-02-27T06:34:00.000-08:00</published><updated>2010-02-27T06:37:05.222-08:00</updated><title type='text'>जगह अब भी मौजूद है</title><content type='html'>‘‘लोग सेलेब्रेटीज और पेज थ्री की हस्तियों की रंगीनियों और उनके भव्य जीवन के बारे में पढ़ना चाहते हैं ’’ इस ऐलान के साथ जब नवभारत टाईम्स ने अपना चोला बदला था तब हिंदी अखबारों में ऐसे मालिकों और संपादकों की कमी नहीं थी जिन्होने इस पर नाक - भौंे सिकोड़ी थी । एक दषक पहले अंग्रेजी अखबारों की तरह वह उदारीकरण और ग्लोबलाइजेषन के नषे में चूर था । पिछले दस वर्षों में अंतर इतना ही हुआ है कि नवभारत टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया के उसी रास्ते को भारतीय और खास तौर पर हिंदी पत्रकारिता का मुक्तिमार्ग मान लिया गया है । ‘‘महाजनो गतो येन सः पंथा ’’ के सूत्र वाक्य का पालन करते हुए पत्रकारिता उसी रास्ते पर चल पड़ी है । फर्क बस इतना है कि इस सूत्र वाक्य में वर्णित महाजन का अर्थ महान लोग हैं पर पत्रकारिता के  मौजूदा पाणिनियों ने इस वाक्य का अर्थ सामंतकालीन महाजन का अनुसरण करना माना । बड़े जोर शोर से घोषणा कर दी गई कि गरीबी , बेरोजगारी ,भुखमरी जैसी खबरें लोगों के मुंह का जायका खराब करती हैं , इनसे खाते - पीते लोगों के आनंद में खलल पड़ता है , इसलिए ऐसी खबरों का कोई भविष्य नहीं है । खबरें ऐसी हों कि समाज के मोगेंबो खुष हो जांय । लेकिन हाल ही में आजादी के बाद के दौर की पत्रकारिता के एक नामचीन पत्रकार की जन्म शताब्दी के मौके पर बड़ी तादाद में जुटे लोगों ने बताया कि जनपक्ष में लिखी जाने वाली खबरों का बाजार भी है , भूख भी है और कद्रदान भी हैं ।आचार्य गोपेष्वर कोठियाल हिंदी की मुख्यभूमि के पत्रकार नहीं थे । वे उस हाषिये के पत्रकार थे जो भूगोल के आधार पर निर्मित किए गए  हैं । भूगोल के बीहड़ में पड़े पहाड़ जैसी पिछड़ी जगह के पत्रकार जिसके बारे में हिंदी का मेनलैंड उतना ही जानता है जितना औसत अमेरिकी भारत के बारे में । उत्तराखंड भारत में ऐसी जगह है जिसका नक्षा तब खोजा जाता है जब कोई बस दुर्घटना या भूस्खलन जैसी आपदा घटती  है । उत्तराखंड का भी अपना हाषिया है जो किसी भूगोल ने नहीं बल्कि लगभग 132 साल पुरानी राजषाही ने टिहरी और उत्तरकाषी के रुप में तैयार किया है । इसी अंधेरे हिस्से के एक बाषिंदे थे गोपेष्वर कोठियाल । आजादी के दौर में जब वह पत्रकारिता को अपना भविष्य के रुप में चुन रहे थे तब पत्रकारिता एक ऐसा रुखा - सूखा पेषा था जो कबीर की    ‘‘ जो घर फंूकनो आपनो चलो हमारे साथ ’’ जैसे फक्कड़पन की याद दिलाता था । वह दौर जुनूनी पत्रकारिता और मिषनरी भावुकता समय था । देष और समाज को रास्ता दिखाने की बेचैनी में बंधकर लोग पत्रकारिता में आते थे और ऐसे समाज और शक्तियों के बीच पत्रकारिता के लोकतांत्रिक हथियार का उपयोग करते थे जो मिजाज में सांमती था । 17 वीं सदी के संस्कारों और सीमाओं में बंधे समाजों में पत्रकारिता करना खतरनाक और  उल्टी गंगा बहाने जैसा दुश्कर काम रहा होगा । ऐसे समय में जब टिहरी में राजषाही की अंतिम दौर में थी और अपनी आसन्न मौत से घबराई यह राजषाही हर रोज बर्बरता के नए हथियार आजमा रही थी तब आचार्य गोपेष्वर कोठियाल पत्रकारिता में आए और इस राजषाही के खिलाफ कलम को हथियार की तरह इस्तेमाल करने के इरादे के साथ आए  । वह चाहते तो बेहतर जीवन और भविष्य चुन सकते थे । मास्टर हो जाते और प्राध्यापकी करते हुए किताबें लिखते व पढ़ते - पढ़ाते आराम से जीवन गुजार देते । उस जमाने में जब पांचवीं पास लोग भी चिराग लेकर खोजने से नहीं मिलते थ तब वह काषी हिंदू विष्वविद्यालय से संस्कृत में आचार्य की डिग्री लेकर पहाड़ लौटे थे । उन्ही गोपेष्वर कोठियाल को जन्म शती के मौके पर याद करने के लिए देहरादून में हाल ही में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था । देहरादून का जिक्र आते ही एक ऐसा शहर जेहन में घूमता है जो फिरंगी साहबों से विरासत में मिले चिकनी - चुपड़ी लकड़ी के छोटे से रुल को हाथ में लिए अफसरी ठसक के साथ घूमते रिटायर्ड अफसरों का स्वर्ग माना जाता था । ये अफसर बुढ़ापा बिताने मसूरी की तलहटी में बसे इस शहर में आते । शहर की आबोहवा में मसूरी की ठंडक और मैदान की गर्मी दोनों का ऐसा नायाब मिश्रण था कि देसी अफसर आजादी से पहले और उसके बाद इस शहर के दीवाने रहे । यह सेना और सिविल सर्विसेज के रिटायर्ड अफसरों के शहर के रुप में ही जाना जाता था । ये दोनों मिलकर इसे एक आधा ब्रिटिष और आधा इंडियन कस्बा  बनाते थे । ठीक उस काले एंग्लो इंडियन जैसा जो भारतीय दिखने को तैयार नहीं था परंतु दुर्भाग्य से भारत में ही छूट गया था । इन साहबों का छोटा सा डंडा कुछ नहीं बोलता था लेकिन साहब और उनका रुल दोनों की देह की भाषा यह बता देतीे थी कि वे हिंदुस्तान पर ‘रुल’ करके निवृत हुए हैं । उनकी ठसक इस शहर को भले ही ब्रिटेन के करीब ले जाती हो पर देसी साहबों का मिजाज शहर को नफासत भी बख्शता था । इसे सुसंस्कृत बनाने में अ्रंग्रेजियत के वारिस रहे इन अफसरों का योगदान भी कम नहीं रहा । इसके मिजाज में वो साहबी अंदाज आखिर यूंही तो नहीं आया ।लेकिन ये साहब अकेले नहीं थे जिन्होने इसे देहरादून बनाया । कलाकारों , साहित्यकारों , पत्रकारों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की एक ऐसी आकाषगंगा भी इस अंग्रेजी मिजाज के शहर में चमकती रही जिसने इसे हिंदुस्तानियत का रंग बख्शा और उसे राजनीतिक चेतना से धड़कता शहर बनाया । इनके साथ वे आम लोग भी थे जो पहाड़ और मैदान के गांवों और कस्बों से आए थे जिन्होने ठेठ देसीपन का छौंक लगाकर इसे ज्यादा मानवीय शहर बनाया । राजधानी बनने के बाद शहर का मिजाज भी बदला और जीवन भी । इत्मीनान की जिंदगी गुजारने की लत की जगह भागदौड़ की आदत ले रही है । फुरसत के पल सिमट रहे हैंे और हड़बड़ी का आलम सड़कों पर पसर रहा है । लोग जल्दी में हैं इसलिए शहर में हर रोज कोई न कोई कुचल जाता है । कभी सड़क पर चलने वाले किसी बूढ़े या बच्चे वाले को कुचलकर मोटर साइकिल वाला फुर्र हो जाता है तो कभी मोटर साइकिल वाले कीे कुचलकर कोई कार या ट्रक फरार हो जाता है । यह ऐसा शहर में बदल रहा है जहां लोग मिलने के मौके के लिए ाादी - ब्याह का इंतजार करते हैं । सीएमआई या दून अस्पताल में भर्ती हुए बगैर मित्रों और परिचितों से मिलना मुमकिन नहीं हो पाता । दिल में लीची की मिठास और व्यवहार में बासमती की खुषबू लिए गरमजोषी के साथ मिलनेवाली प्रजाति लीचियों और बासमती की तरह दुर्लभ होती जा रही है । ऐसे शहर में बीते जमाने के प़त्रकार को जन्म के सौ साल बाद याद करने का आयोजन करना खतरे से खाली नहीं था । वह भी ऐसे समय में जब पत्रकारिता की साख नेताओं के चरित्र के सूचकांक की तरह हर रोज कुछ और नीचे गिर जाती हो । लेकिन इसके बावजूद आयोजन में लोग न केवल बड़ी तादाद में आयोजन में पहुंचे बल्कि पूरे समय तक कार्यक्रम में मौजूद भी रहे । भले ही तथाकथित बड़े अखबारों के स्वनामधन्य पत्रकारों को पत्रकारिता के इस पुरखे को याद करने की जरुरत महसूस न हुई हो परंतु इससे पत्रकारिता की विरासत और उसके प्रति कृतज्ञता जताने को लेकर उनकी अरुचि जरुर झलकती है । लेकिन मुख्यधारा की पत्रकारिता की कृतघ्नता से परे हटकर देखें तो यह साफ दिखा कि आम लोगों ने इस मौके पर आकर पत्रकारिता के उस पुरखे के प्रति अपनी कृतज्ञता जताने में कोई कंजूसी नहीं दिखाई वह भी तब जब शहर संवेदना के स्तर पर मरुस्थल में बदल रहा हो । लोगों का यह लगाव और जुड़ाव बताता है कि जनपक्षधर पत्रकारिता को बीते जमाने का शगल करार देने की तमाम कोषिषों के बावजूद जनता के पक्ष में खड़ी पत्रकारिता के कायल लोग हैं । वह भी तब जब कहा जा रहा हो कि मध्यवर्ग  हल्की - फुल्की खबरें पढ़ना चाहता है । मध्यवर्ग से जुड़े लोगों की भीड़ और उनकी चिंताओं ने बताया कि  जैसे - जैसे मुख्यधारा के अखबार सूचना पत्र में बदल रहे हैं वैसे - वैसे खबरों की भूख भी  बढ़ रही है । इसका सीधा मतलब है कि मुख्य धारा के अखबार अलोकतांत्रिक तरीके से आम पाठकों पर अपनी पसंद का कंटेंट थोप रहे हैं ।अखबारों के दफ्तरों में लोकरुचि के नाम पर विचार और जनपक्षधरता की खबरों की हत्यायें किए जाने की घटनाओं के बीच यह सुकून से भर देने वाली घटना है जिसे रेखांकित किए जाने की जरुरत है ताकि आने वाले इतिहास में यह जरुर दर्ज किया जाय कि बड़े अखबार जब लोगों के पक्ष में खड़ी खबरों के कत्ल में जुटे थे तब लोग उनके साथ नहीं थे । यह वाकया उम्मीद जगाता है । यह एक मौका है उन लोगों के लिए जो पत्रकारिता को उसकी पेषागत ईमानदारी के साथ अंजाम देना चाहते हैं । यह चुनौती भी है । क्योंकि 21 वीं सदी की पत्रकारिता  आठवें दषक की जनपक्षधरता वाले स्टाइल में नहीं चल सकती । उसे अपने लिए किसी ताजे मुहावरे, षिल्प और भाषा की तलाष करनी होगी । नवें दषक में जनसत्ता और नवभारत टाईम्स ने प्रभाष जोषी और राजेंद्र माथुर की अगुआई में पत्रकारिता की नई भाषा और षिल्प ईजाद कर उसे आजादी के दौर की जड़ता से मुक्त किया था । अब समय है कि 21 वीं सदी की पत्रकारिता अपने समय के साथ कदम ताल करते हुए  पिछले दो दषकों से आई जड़ता को तोड़कर नई जमीन तलाषे । पत्रकारिता के सामने नए षिल्प और मुहावरे की तलाषने की चुनौती हर समय रहेगी क्योंकि संप्रेषण के माध्यम की तकनीक हर रोज बदल जारही है तो बाजारवाद लोगों की रुचियों को अपने हिसाब से तय करने पर आमादा है । ऐसे में जनपक्ष आउटडेटेड होने वाला नहीं है । एक हथियार के तौर पर उसकी जरुरत बढ़ती रहने वाली है । आचार्य गोपेष्वर कोठियाल की जन्म शती के मौके पर आई भीड़ यही कहना चाहती है ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2819485710590251716-4680462328519134369?l=shabdsansad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsansad.blogspot.com/feeds/4680462328519134369/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2010/02/blog-post.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/4680462328519134369'/><link rel='self' type='application/atom+xml' 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और बिडंबना भी कि आजादी के 62 वर्षों बाद भी हम विकास का ऐसा रास्ता नहीं खोज पाए हैं जो विकास के नक्शे से बाहर कर दिए गए क्षेत्रों और लोगों को पिछड़ेपन और उपेक्षित रह जाने के अहसास से मुक्ति दिला सकें । न हमने ऐसी राजनीति और राजनीतिक प्रक्रिया को ईजाद किया जो निर्णय लेने की परिधि से बाहर रह रहे लोगों की राजनीतिक भागीदारी तय कर सके । छोटे राज्यों की आग यदि बड़ी दिखाई दे रही है तो इसकी बुनियाद में भारतीय राष्ट्रराज्य की विफलताओं के शव हैं । ऐसी स्थिति में छोटे राज्यों की कामयाबी और नाकामी की बहस का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि यह भूगोल का नहीं बल्कि राजनीतिविज्ञान का सवाल है ।&lt;br /&gt;हम एक बार फिर छठे और सातवें दशक की उस बहस में वापस लौट रहे हैं जो तब महाराष्ट्र से लेकर आंध्र प्रदेश तक गठन को लेकर चली थी । मजेदार बात यह है कि बीसवीं सदी के मध्य के उस दौर में भी देश की हवाओं राज्यों के विभाजन को लेकर वही भय और आशंकायें तैर रही थीं जो आज 21 वीं सदी के इस पूर्वार्द्ध में गूंज रही हैं । राज्यों के विभाजन के प्रेत से देश के बाल्कनीकरण  का भस्मासुर पैदा होने की आशंका में दुबले होने वाले चिंतक और नेताओं की फौज तब भी थी और आज भी है । लेकिन देश की जनता ने साबित किया कि उसे राज्य की जरुरत और अलगाव के बीच मौजूद नियंत्रण रेखा की समझ हमारे नेताओं से कहीं ज्यादा है । इसीलिए देश के भीतर समय - समय पर चलने वाले अलगाववादी आंदोलन आए और कुछ घावों को छोड़कर विदा हो गए । छठे दशक की चिंताओं को छोड़कर ये राज्य आगे बढ़ गए । इनमें से कई तो विकसित राज्यों की पांत में भी षामिल हैं । सातवें और आठवें दशक की शुरुआत में बने छोटे राज्यों ने कामयाबी के झंडे गाड़े तो लगा कि लोगों की खुशहाली का रास्ता इसी माॅडल में निहित है । पंजाब, हरियाणा और हिमाचल की उपलब्धियों को तो जैसे विकास की बाइबिल मान लिया गया । मानव विकास मानकों , प्रति व्यक्ति आय ,विकास दर और सकल घरेलू उत्पाद के नजरिये से इन राज्यों की उपलब्धियां चमत्कृत करने वाली रही हैं । विकास अपने आप में एक संक्रामक प्रक्रिया है । इसलिए सदियों से दमित और उपेक्षित समाजों को लगा कि नियति बदलने का रास्ता छोटे राज्यों से होकर जाता है । इन राज्यों की उपलब्धियों ने पूरे देश में छोटे राज्यों के समर्थकों को तर्क और औचित्य के हथियार के साथ - साथ आंदोलन का ईंधन भी मुहैय्या कराया । इन राज्यों में हुए विकास के हवाले से उत्तराखंड , झारखंड जैसे पिछड़े इलाकों और उपेक्षित इलाकों में आम लोगों में बदलाव की उम्मीदें जगाए जाने लगीं । ये इलाके देश के ऐसे हिस्से थे जहां राष्ट्रीय राजनीतिक दल जनाकांक्षाओं की कसौटी पर नाकाम साबित हो चुकीं थी और उनकी जगह जो दल आए वे अपने - अपने जातीय घेरों के बंदी थे  । ऐसे यूपी और बिहार के इन हिस्सों में अलगाव का अहसास बढ़ा । झारखंड और उत्तराखंड के आंदोलनों के गर्भ से तीन नये राज्यों का जन्म हो गया । संयोग से इन राज्यों की बहुसंख्या सांस्कृतिक और नृवंशीय नजरिये से अपने पूर्ववर्ती राज्यों से काफी अलग थे । इसलिए ये  मूलतः सांस्कृतिक पहचान के आंदोलन थे जिन्हे पिछड़ेपन के आर्थिक कारणों और यूपी - बिहार की अधीनता के राजनीतिक कारणों ने हवा दी ।&lt;br /&gt;जाहिर है कि अब छोटे राज्यों के दो माॅडल सामने हैं । एक ओर सत्तर के दशक में बने हरियाणा, पंजाब और हिमाचल हैं जिन्हे फलने - फूलने के लिए हरित क्रांति का दौर तो मिला ही साथ ही वह कालखंड भी मिला जब राजनीति और सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार न्यूनतम था । लेकिन विकास का यह माडल भी 20 वीं सदी के आखिरी दशक ठहराव की ओर है , या यूं कहें कि  चरमरा रहा है तो गलत नहीं होगा । हिमाचल में सेब क्रांति चरम पर पहुंचने के बाद जमीन की कमी , अत्यधिक कीटनाशकों ,खादों के प्रयोग और ग्लोबल वार्मिंग के कारण झटके झेल रही है तो पंजाब और हरियाणा में भी जमीन की ताकत और भूजल दोनों ही चुकने जा रहे हैं ।विकास के इन स्वर्गों में मरुस्थल दिखने लगे हैं । दूसरी ओर उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ हैं जिन्हे बने नौ साल बीत चुके हैं । झारखंड एक ओर नक्सलवाद के उभार के लिए चर्चा में है नीम पर जा चढ़े करेले की तरह अब वह मधु कौड़ा के पराक्रम के बहाने राजनीतिक भ्रष्टाचार के लिए भी पूरे देश में जाना जा रहा है । छत्तीसगढ़ नक्सलवाद , सलवां जुड़म और कीमती खनिजों के लिए थोक के भाव से हो रहे  एमओयू  के लिए सुर्खियों में है । उसके आदिवासी बहुल जिलों के सकल घरेलू उत्पाद में बृद्धि नहीं हो रही है । उत्तराखंड में भी इन नौ सालों में ऐसा कोई उल्लेखनीय उपलब्धि नहीं है जो छोटे राज्यों के औचित्य को साबित करे उल्टे नौकरशाही का कार्यकुशलता का ग्राफ यूपी से बदतर हो गया है । भ्रश्टाचार और राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते सरकारी तंत्र चरमरा गया है । हालात यह हैं कि पहाड़ के स्कूलों में तैनात शिक्षकों को पढ़ाने के लिए स्कूल भेजने के लिए सरकार को अपने डीएम,एसडीएम से लेकर पटवारी तक मोर्चे पर तैनात करने पड़ रहे हैं । मैदानी जिलों को छोड़ दे ंतो पहाड़ी जिलों में सकल घरेलू उत्पाद गिर रहा है । राज्य की अर्थव्यवस्था कर्ज से ही नहीं चरमरा रही है बल्कि उसमें बुनियादी दोश आ गए हैं । सर्विस सेक्टर का योगदान 50 फीसदी तक जा पहुंचा है । कृषि सेक्टर का योगदान निरंतर उतार पर है ।&lt;br /&gt;छोटे राज्यों की राजनीति की खासियत यह है कि सरकार के फैसलों को प्रभावित करने की जनता की ताकत बढ़ जाती है । मात्र एक हजार वोटों के इधर - उधर हो जाने से जब विधानसभा सीट के नतीजे बदल सकते हों तब लोगों के छोटे समूहों के जनमत भी महत्वपूर्ण होंगे ही । लेकिन हाल में बने राज्यों की बिडंबना यह है कि वहां सत्ता का विकेंद्रीकरण के जरिये निर्णय लेने की प्रक्रिया में जनता की भागीदारी तो बढ़ी नहीं उल्टे  राजनीतिक और प्रशासनिक सत्ता का केंद्रीयकरण राज्य की राजधानी में हो गया । इसलिए नौ साल पहले बने राज्य हिमाचल, पंजाब और हरियाणा की तरह विकास के बजाय अपनी विफलताओं के लिए याद किए जा रहे हैं । इन हालातों में जब छोटे राज्यों को खुशहाली का रामवाण नुस्खा नहीं कहा जा सकता । किसी राज्य की कामयाबी भूगोल से नहीं बल्कि  शासन चलाने की गुणवत्ता सत्ता के विकेंद्रीकरण और निर्णय लेने की प्रक्रिया में आम लोगों की भागीदारी से तय होगी ।&lt;br /&gt;कामयाबी और नाकामी के इस शास्त्रीय बहस से बहस से निकलकर देखें तो लोकतंत्र लोगों को अपने भाग्य और भविष्य चुनने की आजादी देता है । यदि जनाकांक्षायें अलग राज्य मांगती हैं तो उसे लेकर क्यों किसी सरकार या राजनीतिक दल को अपने पूर्वाग्रह या राजहठ पर अड़़ा रहना चाहिए ? आखिर देश की संसद का काम भी तो जनाकांक्षाओं के अनुरुप ही देश का निर्माण करना ही तो है । इस नजरिये देखें तो आंध्र प्रदेश के बाकी हिस्सों में चल रहा अखंड आंध्र का आंदोलन अलोकतांत्रिक और अपने मिजाज में तानाशाही पूर्ण है । क्षेत्र विशेष की आबादी अपनी इच्छा को किसी और पर थोपने की जिद कैसे कर सकती है ? क्षेत्रीय पहचानों का जो विस्फोट हम देख रहे हैं वह दरअसल 62 साल की हमारी राजनीति की विफलता से उपजी निराशा है । इस देश की राजनीति और कर्णधार चकरा देने करने वाली विविधताओं से भरे इस देश के समाजों को संबोधित तक नहीं कर पाए हैं । विकास से लेकर न्याय तक फैली राज्य की ममतापूर्ण भुजायें उन समाजों तक नहीं पहुंची अलबत्ता शोषण और दमन से लैस सहस्त्रबाहु राज्य जरुर उन तक पहुंच गया । नए राज्यों की जरुरत यहीं से पैदा हुई है । एक अर्थ में यह भारतीय राष्ट्र और समाज के संघीय चरित्र की वापसी भी है जिसे हमने कृत्रिम तरीके से बड़े राज्यों में कैद कर दिया था । जिस देश में इतने सारे समाज पहचान के संकट से दो चार हों और इतनी सारी जनांकाक्षायें आर्थिक सामाजिक न्याय की तलाश कर रही हों उस देश को अपनी पूरी राजनीतिक यात्रा पर चिंता और चिंतन करना चाहिए कि उसकी सत्ता की परिधि के बाहर बेचैन समाजों की तादाद क्यों बढ़ रही है । इसमें कोई शक नहीं कि नए राज्य बनें लेकिन वे अपने पूर्ववर्ती राज्यों के छोटे भौगोलिक संस्करण न बनकर जनाकांक्षाओं के साथ न्याय करें इसके लिए कोई मैकेनिज्म होना चाहिए । साथ किसी राज्य का निर्माण सामान्य जनइच्छा है या कुछ महत्वाकांक्षी नेताओं का खेल है, इसे जांचने के लिए जनमतसंग्रह के लोकतांत्रिक औजार को आजमाने में कोई बुराई नहीे होनी चाहिए । इस बात को ध्यान में रखना होगा कि कोई राज्य एक अदद मुख्यमंत्री, कुछेक मंत्रियों और कुछ सैकड़ा अफसरों का वनविहार न बन जाय ।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2819485710590251716-3206970658917995441?l=shabdsansad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsansad.blogspot.com/feeds/3206970658917995441/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2010/01/blog-post.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/3206970658917995441'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/3206970658917995441'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='छोटे राज्यों के बड़े सवाल'/><author><name>Shabd Sansad</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02242133088252450931</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='23' src='http://3.bp.blogspot.com/--JtNUUx-yvg/TsqTmToFzzI/AAAAAAAAALc/4vkSErAt6fE/s220/center%2Bpage%2B4%2Bth%2B%2BIssue%2B01.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2819485710590251716.post-8000754495372805248</id><published>2009-11-24T23:53:00.000-08:00</published><updated>2009-11-25T00:22:08.901-08:00</updated><title type='text'>उत्तराखंडः लूट और झूठ के नौ साल</title><content type='html'>&lt;span style="color:#006600;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;आंदोलन के डेढ़ दशक और राज्य बनने के 9 साल के राजनीतिक सफरनामे की उलटबांसी यह है कि उत्तराखंड की राजनीति के खेवनहार वही दल बने हैं जिन्हे आंदोलन ने खारिज कर दिया था ,जिनके नेता लोगों के डर से भाग खड़े हुए थे ।एक राज्य के रुप में उत्तराखंड जब10वें वर्श में दाखिल हो रहा है तब हालात 1994 से ज्यादा बदतर हो चुके हैं । पहाड़ी राज्य का सपना चकनाचूर हो चुका है ।उत्तराखंड आंदोलन के मकसदों को दफनाया जा चुका है । सतह के नीचे असंतोष का लावा फिर जमा हो रहा है । उत्तराखंड एक और आंदोलन के मुहाने की ओर है । पता नहीं कब, कौन सी चिंगारी पूरे पहाड़ को सुलगा दे । उत्तराखंड सदियों से इतिहास की अंधेरी गुफा में बंद रहा है । प्राकृतिक आपदाओं और मानव निर्मित विपदाओं के जिन दौरों से यह समाज गुजरा है उनसे दुनिया के बहुत कम समाज गुजरे होंगे । इतिहास के इस अंधेरे हिस्से में वे अनगिनत काली रातें भी हैं जब 1803 के भीशण भूकंप से तबाह हुए समाज को इतिहास का सबसे बर्बर हमला गोरखा आक्रमण के रुप में झेलना पड़ा था । लगभग तीन लाख लोगों को जानवरों की तरह जंजीरों में जकड़कर गोरखा आक्रमणकारियों ने हरिद्वार और रुद्रपुर की मानव मंडियों में दास बनाकर बेच दिया गया । ऐसी अनेक हृदय विदारक त्रासदियों के साक्षी रहे हिमालय के इस समाज तक आजादी भी आधी - अधूरी ही पहुंची । उत्तराखंड में जनअसंतोष विभिन्न आंदोलनों की भाशा में बोलता रहा लेकिन 1994 का उत्तराखंड बाकी कारणों के साथ पहाड़ियों की पहचान का आंदोलन था । क्षेत्रीयता का यही पुट इसका मुख्य स्वर था । अपनी तमाम तेजस्विता और अनूठेपन के बावजूद उत्तराखंड आंदोलन 1996 के बाद दम तोड़ चुका था ।आंदोलन का ज्वार उतर चुका था । उत्तराखंड आंदोलन की ताकतें तो 1997 से ही चुकने लगीं थी । राज्य बनते - बनते ये ताकतें कुछ खुद के पराक्रम और कुछ जनता की अनदेखी से हाषिये पर चली गईं । 1994 के जनसैलाब के डर से भूमिगत हुए दल और उनके नेता 1995 में ही अपनी राजनीति और इरादों के साथ फिर से प्रगट होने लगे थे ।1996 के लोकसभा चुनाव में लोगों ने चुनाव बहिष्कार के अस्त्र के जरिये उनका प्रतिकार किया पर उसके बाद राजनीति फिर पुराने ढ़र्रे पर लौट आई। 1994 के आंदोलन में सपा,बसपा और कांग्रेस के खिलाफ उमड़ी जनभावनाओं को भुनाने में भाजपा कामयाब रहीं उसके पास आरएसएस और उसके संगठनों का जमीनी नेटवर्क तो था ही साथ राजनीति के दांवपेंचों में माहिर घाघ नेताओं की पूरी फौज थी । उत्तराखंड आंदोलन की फसल भले ही आंदोलनकारियों ने उगाई हो लेकिन जब काटने और संभालने की बारी आई तब उनके पास न तो फसल काटने में कुशल लोग थे और न ही संभालने के लिए अक्ल और कुठार ही थे । लिहाजा आंदोलन से पकी जनमत की फसल भगवा ब्रिगेडें ले उड़ीं । खारिज किए गए नेता ताल ठोंकने लगे थे । उत्तराखंड आंदोलन हार चुका था । इस हार ने उत्तराखंड को हताषा के हिमयुग में धकेल दिया । हताशा के इसी हिमयुग में जब 9 नवंबर 2000 की आधी रात को राज्य बना तब उत्तराखंड के अधिकांश गांव सो रहे थे । अहंकार से भरी केंद्र की एनडीए सरकार ने उत्तराखंड मांग रहे लोगों को उत्तरांचल राज्य दिया । यह जानते हुए भी कि उत्तराखंड में आरएसएस,भाजपा के सिवा ‘उत्तरांचल’ का कोई माई बाप नहीं है पर राजहठ में डूबी सरकार जनता की इच्छा पर अपना नाम थोपने से ही गौरवान्वित थी । बिन मांगे समूचा हरिद्वार जिला उत्तराखंड की झोली में डाल दिया गया , पर आम लोगों ने इसे केंद्र की कृपा मानने के बजाय पहाड़ के मूल निवासियों की आबादी को संतुलित करने वाले क्षेत्रवाद के रुप में देखा । भाजपा को कोई पहाड़ी मुख्यमंत्री तक न मिला और पहला ही मुख्यमंत्री हरियाणवी मूल का बना दिया गया । राजधानी पहाड़ में घोषित करने के बजाय वह भी मैदान में बना दी गई । राज्य पहाड़ी और मुख्यमंत्री से लेकर राजधानी तक सब कुछ मैदान का , ऐसा सलूक शायद ही किसी और समाज के साथ हुआ होगा ! इन सारे कदमों और राज्य पुनर्गठन अधिनियम की व्यवस्थाओं में क्षेत्रवाद का डंक छिपा हुआ था । राज्य तो बन गया लेकिन उत्तराखंड में संदेश यह गया कि केंद्र ने राज्य नहीं दिया बल्कि उन्हे आंदोलन के लिए दंडित किया है । भाजपा को इसका दंड भी भुगतना पड़ा । राज्य निर्माण करने के राजसी अभिमान पर इतरा रही भाजपा को उत्तराखंड की जनता ने वनवास का दंड देकर बताया कि प्रछन्न क्षेत्रवादी एजेंडे को वह भी समझती है । असली खेल तो राज्य बनने के बाद शुरु हुआ । जो मंत्री बने वे पहाड़ के सादेपन के प्रतिनिधि बनने के बजाय यूपी की राजनीतिक कल्चर के इतने उत्साही वारिस साबित हुए कि यूपी के नेता भी उनकी ठसक के आगे पानी भरने लगे । शांत पहाड़ों में रातोंरात गनर वाली प्रजाति के नेता प्रगट हो गए । राजनीति की ये अधभरी गगरियां भौंडेपन के साथ सरेआम छलकने लगीं तो लोगों को लगा कि यह तो यूपी से भी गया- गुजरा प्रदेश बन रहा है । राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के विस्फोट का सिलसिला शुरु हो गया । कारों और टैक्सियों पर नेमप्लेटधारी नेताओं की फौज सड़कों पर उतर आईं । उन्हे सरकारी योजनाओं में अपना हिस्सा चाहिए था । यह नए राज्य में कमीशन के खेल को नए सत्ताधारियों का ग्रीन सिग्नल था । । नए राज्य की जमीन एकाएक नेताओं के लिए उपजाऊ हो गई । इस छोटे राज्य में पैदावार के मामले में नेताओं ने कुकरमुत्तों को पछाड़ दिया । पहले ही विधान सभा चुनाव में उम्मीदवारों की भीड़ नामांकन के लिए उमड़ पड़ी ।&lt;br /&gt;आंदोलन से जनमे राज्य की इससे बड़ी बिडंबना क्या होगी कि सरकार का पहला ही शासनादेश मूल निवासियों के हितों को दूरगामी नुकसान पहुंचाने के इरादे से जारी किया गया । बाद में यह नियुक्तियों में उत्तराखंड के मूल निवासियों के खिलाफ सबसे बड़ा अस्त्र साबित हुआ । जब गैर मूल निवासी को मुख्यमंत्री बनाने पर भाजपा में भी बबाल हुआ तो आलाकमान ने कमान कोश्यारी को सौंप दी । लोगों को हिंदू राष्ट्र की घुट्टी पिलाने वाले व संघ के प्रचारक रहे कोश्यारी भाजपा में ठाकुरवाद की सोशल इंजीनियरिंग के प्रणेता बनकर उभरे । राज्य सरकार की खुफिया एजेंसी एलआईयू के जरिये विधानसभा क्षेत्रवार जातीय गणना कर इस विचार को आंकड़ों के जरिये सिद्धांत का जामा पहना दिया गया । पहले ही साल में नए राज्य में भ्रष्ट और विघटनकारी राजनीति का उदय हो चुका था । इस मैदानी क्षेत्रवाद और जातिवाद की इस राजनीति को जनता ने पूरी तरह खारिज कर दिया । प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री समेत भाजपा के अधिकांश बड़े नेता खेत रहे । भाजपा और कोश्यारी की सोशल इंजीनियरिंग बुरी तरह पिट गई ।भाजपा के खिलाफ उठी लहर से कांग्रेस 1989 के बाद उत्तराखंड में जिंदा हुई । यह वक्त की बिडंबना ही है कि कभी ‘‘ मेरी लाश पर उत्तराखंड बनेगा ’’ जैसा कठोर जुमला कहने वाले नारायण दत्त तिवारी उसी राज्य के मुख्यमंत्री बन गए पर वह बुढ़ापा बिताने पहाड़ आए थे । उनके पास मैदान का विजन था ,जिससे नौएडा तो बन सकता था पर हिमाचल नहीं । वह खांटी पहाड़ी वाईएस परमार या वीरभद्र सिंह नहीं थे । वह छोटे राज्य के बड़े राजा थे । उन्होने 16 वीं सदी के राजा की तरह दोनों हाथों से राजकोश लुटाया । उनका शासनकाल ऐसा दुर्लभ समय था जब मीडिया से लेकर विपक्ष तक सब चारणकाल में पहुंच चुके थे । विधानसभा से लेकर अखबार के पन्नों तक राग दरबारी की धुन बज रही थी । ऐसा करिश्मा बस तिवारी ही कर सकते थे ।चार्वाक का ‘‘कर्ज लो और घी पियो’’दर्शन सरकार का सूत्रवाक्य बन चुका था । लीडर तब डीलर बन चुके थे । रोज कहीं न कहीं घोटाला हो रहा था । देहरादून के ढ़ाबे वाले हों या पंचतारा होटल वाले उन दिनों को याद कर उसे स्वर्णयुग बताते नहीं थकते । बावजूद इसके कांग्रेस सरकार नहीं बच पाई । भ्रष्टाचार की तोहमत उसे ले डूबी । मिस्टर आनेस्ट जनरल बीसी खंडूड़ी के हाथ सत्ता आई तो पहाड़ के लोगों को लगा कि अब राज्य में खांटी पहाड़ी राज स्थापित होगा और 6 सालों में पनपे दलाल राज का खात्मा इसी रिटायर्ड जनरल के हाथों होगा । उनकी तनी हुई झबरीली मूंछें, सख्त चेहरा और फौजी पृष्ठभूमि मिलकर जो छवि बनाते थे उससे लोगों में इस यकीन ने जड़ें भी जमाईं । जनरल सत्ता के घेरे में ऐसे कैद हुए कि वह कैंट रोड के अपने काले लौह दरवाजों के उस पार जनता के लिए ईश्वर की तरह अगम्य बन गए । सिर्फ इतना ही पता चल पाया कि वह सारंगी कुलनाम के किसी मायावी आईएएस के मोहपाश में हैं । मात्र डेढ़ साल में जनरल का करिश्मा और केंद्रीय सड़क मंत्री के रुप में बटोरा पुण्य चुक गया । लोकसभा चुनाव में अपमानजनक हार के रुप में जनता ने उनकी बर्खास्तगी के पत्र पर दस्तखत कर दिए । इसे राज्य स्तर पर कांग्रेस और भाजपा की राजनीतिक कंगाली भी कह सकते हैं कि उनके पास न तो दूर तक देखने वाली दृष्टि है , न ऐसे नेता हैं और न ही वह साहस जो एक नए राज्य की बुनियाद के लिए जरुरी है । यही कारण है कि उत्तराखंड नए राज्यों में अकेला राज्य है जिसके पास अपनी स्थायी राजधानी तक नहीं है । उसके नेताओं में न तो इतनी हिम्मत है कि देहरादून को ही राजधानी घोषित कर दें और न इतना साहस कि गैरसैंण को राजधानी बना दें । ऐसा ही हाल परिसीमन का भी है । परिसीमन का रस्मी विरोध करने के अलावा कोई गंभीर सवाल नहीं उठाया गया । जबकि एक राज्य के रुप में यह उत्तराखंड के जीवन और मरण का सवाल है ।सन् 2012 के विधानसभा चुनाव में पहाड़ की आधा दर्जन सीटें कम हो चुकी हैं । उत्तराखंड विधानसभा का संतुलन अब मैदान की ओर झुक गया है । उत्तराखंड आंदोलन को पराजित करने की जो साजिश राज्य के गठन के समय की गई थी , परिसीमन से वह अब ज्यादा स्पष्ट हो गई है । सन् 2032 में होने वाले परिसीमन के बाद पहाड़ी राज्य का भ्रम पूरी तरह टूट जाएगा और विधानसभा में 51 सीटें मैदानी क्षेत्रों की होंगी और पहाड़ी क्षेत्रों की सीटें घटकर मात्र 19 रह जायेंगी । पहाड़ी राज्य की पूरी अवधारणा को नेस्तनाबूद करने वाला परिसीमन का यह खतरा हो या राजधानी और पलायन के ज्वलंत सवाल उत्तराखंड के नेताओं के पास राजनीतिक चिंता और चिंतन दोनों नहीं हैं अलबत्ता रातों - रात नोटों के ढे़र पर बैठने के हुनर में वे किसी भी मधु कौड़ा या सुखराम का मुकाबला करने की प्रतिभा रखते हैं । प्रदेश में 50 करोड़ से 400 करोड़ रुपए की हैसियत रखने वाले नेताओं की तादाद एक दर्जन से कम नहीं है और करोड़पति नेताओं की तादाद तो सैकड़ों में है । करोड़पति अफसरों की तादाद 1000 से ज्यादा है । राजनीति और सरकारी क्षेत्र में समृद्धि का यह विस्फोट राज्य बनने के बाद हुआ है । बेहतरीन मानव संसाधन और प्राकृतिक संसाधनों का खजाना होने के बावजूद उत्तराखंड नौ वर्ष के अपने सफर में विकास के बुनियादी मानकों पर भी खरा नहीं उतरा । जलवायु में हो रहे बदलावों के कारण राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था बेहाल है । पहाड़ में आय और जीवन निर्वाह के परंपरागत साधन ढ़ह रहे हैं , नए साधन हैं नहीं । राज्य बनने के बाद पलायन रुका नहीं बल्कि बढ़ गया । तेजी से बियाबान होते जा रहे गांव बता रहे हैं कि आने वाले दशक इतिहास के सबसे बड़े विस्थापन की गवाही देंगे । बेरोजगारी खतरनाक स्तर को छू रही है । केंद्र द्वारा घोषित औद्योगिक पैकेज राज्य की कीमती भूमि की लूट, करों की चोरी का जरिया और श्रम कानूनों की कब्रगाह बनकर रह गया है । अरबों रुपए की जमीनें कौड़ियों में लुटाकर राज्य सरकार कुछ हजार रोजगार जुटा पाई । इसमें में भी मूल निवासियों के हिस्से मजदूरी या सुपरवाइजरी स्तर तक नौकरी ही आ पाई तो अधिकांश नदियां, गाड ,गधेरे सरकार बेच चुकी है ,पर पनबिजली प्रोजेक्टों में भी बड़े पदों पर पहाड़ के लोगों को नियुक्त करने पर अघोषित पाबंदी हैं । आयकर विभाग के आंकड़े गवाह हैं कि राज्य बनने के बाद सर्वाधिक समृद्धि मैदानी जिलों में ही आई ।यदि प्रतिव्यक्ति कार व दुपहिया वाहन और प्रतिव्यक्ति इलेक्ट्रानिक गुड्स के आंकड़े देखे जांय तो मैदान और पहाड़ के जीवन स्तर और उपभोग स्तर की विषमता साफ- साफ नजर आ जाती है । जबकि शिमला में ये दोनों ही सूचकांक पूरे देश में सबसे बेहतर हैं । जाहिर है कि इन नौ सालों में जैसा उत्तराखंड राजनेताओं ने बनाया है वह दिल, दिमाग ,आचार और व्यवहार से तो पहाड़ी कतई नहीं है । इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि उसकी विधानसभा पहाड़ की मेधा,भावना,सामान्य बुद्धिमत्ता और सरोकारों का प्रतिनिधित्व तक नहीं करती । यह बिडंबना ही है कि आज का उत्तराखंड पहाड़ और उसके लोगों के तात्कालिक और दीर्घकालिक हितों के खिलाफ है । एक पहाड़ी राज्य के रुप में उत्तराखंड नाकाम हो चुका है । राज्य के पहाड़ विरोधी रंगढंग देखते हुए ही उत्तराखंड जनमंच जैसे आंदोलन में हिस्सा लेने वाले संगठन उत्तराखंड राज्य को विसर्जित करने की मांग उठाने लगे हैं ।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2819485710590251716-8000754495372805248?l=shabdsansad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsansad.blogspot.com/feeds/8000754495372805248/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2009/11/blog-post_24.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/8000754495372805248'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/8000754495372805248'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2009/11/blog-post_24.html' title='उत्तराखंडः लूट और झूठ के नौ साल'/><author><name>Shabd Sansad</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02242133088252450931</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='23' src='http://3.bp.blogspot.com/--JtNUUx-yvg/TsqTmToFzzI/AAAAAAAAALc/4vkSErAt6fE/s220/center%2Bpage%2B4%2Bth%2B%2BIssue%2B01.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2819485710590251716.post-8844386081931939917</id><published>2009-11-12T06:59:00.000-08:00</published><updated>2009-11-12T07:00:41.251-08:00</updated><title type='text'>क्षेत्रीयताओं का द्वंद समझने का समय</title><content type='html'>&lt;span style="color:#009900;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;     &lt;br /&gt;मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मध्यप्रदेश की फैक्टरियों में बिहारियों के बजाय मध्यप्रदेश के लोगों को नौकरियां दिये जाने का बयान क्या दिया कि एक बार फिर तूफान खड़ा कर दिया गया । माहौल ऐसा बनाया जा रहा है कि जैसे कोई आसमान टूट पड़ा हो ।शीला दीक्षित से लेकर राज ठाकरे तक न जाने कितने बयानों को लेकर ऐसा माहौल बनाया गया कि जैसे देश खतरे में पड़ गया हो ।अंधाधुंध बिहारी आब्रजन के खिलाफ बोलना कुफ्र मान लिया गया है । बिहारी वर्चस्व वाला हिंदी मीडिया और बिहार के भ्रष्ट और अकर्मण्य नेता अक्सर इन घटनाओं पर आक्रामक प्रतिक्रिया और शोर मचाकर इसे राष्ट्रीय संकट में बदलते रहे हैं । यह उनकी रणनीति है कि कभी राज ठाकरे तो कभी शिवराज के रुप में वे बिहार के लिए एक अदद खलनायक का इंतजाम करते रहते हैं ताकि बिहार के असली खलनायक बिहारी क्षेत्रवाद की ढ़ाल के पीछे नायक बने रहें ।आखिर बिहार के बुनियादी सवालों के बजाय राज ठाकरे और शीला दीक्षित या शिवराज सिंह को गलियाने से बिहार में वोट मिल सकते हैं तो इसमें हर्ज क्या है ।&lt;br /&gt;दरअसल हिंदी मीडिया खासतौर पर इलेक्ट्रानिक मीडिया खुद क्षेत्रवाद के कीचड़ में इतना धंस चुका है कि उसमें आब्जेक्टेविटी गायब हो चुकी है । यदि ऐसा नहीं होता तो वह पंजाब , असम महाराष्ट्र और अब मध्य प्रदेश से आ रही बिहारी विरोधी आवाजों को राष्ट्र विरोधी करार देने पहले यह जरुर विश्लेषित करता कि विभिन्न भारतीय समाजों से एक ही समुदाय के खिलाफ क्यों ऐसी प्रतिक्रिया आ रही है ? क्यों  इन समाजों का धैर्य चुक रहा है ? मीडिया के हमले और बिहारी नेताओं की हमलावर रणनीति से भले ही शीला दीक्षित या शिवराज को बचाव पर उतरना पड़ा हो पर सच्चाई यह है कि जिस बिहारीवाद विरोधी जिस वर्ग को ये नेता संदेश देना चाहते थे उसे उन्होने संबोधित कर लिया । बिहारियों के खिलाफ इन समाजों में प्रतिक्रिया तो पहले से ही मौजूद है , नेताओं ने तो उसे सिर्फ वाणी देकर मुद्दा बनाया ।यह बात आईने की तरह साफ है कि अनियंत्रित और अनियोजित बिहारी आब्रजन के खिलाफ विभिन्न समाजों में सतह के तले प्रतिक्रिया हो रही है और राजनीति तो उन भावनाओं पर सवारी गांठना चाहती है । पंजाब में यह प्रतिक्रिया पर्चे - पोस्टर चिपकाने के बाद चुनाव में लुधियाना जैसे शहरों में स्थानीय लोगों की पकड़ कम होने से आई तो महाराष्ट्र के चुनावों ने साबित कर दिया कि वहां बिहारी आब्रजक बड़े राजनीतिक सवाल बन चुके हैं ।दिल्ली में भी यही होने जारहा है तो असम में हिंसा के साथ प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा है । मध्यप्रदेश में यह टकराव का रुप लेने की ओर है । इसमें जो नए प्रदेश भविष्य में जुड़ने वाले हैं उनमें राजस्थान और उत्तराखंड जैसे शांत राज्य भी शामिल हैं ।&lt;br /&gt;जो लोग अंधाधुंध आब्रजन का समर्थन कर रहे हैं वे भारत और उसके समाजों को कितना जानते हैं , यह तो पता नहीं पर ये लोग न तो बिहारियों के हित में है और न देश के हित में है ।भारत एक संघीय गणराज्य है । इस देश को संघीय गणराज्य कोई संविधान ने नहीं बनाया ।भारत स्वभाव और संरचना से ही एक संघीय राष्ट्र है । सदियों के सफर के अनुभवों और जरुरतों ने विभिन्न रीति रिवाजों और मिजाजों के समाजों को अपनी विशिष्ट पहचान के साथ राष्ट्र की एक राजनीतिक ईकाई में पिरोया । भारतीय समाज में यह सामाजिक, सांस्कृृतिक विविधता सदियों से चली आ रही है । रंगों की इसी छटा से भारत बनता है । एक राष्ट्र के रुप में भारत के अस्तित्व की गारंटी भी यही विविधता देती है । क्योंकि यह हर समाज को अपने इलाकों में अपनी परंपराओं, मान्यताओं, रीति-रिवाजों के अनुरुप जीवन बसर करने की आजादी देती है ।अनेक राष्ट्रीयताओं , उपराष्ट्रीयताओं के संगम ने ही भारत जैसे बहुधर्मी ,बहुभाषी, बहुसांस्कृृतिक और विविधवर्णी राष्ट्रराज्य का निर्माण किया है । यह उसकी ताकत भी है और एक राज्य के रुप में उसकी सीमा भी । वह कोई एक ही गोत्र में जन्मे लोगों की मोनोकल्चर प्रजाति जैसी सरल सामाजिक संरचना नहीं है ।अपने क्षेत्र के आर्थिक और प्राकृतिक संसाधनों पर उस अंचल के मूल निवासियों का पहला अधिकार है ।यह अधिकार भारतीय संविधान भले ही न देता हो परंतु यह उनका जन्मजात और प्राकृृतिक अधिकार है और यह सदियों से चला आ रहा है । यह अधिकार अनुल्लंघनीय है और भारत की एकता की गारंटी भी ।&lt;br /&gt; जो लोग संविधान के तहत दी गई कहीं भी बसने और रोजगार पाने के अधिकार के दैवी अधिकार की तरह प्रचारित कर बिहार से हो रहे भारी पलायन को औचित्य प्रदान करने की कोशिश कर रहे हैं उनसे निवेदन है कि संविधान अपने अस्तित्व के लिए जनता की इच्छा पर आश्रित है । जनादेश के बल और वैधता के बिना संविधान एक रद्दी के ढ़ेर में पड़ी किताब है । वह तभी तक प्रभावी है जब तक जनमत उसके साथ है । संविधान यदि देश और समाज की आकांक्षाओं से तालमेल नहीं बिठा पाएगा तो लोग उसे ही बदल देंगे ।लोगों की इच्छा के खिलाफ किसी कानून या संविधान का पालन सिर्फ दमन से संभव है ।क्या यह उचित होगा कि भारतीय राष्ट्र बिहार से बड़े पैमाने पर हो रहे पलायन के कारणों का इलाज करने के बजाय उन समाजों का लाठी - गोली से इलाज करे जो अल्पसंख्यक होने और अपने संसाधनों पर औरों का कब्जा होने के डर से प्रतिक्रिया कर रहे हैं ?&lt;br /&gt;किसी बाहरी तत्व के घुसने पर मानव शरीर भी स्वाभाविक प्रतिक्रिया करता है और एंटीबाॅडी बनाना शुरु कर देता है । शरीर का तापमान बढ़ जाता है और मेडिकल की भाषा में यह बुखार है । ऐसा सिर्फ शरीर के साथ ही नहीं होता बल्कि समाज और यहां तक कि प्रोफेशनल कहे जाने वाले व्यावसायिक और वाणज्यिक संस्थान भी इसी तरह से फारेन बाडीज का प्रतिकार करते हैं । इसलिए महाराष्ट्र ,असम या मध्यप्रदेश से आने वाली बिहारी विरोधी प्रतिक्रियाओं को राष्ट्रविरोधी कहकर प्रचारित कर रहे हैं उन्हे जानना चाहिए कि ये समाज आर्थिक ,राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक बुखार से तप रहे हैं ।इन समाजों को सहानुभूति और केयर की जरुरत है ।उनके भयों और चिंताओं को संबोधित करना होगा । हिंदी मीडिया और बिहार के नेताओं की दुत्कार से यह रोग गंभीर होगा और एक दिन लाइलाज होकर भारतीय राष्ट्रराज्य के लिए खतरा बन जाएगा ।दुख की बात यह है कि हिंदी हार्ट लैंड से समझदारी के स्वर गायब हैं और वे बिहारियों को रोकने वाले मराठियों , मध्यप्रदेशियों, असमियों का सर मांग रहे हैं ।&lt;br /&gt;परंतु अब समय आ गया है कि पलायन को प्रोत्साहित करने वाली राजनीति के मंतव्य समझे जांय और उसे हतोत्साहित किया जाय ।वैज्ञानिक रुप से हर राज्य और शहर की मानव भार वहन करने की क्षमता तय की जाय और उसी के अनुरुप राज्यों या शहरों में आबादी के प्रवाह को नियंत्रित किया जाय । यदि ऐसा नहीं हुआ तो हिंदुस्तान के शहर नरक में बदल जायेंगे और उनके नागरिक जीवन को संचालित करना असंभव हो जाएगा ।दरअसल आब्रजन को लेकर जितना भी शोर उठा है वह बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश से अस्सी के दशक से बड़े पैमाने पर शुरु हुए पलायन की प्रतिक्रिया है ।आर्थिक उदारीकरण ने लोगों के जीवन को ज्यादा संकटपूर्ण बनाया है और उन्हे जानलेवा प्रतिस्पर्धा में झोंक दिया है । इसने नए सामाजिक - आर्थिक तनावों को जन्म दिया है । आज का हर समाज 1980 के मुकाबले ज्यादा चिड़चिड़ा और तुनुक मिजाज हुआ है ।आर्थिक रुप से उपयोगी प्राकृतिक संसाधनों और रोजगार के अवसरों को लेकर जंग तीखी और हिंसक होती जा रही है । बड़े समाजों की आक्रामकता के खिलाफ छोटे समाज लामबंद हो रहे हैं ।भारत कृत्रिम एकात्मकता से संघीय चरित्र और बहुलतावाद की ओर प्रस्थान कर रहा है ।&lt;br /&gt;जब दुनिया के हर राष्ट्र को आब्रजकों की तादाद तय करने का अधिकार है तो हर राज्य को अपनी आबादी के अनुपात और जरुरत के हिसाब से यह तय करने का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए कि उसे कितनी संख्या और किस श्रेणी का मानव संसाधन चाहिए ।&lt;br /&gt;उत्तराखंड,बिहार और पूर्वी यूपी समेत भारत में पलायन के जो भी मुख्यालय रहे हैं वहां रहन-सहन की स्थितियां बेहद खराब, रोजगार के साधनों का अभाव और गरीबी का साम्राज्य रहा है ।यह स्थितियां इन राज्यों के राजनीतिक नेतृत्व के भ्रष्टाचार, निकम्मेपन और स्वार्थी राजनीति के कारण पैदा हुई हैं । इन राज्यों का नेतृत्व अपने नागरिकों को गरिमामय जीवन और जीने की बेहतर परिस्थितियां देने में पूरी तरह विफल हुआ है ।अब सवाल उठता है कि पूर्वी यूपी या बिहार के नेताओं और सरकार की विफलता दंड महाराष्ट्र या मध्य प्रदेश , असम या किसी और राज्य के लोग क्यों भुगतें ? वे अपने रोजगार और अन्य साधनों पर हमले क्यों सहें ? अक्सर यह देखने में आता है कि जैसे ही राज ठाकरे या कोई और बाहरी लोगों के खिलाफ बयान देता है तो बिहार और पूर्वी यूपी के नेता आसमान सर पर उठा देते हैं ।पंजाब से लेकर राजस्थान तक कोई प्रतिक्रिया नहीं होती । साफ है कि इन दो इलाकों के नेता पलायन को जारी रखना चाहते हैं ताकि वे अपनी जनता को सुशासन और बेहतर जीवन देने के झंझट से बचे रहें ।सच यह है कि यदि बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश में जमीन का न्यायसंगत पुनर्वितरण हो जाय तो सारा पलायन रुक जाय ।क्योंकि पलायन करने वालों में अधिकांश गरीब हैं जो सामाजिक- आर्थिक कारणों से बाहर जा रहे हैं ।यदि इन इलाकों में हरित क्रांति के प्रयास युद्धस्तर पर किए जांय तो वहां भी पंजाब की तरह समृद्धि की कथा लिखी जा सकती है ।जाहिर है कि ये कठिन काम हैं जबकि राज ठाकरे को गाली देना आसान है । इससे बिहारी व पूरबिया क्षेत्रवाद भी भड़कता है और उससे वोट भी मिलता है । इस काम में इन नेताओं की मदद के लिये सवर्ण प्रभुत्व वाला हिंदी मीडिया भी जुट जाता है ।बिहार और पूर्वी यूपी की कृषि के सामंती ढ़ांचे के बने रहने में मीडिया के भी अपने स्वार्थ हैं ।&lt;br /&gt;यह आश्चर्यजनक और अफसोसनाक है कि हिंदी मीडिया और बिहार व पूरब के नेता इस अंधाधुंध पलायन पर उंगुली उठाने या उसे रोकने वाली हर कोशिश को आनन फानन में  देशद्रोह घोषित कर देते हैं ।पूछा जा सकता है कि क्या देश का मतलब सिर्फ बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश है ? यदि यही देश हैं तो ऐसे देश से भारत को खतरा है ।जो लोग अंधाधुंध आब्रजन का समर्थन कर रहे हैं वे भी क्षेत्रवादी आग्रहों के कारण ही ऐसा कर रहे हैं ।हद तो यह है कि ये क्षेत्र नेता भी निर्यात कर रहे हैं फिर बाकी समाजों के नेता क्यों नहीं विरोध करेंगे ? यदि गणेश उत्सव की प्रतिक्रिया में छठ उत्सव का राजनीतिकरण किया जाएगा तो प्रतिक्रिया क्यों नहीं होगी ? यदि बिहारी या पूर्वी यूपी के प्रवासी मराठी विरोध या अपनी अलग क्षेत्रीय राजनीतिक पहचान के लिए किसी अबु आजमी या कृपाशंकर को चुनेंगें तो सामान्य सोच का मराठी  उनसे खतरा क्यों नहीं महसूस करेगा ? वह अपनी जमीन पर किसी और का राजनीतिक प्रभुत्व क्यों स्वीकार करेगा ? उसने महाराष्ट्र के निर्माण की लड़ाई कोई बिहार और पूर्वी यूपी के नेताओं के लिए थोड़े ही लड़ी है ।यह कैसे हो सकता है कि मीडिया और बिहार के नेता क्षेत्रवाद की राजनीति करते रहें और बाकी समाज देशहित में चुपचाप बैठे रहें ? यह स्वाभाविक है कि जैसी राजनीति आप करेंगे वैसा ही जवाब आपको मिलेगा ।&lt;br /&gt;हमें इस सच को स्वीकार करना होगा कि कोई भी समाज अपने संसाधनों व रोजगार पर हमला बर्दाश्त नहीं करेगा और न ही अपनी भूमि पर अल्पसंख्यक होने की नियति स्वीकार करने को तैयार होगा ।आधुनिक लोकतंत्र के मक्का कहे जाने वाले पश्चिमी देशों तक में हिंसक प्रतिक्रियायें होने लगी हैं । यह इस बात का द्योतक है कि हर समाज एक निश्चित सीमा में ही बाहरी लोगों को बर्दाश्त कर सकता है । तिब्बत और पूर्वी तुर्किस्तान के मूल निवासियों को अल्पसंख्यक बनाने की चीनी नीति यदि गलत है तो ऐसी कोशिशें भारत में सही कैसे हो सकती है ? त्रिपुरा का उदाहरण सामने है जहां मूल निवासी अल्पसंख्यक हो गए और वे त्रिपुरा उपजाति समिति के तहत हिंसक आंदोलन करते रहे हैं । वहां माकपा का आधार माक्र्सवाद नहीं बल्कि बंगाली क्षेत्रवाद है । अन्य राज्यों में मूल निवासी अल्पसंख्यक हुए तो वे भी क्या हिंसक प्रतिरोध की ओर नहीं जायेंगे ?  यह दुखद है कि हिंदी मीडिया भी इसे हवा दे रहा है । उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने एक ट्रेन मे महाराष्ट्र के निवासियों को खोज-खोज कर बेल्टों से पीटा । महाराष्ट्र में ऐसी ही घटना पर ‘‘राज के गुंडे’’ जैसे आक्रामक जुमले इस्तेमाल करने के लिए कुख्यात किसी हिंदी चैनल ने इसे गुंडागर्दी करार देना तो दूर ढंग से रिपोर्ट तक नहीं किया । राजठाकरे के खिलाफ अपने संपादकीयों में जहर उगलने वाले हिंदी अखबारों ने एक भी संपादकीय सपा की करतूत पर नहीं लिखा ।यह हिंदी मीडिया का अघोषित क्षेत्रवाद नहीं है तो क्या है ? यह अजीब रस्म है कि एक समुदाय क्षेत्रवाद चलाए तो सही और बाकी आत्मरक्षा में क्षेत्रवाद करें तो गलत ।वो कत्ल भी करें.....&lt;br /&gt;मीडिया का यह क्षेत्रवाद हाल में अबु आजमी प्रकरण से भी नंगा हुआ है ।आजमी पर मनसे के विधायकों के हमले की रिपोर्टिंग पूरी तरह से विषाक्त और एकपक्षीय रही । न्यूज चैनलों में तो सदा की तरह इस पर भी हाहाकार मचा रहा । उनके यहां तो यह मुद्दा पाकिस्तान के हमले जैसा राष्ट्रीय संकट बना रहा । अखबारों ने भी पत्रकारिता की मर्यादाओं को लांघ दिया । उत्तर भारत के एक प्रमुख दैनिक ने शीर्षक दिया,‘ हिंदी पर हमला ’ दूसरे ने भी कुछ ऐसी ही भड़काऊ हैडिंग लगाई । इन हैडिंगों को देखकर अयोध्या में कारसेवकों पर हुए गोलीकांड के दौरान की गई सांप्रदायिक रिपोर्टिंग याद आ गई ।अबु आजमी हिंदी मीडिया के नए हीरो हैं क्योंकि वह अंग्रेजी के नहीं बल्कि मराठी के विरोधी हैं । हिंदी को भारतीय भाषाओं के खिलाफ खड़ा करने की इन साजिशों के कामयाब होने से हिंदी को ही घाटा होगा ।मराठी के विरुद्व हिंदी के लिए शोर मचाने वाला हिंदी मीडिया उन फिल्मी सितारों के आगे तो बिछा रहता जो नमक तो हिंदी का खाते हैं और मीडिया से बात अंग्रेजी में करते हैं ।किसी हिंदी अखबार या हिंदी चैनल ने हिंदी के साथ नमकहरामी करने वाले इन सितारों को छापने या टेलिकास्ट करने से इंकार नहीं किया ।&lt;br /&gt;हिंदी के नाम पर हिंदी मीडिया के उन्माद के कोरस में सुधीश पचौरी का शामिल होना चकित करता है । उन्होने तो आजमी को मराठी के विरुद्ध हिंदी के धर्मयुद्ध का योद्धा तक घोषित कर दिया ।गनीमत है कि उन्होने आजमी को आज का लोहिया नहीं बताया । । राजनीति की वैतरणी पार करने के लिए हिंदी की पूंछ पकड़ने वाले आजमी किस किस्म के नेता हैं यह कौन नहीं जानता ।हिंदी को महाराष्ट्र में जिंदा रहने के लिए आजमी या किसी नेता की जरुरत पड़े ईश्वर करे ऐसा दिन हिंदी के इतिहास में कभी न आए ।हिंदी महाराष्ट्र में आजमी के लिए नहीं बल्कि अपने समृद्ध साहित्य व भाषायी सौंदर्य के लिए जानी जाय , पढ़ी जाय और उससे आम मराठी इसलिए नफरत न करें कि वह आजमी जैसे नफरत की राजनीति करने वाले नेताओं की भी भाषा है , काश! ऐसा हो ।पत्रकारिता की बुनियादी सिद्धांतों को ताक पर रखने वाले हाहाकारी हिंदी मीडिया को 10 नवंबर 09 के मराठी अखबार जरुर पढ़ने चाहिए जिनमें हिंदी को लेकर बबाल मचाने पर मनसे की लानत- मलामत की गई है ।पत्रकारिता का धर्म अखबार बेचने के लिए उन्माद पैदा करना नहीं है ।जो ऐसा कर रहे हैं वे अपने बाजारु स्वार्थ के लिए देश की एकता तोड़ रहे हैं और देशद्रोह इसी को कहते हैं ।इस सारी बहस का मतलब यही है कि क्षेत्रीयता और छोटे समाजों के मनोविज्ञान को समझा जाय और उनके द्वंदों को संबोधित करते हुए पलायन और आब्रजन पर कोई राष्ट्रीय नीति बने ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2819485710590251716-8844386081931939917?l=shabdsansad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsansad.blogspot.com/feeds/8844386081931939917/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2009/11/blog-post.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/8844386081931939917'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/8844386081931939917'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='क्षेत्रीयताओं का द्वंद समझने का समय'/><author><name>Shabd Sansad</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02242133088252450931</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='23' src='http://3.bp.blogspot.com/--JtNUUx-yvg/TsqTmToFzzI/AAAAAAAAALc/4vkSErAt6fE/s220/center%2Bpage%2B4%2Bth%2B%2BIssue%2B01.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2819485710590251716.post-5207907662062935667</id><published>2009-10-23T06:04:00.000-07:00</published><updated>2009-10-23T06:08:32.234-07:00</updated><title type='text'>कठिन वक्त में भाजपा</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#006600;"&gt;दो दशकों की सबसे भीषण मंहगाई और दो बार सत्तारुढ़ रहने से उपजा सत्ताविरोधी रुझान फिर भी भाजपा को महाराष्ट्र में मुंह की खानी पड़ी । लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के हाथों मात खा चुकी भाजपा के लिए यह कोई मामूली झटका नहीं है बल्कि इसका संदेश दूरगामी है । हरियाणा से लेकर अरुणाचल और महाराष्ट्र तक कहीं से भी उसके लिए दिल बहलाने के लिए भी कोई खबर नहीं है ।देश में सवाल पूछा जाने लगा है कि क्या भाजपा के दिन लद चुके हैं ? क्या भारतीय राजनीति में वह अप्रांसगिक हो चुकी है ? निश्चित तौर पर भाजपा के लिए यह कठिन समय है । बिडंबना यह है कि ऐसे वक्त में उसके पास न तो वाजपेयी जैसा नेता है जो अपनी छवि के बूते उदार हिंदुओं को मोह सके और न बाबरी मस्जिद जैसी कोई निर्जीव और कमजोर खलनायक जो उसकी झोली वोटों से भर दे ।&lt;br /&gt;एक दल के रुप में भाजपा के सामर्थ्य और सीमाओं पर बात करने से पहले महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव नतीजों का विश्लेषण किया जाना जरुरी है । महाराष्ट्र में दस सालों से कांग्रेस की सरकार है और घोर कांग्रेसी भी यह मानेगा कि महाराष्ट्र में सरकार के खाते में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसके बूते उसे तीसरी बार सत्ता में बैठने का नैतिक अधिकार दिया जा सके । न तो उसके पास शीला दीक्षित की तरह विकास की जादुई छड़ी थी और न बेहतर कानून व्यवस्था और साफ-सुथरा प्रशासन कायम करने का यश । जनता के पास ऐसा कोई कारण नहीं था कि वह कांग्रेस को वोट दे ।इन सबसे ऊपर पिछले दो दशकों की ऐसी भीषण महंगाई है जिससे सिर्फ देश का गरीब तबका ही नहीं बल्कि मध्यवर्ग और उच्च मध्यवर्ग भी त्राहिमाम कर रहा है । लोगों की रोजी और रोटी दोनों खतरे में डाल दी गई हों , उनके भोजन की बुनियादी जरुरत दाल को रातों रात गायब कर दिया गया हो तब भी देश का सबसे मुखर और बड़बोला विपक्ष हार जाय ! महाराष्ट्र में भाजपा की हार को इसीलिए मामूली घटना मानकर हवा में नहीं उड़ाया जा सकता । क्योंकि यह प्रतिपक्ष के रुप में उसकी राजनीति और रणनीति के साथ नेतृत्व की भी हार है । भाजपा के नेतृत्व को राजनीतिक हालातों की कितनी समझ है इसका अंदाजा हरियाणा में अकेले चुनाव लड़ने के उसके फैसले से लगाया जा सकता है । यदि भाजपा इनेलो के साथ वहां चुनाव लड़ती तो हरियाणा से कांग्रेस का बिस्तर बंध गया होता । पार्टी ने यह फैसला तब भी वापस नहीं लिया जब हुड्डा ने विपक्ष में बिखराव देखते हुए समय से पहले चुनावों का ऐलान कर दिया । भाजपा के नेतृत्व ने संकीर्ण दलीय हितों के बजाय अपने दूरगामी हित सोचे होते तो उसे हरियाणा में मुंह छिपाने की जगह मिल गई होती ।दरअसल वस्तुगत परिस्थितियां विपक्ष के साथ होने के बावजूद यदि वह हार गई तो उसे अपने गिरेबान में झांकना चाहिए ।एमएनएस को वोट बंटवारे का दोषी ठहराने की कवायद खंभा नोचने जैसा खिसयाया विश्लेषण है ।क्या भाजपा इतनी नादान पार्टी है कि उसे यह भी पता नहीं कि लोकतंत्र में कोई न कोई वोट बांटने वाला हर चुनाव में मौजूद रहेगा । उसके वोट न बंटे यह पुरुषार्थ तो उसे ही दिखाना है ।भाजपा या किसी भी विपक्षी दल को वोट देने के लिए जनता के पास कोई वैध कारण और तर्क होना चाहिए । जनता को यदि यह भरोसा है कि अमुक दल के सत्ता में आने से उसके हालात बदलेंगे तो वह परिवर्तन के लिए वोट देगा । मनुष्य का स्वभाव परिवर्तन की इच्छा और यथास्थिति बनाए रखने की चाह का घालमेल है । परिवर्तन की पक्षधर ताकतें लोगों में यदि बेहतर कल के सपने को संचरित करने में कामयाब रहती हैं तो आम लोग परिवर्तन के पक्ष में लामबंद हो जाते हैं अन्यथा लोग जड़ता में पड़ा रहना पसंद करते हैं । जड़त्व का नियम सिर्फ निर्जीव वस्तुओं पर लागू नही होता वह समाजों और लोगों पर भी लागू होता है ।वस्तुओं की तरह समाज भी तभी आगे या पीछे सरकते हैं जब उन्हे कोई हिलाता - डुलाता है ।&lt;br /&gt;         यदि सन् 2004 से लेकर 2009 तक भाजपा की राजनीतिक सक्रियता का विश्लेषण किया जाय तो यह आईने की तरह स्पष्ट है कि इन पांच सालों में भाजपा ने ऐसा कोई पुरुषार्थ नहीं दिखाया कि वह उत्तर भारत की जनता को अपने पक्ष में वोट करने को प्रेरित कर सके ।इसे यूं भी कहा जा सकता है कि उसने लोकतंत्र में प्रतिपक्ष का अपना धर्म नहीं निभाया । भाजपा को इस मुगालते में रहने का अधिकार है कि संसद में मात्र उसका संख्याबल ही उसे देश का मुख्य प्रतिपक्षी दल बना देता है , पर व्यवहार में ऐसा है नहीं ।यदि राजनीतिक दल जनता के लिए निरंतर संघर्ष कर राजनीतिक पूंजी नहीं बटोरते तो उनका पूर्व के संघर्षों का संचित पुण्य भी क्षरित होने लगता है और एक दिन ऐसा भी आता है कि वे अतीत की पार्टियां बन जाती हैं । क्या भाजपा के साथ भी यही दोहराया जाने वाला है ? भाजपा की मुश्किल यह है कि वह सत्ता में तो आना चाहती है लेकिन उसके लिए जमीन पर लड़ना नही चाहती । उसके नेता अब सत्ता में आने के लिए सत्ता विरोधी रुझान के भरोसे बैठे हैं । उन्हे लगता है कि यह असंतोष उन्हे प्रतिपक्ष से उठाकर सत्ता में बैठा देगा ।सत्ता की राजनीति ने एक जमाने की इस लड़ाकू दक्षिणपंथी पार्टी को आरामतलब और शाही विपक्ष में रुपांतरित कर डाला है ।विहिप और आरएसएस जरुर चुनावों के आसपास यात्रायें और आक्रामक अभियान चलाकर उसके लिए हिंदू वोटों का जुगाड़ करते हुए दिखाई देते हैं । बदले हुए समय में संघ परिवार के ये उपक्रम कट्टर हिंदुओं को तो उसकी झोली में बनाए रखते हैं पर नया कुछ जोड़ते नहीं ।&lt;br /&gt;अटल बिहारी वाजपेयी के राजनीतिक परिदृश्य से हटने के बाद उसके पास मध्यवर्ग को भा जाने वाला नेता नहीं है और कट्टरपंथी राजनीति की सीमायें बाबरी मस्जिद कांड के बाद साफ हो चुकी हैं ।करिश्माई नेता के नाम पर उसके पास सिर्फ नरेंद्र मोदी है लेकिन वह उन्ही हिंदुओं के नायक हैं जो पहले ही भाजपा के साथ हैं । राजनीतिक संस्कृति और आर्थिक नीतियों के सवाल पर भाजपा कांग्रेस का विकल्प नहीं बल्कि पूरक है । महंगाई,कालाबाजारी,जमाखोरी , मिलावटबाजी और रोजगार असुरक्षा के मुद्दे पर दोनों दलों ने आपस में राष्ट्रीय सहमति कायम कर ली है ।यानी दोनों दलों में कोई भी सत्ता में आए ये समस्यायें ऐसी ही रहेंगी ।जब जनता को यह बुनियादी बात पता है कि भाजपा के सत्ता में आने पर भी उसे कोई राहत नहीं मिलनी है तब वह क्यों भाजपा के पक्ष में खड़ी हो ? रही  बात उच्च वर्ग की , तो वह मनमोहन सिंह , चिदंबरम से खुश है ही , इसलिए मीडिया भी उन पर मुग्ध है ।सवाल यह है कि ऐसी स्थिति में भाजपा किस वर्ग की राजनीतिक जरुरत है जो उसे सत्ता में आता हुआ देखना चाहेगा ? इस सवाल का जवाब ही तय करेगा कि भाजपा का क्या होगा ।भाजपा के लिए यह समय अपनी पूरी राजनीति पर समग्रता से सोचने का है । उसे तय करना होगा कि 21वीं सदी के भारत को क्या वह जनसंघ के नजरिये से देखना चाहती है या फिर कोई नया प्रस्थान बिंदु खोजना चाहती है । उसे ही तय करना है कि वह स्वायत्त राजनीतिक दल बनेगा या आनुषांगिक संगठन की नियति स्वीकार करेगा ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2819485710590251716-5207907662062935667?l=shabdsansad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsansad.blogspot.com/feeds/5207907662062935667/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2009/10/blog-post_23.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/5207907662062935667'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/5207907662062935667'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2009/10/blog-post_23.html' title='कठिन वक्त में भाजपा'/><author><name>Shabd Sansad</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02242133088252450931</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='23' src='http://3.bp.blogspot.com/--JtNUUx-yvg/TsqTmToFzzI/AAAAAAAAALc/4vkSErAt6fE/s220/center%2Bpage%2B4%2Bth%2B%2BIssue%2B01.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2819485710590251716.post-4324884867607708049</id><published>2009-10-09T06:15:00.000-07:00</published><updated>2009-10-09T06:17:42.404-07:00</updated><title type='text'>चिदंबरम के भारत को चाहिए गुलाम आदिवासी</title><content type='html'>&lt;span style="color:#006600;"&gt;   &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;देश के न्यूज चैनलों में इन दिनों एक बच्चे का रुदन है और उसका गुस्सा भी है, जिसमें वह बड़ा होकर पुलिस बनने की शपथ ले रहा है। आज से लगभग 10 साल बाद वह बच्चा जब पुलिस में भर्ती होने लायक होगा तब तक पुलिस कांस्टेबल के पद पर भर्ती होने की घूस कितनी होगी, यह कड़वा सच वह बच्चा नहीं जानता पर चैनल वाले जानते हैं लेकिन बताते नहीं क्योंकि सच बताने से उनकी नक्सलवाद विरोधी मुहिम की पोल खुल सकती है ।&lt;br /&gt;न्यूज चैनलों के खबरनवीस और मालिक लोग चूंकि चिदंबरम के भारत के गणमान्य नागरिक हैं इसलिए ऐसे समय में जब पूरा देश मंहगाई और आर्थिक असुरक्षा से त्राहिमाम कर रहा है तब वे नक्सलवाद से परेशान हैं । हम सबको याद है कि नक्सलवाद के खिलाफ चैनलों के दुलारे चिदंबरम दरअसल इस देश और पाश्चत्य दुनिया में उदारीकरण के पोस्टर ब्वाय रहे हैं । वह भारतीय भद्रलोक के सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली प्रतिनिधियों में से एक हैं । अपने लोकसभा क्षेत्र में चमत्कारिक ढंग से हारते - हारते बचे चिदंबरम के नक्सलवाद विरोधी अभियान के गहरे अर्थ हैं । एक तो यह है कि यूपीए सरकार महंगाई के मोर्चे पर बुरी तरह विफल हुई है । समूचा मध्यवर्ग मंहगाई की मार से त्राहिमाम कर रहा है और केंद्र सरकार और राज्य सरकारें जमाखोरों और मुनाफाखोरों के आगे नतमस्तक हैं । आम लोगों में नौकरियां जाने और मंहगाई की दोहरी मार से गुस्सा है । यह गुस्सा लोगों को नक्सलवाद की ओर धकेल सकता है इससे चिदंबरम और उनका प्रभुवर्ग डरा हुआ है । नक्सलवादियों को तालिबानी टाइप के आतंकवादी के रुप में प्रचारित करने से उनके प्रति आम लोगों के झुकाव को रोका जा सकता है । तीसरा कारण यह है कि मध्यवर्ग आम तौर पर भावुक किस्म का देशभक्त होता है जिसके लिए देशभक्ति सीमा पर लड़ने और आतंकवाद के खिलाफ झंडा बुलंद करने तक सीमित होती है । नक्सलवाद के प्रति मध्यवर्ग के एक छोटे से हिस्से की सहानुभूति रही है । इसमें गांधीवादी, समाजवादी और विभिन्न आदर्शवादी विचारों से जुड़े वे लोग शामिल हैं जो देश के वंचित तबकों के मौजूदा हालातों में बुनियादी बदलाव लाने का सपना देखते हैं । मध्यवर्ग का यही हिस्सा है जो आदिवासियों और गरीबों के साथ पुलिस-प्रशासन,सरकार की ज्यादतियों को एक्सपोज कर देता है। इसलिए भी चिदबंरम चाहते हैं कि मध्यवर्ग में नक्सलियों की छवि देशद्रोही के रुप में स्थापित की जाय। ताकि इस वर्ग में नक्सलियों से सहानुभूति रखने वाले सीमित रहें। यह इसलिए है कि भारत का भद्रलोक देश में विशाल मध्यवर्ग के उभार से चिंतित भी है। उसके लिए यह वर्ग तभी तक प्रिय है जब तक वह उसके उत्पादों को खरीदता रहता है लेकिन यह वर्ग जैसे ही विचारधारा और बुनियादी बदलाव की बात पर आता है तो भद्रलोक चौकन्ना हो जाता है । उसे अपनी रोजी-रोटी कि चक्कर में घनचक्कर बना विचारहीन मध्यवर्ग  तो चाहिए लेकिन समाज के मौजूदा ढ़ांचे को सर के बल खड़ा करने वाला सरफिरे(!) विचार के साथ नहीं।&lt;br /&gt;एक और कारण है जिसके चलते माओवादी चिदंबरम और उनके भारत को सबसे ज्यादा चुभ रहे हैं । भारत के झारखंड , छत्तीसगढ़ और उड़ीसा जैसे राज्यों के आदिवासी इलाके संयोग से खनिज संपदा के खजाने भी हैं । इन इलाकों पर सदियों से बाहरी लुटेरों की नजर रही है। इस दौड़ में मल्टीनेशनल कंपनियां भी शामिल हैं । इन इलाकों में माओवादियों के वर्चस्व के चलते सरकार चाहकर भी इन कंपनियों को जमीन से लेकर सुरक्षा तक जरुरी सुविधायें नहीं उपलब्ध करा पा रही है। हाल ही में स्टील किंग लक्ष्मी निवास मित्तल द्वारा फैक्टरी न लगाने की धमकी को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए । यदि आदिवासी इलाकों को मल्टीनेशनल की चारागाह के रुप में विकसित किया जाना है तब आदिवासी प्रतिरोध को जड़मूल नष्ट करना चिदंबरम के भारत की जरुरत है। यह भारत दरअसल कई खतरों से दो चार है। मजदूर आक्रामक हो रहे हैं और वे उद्योगों के आला अफसरों पर हमला कर रहे हैं । शहरी भारत गरीबी के महासागर से घिरा है । आर्थिक विषमता भयावह रुप से बढ़ रही है जिसके परिणामस्वरुप आम जीवन में हिंसा बढ़ रही है। मामूली विवाद भी हिंसक रुप ले रहे हैं । यह फुटकर और निजी किस्म हिंसा है जो कि सरकारी आर्थिक नीतियों की अप्रत्यक्ष हिंसा का काउंटर प्रोडक्ट है। यह सब उस भारत को संकटग्रस्त कर रहा है जो आर्थिक कुंठाओं की सुनामी के बीच एक टापू बनकर रह गया है ।&lt;br /&gt; इसीलिए कारपोरेट न्यूज चैनलों से लेकर चिदंबरम तक इलीट भारत नक्सलवाद का ऐसा हौवा खड़ा कर रहा है जिससे भारत की एक फीसदी जनता भी प्रभावित नहीं है और जिससे भारत के दो प्रतिशत समृद्ध आबादी के अलावा किसी को खतरा नहीं है। जब जनता के नाम पर नक्सलियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो सकती है तो चिदंबरम और राज्यों की पुलिस कालाबाजारियों व जमाखोरों के खिलाफ उतना सख्त रुख क्यों नहीं अपनाती । जबकि ये लोग देशद्रोही और जनता के दुश्मन नं0 1 हैं । क्या हम ऐसे अभिजात्य लोकतंत्र में रह रहे हैं जिसमें देश के सर्वशक्तिमान दो प्रतिशत हिस्से के दुश्मनों के खिलाफ तो कार्रवाई होती है पर 98 फीसदी लोगों के शत्रुओं को जनद्रोह करने की आजादी है।&lt;br /&gt;माओवादियों की हिंसा पर अनेक सवाल उठाए जा सकते हैं और उठाए जाते रहेंगे । शायद माओवादियों को भी भविष्य में इस सवाल से जूझना पड़े । जैसा विषम और अन्यायपूर्ण भारत मनमोहन, चिदंबरम और उनका प्रभुवर्ग बना रहा है उसमें हिंसक टकराव होते रहेंगे। सेना को नक्सलियों के मैदान में उतारने से सेना की छवि को तो नुकसान होगा ही साथ ही यह कदम आने वाले 25-30 सालों में गृहयुद्ध की पटकथा भी लिख देगा । चिदंबरम भारत को सीमित नागरिक आजादी वाला पुलिस राज्य बनाने की ओर चल पड़े हैं । पहला हमला आदिवासियों पर हो रहा है । यदि यह कामयाब रहा तो आदिवासी तीरकमान के साथ फिर कभी लड़ते नहीं दिखाई देंगे । चिदंबरम के भारत का आदिवासी उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के मंच पर तीर कमान थामे तो दिखेगा पर बस्तर से लेकर संथाल और अबूझमाड़ की अपनी धरती पर हक के लिए तीर कमान के साथ नहीं बल्कि मजदूर के रुप में मल्टीनेशनल कंपनियों के अफसरों के सामने घुटने टेके दिखेगा । यदि यह हमारे सपनों का भारत है तो पाश के शब्दों को दोहराते हुए कहना चाहूंगा कि इस देश से मेरा नाम काट दो ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2819485710590251716-4324884867607708049?l=shabdsansad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsansad.blogspot.com/feeds/4324884867607708049/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2009/10/blog-post.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/4324884867607708049'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/4324884867607708049'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='चिदंबरम के भारत को चाहिए गुलाम आदिवासी'/><author><name>Shabd Sansad</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02242133088252450931</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='23' src='http://3.bp.blogspot.com/--JtNUUx-yvg/TsqTmToFzzI/AAAAAAAAALc/4vkSErAt6fE/s220/center%2Bpage%2B4%2Bth%2B%2BIssue%2B01.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2819485710590251716.post-6562656676907283521</id><published>2009-09-21T01:25:00.000-07:00</published><updated>2009-09-21T01:33:09.575-07:00</updated><title type='text'>रिपोर्ताज       ‘रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून’</title><content type='html'>मानव के आदिम इतिहास में महाद्वीपों के इस छोर से उस छोर को नंगे पैरों से नापने वाले कितने काफिलों, कितने लश्करों अपने डेरे पानी से लबालब नदियों किनारे डाले तो फिर हिले नहीं । दुनिया की महान सभ्यतायें इन नदियों के पानी में स्नान कर या वजू कर खुद को धन्य मानती रहीं । इन आदिम काफिलों में से अनेक जब एंडीज, आल्प्स से लेकर हिंदूकुश  और हिमालय के पहाड़ों से गुजरे तो उनके कदम वहीं थम गए और पहाड़ी झरनों और चश्मों के करीब उन्होने अपनी बस्तियां बसा डालीं । वे कबीले थे और आदिम भी मगर हजारों साल पहले वे मानव अस्तित्व का मूलमंत्र जानते थे । उन्हे पता था कि जहां पानी है , जीवन भी वहीं है । पानी के करीब, पानी की सरपरस्ती में सभ्यतायें सरसब्ज होकर फलती - फूलती रहीं । उन्होने नदियों की शान में  जटिल काव्यमय ऋचायें, मंत्र रचकर उनके प्रति अपनी कृतज्ञता भी जताई । नदियां बची रहें , पानी न सूखे इसलिए वे नदियों और पानी को पवित्र घोषित कर गए । सफर आगे बढ़ा तो पनघटों में गीत गूंजने लगे । प्यार की कितनी ही कहानियों ने पानी भरने के दौरान अंगड़ाईयां लीं ,पनघटों की शीतलता के बीच ये कहानियां जवान भी होती रही होंगी । वे किस्से फिर गीत बनकर अगली पीढ़ियों को कभी दर्द से भिगोती रहीं तो कभी  रोमांस के रोमांच से गुदगुदाती रहीं । तब पनघट पर मीठी ठिठोलियां या छेड़खानियां हुआ करती थीं ।इसी माहौल पर जब ‘‘मोहे पनघट पे नंदलाल छेड़ गयो रे’’ जैसे गीत आया तो पनघट जैसे और भी रुमानी हो गए ।&lt;br /&gt; लेकिन सभ्यता का सफर अब नाजुक मुकाम पर पहुंच गया है । पानी को लेकर जो रुमानी संसार 19 वीं और 20 वीं सदी में रचा गया था वह खंड-खंड होकर बिखर गया है । गीतों की गूंज के बदले गालियों का  शोर है । पानी भरने के दौरान प्यार श् नहीं झगड़े हो रहे हैं । पहाड़ ऊपर से चाहे कितने सख्त और रुखे क्यों न लगते रहे हों लेकिन सबसे ज्यादा पानी उन्ही के पास रहा है । यहां तक कि वे नंग-धड़ंग काले कलूटे पहाड़ भी,जो अपनी छाती पर पेड़ तो दूर नाजुक-नरम घास को भी जड़ें जमाने की इजाजत नहीं देते, उनके भीतर भी पानी के असंख्य सोते छलछलाते रहे हैं । हजारों-हजार झरनों,चश्मों के संगीत से गंूजने वाला गंगा और यमुना का यह मायका भी जल अभाव से होने वाले कलह से अछूता नहीं रहा । पहाड़ी समाज को आम तौर पर लड़ाई-झगड़े से दूर रहने वाला और शांतिप्रिय माना जाता रहा है, पर पानी के संकट से इसका मिजाज बदल रहा है । संयम टूट रहा है , लोग चिड़चिड़े और परले दर्जे के स्वार्थी होते जा रहे हैं । वहां भी पानी को लेकर सर फूट रहे हैं । गाली-गलौच के बीच लगता ही नहीं कि आप उस पहाड़ में हैं जिसके लोगों की भलमनसाहत का कायल सात संमदर पार से आया अंग्रेज एटकिंशन भी रहा,जिसने 19 वीं सदी में लिखे अपने ‘‘एटकिशन गजेटियर’’ यहां के लोगों की सज्जनता की शान में कसीदे पढ़े थे ।&lt;br /&gt;   लगभग 170 साल की लंबी यात्रा में पौड़ी के लिए यह पहला मौका है जब उसे एक-एक बूंद पानी के लिए तरसना पड़ा। यह सचमुच एक कठोर और कठिन साल रहा जब पौड़ी के लोगों को पानी के लिए रतजगा करना पड़ा । बात यहीं तक होती तो गनीमत थी । पानी के लिए वहां झगड़े भी हुए,सर भी फूटे । लोगों का गुस्सा आपस में भी फूटा तो प्रशासन पर भी । नगर पालिका के चेयरमैन से लेकर पानी बांटने वाले विभाग के अफसर तक पिटे ।&lt;br /&gt; बद्रीनाथ के रास्ते पर एक कस्बा है गौचर । 19 वीं सदी के उत्तरार्ध में दो-चार घरों की इस चट्टी में बद्रीनाथ के यात्री अपनी थकान उतारते थे । 25-30 साल पहले भी यह छोटी सी बस्ती हुआ करती थी । दूर-दूर तक फैले समतल खेत इसे सुंदर भी बनाते हैं और बसने के लिए एक माकूल जगह भी ।  इसलिए हाल के वर्शों में गौचर में आबादी बढ़ी और पानी की खपत भी बढ़ी पर पुराने सोते एक-एक कर सूखते रहे । अब हर गर्मियों में पानी के लिए जूझना, भिड़ना गौचर के जीवन का हिस्सा बन चुका है । लेकिन ये गर्मियां गौचर पर भी भारी गुजरीं । पानी को लेकर यह तस्वीर सिर्फ इन दो कस्बों की नहीं है । राज्य के दो दर्जन से ज्यादा कस्बों में पानी को ले कर हाहाकार मचा । पानी को लेकर सर फुटव्वल, लड़ाई, झगड़े धरना,प्रदर्शन और अफसरों का घेराव जैसे वाकये आम होते जा रहे हैं । पर तस्वीर इससे ज्यादा भयावह और चिंताजनक है । उत्तराखंड की एक तिहाई बस्तियां जल संकट से ग्रस्त हैं ।  हजार  से ज्यादा गांवों में पानी बिल्कुल सूख गया है । लगभग सात हजार गांव ऐसे हैं जिनमें जल श्रोतों का प्रवाह आधे से लेकर 70 फीसदी तक कम हो गया है । राज्य में ऐसा कोई गांव नहीं है जिसमें पानी के श्रोत में पानी कम न हुआ हो । अपने वेग और गर्जना से डराने वाली भागीरथी  इतनी दुबली-पतली हो गई है कि उसे देखकर तरस आता है कि आदमी ने एक भरी-पूरी नदी की क्या गत बना दी है । यही हाल अलकनंदा जैसी पानी से लबालब धीर गंभीर नदी का भी है भागीरथी में पानी कम होने से दस हजार करोड रुपए़ की लागत  और एक लाख की आबादी को उजाड़ कर बना टिहरी बांध तीन सालों में ही दम तोड़ने लगा है । वनों से पोषित नदियां ही नहीं बल्कि ग्लेसियरों से पैदा होने वाली नदियों में भी पानी तेजी से घट रहा है । पनबिजली परियोजनाओं के बूते अपनी अर्थव्यवस्था को बेहतर करने का सपना खतरे में है ।  &lt;br /&gt;  यदि पानी के श्रोतों के सूखने की रफ्तार यही रही तो भी अगले दस वर्षों में पहाड़ के अस्सी फीसदी गांवों में पानी के लिए त्राहि-त्राहि मची होगी लेकिन  इन सुदूर गांवों में पानी पहुंचाने में सरकार के पसीने छूट जायेंगे । प्रदेश में पानी को लेकर दंगों के हालात बन जायेंगे ।  एक ओर शहरी आबादी के लिए पेयजल योजनायें बनाने में सरकार को अपने अधिकतम संसाधन झोंकने होंगे । नदियों का पानी चिंताजनक रुप से कम हो जायेगा । वन पोषित अधिकांश नदियां या तो सूख चुकी होंगी ।         &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   सन््् 1970 के बाद समय बदलने लगा था । जो प्रकृति हिमालय के इन पहाड़ों पर मेहरबान थी,हमारे लालचों और लुटेरे मानव गिरोहों की हरकतों के चलते वह रूठने लगी थी । हर समय छलछलाते रहने वाली जलधारायें चुपके-चुपके दम तोड़ रही थीं । सदियों से हमारी प्यास के ये साथी बीमार थे और इस कारण कमजोर होते जा रहे थे । लेकिन हम कभी समझ ही नहीं पाए कि  हमारा सबसे करीबी दोस्त और पहाड़ की जीवनरेखा बीमार है । हम एक सोते के सूख जाने पर दूसरे श्रोत तक जाते रहे । लेकिन पहले वाला क्यों रुठकर गायब हो गया ,यह हमें कभी पता भी नही चला । सातवें-आठवें दशक  तक पानी गांव से दूर भागने लगा था । गांव से दूर होते इस पाणी को लेकर बहुओं का दुख अब लोकगीतों में बोलने लगा था । मुझे अपने बचपन का वह समय याद  आता है जब माॅं पानी लेकर लौटती थी तो उसके चेहरे पर थकान साफ-साफ बोल रही होती थी । निरंतर दूर होते जा रहे पानी के कारण ही  बरसात होने पर वह  पतनालों के नीचे बड़े बर्तन रख देती थी । इनके भर जाने के बाद पतीलियां,लोटे भी लगे हाथ भर लिए जाते थे । इन बर्तनों में गिरती बारिश  की बंूदों का भी एक संगीत होता था । हर बर्तन का अपना खास संगीत ! खाली बरतन पर गिरती बंूदों का संगीत अधभरे बर्तन से अलग होता था । ज्यांे-ज्यों बर्तन भरता जाता था वह गुरु गंभीर आवाज में गूंजने लगता था । बर्तन आकंठ भर कर पानी अब बाहर  बहने लगा है ,इसका पता  भी बारिश  का यही संगीत देता था । हम नींद में भी इस संगीत का मजा लेते थे , वे बरसातें और उनका वह संगीत आज भी स्मृतियों में गूंजता है । बूंदों की भाषा में खाली और भरे बर्तन का फर्क बताने वाला वह संगीत बेहद याद आता है ।&lt;br /&gt; पहले पानी के श्रोत गायब हुए पर अब ऐसा वक्त आ गया है कि हैंडपंप भी संकट में हैं। पानी की तलाश  में उन्हे हर साल धरती की कोख में और गहरे धंसना पड़ रहा है । बावजूद इसके  एक-दो साल में ही उनका गला भी सूखने लगता है और देखते ही  देखते वे दम तोड़ देते हैं । पहाड़ों पर सैकड़ों हैंडपंपों के अस्थिकलश बता रहे हैं कि कभी यहां भी पानी था ।   &lt;br /&gt;            प्रख्यात कवि,कथाकार रसूल हमजातोव के ‘‘मेरा दागिस्तान’’ के एक किस्से में झुकी हुई  कमर और झुर्रीदार चेहरे वाली एक बुढ़िया है जो पानी की उम्मीद में हर रोज फावड़े से जमीन खोदती है । हर सुबह वह उम्मीद से खोदना शुरु करती है और हर तलाश के बाद निराश कदमों से लौटती है । रसूल के किस्सों की वह बुढ़िया कहीं मेरा पहाड़ तो नहीं जो पानी खोज रहा है और उसे पानी का श्रोत ढंूढे  नहीं मिल रहा ! गढ़वाल की लोककथाओं में प्यास से बेचैन एक चिड़िया का जिक्र आता है जो कातर स्वर में आसमान से पानी मांगती रहती है । गरमियों की उदास दोपहर में इस चिड़िया के स्वर की  कातरता विचलित करती है । आने वाले सालों में क्या पूरा पहाड़ इस चिड़िया में बदलने वाला है, कौन जानता है ? रहीम बहुत पहले चेता गए थे कि बिना पानी के सब सूना है । हम इन पंक्तियों की संदर्भ सहित व्याख्या करने और विद्वान उन पर पोथी लिखने में लगे रह गए और उधर पानी सिधार गया ।&lt;br /&gt;   सभ्यता की इस यात्रा में हमने बहुत कुछ ऐसा खोया जो हमारे वजूद के लिए जरुरी थे । इनमें अधिकांश प्राकृतिक रुप से  हमारे मित्र और करीबी रिश्तेदार भी थे । पेड़-पौधे, पशुू-पक्षी और बर्फ जैसी असंख्य नेमतें हमसे रुठ रही हैं । हर साल बर्फ आती और धरती  की सारी खुश्की को अपने आॅंचल में समेट लेती । झक सफेद बालों वाली यह बर्फ  किसी बुजुर्ग की तरह  कभी नरम तो कभी सख्त रुप में पेश आती पर महीनों तक खेत,खलिहान और आॅंगन को अपने स्नेह से भिगोती रहती थी । लाख हटाने के बाद भी जीम रहती थी । अब वही बर्फ मेहमानों की तरह फिल्मी नायिकाओं के नाज-नखरों के साथ आती है और सरकारी कर्मचारियों के अंदाज में ड्यूटी बजा कर गायब हो जाती है । हमने  हिरन के करीबी बंधु-बांधवों घुरड़,काखड़ जैसे मासूम जानवरों से उनके जंगल छीन लिए । रंग-बिरंगी नाजुक चिड़ियाओं से उनके गीत गाने की वजह छीन ली । अपने सबसे करीबी  बुजुर्गों पीपल, बरगद और नीम  को हमने आऊट डेटेड घोषित कर उन्हे दरवाजा दिखा दिया । शीतल हवा और बर्फ सा ठंडा पानी देने वाले बांज जैसे सबसे अनमोल मित्र को हमने अच्छी क्वालिटी के कोयले के लिए  लालच की भट्टी में झोंक दिया । जिन दुर्लभ और अनमोल प्रजातियों की रचना करने में प्रकृति ने हजारों-हजार साल खपा दिए उन्हे मिटाने में हमने एक सदी भी नहीं लगाई । हमारी इन निर्ममताओं और आत्मघाती हरकतों पर कुदरत भला क्यों खफा न हो । उसके दंड कीशुरुआत हवा और पानी से हो चुकी है ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2819485710590251716-6562656676907283521?l=shabdsansad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsansad.blogspot.com/feeds/6562656676907283521/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2009/09/blog-post_2925.html#comment-form' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/6562656676907283521'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/6562656676907283521'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2009/09/blog-post_2925.html' title='रिपोर्ताज       ‘रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून’'/><author><name>Shabd Sansad</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02242133088252450931</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='23' src='http://3.bp.blogspot.com/--JtNUUx-yvg/TsqTmToFzzI/AAAAAAAAALc/4vkSErAt6fE/s220/center%2Bpage%2B4%2Bth%2B%2BIssue%2B01.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2819485710590251716.post-2322467601180391893</id><published>2009-05-14T04:21:00.000-07:00</published><updated>2009-05-14T07:10:04.368-07:00</updated><title type='text'>'लौट आए हैं 18वीं सदी के पिंडारी गिरोह'</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_GeAj9PhRn2Q/SgwkEQezs1I/AAAAAAAAABY/EnFCAiDlZ64/s1600-h/india-election.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5335679314089456466" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 160px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_GeAj9PhRn2Q/SgwkEQezs1I/AAAAAAAAABY/EnFCAiDlZ64/s200/india-election.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;इतिहास के प्रतीक अक्सर राजनीति में आकर हमें बताते रहते हैं कि समय की सदियों लंबी यात्रा में पात्र बदलते हैं, उनके चेहरे बदलते हैं, भाषाएं बदलती हैं, वेशभूषाएं बदलती हैं लेकिन सत्ता की अंतर्वस्तु नहीं बदलती है। यानी सत्ता की बुनियादी चीजें वही रहती हैं। परंतु राजनीति की विडंबना यह नहीं है कि उसमें इतिहास के पात्र या प्रतीक खुद को दोहराते हैं बल्कि हमारे समय की राजनीति की त्रासदी यह है कि उसके नायक इतिहास के अंधेरे कालखंडों के खलनायकों से अद्भुत समानता रखते हैं। ऐसे में यदि 18वीं सदी में मध्य भारत को थर्रा देने वाले पिंडारी ठगों के गिरोह इतिहास की किताबों में आराम करने के बजाय चुनाव में परगट होते लग रहे हैं तो इसका श्रेय लेखकीय कल्पनाओं के बजाय हमारे नेताओं को दिया जाना चाहिए क्योंकि उन्हीं के पुरूषार्थ से हम लोग इतिहास में दफन उन क्रूर पात्रों से रूबरू हो पा रहे हैं।&lt;br /&gt;15वीं लोकसभा के चुनावों पर बात की शुरूआत इतिहास के सबसे खूंखार और कुख्यात ठग गिरोह से करना अजीब जरूर लग सकता है परंतु यह जिक्र अप्रासंगिक तो कतई नही है, यही भारतीय लोकतंत्र और राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना है। खूंखार ठग 18वीं सदी के दौरान उस समय अस्तित्व में आए जब मुगल साम्राज्य जमीन पर खत्म हो चुका था, उसकी सत्ता अपने कारिंदों और चापलूस दरबारियों तक सिमट कर रह गई थी। यह वह समय था जब ईस्ट इंडिया कंपनी के कंपनी बहादुर भारत में दाखिल हो कर इस देश पर काबिज होने की कोशिशों में जुट गए थे। लुंज पुंज केंद्रीय सत्ता के चलते पिंडारी गिरोहों की बर्बरता चरम पर थी।&lt;br /&gt;यदि 18वीं सदी के पूर्वाद्ध के उस दौर और वर्तमान भारत की तुलना की जाए तो हमें कई आश्चर्यजनक समानताएं दिखाई देती हैं। अंबानियों, टाटा, मित्तलों जैसे कंपनी बहादुरों पर मुग्ध लोगों को यह तुलना नागवार गुजर सकती है, लेकिन 18वीं और २१ सदी के भारत में बहुत अंतर नहीं आया है। तब भी भारत की केंद्रीय सत्ता जर्जर हो चुकी थी आज भी केंद्रीय सत्ता जर्जर है। अंतर बस इतना है कि तब केंद्रीय सत्ता का प्रशासनिक और सैन्य वर्चस्व के साथ राजनीतिक व नैतिक बल भी लगभग खत्म हो चुका था तो वर्तमान में भारतीय केंद्रीय सत्ता की कार्यपालिका और न्यायपालिका तो कायम है परंतु उसका राजनीतिक व नैतिक वर्चस्व खत्म हो चुका है। एक भी दल या नेता ऐसा नहीं है जिसका नेतृत्व स्वीकार करने को देश की बहुसंख्य जनता तैयार हो। इसी जर्जर नेतृत्व का नतीजा है कि भारत की केंद्रीय सत्ता के भाग्य का फैसला तम भी क्षत्रप कर रहे थे अब भी क्षत्रप कर रहे हैं। गरीब भारत के प्रति जो उपेक्षा तब था वही आज भी है। जर्जर नेतृत्व का फायदा उठाकर तब भी कंपनी बहादुर भारत की आर्थिक एवं राजनीतिक सत्ता पर काबिज होने को मैदान में उतर चुके थे आज के कंपनी बहादुर भी इसी अभियान में जुटे हैं। अंतर बस इतना है कि तब सिर्फ एक ईस्ट इंडिया कंपनी थी आज कई देशी और विदेशी कंपनियां भारतीय अर्थव्यवस्था और राजनीति पर काबिज हो रही हैं। यदि शासकों और शासितों के बीच की खाई तीन सदी बाद भी लगभग वही है तो इसे भारतीय लोकतंत्र और राजनीति की दरिद्रता न कहें तो क्या कहें?&lt;br /&gt;अब 18वीं सदी के पिंडारियों के किस्से पर लौटें। पिंडारी कुख्यात ठग थे, जो भोले-भाले लोगों को लूटते और निर्ममतापूर्वक उनकी हत्या कर देते थे। 15वीं लोकसभा के चुनाव में जिन दलों व एलायंसों को पूरा देश देख रहा था वे पिंडारी ठगों की यादें ताजा कर रहे हैँ। इतिहास का यही एकमात्र ऐसा प्रतीक है जो देश में चल रही क्रूर राजनीतिक ठगी को पूरे तीखेपन के साथ बयान करता है। इसी पिंडारीपन की बानगी देखिए। जो नीतिश कुमार बिहार में मतदान से पहले नरेंद्र मोदी के खिलाफ ऐसे तेवर दिखा रहे थे मानो एनडीए में मोदी मार्का सांप्रदायिकता के खिलाफ वही अकेले सेकुलर योद्धा हों। उन्होंने बाकायदा ऐलान भी किया कि वह मोदी के साथ मंच साझा नहीं करेंगे। बिहार के मुस्लिम वोट बिदक न जाएं इसलिए नीतिश ने मोदी को बिहार में घुसने तक नहीं दिया। चुनाव प्रचार के मोर्चे पर दिग्विजय को निकलने भाजपा के सबसे बड़े स्टार प्रचारक मोदी को मन मसोस कर रहना पड़ा। लेकिन जैसे ही बिहार का चुनाव निपटा, नीतिश न केवल मोदी के बगलगीर हुए बल्कि दोनों ने एक-दूसरे का हाथ थामकर हवा में लहराया मानो मतदाताओं को चुनौती दे रहे हों। अब जिन मुस्लिमों या सेकुलर किस्म के मतदाताओं ने नीतिश के मोदी विरोधी तेवरों के झांसे में आकर उनकी पार्टी को वोट डाला होगा उन वोटरों के साथ की गई यह राजनीतिक ठगी क्या पिंडारियों की याद नहीं दिलाती! एक और बानगी अपने लालबुझक्कड़ वामपंथी साथियों की है। खुद को कांग्रेस-भाजपा का विकल्प बताने वाले कामरेड करात और वर्धन ने टीआरएस के साथ गठबंधन कर उस पर सेकुलर और प्रगतिशील होने का जो तमगा लगाया उस मैडल को उसने आंध्र प्रदेश में चुनाव निपटते ही एनडीए की रैली के दौरान मोदी और आडवाणी के चरणों में अर्पित कर दिया। पूरे देश ने देखा कि किस तरह कामरेड करात द्वारा प्रमाणित 'सेकूलर योद्धा' चंद्रशेखर राव ने दो-दो हिंदू हृदय सम्राटों के चरणों में गोता लगाकर वाम स्पर्श के दोष से मुक्ति पा ली। जो वोट वामपंथियों को मजबूत करने के लिए डाला गया था वह 'भगवा ब्रिगेडों' को सत्ता में लाने के काम आ रहा है। इन चुनावों में नास्तिक संसदीय कम्युनिस्टों की दो अराध्य देवियां रही हैं। एक उत्तर में मायावती और दूसरी सुदूर दक्षिण में जयललिता। कामरेडों की ये कुलदेवियां चुनाव के बाद किसे 'सत्तारूढ़ भव:' का वरदान देती हैं, यह करात और वर्धन जैसे सांसारिक प्राणी तो क्या दैव भी नहीं जानते। यदि तीसरे मोर्चे के घटकों की अवसरवादिता के कारण केंद्र में भगवा ब्रिगेडों की सरकार बन जाती है तो यह क्या उन वोटरों के साथ विश्वासघात नहीं होगा जिन्होंने वामपंथियों के कारण टीआरएस, बसपा, जयललिता, टीडीपी जैसे दलों को वोट दिया।&lt;br /&gt;तीसरी बानगी कांग्रेस की है जो चुनाव में ममता बनर्जी के साथ मिलकर कम्युनिस्ट विरोधी वोट हड़पती है परंतु चुनाव के बाद उन्हीं वामपंथियों से हाथ मिलाने को तैयार बैठी है। यह क्या पश्चिम बंगाल और केरल के उन वोटरों के साथ ठगी नहीं है जिन्होंने कम्युनिस्ट विरोध के चलते कांग्रेस को वोट दिया। जाहिर है कि इस चुनावी समर में जो दल हैं वे दरअसल 18वीं सदी के पिंडारी गिरोहों का पुनर्जन्म है। इस चुनावी संग्राम में दक्षिण से लेकर ठेठ वाम तक जो योद्धा हैं उनके भीतर लार्ड विलियम बैंटिक के हाथों मारे गए पिंडारी सरदारों की अतृप्त आत्माएं जब-तब दिखाई देती हैं। हां, इतना अवश्य कहा जा सकता है कि वे आत्माएं 18वीं सदी के क्रूड फार्म में नहीं हैं उनके जेनेटिक कोड को 21वीं सदी के हिसाब से संशोधित व परिवर्द्धित कर दिया गया है।&lt;br /&gt;कम वोटिंग को लेकर शाहरूख, आमिर समेत कई सेलेब्रिटीज इस बार खासी परेशान नजर आईं। न्यूज चैनलों ने उन्हें धर दबोचा और 'वोट दो- वोट दो' की दिहाड़ी पर लगा दिया। एनडीटीवी समेत कई न्यूज चैनलों द्वारा किए गए इस धुआंधार प्रचार से कई बार ऐसा लगा कि यदि इस बार वोट न दिया तो आने वाली केंद्र सरकार के गलत फैसलों के लिए अपन को दोषी ठहराया जा सकता हैपर जब पहले चरण में मतदान प्रतिशत लुढ़क गया तो अपनी जान में जान आई कि वोट न देने की हिमाकत करने वाले अपन कोई अकेले नहीं हैं।परंतु एनडीटीवी और अन्य न्यूज चैनलों को जब खुद ही यह पता नहीं है कि वे जिन दलों, प्रत्याशियों को ज्यादा वोटिंग का लाभ मिलने वाला है वे कहां जाएंगे, किसकी सरकार बनाएंगे, ऐसे राजनीतिक ठगों को वोट देने के लिए प्रेरित करने का क्या फायदा? बेहतर होता यदि ये चैनल जनता को प्रत्याशी खारिज करने और जनप्रतिनिधि वापस बुलाने का अधिकार दिए जाने की मुहिम छेड़ते। यह एक ऐसा रास्ता हो सकता है जो लोगों को इन उन्नत नस्ल के पिंडारी गिरोहों से मुक्ति दिलाए।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2819485710590251716-2322467601180391893?l=shabdsansad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsansad.blogspot.com/feeds/2322467601180391893/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2009/05/18.html#comment-form' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/2322467601180391893'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/2322467601180391893'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2009/05/18.html' title='&apos;लौट आए हैं 18वीं सदी के पिंडारी गिरोह&apos;'/><author><name>Shabd Sansad</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02242133088252450931</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='23' src='http://3.bp.blogspot.com/--JtNUUx-yvg/TsqTmToFzzI/AAAAAAAAALc/4vkSErAt6fE/s220/center%2Bpage%2B4%2Bth%2B%2BIssue%2B01.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_GeAj9PhRn2Q/SgwkEQezs1I/AAAAAAAAABY/EnFCAiDlZ64/s72-c/india-election.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2819485710590251716.post-8770018870815797102</id><published>2009-05-05T07:14:00.000-07:00</published><updated>2009-05-12T07:52:31.319-07:00</updated><title type='text'>धधकता हिमालय और फारेस्ट के नीरो</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_GeAj9PhRn2Q/SgmLuhva1MI/AAAAAAAAABA/_8whu_pzB7w/s1600-h/Fire+photo+2.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5334948865044567234" style="FLOAT: 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हैं। इधर जंगल में आग लगी हुई है उधर प्रदेश में आइएएस और आइएफएस सेवाओं के सबसे ज्यादा योग्य और प्रतिभावान बाबू एक के बाद एक रिपोर्ट तलब कर रहे हैं। ग्रामीणों की मौत से सहमी सरकार ने दस करोड़ रुपये की मदद की मांग कर जंगल की आग को केंद्र सरकार के पाले में सरका दिया है।&lt;br /&gt;ऐसा नहीं है कि हिमालय के जंगलों में इसी वर्ष आग लगी हो लेकिन इस वर्ष अप्रैल के अंतिम व मई के प्रथम हफ्ते में लगी भीषण दावाग्नि में सात ग्रामीणों के जलने की घटना के बाद हर साल बढ़ रही आग की घटनाओं को एकाएक फोकस में ला दिया है। वन विभाग में व्याप्त लापरवाही की हद यह है कि जंगल में भीषण आग की चपेट में एक गांव के आने की भनक भी वन विभाग के कारिंदों को नहीं लगी। सिर्फ हरी टहनियों के बूते जंगल की भयावह आग से जूझने वाले ये ग्रामीण इस जंग में अकेले थे। पर्यावरण और वन प्रबंधन के नाम पर हर साल करोड़ों रुपए हजम करने वाला फारेस्ट का अमला मोर्चे से गायब था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिमालय के जंगलों की यह त्रासदी है कि जैसे-जैसे वन विभाग के अमले पर खर्च बढ़ता गया वैसे-वैसे ही आग से प्रभावित वन क्षेत्र भी बढ़ता रहा है। सन 2000-2001 में आग की चपेट में आने वाला वन क्षेत्र सिर्फ 925 हैक्टेयर था। राज्य बनने के इन नौ वर्षों में वन विभाग में प्रमुख वन संरक्षक रैंक के 14, वन संरक्षक रैंक के 27 और प्रभागीय वनाधिकारी स्तर के 87 अधिकारी तैनात हैं। विडंबना यह है कि जिन जंगलों की देखभाल के लिए अफसरों का यह भारी-भरकम अमला बनाया गया उन जंगलों में से 23000 हैक्टेयर जंगल इन नौ वर्षों में स्वाह हो गए। सन 2000-2001 के मुकाबले आग से प्रभावित होने वाला वन क्षेत्र औसतन तीन गुने से पांच गुने तक बढ़ गया है। केवल 20006-07 और 08-09 में ही यह औसत कम रहा है तो यह वन विभाग का नहीं बल्कि अप्रैल, मई और जून में होने वाली वर्षा का कमाल है। इस वर्ष भी अभी तक 2800 हैक्टेयर जंगल स्वाह हो चुका है। जाहिर है कि अफसरों का भारी-भरकम अमला जंगलों को बचाने में विफल साबित हुआ है क्योंकि आग से लड़ने के लिए विभाग के पास न तो जमीनी स्टाफ है और न जरुरी तैयारी ही। अब जंगल की आग का मुकाबला करने के लिए मानदेय पर सीजनल मजदूर रखे जाते हैं जो फील्ड पर कम और कागजों पर ज्यादा होते हैं। जंगल की आग पर काबू पाने के लिए विश्व स्तर पर अपनाए जाने वाली नई तकनीक अपनाना तो दूर वन विभाग ने फायर लाइन और कंट्रोल बर्निंग ब्रिटिशकालीन तकनीक भी छोड़ दी है।जंगल की आग को एक हिस्से में सीमित करने वाली इन फायर लाइनों की देखभाल न होने से वहां भी जंगल ऊग आए हैं। फलतः आग की घटनाएं और प्रभावित क्षेत्रफल दोनों में भारी वृद्धि हो रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जंगल की आग लगने की घटनाओं में हो रही वृद्धि के कई कारण हैं। मानव निर्मित कारणों में सबसे पहला कारण यह है कि जंगलों से सबसे करीब रहने वाले और उन पर आश्रित समाजों को सरकार और वन विभाग ने सुनियोजित रुप से वन प्रबंधन और स्वामित्व दोनों से बेदखल कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के 1994 गोडा वर्मन बनाम भारत सरकार मामले में दिए गए फैसले के बाद तो वनों के करीबी समाजों का वनों में पत्तियां बीनना तक अपराध हो गया। केंद्र और राज्य की सरकारें चाहती तो वनों पर आश्रित समाजों को वन प्रबंधन व स्वामित्व में भागीदार बना सकती थी। लेकिन वन विभाग खुद में इतने निहित स्वार्थों का गठबंधन बन चुका है कि वह जंगलों पर अपना एकाधिकार चाहता है। इससे स्थानीय लोगों का जंगलों के प्रति लगाव कम हुआ है और वे वनों की रक्षा के प्रति उदासीन हुए हैं। इसके बावजूद वे ही जंगल की आग का मुकाबला करने के लिए अग्रिम मोर्चे पर हैं। ग्रामीण भी बरसात में अच्छी घास पाने के लिए जंगलों में आग लगाते हैं, लेकिन यह अकेला कारण नहीं है। फर्जी वृक्षारोपण के सबूत मिटाने के लिए भी जंगल की आग का खेल खेला जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आग की घटनाओं के काबू से बाहर होने के लिए आदमी ही जिम्मेदार है। 19वीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में मिश्रित वनों के निर्मम सफाये के बाद वन विभाग ने चीड़ वनों के विस्तार की जो सुनियोजित मुहिम चलाई उसके चलते ही जंगल में आग अब हद से बाहर हो रही है। उत्तराखंड के जंगलों में चीड़ बडे भाई की तरह सबसे बड़े हिस्से पर काबिज है। वनों के व्यापारिक दोहन के १४० वर्ष के भीतर ही बांज-बुरांस के मिश्रित वन छोटे भाई की तरह कोने में सिमट जाने को मजबूर हो गए हैं। उत्तराखंड़ के ३९३०३६ हैक्टेयर में चीड़ का राज है। सेटेलाइट से प्राप्त चित्रों से जाहिर है कि आग उन्हीं इलाकों में अपना रोद्र रूप दिखा रही है जिनमें बड़े भाई चीड़ का राज है। यह इलाका ४ हजार से लेकर ६ हजार फीट तक फैला है। ऐसा चीड़ की सूखी पत्तियों के अति अधिक ज्वलनशील होने के कारण है। इसके अलावा चीड़ वनों में नमी का स्तर न्यूनतम होता है। नमी न होने से यह इलाका आग के प्रति ओर भी संवेदनशील हो जाता है। ग्लोबल वार्मिंग से पिछली एक सदी में तापमान में हुई बढ़ोत्तरी और अक्सर सूखा पड़ने से जंगल ज्यादा खुश्क हुए हैं तो चीड़ की पत्तियां तेजी से सूख रही हैं। पिछले ५० वर्षों में वनपोषित जलस्रोतों में से ५० फीसदी या तो सूख गए हैं या फिर उनके जल प्रवाह में ७० फीसदी तक की कमी आई है। इसने भी आग को हवा देने का काम किया है।&lt;br /&gt;हिमालय के जंगल जिस तरह से धधक रहे हैं उससे अनिष्ट की आशंकाएं ही प्रबल हो रही हैं। आग से हिमालय के गर्म होने की प्रकिया तेज होगी जो ग्लेशियरों को गलाने की रफ्तार बढ़ा देगा। रहे-सहे वनपोषित जल स्रोत सूखेंगे और यह गंगा के मैदान के मरूस्थल में बदलने की शुरूआत होगी। आग से नष्ट मिश्रित वनों का स्थान चीड़ वन ले लेंगे और फिर जंगल की आग सुरसा के मुंह की तरह हिमालय के ऊपरी हिस्से तक पहुंच जाएगी। आने वाली पीढियां बांज-बुरांस के जंगलों को इंटरनेट की फोटो गैलरियों में ही देख सकेगी। हमारी मूर्खताओं का कुल गुणनफल प्रकृति के इन सबसे खूबसूरत जंगलों को लील लेगा। धधकते जंगल बता रहे हैं कि हिमालय संकट में है। जलते हुए पेड़ों की इस चेतावनी को गौर से सुना जाना चाहिए।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2819485710590251716-8770018870815797102?l=shabdsansad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsansad.blogspot.com/feeds/8770018870815797102/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2009/05/blog-post.html#comment-form' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/8770018870815797102'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/8770018870815797102'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='धधकता हिमालय और फारेस्ट के नीरो'/><author><name>Shabd Sansad</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02242133088252450931</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='23' src='http://3.bp.blogspot.com/--JtNUUx-yvg/TsqTmToFzzI/AAAAAAAAALc/4vkSErAt6fE/s220/center%2Bpage%2B4%2Bth%2B%2BIssue%2B01.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_GeAj9PhRn2Q/SgmLuhva1MI/AAAAAAAAABA/_8whu_pzB7w/s72-c/Fire+photo+2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2819485710590251716.post-6136186706185594167</id><published>2009-04-27T05:32:00.000-07:00</published><updated>2009-04-27T07:02:36.228-07:00</updated><title type='text'>बदल रही है युवा सपनों की तासीर</title><content type='html'>चकराता। बर्फ से ढ़के पहाड़ और हरे भरे जंगलों के ऐसे दृष्य कि आप अपनी सुध बुध खो बैठें। जिन्हें स्वर्ग बहुत लुभाता है, वे इसे स्वर्ग से सुंदर कह दें तो भी इंद्र की शान में गुस्ताखी नहीं होगी और न मेनका और रंभा जैसी वे अप्सरायें नाराज होंगी जो स्वर्ग को उसकी दिव्यता के बीच मानवीय बनाती हैं। कभी-कभी लगता है कि मैदान की गर्मियों से त्रस्त होकर ईश्वर ने चकराता के सुंदर पहाड़ बनाये होंगे। जौनसार का समाज कई मायनों में अनूठा है। गढ़वाल के पहाड़ी समाज से अलग इसका अपना खास रंग है। यह समाज सदियों से बाहरियों को लुभाता रहा है, और कहावतें बनती रही कि जो जौनसार गया वह फिर कभी लौटा नहीं। बाहर से देखने वालों के लिए वह आश्चर्य में लिपटा रहस्यमय लोक बना रहा। किस्से और दंतकथाएं रहस्य की इन परतों को और भी गहरा करती रही। आजादी की आधी सदी गुजर चुकी है लेकिन चकराता अभी भी विकास का ककहरा पढ़ रहा है। अलबत्ता उसके नेता भ्रष्टाचार की विधा में पारंगत हो गए हैं। अपने आप सिमटा, सकुचाया रहने वाला जौनसारी समाज भी बदलाव की अंगड़ाई ले रहा है। उसके भीतर मौजूद आत्मविश्वास अब बोलने लगा है। दरअसल जब सपने बदलते हैं तो समाज भी बदलते हैं। यह किस्सा सपने बदल जाने का ही है।&lt;br /&gt;चकराता के पास एक छोटा सा गांव है। आम पहाड़ी गांव की तरह। करीने से लगे देवदार के जंगल, पहाड़ी ढ़लान पर छोटे-छोटे पर हरे-भरे खेत और सामने दिव्य हिमालय। सदियों से मौसम की विभीषिकाओं, आपदाओं की त्रासदियों के बीच निरे आम लोगों ने इस गांव को एक सुंदर भू-दृश्य में बदला है। उन्हीं आम-अनाम लोगों के श्रम की गंध से इस गांव के खेत और मकान आज भी महकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;हर गांव की तरह गांव के पास परंपराओं की अपनी बेडियां हैं। परंतु परंपराओं की जकड़न  के बीच हर नई पीढ़ी अपने लिए आकांक्षाओं के नए आकाश चुनती है। परंपराओं की बेडियां ढ़ीली पड़ती हैं और मानव सभ्यता थोड़ा आगे सरक जाती है। इसी गांव की एक लड़की है नीलम चौहान। खास बात यह थी कि नीलम को सपना देखना भी आता था और उसके पास वह जिद भी थी जो सपनों को धरती पर उतारने के जरूरी होती है। नीलम का परिवार संयुक्त परिवार है, इतना बड़ा परिवार कि दिल्ली-मुम्बई के लोगों को यह परिवार नहीं बल्कि बारात जैसा लगे। ६० लोगों का परिवार। चकराता के इर्द-गिर्द के इलाके में दूसरा सबसे बड़ा परिवार है। जितना बड़ा परिवार, रिश्तों के धागे में उतने ही गहरा गुंथा हुआ। इतने बड़े परिवार को यदि एक रखना है तो जाहिर है कि परंपराओं और अनुशासन की सख्त चाबुक भी चाहिए होगी। कई पुरूषों और उनकी हां में हां मिलाने वाली महिला सदस्यों के इस भरे-पूरे परिवार में एक किशोर लड़की शादी के सिवा दूसरा सपना देखे भी तो कैसे? पर नीलम ने यह गुस्ताखी कर ही डाली। नीलम ने यदि डाक्टर, इंजीनीयर या टीचर वगैरह बनने का सपना देखा होता तो घर में तूफान न मचा होता, लेकिन परंपराओं में जकड़े समाज ने फैशन को कैरियर बनाना तो किसी कुफ्र से कम न था। सबसे मुश्किल यह थी कि इस लड़ाई में उसके सामने कोई पराये नहीं थे। जिनके खिलाफ उसे अपनी आवाज बुलंद करनी थी, वे सारे के सारे अपने ही थे। वही ताऊजी जिनकी उंगली पकड़ कर उसने चलना सीखा तो वही चाचा-चाचियां जिनके दुलार से राजकुमारी की तरह इतराती थी। यह कठिन परीक्षा थी परंतु घर के इस विरोध में उसके पिता और मां उसके साथ खड़े रहे। एक दिन पूरे गांव ने आश्चर्य के साथ देखा कि बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध की परंपरा में रह रहे समाज की एक लड़की मॉडलिंग के वर्जित क्षेत्र में चली गई। पूरा गांव जैसे डोल गया। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;किसी को लगा कि उनका समाज जैसे तहस-नहस हो जाएगा। गांव की बूढ़ी औरतों के लिए यह घोर कलयुग के आने का शंखनाद था। अनर्थ की इन बूढ़ी आशंकाओं के बीच नीलम मिस दून चुनी गई तो उसके सपनों को जैसे पंख लग गए। यह उस सपने की भी जीत थी जो लालटेन की रौशनी में ठेठ पहाड़ी गांव में देखा गया था। इसके बाद नीलम ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और अक्सर होने वाले फैशन शोज में वह सबसे पसंदीदा चेहरा बन गई। आज नीलम एक प्रतिष्ठित एयरलाइंस में एयर होस्टेस है। वह जब गांव लौटती है हमउम्र और किशोर लड़कियां उसे आश्चर्य मिश्रित कौतुहल के साथ देखती हैं कि वह उन्हीं में से एक है क्या! आज उसके संयुक्त परिवार को नीलम पर नाज है। नीलम को देखकर उसके गांव और आसपड़ोस के गांव की लड़कियों की आंखों में सपने जगमगाने लगे हैं। सपने संक्रामक रोग की तरह होते हैं। वे लोगों की शिराओं में दौड़ते हैं, उन्हें भीतर ही भीतर बदल डालते है। दुनिया की हर क्रांति से पहले भी सपने ही शिराओं में दौड़ते हैं। फर्क फकत इतना ही है कि क्रांतियां गर्जना करती हैं,  लेकिन समाजों के भीतर बदलाव बहुत धीमे, बेहद आहिस्ता-आहिस्ता होते हैं। बसंत की तरह दबे बदलाव समाज की शिराओं में दाखिल होता है और किसी दिन पूरे समाज का रंग-ढ़ंग बदल देता है जैसे बसंत पूरे जंगल को बदल देता है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;नीलम को मुग्ध भाव से देखने वाली ग्रामीण लड़कियों के भीतर भी ग्लैमर की दुनिया में जाने हसरतें हिलोरे ले रही हैं, लेकिन उन इच्छाओं पर वर्जनाओं के पहरे भी हैं। इन सबके बीच नीलम सिर्फ लड़की भर नहीं है। वह उत्तराखंड की लड़कियों की इच्छाओं का चेहरा है, जिनके सपनों का रंग बदल रहा है। पिछले दशकों का वह दौर अब पीछे छुटता जा रहा है जब लड़कियां बीटीसी और बीएड कर सरकारी स्कूलों में टीचर हो जाना चाहती थी। स्कूल में स्वेटर बुनती अध्यापिकाओं के चित्र लड़कियों के दिमाग में दर्ज रहते थे। मध्यवर्गीय और निम्न मध्यवर्गीय परिवारों की लड़कियां अक्सर ऐसा ही कोई सपना देखा करती थी। यह उस समय का सपना था, जो आमतौर पर मध्यवर्ग और निम्न मध्य वर्गीय परिवारों की लड़कियां देखा करती थीं। हालांकि एक छोटी संख्या में लड़कियां डाक्टर, इंजीनियर बनने जैसा सपना तब भी देख रही थी, लेकिन यह आम सपना नहीं था। पिछले पांच-सात सालों में युवाओं और युवतियों में सपनों के स्तर पर बदलाव आए हैं। सिर्फ माता-पिता या परिवार वालों की इच्छा पर आंख मूंदकर बीए, बीएससी या बीकाम करने वाली पीढ़ी धीरे-धीरे कम होती जा रही है। आज के युवा और युवतियां अपनी पसंद के विषय चुनने के जिद भी कर सकते हैं और वे अपने तर्कों से परिजनों को अपनी पसंद मनवाने का माद्दा भी रखते हैं। परिवारों के भीतर पिता की सत्ता कमजोर हो रही है। परिवारों के भीतर लड़कियां भी हाशिये पर नहीं हैं। वे भी बराबरी की ओर बढ़ रही है। यह जो बदलाव है वह भी आज के युवा वर्ग की आकांक्षाओं के दबाव से ही पैदा हुए हैं। इस बदलाव को परिवार नाम की संस्था के ज्यादा लोकतांत्रिक होने का भी लक्षण माना जा  सकता है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;हम अपने सामने जो पीढ़ी देख रहे हैं, वह बिल्कुल वैसी नहीं है, जो हमें बीसवीं सदी के नवें और आखिरी दशक के शुरूआती सालों में दिखाई देती है। उस पीढ़ी और मौजूदा पीढ़ी के सपनों का रंग काफी अलग है। दरअसल बीसवीं सदी के आखिरी सालों में जब आर्थिक उदारीकरण के नतीजे आने लगे तब से हम एक नई तरह की युवा पौध देख रहे हैं। यह पौध आत्मविश्वास में पिछली पीढ़ी से आगे है ही, लेकिन उससे कई गुना ज्यादा महत्वाकांक्षी भी है। उसमें आठवें और नवें दशक के युवा की तरह सरकारी नौकरी हासिल कर जीवन को आराम से गुजारने की ललक की जगह निजी क्षेत्र की नौकरियों का जोखिम उठाने का साहस है। लड़कियां मॉडलिंग, एयर होस्टेस से लेकर होटल मैनेजमेंट तक उन पाठ्यक्रमों में जाना पसंद कर रही है, जिनका जिक्र करते हुए भी आठवें व नौवें के दशक युवतियां घबरा जाती थी। यही बात आज के युवाओं पर भी लागू होती है। वे आगे बढ़ने के लिए जो जोखिम उठाने को तैयार हैं, उत्तराखंड के परंपरांगत समाज के नजरिये से देखें तो यह अहम बदलाव है। युवाओं की मनोदशा में आज यह बदलाव जब-तब सवर्णों के भीतर अंतर्जातीय विवाहों की शक्ल में भी सामने आ जाता है। धीरे-धीरे अंतर्जातीय विवाह भी बढ़ रहे हैं, और अब ऐसे विवाहों में परिवार की नाराजगी के बजाय भागीदारी बढ़ रही है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;हम अपने समय की ऐसी महत्वाकांक्षी पीढ़ी को देख रहे हैं, जो अपनी उपस्थिति भी जता रही है और अपने इरादों को लेकर मुखर भी है। लेकिन वे विशेषताएं मौजूद युवा पीढ़ी को खास बनाती है। यह भी नहीं भूला जाना चाहिए कि उन पर अपनी पूर्ववर्ती पीढियों से कहीं ज्यादा उम्मीदों का बोझ है। &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2819485710590251716-6136186706185594167?l=shabdsansad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsansad.blogspot.com/feeds/6136186706185594167/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2009/04/blog-post_27.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/6136186706185594167'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/6136186706185594167'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2009/04/blog-post_27.html' title='बदल रही है युवा सपनों की तासीर'/><author><name>Shabd Sansad</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02242133088252450931</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='23' src='http://3.bp.blogspot.com/--JtNUUx-yvg/TsqTmToFzzI/AAAAAAAAALc/4vkSErAt6fE/s220/center%2Bpage%2B4%2Bth%2B%2BIssue%2B01.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2819485710590251716.post-1713046788549369722</id><published>2009-04-21T02:42:00.000-07:00</published><updated>2009-04-23T08:26:00.949-07:00</updated><title type='text'>छोटे दल, मनमोहन का डर</title><content type='html'>जब से बाईपास सर्ज्ञरी हुई है तब से सुस्त और उदासीन से दिखने वाले मनमोहन सिंह पूरी फारम में लौट आए हैं। उनके दिल को खून की आपूर्ति क्या बहाल हुई कि वह ताबड़तोड़ हमले करने में जुट गए हैं। दिल जब आपका साथ देता है तो मनमोहन भी आडवाणी को ललकार सकते हैं। चुनावी ललकारों के बीच मनमोहन ने क्षेत्रीय दलों को देश के लिए नुकसानदेह बताकर एक नई बहस को जन्म दिया है। यह मनमोहन का राजनीतिक अग्यान भी है कि वह इस देश और उसके विभिन्न समाजों के बारे में कितना कम जानते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पीएम की इस टिप्पणी के जवाब में देश भर से कई प्रतिक्रियाएं आईं जिनमें मनमोहन की आलोचना की गई थी। दरअसल क्षेत्रीय दलों के चरित्र पर बहस शुरू करने से पहले मनमोहन के इस बयान के निहितार्थ समझे जाने चाहिए। भारतीय राजनीति में 1966 को एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाना चाहिए। 1962 के भारत चीन युध्द में हुई हार से नेहरू और कांग्रेस का पतन शुरू हो गया। विकल्प के अभाव और नेहरू जैसे व्यक्तित्व के कारण कांग्रेस की लोकप्रियता में पड़ रही दरारें दिखाई नहीं दे रहीं थी लेकिन वक्त की धूप, हवा और पानी ने इस किले को भीतर और बाहर दोनों ओर से खाना शुरू कर दिया था। 1964 में नेहरू के अवसान के साथ कांग्रेस की रक्षा करने वाली उनकी विराट छवि भी न रही। १९६७ आते-आते उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक कांग्रेसी किले में पड़ रहीं दरारें दिखने लगी थी। इंदिरा गांधी के उदय से कांग्रेस की विशाल इमारत का दरकना रूक गया। इंदिरा के करिश्मे ने कांग्रेस से मोहभंग की प्रक्रिया को रोक दिया। लेकिन यह इतिहास की विडंबना ही है कि उसी इंदिरा गांधी की इमरजेंसी ने इस प्रक्रिया को आंधी में बदल दिया। 1977 में कांग्रेस की अजेयता को जो चुनौती मिली वह 1989 में दोहराई गई और फिर लगातार दोहराई जा रही है। बीसवीं सदी के आखिरी दशक को भारतीय राजनीति में आये सबसे बुनियादी बदलाव के लिए रेखांकित किया जाना चाहिए। यह वही दशक था जब न केवल भारत का प्राकृतिक मौसम बदल रहा था बल्कि देश की राजनीतिक आबोहवा भी बदल रही थी। देश की राजनीति की भाषा व्याकरण में भी बुनियादी बदलाव तो आए ही साथ ही राष्ट्रीय राजनीति से एकाधिकार का युग भी विदा हो गया।&lt;br /&gt;21वीं सदी में हम जिस राजनीतिक भारत का नक्शा देख रहे हैं वह न तो कांग्रेसी और न ही भगवा रंग में रंगा हुआ है। यह ऐसा बहुरंगी भारत है जिसमें पूर्वोतर से लेकर सुदूर दक्षिण तक मौजूद जातियां और क्षेत्र अपने-अपने रंगों के साथ उपस्थित हैं। मनमोहन सिंह की मुश्किल यह है कि वह ऐसा भारत चाहते हैं जो भले ही जातियों क्षेत्रों और आर्थिक आधार पर विभिन्न स्तरों पर विभाजित हो लेकिन राजनीतिक रूप से वह एक रूप हो। दरअसल कांग्रेस को 1952 वाला भारत चाहिए तो भाजपा कांग्रेस वाले भारत में भगवा रंग भरकर अपने वाला एक रूप भारत चाहती है। यानी ठीक वैसा भारत जैसा आरएसएस के &lt;strong&gt;बंच आफ थाट्स&lt;/strong&gt; में लिख दिया गया है। लेकिन इस देश के साथ मुश्किल यह है कि यह न तो कांग्रेस और न भाजपा की राजनीतिक भाषा, व्याकरण में बोल रहा है। 21वीं सदी के राजनीतिक भारत की सामाजिक- राजनीतिक आकांक्षाएं अपने-अपने सुरों में बोल रही हैं। अगर ये सुर मनमोहन को रास नहीं आ रहे हैं तो यह उनकी राजनीति और समझ की समस्या है न कि भारतीय समाज की। मनमोहन को जानना चाहिए कि भारत को यदि एक संघीय गणराज्य बनाने का संविधान निमार्ताओं का निर्णय आखिर यूं ही हवा-हवाई नहीं था। वे जानते थे कि भारतीय समाज जापानियों अंग्रेजों या जर्मनों की तरह सपाट समाज नहीं है। भाषा, जातियां, धार्मिक विश्वास़, भूगोल और संस्कृतियां भारतीय समाज को कई राष्ट्रीयताओं और उपराष्ट्रीयताओं में बांटते हैं। हम भारत नाम के जिस राष्ट्र राज्य को प्रशासनिक तौर पर देख रहे हैं वह दरअसल इन्हीं विभिन्न वर्णी समाजों का संघीय रूप है। भारतीय संविधान ने इस सच्चाई को स्वीकार कर इसे एक प्रशासनिक ईकाई बनाया है। इससे पहले भी अंग्रेजों से लेकर अकबर तक और उससे पहले के मध्यकालीन भारत में भी जो भी साम्राज्य आए उन्होंने अपने माताहत रियासतों की पहचान में कोई छेड़खानी नहीं की। इसलिए मनमोहन सिंह को यह जानना चाहिए कि वह भारत के विभिन्न समाजों की राजनीतिक पहचानों में जिन विविधताओं से हैरान हैं वह दरअसल भारत के डीएनए में है। 1952 से 1962 के एक दशक में यह विविधता भले ही नेहरू गांधी के करिश्मे में ढंक गई हो लेकिन तब भी इसकी अंतर्धाराएं लगातार मौजूद रहीं। कांग्रेस के पुण्यों और करिश्मे का ग्लेशियर जैसे ही पिघलने लगा तो द्रविड़ से लेकर मलयाली बंगाली तक सारी अंतर्धाराएं दिखने लगीं। मनमोहन जिन राजनीतिक शक्तियों के उभार से परेशान हैं वे सारी की सारी गैर कांग्रेसवाद की कोख से जनमी हैं। कांग्रेस की विफलताओं ने ही गैर कांग्रेसवाद जैसी नकारात्मक राजनीति को विचारधारा में बदल दिया। छोटे दलों के उभार पर मनमोहन को शिकायत करने का नैतिक अधिकार नहीं है। मनमोहन छोटे दलों के उभार से इसलिए भी नाराज हैं क्योंकि इन दलों के कारण ही वह अपने उस आर्थिक एजेंडे को पूरी तरह लागू नहीं कर पा रहे हैं जो विश्व बैंक़, डब्लूटीओ और बहुराष्ट्रीय कंपनियां चाह रही हैं। हालांकि वह काफी हद तक भारत की परंपरागत अर्थव्यवस्थाकी रीढ तोड़ने में कामयाब रहे हैं लेकिन यह उतनी तेजी से नहीं हो पा रहा है जितना कि उदारीकरण के मालिक लोग अपने भारतीय कर्मचारियों से चाह रहे हैं।&lt;br /&gt;दरअसल उदारीकरण की सबसे बड़ी चैंपियन पार्टियां कांग्रेस और भाजपा देश में अमेरिका की तरह दो दलीय लोकतंत्र चाहती हैं। यह सिर्फ संयोग नहीं है कि विश्व बैंक़ डब्लूटीओ भी यही चाहते हैं क्योंकि दो दलीय लोकतंत्र को अमेरिका की तरह  कारपोरेट लोकतंत्र में बदला जा सकता है। कांग्रेस और भाजपा कारपोरेट हितों की रक्षा करने में अपने कौशल को साबित कर चुकी हैं। इसलिए भारतीय हो या विदेशी कारपोरेट जगत यही चाहता है कि चुनाव कांग्रेस और भाजपा के बीच सीमित हो जाए ताकि ऐसे दल सत्ता में न आ सकें जिन पर वोटर का करीबी नियंत्रण है। छोटे दलों का अस्तित्व ही चूंकि लोकप्रियतावादी नीतियों पर टिका है इसलिए समर्थकों की प्रतिक्रियाओं से भी इन दलों की नीतियां बनती-बिगड़ती रहती हैं। तो मनमोहन अकेले नहीं है और न ही हेडगेवार अकेले थे जिन्हे गंजे की तरह सपाट भारत चाहिए था वह अकेले नहीं जिन्हें गरीब और अमीर की वर्गीय विविधता वाला भारत तो चाहिए लेकिन राजनीतिक रूप से सपाट देश चाहिए। लेकिन इन महानुभावों की त्रासदी यह है कि वे देश नहीं चुन सकते इसलिए विधवा विलाप करते हुए भी उन्हें इसी भारत में रहना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इन तर्कों में देश के छोटे दलों की राजनीति का औचित्य साबित करने का खतरा भी छुपा है। दरअसल भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का उभार दक्षिण भारत से शुरू हुआ जहां द्रविड़ राजनीति के सूत्रधार के रूप में डीएमके, एआईडीएमके, टीडीपी ने अपना सफर शुरू किया। लेकिन अब भारतीय राजनीति में छोटे दलों की भरमार है। बीसवीं सदी के नवें दशक और 21वीं सदी के पहले दशक में इन छोटे दलों में से अधिकांश ने  केंद्र और राज्य स्तर पर गठबंधन की जो राजनीति की है वह भारतीय राजनीति में अवसरवाद की पराकाष्ठा है। भारतीय राजनीति के बहुध्रुवीय और विकेंद्रीयकृत होने की जो उम्मीद इन छोटे दलों से जगी थी उसे इस अवसरवाद ने चूर-चूर कर दिया। इनमें से कई छोटे दलों ने यह भी साबित कर दिया की बौने नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की निकृष्ट अभिव्यक्ति हैं। इनमें से अधिकांश दलों ने अपने आचार- व्यवहार और राजनीति से ऐसा कुछ भी साबित नहीं किया जिससे यह लगे कि देश और दुनिया के बारे में इन दलों का अपना कोई नजरिया है। देश और दुनिया के बारे में न कोई समझ, न कोई सपना, अधिकांश छोटे दलों के बारे में सच्चाई यही है। इसलिए इन दलों को कभी भाजपा, कभी कांग्रेस तो कभी कम्युनिस्टों के साथ गठबंधन करने में न झिझक महसूस होती है और न शर्म ही आती है। इस वैचारिक अराजकता और परले दर्जे की सत्तालिप्सा ने ही कांग्रेस और भाजपा को छोटे दलों के खिलाफ माहौल बनाने का मसाला दिया है। देश में मध्यवर्ग के एक हिस्से में कांग्रेस और भाजपा का यह प्रचार असर भी दिखा रहा है। छोटे दलों की यह विफलता देश को दो दलीय राजनीति की ओर ले जाएगी जिसके नतीजे देश के लिए खतरनाक होंगे । क्योंकि आर्थिक नीतियों से लेकर भ्रष्टाचार सत्ता के चरित्र तक ये दोनों दल एक दूसरे के क्लोन हैं। अंतर इतना ही है कि भाजपा में भगवा रंग वाला डीएनए थोड़ा गाढे रंग और कांग्रेस में यह डीएनए हल्के भगवे रंग का है।&lt;br /&gt;दुर्भाग्य से यदि राजनीति कांग्रेस और भाजपा तक सीमित हुई तो ये दोनों दल सड़क से लेकर संसद तक फ्रेंडली मैच खेलेंगे और हर पांच वर्ष दल तो बदलेंगे लेकिन हालात वही रहेंगे। देश को यदि बड़े दलों की आपदा से बचना है तो उसे सही मायनों में क्षेत्रीय या आंचलिक सवालों पर राजनीति करने वाले दलों की जरूरत है। तब जाकर ही भारतीय संसद और राजनीति का चरित्र सही मायनों में संघीय हो सकेगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2819485710590251716-1713046788549369722?l=shabdsansad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsansad.blogspot.com/feeds/1713046788549369722/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2009/04/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/1713046788549369722'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2819485710590251716/posts/default/1713046788549369722'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsansad.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='छोटे दल, मनमोहन का डर'/><author><name>Shabd Sansad</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02242133088252450931</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='23' src='http://3.bp.blogspot.com/--JtNUUx-yvg/TsqTmToFzzI/AAAAAAAAALc/4vkSErAt6fE/s220/center%2Bpage%2B4%2Bth%2B%2BIssue%2B01.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2819485710590251716.post-6501031150137637929</id><published>2009-03-28T06:16:00.000-07:00</published><updated>2009-03-28T09:03:31.262-07:00</updated><title type='text'>भाजपा - फिर से उन्मादम् शरणम् गाच्छामि</title><content type='html'>भारतीय राजनीति को विकास, गरीबी, अमीरी,मंहगाई, बेरोजगारी के मुद्दों से भटकाकर उसे धार्मिक उन्माद के बीहड़ में धकेलने के लिए यदि किसी एक राजनीतिक दल ने सर्वाधिक योगदान दिया है तो वह भारतीय जनता पार्टी ही है। इसे आत्मविश्वास की कमी कहें या सुविधाजनक रास्ता पकडने की आदत भाजपा जनसंघ के जमाने से ही भावनात्मक मुद्दों की तलाश में भटकती रही। बाबरी मस्जिद के ध्वंस से लेकर गुजरात दंगों तक कई कुख्यात कांडों को अंजाम देने वाली इस पार्टी की मुश्किल यह है कि वह भारतीय जनमानस पर यकीन करने के बजाय अयातुल्ला खुमैनी की विचा
